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Saturday, August 15, 2020

दुनिया एक रंगमंच है : जुमले के निहितार्थ स्तानीस्लावस्की (Stanislavsky's The Unbroken Line) के बहाने से

रंगमंच से अपेक्षा है कि यहां स्वतंत्र चिंतन होता रहना चाहिए । स्वतंत्र चिंतन से एक आशय यह ही है कि रंगमंच पर वैचारिक मंथन के पश्चात ही चीजों को लोगों तक ले जाएँ। आशय यह भी है प्रचलित जुमलों नारों को पहले समझें और उनके निहितार्थ लोगों के सामने भी रखें। 

एक जुमला है जिसे रंगमंच के संबंध में हर कोई प्रयोग करता है, "दुनिया एक रंगमंच है और हम उसके किरदार हैं।" आज हम इस जुमले को समझेंगे। जैसे एक वीडियो में हमने "जय रंगकर्म" पर विचार किया था। 

यदि आप उस वीडियो को देखना चाहते हैं तो यहाँ उसका लिंक दिया गया है।



दोस्तो आपने यदि फॉलो नही किया है तो कर लें ताकि आपको पोस्ट मिलते रहें। पोस्ट पसन्द आये तो कमेन्ट व शेयर करें। 

"दुनिया एक रंगमंच है" या फिर "जीवन एक रंगमंच है" जैसे वाक्य अक्सर लोगों द्वारा प्रयोग किए जाते हैं। इसका आशय लोक के संदर्भ में तो सब समझते हैं । हम इसको नाट्य सिद्धांतों के संदर्भ में देखेंगे। इस संदर्भ में आप अपने रोजमर्रा की जिंदगी को देखेंगे तो अभिनय के लिए आपको बहुत-सी अंतर्दृष्टि मिलेगी। उदाहरण के तौर पर आप इसे ऐसे समझें। आप अपने दोस्त के साथ कभी स्कूल में होते है, फिर बाजार में भी कुछ समय साथ होते हैं और कभी-कभी आप अपने दोस्त के साथ उसके घर भी चले जाते हैं। अब आप अपने तीनों जगह होने को विश्लेषित कीजिए। वहाँ किए गए व्यवहार को देखिए। एक-सा रहता है या संदर्भ के साथ बदलता है?

क्या तीनों जगह दोस्त के साथ आपकी भाषा एक जैसे होती है? तीनों जगह आपका शब्द चयन कैसे बदल जाता है। क्या आपकी अपने मित्र के साथ बॉडी लैंग्वेज वैसी ही उसके घर पर भी होती है जैसी कि बाजार या रास्ते में थी? आप देखेंगे कि आपका किरदार तीनों जगह चमत्कारिक रूप से बदल जाता है। 

यह अलग-अलग रूप धरने में हम इतने सिद्धहस्त कैसे हो जाते हैं? जगह, संदर्भ बदलते ही कैसे अलग भाषा, अलग शब्दावली, अलग टोन, अलग मुहावरे, अलग भंगिमाएं अपना लेते हैं? अगर इसे हम समझ जाएं तो हमें अपनी नाट्य भूमिका में जाने का बीज यहां से कुछ हद तक मिल सकता है। दरअसल यह हम इसलिए कुशलता से कर लेते हैं क्योंकि दोस्त के साथ साहचर्य से हम उसके संदर्भ, पर्यावरण को समझने लगते हैं। उसके साथ व्यवहार के विभिन्न बिंदु निर्धारित करते चलते हैं। इन्ही बिंदुओं को मिलाकर विभिन्न एक्शन की एक अविभाज्य रेखा का निर्माण कर लेते हैं। इसी कार्यशृंखला के साथ दूसरी चीजें जो अचेतन में पहले से विद्यमान हैं, जुड़ती चली जाती हैं। जैसे भाषा, शब्द, टोन, शारीरिक भंगिमाएं। इसी कार्य श्रृंखला को ही तो स्तनिस्लावस्की The unbroken line of actions कहते हैं। सतानिस्लावस्की कहते हैं आप अपनी भूमिका में तब जा सकेंगे जब आप उस कार्यशृंखला की अटूट रेखा को बना सकेंगे। उनका कहना है कि स्क्रिप्ट में दिया गया किरदार अधूरा होता है। उसके जीवन का बहुत छोटा हिस्सा ही आलेख में होता है जबकि किरदार के जीवन का कैनवास विशाल व विस्तृत है। वो कहते हैं कि आप देखिए कि आपका किरदार तब क्या करता है जब वह दृश्य में नहीं होता है। यानि स्टेज पर नहीं होता है। जो दृश्य दिया हुआ है, उस वर्तमान के साथ अतीत से होते हुए भविष्य तक एक अविभाजित रेखा गुजरती है। यह रेखा वर्तमान में तो दिखती है लेकिन अतीत व भविष्य में अदृश्य है। इस रेखा को अभिनेता को अपनी किरदार की समझ के आधार पर कल्पना के सहारे उभरना होता है, अपने मन में। मसलन उसकी भूमिका का किरदार सभी काम करता है - सोता है, दौड़ता है, तैरता है, नहाता है, खाता है, पीता है। उन सभी क्रियाओं पर आपको गौर करना होगा कि वह यह सब कैसे करता होगा। तभी आप unbroken line ऑफ एक्शन तैयार कर सकेंगे। जब आपके मन में यह तरतीब बन जाती है तो आप सहज पात्रानुकूल भूमिका में जाकर अभिनय करने का एक मार्ग प्रशस्त कर लेते हैं। अपने वास्तविक जीवन में हम सम्पूर्ण जीवन के फ़लक से परिचित होते हैं तो यह unbroken line अनायास ही बन जाती है किन्तु नाटक में अभिनय के लिए हमें पाठ से बाहर झांकना पड़ता है। 

इसके अतिरिक्त भी स्तनिस्लावस्की ने और भी तकनीकें बताई हैं उनका अभी किसी और संदर्भ से जिक्र करेंगे।

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दलीप वैरागी 
09928986983 

 



Sunday, July 19, 2020

नए अभिनेता बैकस्टेज (Backstage) नहीं करना चाहते हैं ?

Why newly joined actor don't like to do backstage

अभी पिछले दिनों थियेटर की एक वेबिनर से जुड़ा था। वहाँ किसी रंगकर्मी ने प्रश्न किया था। थियेटर से नए - नए जुड़ने वाले अभिनेता Backstage क्यों नहीं करना चाहते हैं ? इस प्रश्न का उस समय जो जवाब बना मैंने देने की कोशिश की थी किन्तु मुझे लगा कि इस प्रश्न पर एक रंगमरमी के तौर पर और मंथन करना चाहिए। 

भाषा की दृष्टि से समस्या का बयान 

अगर शब्दावली पर गौर की जाए तो Backstage शब्द में ही दिक्कत है।  क्योंकि Back एक तुलनतमक शब्द है  जो पीछे होने का आभास कराता है। इसके मतलब को समझने के लिए उस स्थिति को समझना पड़ता है कि किससे पीछे ? .... दरअसल हमारे यहाँ आगे-पीछे .... ऊपर-नीचे... बड़ा-छोटा जैसी शब्दावलियों के शब्दकोशीय अर्थों के अलावा समाजशास्त्रीय पर्याय भी होते हैं और ये समाज शास्त्रीय पर्याय अलग संदर्भों में भी अर्थ ग्रहण को प्रभावित कर जाते है। यह अर्थ भंगिमा हमारे चिंतन और चीजों को देखने के दृष्टिकोण को भी प्रभावित करती हैं। यह तो समस्या को भाषा वैज्ञानिक रूप से देखना हुआ। अब नाट्यशास्त्र के अनुसार देखते हैं। 

नाट्यशास्त्र क्या कहता है 

नाट्यशास्त्र के अनुसार देखें तो वहाँ अभिनय को Onstage या Backstage में बाँट कर नहीं देखा गया है। यहाँ हर चीज़ सेंटर स्टेज है। कोई आगे-पीछे नहीं, ऊपर-नीचे नहीं। यहाँ नाटक का एक बड़ा छाता है, जिससे भरत मुनि ने विविधरूपा कलाओं को  पूरे सम्मान के साथ आच्छादित कर दिया है। 
थियेटर से नए जुडने वालों का Backstage की गतिविधियों से न जुड़ पाने का एक और कारण अभिनय को लेकर भ्रांत धारणा है। उनकी नजर में अभिनय का आलंबन केवल मंच के ऊपर आकर चल फिर रहा तथाकथित अभिनेता ही है। उसके अलावा जो भी कार्यव्यापार है वह अभिनय नहीं है। जाने अनजाने में हम तथाकथित वरिष्ठ रंगकर्मी भी उनकी इस धारणा को मजबूत ही करते हैं। दरअसल नाट्यशास्त्र रंगमंच की परिधि में लगभग सभी आयामों को अभिनय के चार रूपों यथा आंगिक, वाचिक, आहार्य तथा सात्विक में ही समेट  कर रख देते हैं। फिर यह आगे व पीछे का भाव ही समाप्त हो जाता है।   नए शामिल होने वाले अभिनेताओं को शुरू में ही थियेटर की यह  वृहद तस्वीर दिखानी चाहिए। केवल अभिनेता ही रंगमंच का केंद्र नहीं जैसा कि दिखाई देता है। यद्यपि Stanislavsky भी अभिनेता को केंद्र में रख कर अपना अभिनय सिद्धान्त रचते हैं लेकिन वे अभिनेता को मंच दूसरी चीजों से इस कदर बांधते हैं कि उसमें वह अलगाव पैदा ही नहीं हो सकता है। 

क्या होना चाहिए  

जब भी नए अभिनेता थियेटर से जुडते हैं तो वे अपने साथ एक समृद्ध कलात्मक अनुभव या कौशल लेकर आते हैं। निर्देशक उन्हें रिक्त पात्र मान कर नए ज्ञान से स्नान करना शुरू कर देते हैं। जबकि निर्देशक को नए जुडने वाले कलाकार का एक Baseline assessment करना चाहिए कि 
वह किस विशेष हुनर को अपने में धारण किए हुए है?
वह हुनर किस स्थिति में है?
उस हुनर को किस दिशा में आगे बढ़ाया जा सकेगा?
रंगमंच पर वह दक्षता किस रूप में अपना योगदान दे सकेगी?
यदि निर्देशक उपरोक्त बातों पर गौर करके आगे बढ़े तो वह उस यक्ष प्रश्न का समाधान पा जाएगा कि "क्यों लोग Backstage नहीं करना चाहते? 
यदि नए जुडने वाले कलाकार की रुचियाँ, रुझान व कौशलों को रंगमंच की प्रक्रिया (प्रस्तुति निर्माण ) में स्थान व महत्व मिलेगा तो वे अवश्य जुड़ना चाहेंगे।  

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दलीप वैरागी 
09928986983 

Tuesday, February 5, 2019

नाट्यकला : मेरी समझ



नाटक(Theatre) पर अलग-अलग समय पर इस ब्लॉग पर अपने विचार रखता रहा हूँ। सभी लेख इस ब्लॉग पर बिखरे पड़े थे,  पाठकों की सुविधा के लिए मैंने उन्हें एक जगह पर सूचीबद्ध किया है। नीचे सूची में लेखों के शीर्षक दिए हैं। उन शीर्षकों पर क्लिक करने पर संबन्धित लेख खुल जाएगा।  
  1. सामूहिक अचेतन में धँसी टुकड़ा-टुकड़ा तस्वीरों को नाटक ही जोड़कर बाहर ला सकता है।
  2. नुक्कड़ नाटक : होश में कब तक आएंगे ?
  3. दूसरे के जूते में पैर रख के देखो
  4. अंतर्राष्ट्रीय रंगमंच दिवस : आओ, लोगों को नाटक का चस्का लगाएँ
  5. ग्रीष्म नाट्य उत्सव 2017 : उसके इंतज़ार में उर्फ आखिर तक सुर बदल गया
  6. द मैरिज प्रोपोज़ल : अरण्य में कहकहे तलाशता एक हास्य
  7. अलवर की एक शाम किस्सागोई के नाम - दलीप वैरागी
  8. गुड्डी गायब है उर्फ जनता ऊँचा सुनती है
  9. “ भूलेंगे तो तब न, जब हम उसे रटेंगे!”
  10. नाटक केवल प्रॉडक्ट नहीं होता
  11. अलवर रंग महोत्सव: एक खूबसूरत नाट्यानुभव
  12. अभिव्यक्ति अपना व्याकरण खुद रच लेती है।
  13. हास्य नाट्य समारोह के ठहाकों की गूंज अलवर की फिज़ाओं में कई दिन तक रहेगी
  14. मोहन से महात्मा और नाटक
  15. एक अमेच्योर एक्टर की डायरी - 1 : रटें या रमें
  16. कहानी कोई भी मोड़ ले सकती है
  17. नाटक को पाठशाला से प्रेक्षागृह में निर्देशक बदलता है
  18. लघु नाटिका - सब कुछ सड़क पर...
  19. नाम में मिला होता है अपमान का घूंट
  20. एकल नाटक : उत्तर कामायनी
  21. स्थगित नाटक उर्फ गुमशुदा सवाल है
  22. शो मस्ट गो ऑन
  23. थियेटर एक्सर्साइज़ : ग्रुप डायनामिक्स 1
  24. थिएटर एक्सर्साइज़ ( Theatre Exercise) : Mime and movement - 1
  25. थियेटर एक्सर्साइज़ (Theatre exercise-2) : स्थायी पता
  26. रंगमंचीय गतिविधियां एवं अभ्यास (Theatre exercises) -1 : (Image) इमेज
  27. विश्व रंगमंच दिवस : समस्याओं से जूझता अलवर का रंगमंच
  28. नाटक और रटना
  29. नाटक, संभावनाओं का मंच (भाग - 1) : खामोश नाटक जारी है
  30. नाटक संभावनाओं का मंच (भाग 2) : नाटक क्या करता है
  31. नाटक संभावनाओं का मंच (भाग-3) : धीरे-धीरे आइसबर्ग का बाहर आना
  32. नाटक संभावनाओं का मंच ( भाग 4 )
  33. नाटक संभावनाओं का मंच ( भाग 5 ) : भरत वाक्य
  34. थियेटर ( Theatre) : फ़र्क तो पड़ता है
  35. थिएटर ज़िंदगी के लिए उतना ही ज़रूरी है जितना मॉर्निंग वॉक या वर्जिश
  36. अंकुरजी उवाच : रगमंच जैसी विधा पैरों पर खड़ी नहीं हो सकती।
  37. रंगमंच (Theatre) : वंचित वर्ग की शिक्षा का माध्यम को हमेशा हाशिये पर रखा गया है।
  38. बच्चों का रंगमंच: कहीं भी, कभी भी ...
  39. Theatre : सच को साधने का यन्त्र
  40. नाटक, स्कूली बच्चे और हम !
  41. थियेटर, अभिनेता और दर्शक के बीच लेनदेन भर है... न कम न ज्यादा।
  42. एक्टर बनने की पहली शर्त इंसान होना है
  43. Theatre : सच को साधने का यन्त्र

 दलीप वैरागी 
9928986983 
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Thursday, June 28, 2018

सामूहिक अचेतन में धँसी टुकड़ा-टुकड़ा तस्वीरों को नाटक ही जोड़कर बाहर ला सकता है।


प्रशिक्षणों (training)के दौरान कई क्षण ऐसे आते हैं, जब प्रशिक्षक को एकदम शून्यता का अहसास होने लगता है। उस रिक्त क्षण में क्या किया जाए, कुछ सूझता नहीं है। ऐसे में थियेटर एक ऐसा औज़ार है जो उस शून्यता से आपको निकाल कर एक सौद्देश्यता प्रदान कर जाता है। यह शून्यता कई बार अपने पाससब कुछहोने से भी आती है। एक पूर्व नियोजन और मजबूत तैयारी में से किसी बुलबुले सरीखी यह निकलकर सामने आ खड़ी होती है। यह बुलबुला एक ही गतिविधि की लगातार पुनरावृत्ति से पैदा होता है। सफलता  पुनरावर्ती की अपेक्षा करती है। जरा-सी सफलता का सतत दोहरान इंसानी फितरत की सामान्य परिघटना है। पिछले सालों के प्रयोग में शूज शफल ड्रामा तकनीक के बच्चों के साथ कारगर होने पर इसे लगातार वर्ष भर खूब दोहराया गया। जैसे हर चीज़ घिसती है, वैसे ही सफलता का भी द्रव्यमान छीजता रहता है। सामने किशोरों का समूह है और योजना में शुज-शफल  ड्रामा तकनीक है। पूर्व में आजमाई हुई तकनीक! किशोरों से केवल कहना भर है किघेरे के मध्य रखी वस्तु को उठा कर, उसके साथ किसी चरित्र को साकार करते हुए रोल-प्ले करना है।”  …और यह कहते ही एक सिलसिला शुरू हो जाता... किन्तु उसी वक़्त शून्यता का एक बुलबुला आँखों के सामने मोतियाबिंद-सा आता है। मध्य रखने के लिए वस्तु (प्रोप्स) हैं लेकिन सूझती नहीं। शून्य के आकार में बैठे किशोरों के घेरे के दरम्यान शून्यता का बुलबुला फैलता जाता है और परिधि तक जाकर, थोड़ी देर थम कर फूट जाता है। फूटते ही एक इंद्रधनुष स्मृति पर चमक उठता है। एक नई किरण दिखाई देती है। अब वस्तु की जगह एक किशोर को घेरे के दरम्यान आने को बुलाया जाता है। नवीन नाट्य तकनीक का स्पर्श  अब व्यक्ति द्वारा वस्तु को प्रतिस्थापित करने वाला है। पहले केंद्र में वस्तु होती थी अब व्यक्ति है वस्तुओं से रहित। यह व्यक्ति का वस्तुकरण नहीं और वस्तु का मानवीकरण भी नहीं, बल्कि शरीर के द्वारा वस्तुओं से विमुक्तिकरण  है। आलंबन रूप में, न उद्दीपन रूप में वस्तु अब कहीं नहीं है। केवल अभिनेता है, उसका मन है, शरीर है उसकी अनंत संभावनाओं के साथ, एक संभावना वस्तु भी हो सकती है।
किशोर के घेरे के भीतर आने तक Tableau (टेब्लू अर्थात झांकी) रंग-तकनीक की भूमिका बन चुकी थी।
(1)  एक किशोर से कहा गया कि आप घेरे के मध्य में किसी एक भंगिमा में आकार मूर्तिवत फ्रीज़ हो जाएँ। किशोर ने एक दो मुद्राएँ बनाई सामने बैठे लोगों की तरफ आश्वस्ति भाव से देखा फिर फर्श पर ऐसे पैर फैलाकर बैठा जैसे पीछे गाव तकिया लगा हो। शुरू में अभिनेता के सामने ये चुनौती है कि वह अपने शरीर को कौनसा आयाम दे? शरीर दिन भर में अनंत आयाम प्राप्त करता है किन्तु स्वाभाविक जरूरत के साथ... व्यक्तिगत जीवन में व्यक्ति किसी उद्देश्य को तय करता है और शरीर को उसके अनुसार साधता है। जीवन में शरीर व मन के दरम्यान मन: शारीरिक सहज रूपान्तरण चलता रहता है। यह दैनिक रूपान्तरण व्यक्ति के व्यक्तित्व के एक पहलू को आकार देते हैं। अभिनय में बात दूसरी है। वह सहज पथ पर जाने से रोकता है। अभिनेता के लिए अभिनय के इस बिन्दु पर उसके शरीर को पहले आना है और हेतु को बाद में आना है, या फिर हेतु को अभी तलाशना है। इसलिए गतिविधि का प्रथम बिन्दु चुनौती खड़ी करता है। इस निर्मिति में अभिनेता के अलावा दर्शकों के पास अपनी-अपनी व्याख्याएँ हो सकती हैं, निर्माता अभिनेता से सर्वदा भिन्न भी हो सकती हैं।
(2)  दूसरे चरण में दूसरे किशोर (अभिनेता ) को आना है। पूर्व में बनी मूर्ति को  अक्षुण्ण रखते हुए स्वयं को संयोजित करते हुए फ्रीज़ होना है। दूसरे अभिनेता के जुड़ने पर यहाँ एक ऐसी संश्लिष्ट इमेज  बननी है जो पहले वाली से अर्थ में जुदा हो। जो भी अभिनेता यहाँ आएगा, वह अपनी एक अलग व्याख्या के तहत खुद के शरीर को जोड़कर इसे विस्तार देगा, केवल वही रूप हमारे सामने आएगा। किन्तु सामने बैठे अन्य अभिनेता केवल दर्शक-झुंड मात्र नहीं, वे भी मौलिक विचारकों में तबदील हो चुके हैं। सबके मन में  एक-एक मौलिक इमेज साकार हो चुकी है। जो पहले वाली से जोड़ कर अपने मानस पर बना रहे हैं। मंच पर उपस्थित अभिनेता की निर्मिति में संभावनाओं की खूँटियाँ लगी हुईं है, जिनपर बाहर बैठे अभिनेता अपनी कल्पनाओं के चित्र टाँग रहे हैं। किन्तु खेल का अनुशासन (सीमा नहीं) यही है कि केवल एक व्याख्या ही सामने आनी है। मंच पर पहले से बैठे अभिनेता के चारों तरफ खाली निर्वात नहीं है, बल्कि पूरी फ़िजा में विचारों व संभावनाओं के परागकण घुले हुए हैं। जो भी अभिनेता इसे अपने विचारों का स्पर्श देगा तब सोच का नवांकुर प्रस्फुटित होकर मंच पर साकार होगा।
दूसरा अभिनेता आकर पहले वाले के पैरों से एक मीटर की दूरी पर उकड़ू बैठ जाता है। घुटनों पर दोनों भुजाएँ समेट कर रखीं हुईं हैं। भुजाओं पर टिका हुआ है मस्तक नत है। दूसरे ही अभिनेता ने अपने प्रयास में इस इमेज की नियति लगभग तय कर दी। एक ही झटके में सत्ता को प्रविष्ट करा दिया। इमेज में सत्ता आ चुकी है, अब शेष कलाकार केवल सत्ता के समीकरण को संतुलित करने के उपकरण भर होंगे। परंतु, व्याख्याओं की संभावनाएं अब भी हैं लेकिन सत्ता-सूत्र को थाम कर। अब झांकी के अंदर दो व्यक्ति हैं - एक प्रभाव में है, एक प्रभावित है। एक दंभ में है, एक दमित है। एक पद पर है, एक पग में है। एक अर्श पर है, एक फर्श पर है.... इसे घटित होने से पहले  बाकी के अभिनेता विचारों के जो अपने-अपने वातायन खोल के बैठे हुए थे उन्होंने अब अपने झरोखे बंद कर लिए हैं, क्योंकि दूसरे अभिनेता ने मुख्य द्वार खोल दिया है। सब इसी द्वार से प्रवेश करेंगे। इसी द्वार के साथ-साथ नाट्यकला की एक और संभावना भी खुल कर उजागर होती है - किसी दूसरे के विचार सूत्र को पकड़ कर आगे बढ़ाने का अद्भुत स्वीकार नाट्य गतिविधियों में ही हो सकता है।
(3)  थोड़ी देर तक चुप्पी, अब तीसरा अभिनेता दूसरे अभिनेता, जो पहले के कदमों में बैठा है, के कंधे पर हाथ रख कर उसके पीछे बैठ जाता है। अब यह चरित्र कोई भी हो सकता है लेकिन व्याख्या यही है कि यह है कोई हमदर्द दूसरे अभिनेता का... दोस्त ... परिवारजन... परिचित या....  
(4)  अब अन्य दो अभिनेता बारी-बारी से आते हैं और तीसरे अभिनेता की अगल-बगल में बैठ जाते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि तीसरे अभिनेता के आँचल का पल्लू पकड़े हुए हैं। इनकी यह भंगिमा तीसरे अभिनेता की उकेरी रेखाओं को और गहरे रंग दे देती है। पूरी झांकी को समेकित रूप से देखें तो अब तस्वीर उभरती है कि एक परिवार है जो शक्ति की गिरफ्त में है।
(5)  Image theatre के बारे में Augusto Boal कहते हैं कि इस तरह का थियेटर अरस्तू के कैथार्सिस से अलग है। इसमें अभिनेता भावनात्मक की अपेक्षा वैचारिक रूप से जुड़ता है। क्यों कि वह केवल एक्टर न होकर स्पेक्ट-एक्टर है। इस बात को जब पढ़ा तब समझ नहीं आई, अब जब अभिनेताओं को आते देख रहा हूँ तो इबारत स्पष्ट हो रही है। क्योंकि आने वाले अभिनेता तस्वीर को अपनी उपस्थिति से समृद्ध कर रहे हैं और भावनात्मक उद्वेलन की जगह तस्वीर को तार्किक आधार प्रदान कर रहे हैं। अगर तस्वीर में शोषण का बीज मात्र भी दिखाई दे रहा है तो उसे और उभार कर सामने लाना...  शायद इसलिए ही अगला अभिनेता जब आता है तो शोषित के पक्ष में न बैठ कर शोषक की तरफ आसान लगाकर सामने बही खाता खोलकर बैठ जाता है। इस अभिनेता ने तस्वीर में आए शोषण को एक वजह दे दी। अर्थात तस्वीर से थोड़ी धूल और हटी रंग गहरा हुआ कि मामला जो भी है पर आर्थिक है।
(6) इस बार दो अभिनेता एक साथ आते हैं। यह अप्रत्याशित था। वैसे थियेटर में अप्रत्याशित कुछ नहीं होता। यूं कहें कि अनपेक्षित था। चूंकि एक-एक अभिनेता को बुलाया जा रहा था तो एक–एक करके ही तो आना चाहिए था। ये दो साथ आए और नाट्यकला की एक और विशिष्टता को उजागर कर गए कि फॉर्मेट चाहे कोई भी हो अंततः नाट्यकला एक से दो होने की विधा है, सहमतियों व असहमतियों के बावजूद। बहरहाल, दोनों अभिनेता साथ में आए और एक सोच के साथ... मंच पर बैठे गद्दीनशीन व्यक्ति के दोनों तरफ गर्दनें अकड़ाकर खड़े हो गए। ये लठैत हैं। शारीरिक बल है। शारीरिक बल सत्ता के साथ खड़ा रहता है अकसर.... यदि यह समाज की विडम्बना है तो इसे अपने क्रूरतम रूप में सामने नज़र आना चाहिए। अभिनेता ही इस सच्चाई को सबके सामने नंगा करेगा। स्वयं को चाहे एक पल को इसका उपकरण बनाएगा।
(7) इसके पश्चात लग रहा था कि तस्वीर पूरी हो चुकी है। अभिनेताओं के आने का सिलसिला थम सा गया था। तस्वीर को देखने पर भी ऐसा लग रहा था कि इसके सभी संभावित पहलू दिखाए जा चुके हैं। थोड़ी देर कहीं कोई हलचल नहीं हुई। अचानक एक अभिनेता उठ कर आया और मंच पर बनी झांकी से तीन मीटर की दूरी पर खड़ा हो गया। भाव, भंगिमा व स्थिति से वह तस्वीर से बहुत असंगत दिखाई दे रहा है। न वह सत्ता के इधर है न उधर है। वह दरम्यान भी तो नहीं। वह झांकी को निहार तो रहा है लेकिन उसका हिस्सा नहीं होना चाहता। यह पैरडाइम शिफ्ट है। हमारी बाइनरी काउंटिंग को पलट दिया अभिनेता ने... इधर – उधर के अलावा एक तीसरी श्रेणी होती है, जो होते तो हैं लेकिन कहीं नहीं होते। इस अभिनेता ने अब तक के यथार्थवादी चित्र को थोड़ा एब्स्ट्रेक्ट रूप दे दिया। यह पात्र नहीं प्रतीक है। जो देखता तो है लेकिन दृष्टा नहीं... जो दर्शक है पर केवल मूक दर्शक। यह समाज के उस हर जने का प्रतिनिधित्व करता है जो सब कुछ देख कर अपनी स्थिति स्पष्ट नहीं करता कि वह किधर है। मुझे लगता है कि यह पात्र एक वर्ग का चरित्र है। यह पात्र वह हर कोई है जो इस चित्र से बाहर है और उसका हिस्सा नहीं है।  मूक दर्शन उतनी ही हेय क्रिया है जितनी कि दर्शन सम्मानित क्रिया है। मूक दर्शन क्रिया जब सक्रियता की उम्मीद है तब तटस्थ बनी रहती है। मूक दर्शन एक जीव विज्ञानी परिघटना है जबकि दर्शन एक वैचारिक कार्यकलाप जो किसी स्तर पर आपकी तटस्थता को भंग करता है।
इसने तस्वीर का एक अलग आयाम खोल दिया और सामाजिक संरचना का एक और वीभत्स कोना हमें दिखा दिया। अभिनेता अभी और भी बाकी हैं। न तो अभिनेताओं की क्षमताओं को कम आँका जा सकता है और न ही इस तस्वीर की और संभावनाओं से इंकार किया जा सकता है। अभी इस तस्वीर को यहीं इसलिए रोकना होगा, क्योंकि आज के सत्र के लिए जिस शिक्षण सामग्री की हमें जरूरत थी, वह मंच पर मौजूद हो चुकी थी। इसके साथ आज की चर्चा को आगे बढ़ाया जा सकता है। आज के सत्र का उद्देश्य था कि युवाओं के साथ समाज के ताने-बाने पर चर्चा की जाए। खासकर समाज में व्याप्त असमानता व भेदभावों पर। इस तस्वीर में एक प्रस्थान बिन्दु हमें मिल गया जहां से आगे बढ़ा जा सकता है एक सार्थक चर्चा की ओर।
एक बार फिर नाट्यकला की शिक्षा में उपयोगिता पर विश्वास और मजबूत हुआ। प्रारम्भ में हमारे पास कोई सामग्री नहीं थी। शून्य था। केवल अभिनेता का शरीर। मंच पर मौजूद तामझाम कहाँ से आया? इसे किसने लाने के लिए बोला? क्या निर्देशक ने ? क्या किसी एक अभिनेता ने? यदि एक ने नहीं तो सब ने मिलकर भी तो इसके लिए नहीं सोचा था? फिर कौन लाया इस तस्वीर को? क्या यह अपने आप आई ? यह किसी एक दिमाग की सृष्टि है ? यह सवाल अभिनेता, निर्देशक, नाटक के शोधार्थी, मनोविज्ञानी, शरीर विज्ञानी, समाज विज्ञानी व शिक्षा शास्त्रियों के लिए एक साथ महत्वपूर्ण हो सकता है। ये सब नाटक की इस तस्वीर से शुरू होकर अपनी-अपनी दिशा में आगे बढ़ सकते हैं और इस तस्वीर के उत्स तक पहुँच सकते हैं। अस्तु, मैंने तो यही समझा कि यह तस्वीर समाज की वह तस्वीर है जो जिग-ज़ैग पहेली की तरह लोगों के मानस में टुकड़ा-टुकड़ा करके बिखरी हुई है। एक हिस्सा किसी के मन में है तो दूसरा किसी और के मस्तिष्क में। केवल एक तस्वीर के टुकड़े नहीं अलग-अलग तसवीरों की चिन्दियाँ आपस में गड्ढ-मड्ढ हैं। पीढ़ियों की रेट उनपर चढ़ी हुई है। ये सब तस्वीरें स्पष्ट होने के लिए उतावली हैं लेकिन स्पष्ट इसलिए नहीं होती कि इसके टुकड़े अलग-अलग दिमागों में धँसे हुए हैं। ये तस्वीरें जुड़ तो जाएँ बशर्ते चार सिर आपस में जुड़े तो सही। सिरों के सहज जुड़ाव का मंच केवल नाटक ही प्रदान करता है। उन तसवीरों से गर्द हटा कर, टुकड़े बटोर कर पूरे हाई ऋजुलेशन के साथ केवल नाटक ही सामने ला सकता है। सामूहिक अचेतन में धँसी टुकड़ा-टुकड़ा तस्वीरों को नाटक ही जोड़कर बाहर ला सकता है।
 



Saturday, January 28, 2017

गुड्डी गायब है उर्फ जनता ऊँचा सुनती है

बच्चों के साथ एक नाट्यानुभव 
शूज शफल” एक ड्रामा तकनीक  है, इसे जितनी बार बच्चों के साथ करो इसकी उतनी ही संभावनाएं खुल कर सामने आती हैं। करना कुछ नहीं, एक वस्तु लीजिए और बच्चों या अभिनेताओं के बीच रख दीजिए। अब उस वस्तु का प्रयोग करते हुए अभिनय करना है। शर्त यह है कि वास्तव में जो वस्तु है उसे वह वस्तु न मान कर कोई और वस्तु मानना है। केजीबीवी में 91 लड़कियां थीं। सभी को इस गतिविधि में शामिल करना ही था। निकटतम उपलब्ध वस्तु, एक थाली जो हॉस्टल में सहज ही उपलब्ध थी वह लड़कियों के घेरे के बीच में रखी गई। अब लड़कियों को बुलाया गया। यह क्या! कोई भी लड़की उठ कर नहीं आई। क्या बात है... गतिविधि प्रासंगिक नहीं है ... या ... मैं बता ही नहीं पाया ... एक बार फिर बताया गया ... बात जस की तस... अब खोट सामने वाले में देखने की बारी थी। शायद लड़कियों में झिझक बहुत है। क्यों न एक बार फिर अपने सम्प्रेषण को परखा और सीमाओं को देखा जाए, कई बार शाब्दिक सम्प्रेषण काफी नहीं होते। मैंने सभी लड़कियों को कहा कि इस गतिविधि को करने में पहला नंबर मेरा है। मैंने सामने पड़ी थाली को उठाया और उसे आईने की तरह सामने रख कर अपने बाल सँवारने का कार्य किया। मेरे बैठने से पूर्व एक लड़की खड़ी हो चुकी थी। उसने आरती की थाली बना दी। दूसरी लड़की ने भी पूजा जैसी कोई थाली बनाई। उससे कहा गया कि आप एक ही कार्य को दोहरा नहीं सकते। लड़की ने कहा कि यह अलग है, मैं यह थाली लेकर राखी बांध रही हूँ। एक लड़की आयी उसने थाली को थालीपने से सम्पूर्ण मुक्ति देते हुए बारिश में छाते की तरह औढ लिया। एक और लड़की ने उसे रोटी बेलने का चकला बना दिया। एक ने बैठने कि चौकी बना दी। एक ने कचरादान बनाया, एक ने फावड़ा, एक ने सुदर्शन चक्र... लैपटाप ... ढपली.... स्कूल की घंटी... कंघा... पंखा... कॉपी ... किताब... पर्स... बैग ... गिनती 91 तक जाती है... इस बीच नैनी, जो अभी पढ़ना लिखना सीख रही है, जिसके बारे में कहा जाता है कि शिक्षण प्रक्रियाओं में नहीं जुड़ पाती, वह अब तक तीन बार आ चुकी है और हर बार उसके उत्साह में गुणोत्तर वृद्धि हो रही है। कल्पना व सृजनशीलता की ऊष्मा से पिघल कर थाली तरलता में रूपांतरित हो चुकी थी और मन चाहे नाना आकारों में ढलने लगी थी।  अब लड़कियों को बुलाना नहीं पड़ रहा वे आ रही हैं... इससे पहले कि यह आइडिया तरलता से गैस में तब्दील होकर हवा हो जाए इसमें वैरिएशन (बदलाव) जरूरी है।
विचारों के मशरूम
मैंने बदलाव के आशय से लड़कियों से कहा कि यह गतिविधि तो बहुत सरल हो गई है। अब मैं इसे थोड़ा कठिन कर देता हूँ। चार-पाँच लड़कियों ने कहा जरूर कर दीजिए लेकिन एक–एक बार पहले इसे हमे पूरा करने दो। थोड़ी देर बाद मैंने थाली के पास ही एक छोटा बक्सा रख दिया, जो वहीं क्लासरूम में रखा हुआ था। थोड़ा सा विराम आया। कल्पना का विमान अब वैचारिक धरातल पर उतर चुका था। अब तक लड़कियां वस्तु को उसके आकार के अनुसार कल्पना के रंग दे रहीं थीं। अब वे दोनों वस्तुओं के अंतर्संबंध को देख रहीं थीं। उस वस्तु के आकार उपयोगिता व गुणधर्म आधार पर... फिर उसके साथ अपने शरीर को भी ढाल रही थीं। एक लड़की ने बक्से को लैपटाप बनाया तथा पास में रखी थाली से कुछ ले कर खाती भी जा रही है। एक लड़की ने बक्से को पूजा की वेदी बनाया तथा सामने पूजा की थाली रखी। अब थाली अपने मूल रूप की और लौट रही थी और बक्सा कल्पना के रंगों से रंगा जा रहा था। अब लड़कियों ने कहा कि आपने गतिविधि को कठिन करने की बजाए और सरल कर दिया। अब मैंने एक वस्तु कपड़ा भी रख दिया। मैंने कहा अब चाहें तो दो लड़कियां साथ मिल कर भी आ सकती हैं। चंद क्षण में ही लड़कियों के हाथ जुड़ कर जोड़ियाँ बनने लगीं। एक लड़की ने बक्से पर कपड़ा बिछाया, उस पर दूसरी को बैठा दिया तथा थाली में उसके पैर रख कर, पैरों को धोने का उपक्रम करने लगी। एक जोड़ी आई उसने बक्से व कपड़े की स्थिति में बदलाव किए बिना अपने साथी को उस पर बैठाया तथा थाली में से कुछ उठा कर बालों में मेहँदी लगाने का अभिनय किया... एक जोड़ी, भी वैसे ही लड़की को बक्से पर बैठाया, बैठी हुई लड़की के हाथ में थाली को आईने की तरह थमाया और उसकी चोटी बनाने का अभिनय करने लगी। ऐसा प्रतीत हो रहा था कि लड़कियां Photomontage तकनीक की विशेषज्ञ हों और मूल बैकग्राउंड  या झांकी के आगे कुछ इन्स्टाल या रद्दोबदल करके दृश्य को परिवर्तित कर रही हों। लड़कियों की जोड़ियाँ बदस्तूर आ जा रही थीं मंच पर से। उनके अभ्यासों में कथा तो अभी नहीं आई थी लेकिन एक सूत्र जरूर आ गया था जो उन्हे व मंच की वस्तुओं को न केवल बांधता था बल्कि पूर्व में लड़कियों द्वारा बनाए को, विध्वंस न करने की बजाए उसमे कुछ जोड़ता था। यहाँ नाटक की प्रवृत्ति साफ उभर कर सामने आ रही थी जो सहज ही व्यक्तियों को एक टीम बनने की और ले जाती है। मेरे पास बदलाव का और कोई विकल्प नहीं था सिवा इसके कि एक दो वस्तु और व्यक्तियों को जोड़ने की छूट दे दूँ। मैंने कहा कि इसे और कठिन (आसान ) करने जा रहा हूँ। मैंने अब कोने में रखी एक झाड़ू उठा कर मंच के बीच रख दी और लड़कियों से कहा कि अब कितनी भी लड़कियां आ सकती हैं। अब तक यह गतिविधि मूक रखी गई थी अब बोलने की बंदिश भी हटा दी गई।
दो-दो की टोलियाँ चार-पाँच के दल में संघनित होने लगे। चीज़ें बढ़ी व्यक्ति भी बढ़े। चीजों व व्यक्तियों की बढ़ोतरी की गर्मी व नमी पाकर विचारों के मशरूम ज़मीन तोड़ कर बाहर आने लगे। विचारों से कथाओं की कोंपले फूटती दिखाई देने लगीं। एक लड़की थाली को तकिया बना लेती हुई है। दूसरी ने उसको चादर औढ़ा दी है। एक उसे औझा को दिखाने ले जाती है। औझा झाड़ू से झाड़ फूँक करता है। एक और लड़की आकर उन्हे समझाती है और डॉक्टर के पास लेकर जाती है। इसी प्रकार और भी टोलियाँ आने लगीं। डॉक्टर उस सन्दूकची में दवाइयों को लेकर मरीज की जांच करता है। चीजों से विचार तथा विचारों से कथाओं की कोंपले फूटती दिखाई देने लगीं। शुज शफल की की गतिविधि जहां हमारा प्रस्थान बिन्दु था वहीं हमें लग रहा था कि बिना कोई बाह्य विचार लड़कियों पर थोपे महज़ चीजों के सहारे हम उसी मंज़िल तक सहज ही आ गए जहां पहुँचने के लिए लंबा सफर तय करना पड़ता है। यह अहसास होता है कि आमतौर पर हम जिन्हें जड़ वस्तुएँ मानते हैं, दरअसल वे ज़िंदगी की बुनावट साथ लिए रहती हैं। नाटक में अभिनेता का स्पर्श पाकर ये वस्तुएँ पुनर्नवा की तरह जीवंत हो उठती हैं। जितनी वस्तुएँ और व्यक्ति बढ़ेंगे वैचारिक सूत्र मूर्त से अमूर्त की बढ़ने  लगते हैं। जिंदगी उतने ही संस्लिष्ट रूप में नाटक की कथा के रूप में चल निकलती है अपने विराट रूप मे।
थोड़ी ही देर में पूरा समूह छोटी-छोटी टोलियों में ढलता दिखाई दिया। चूंकि चीजों का सेट एक था तो, पहले मैं, पहले मैं की अराजकता भी आई। एक बदलाव के तौर पर फिर एक मोड गतिविधि को दिया गया। सभी लड़कियों से कहा गया कि बाहर आँगन में जाएँ और जो चीज आपको दिखाई दे उसे लेकर आ जाएँ। चीजें इकट्ठी होने पर लड़कियों के  समूह बना दिये। सभी समूहों को अपनी लाई चीजों में से पाँच चीज़ें लेनी है व उनके साथ एक नाटक बना कर लाना है। 
समूह
वस्तुएँ
विचार
कथा का परिवेश
समूह 1.
कंघा, तेल, बाल्टी, मग, डंडा
पढ़ाई व दंड
हॉस्टल व स्कूल जीवन
समूह 2.
कॉलगेट, ब्रुश, फोन, किताब, नेल कटर
पढ़ाई  व दंड
स्कूल मे अफसर का दौरा
समूह 3
डंडा, बैग, गिलास, स्टूल, कॉपी
पढ़ाई, दंड, बाल विवाह 
स्कूल
समूह 4
घड़ी, किताब, रंग, दर्पण व पेंसिल बॉक्स
पढ़ाई
स्कूल
समूह 5
पत्ता, बोतल, झाड़ू, लकड़ी, सोना
जेंडर भेद, अंधविश्वास  
घर समाज
समूह 6
बैग, प्लेट, चाकू, कपड़े, साबुन
मोलभाव
सब्जी का ठेला




समूह 7
पत्ते, गिलास, फूल, दुपट्टा व झाड़ू
अंधविश्वास
अस्पताल व भोंपा
लगभग आधा घंटा काम करने के बाद बच्चे बड़े समूह मे लौट आए। सबने तैयारी के साथ अपनी प्रस्तुतियाँ दीं। यहाँ भी चीजें दोनों रूपों में इस्तेमाल  हुईं अपने वास्तविक रूढ रूप में तथा प्रतीकात्मक व काल्पनिक रूप में। परंतु बच्चों के चीजों के साथ काम करने का एक पैटर्न समझ मे आया कि भले ही चीजों के मामले में हर समूह के पास अलग-अलग चीजें थीं, कथानक व घटनाओं का वैविध्य भी स्वाभाविक रूप से अपेक्षित था लेकिन उनमें गूँथे हुए विचार लगभग समान ही थे। शायद बचपन में चीजों से पेश आने में बच्चों में ज्यादा महारत होती है। किसी भी वस्तु से वे मनचाहा करवा सकते हैं। शायद इसी लिए उन्होने विविधता पूर्ण चीजों के बावजूद अपनी ज़िंदगी के सबसे निकट के व तल्ख अनुभवों व विचारों को अभिवक्ती दी, जो उनके कॉमन से हैं।
इस गतिविधि में चीजों की मार्फत एक सौद्देश्य शैक्षणिक प्रक्रिया की और हम बढ़ चुके थे। छोटी नाट्य प्रक्रियाओं से घटनाओं, कहानियों से होते हुए बच्चों के मुद्दों तक पहुँच चुके थे जो उनके सबसे निकट के है। इन्हीं में से किसी एक पर आगे के दिनों और फोकस्ड होकर काम किया जाना है।
मिला कुंजी वाक्य उर्फ गुड्डी गायब है।  
 एक समूह की प्रस्तुति का दृश्य था कि कक्षा कक्ष में अध्यापिका बच्चों की हाजरी करती है। बच्चे “यस मैडम” बोलते हैं। अब टीचर गुड्डी का नाम पुकारती है। कोई आवाज नहीं आती। टीचर दुबारा नाम लेती है तो एक बच्ची बोलती है, “गुड्डी नहीं है।” टीचर पूछती है, “कहाँ है?” बच्चे कहते हैं – “गुड्डी गायब है!”  
रोलप्ले खत्म होने के बाद हमने “गुड्डी गायब है...” वाक्य को खोलना शुरू किया। हमने लड़कियों से कहा कि अभिनय में और ज्यादा सच्चाई लाने के लिए विवरणों में और गहराई लाना जरूरी हो जाता है। फर्ज़ करो कि गुड्डी स्कूल में नहीं है तो वह कहाँ हो सकती है। इसकी चर्चा में उन सभी ठिकानो को टटोला गया जहां एक स्कूल से ड्रॉप आउट के बाद लड़की के होने की संभावनाएं हो सकती हैं। चर्चा में यह पता ही नहीं चला कि कब यह वाक्य “गुड्डी गायब है” रोल प्ले के संदर्भ विशेष की गुड्डी से निकल, सामान्यीकृत होकर एक आम लड़की या महिला की स्थिति का रूपक बन कर सामने आ गया। चलो, जहां तक चले इस रूपक से ही आगे बढ़ा जाए...
एक सवाल किया गया, “और कहाँ कहाँ से गुड्डी गायब है ?
“अस्पताल से... बस से ... बस स्टैंड से .... शहर से .... गाँव से... गली ... से .... घर से .... ”
“बस, गयाग करने के तरीके अलग-अलग हैं।”
इन्हीं तरीकों में से एक-एक तरीके पर चर्चा करने व उस पर एक कहानी लिख लाने का होमवर्क तीनों कक्षाओं के मिश्रित समूह बनाकर दिया गया। आशय यह भी था कि एक तो होमवर्क के बहाने लड़कियां उन प्रक्रियाओं के बारे में मिल कर सोचेंगी जो लड़कियों को वंचित बनती हैं, दूसरे मौखिक अभिव्यक्ति पर आज काफी काम हो चुका था इसलिए थोड़ा ठहरकर लिखित अभिव्यक्ति भी उभर कर आ सकें।  
अगले दिन सुबह केजीबीवी में पहुँचते ही लड़कियों ने एक्टिविटी हाल में इकट्ठे होकर कहानियाँ सुनाईं।
एक कहानी में संयुक्त परिवार है जहां महिला को अब और लड़कियां न जनने की हिदायत मिल रही है।
एक कहानी, ऐसा लगता है इसी कहानी को आगे बढ़ाती है, जिसमे एक दंपत्ति डॉक्टर से गुजारिश करता है कि वह अल्ट्रासाउंड के नतीजों को जेंडर में अभिव्यक्त कर दे।
तीसरी कहानी भी पहली वाली का तीसरा एपिसोड लगती है, जिसमें कन्या भ्रूण समाप्ति की ओर है।
चौथी कहानी में खाने की थाली में संतुलन का गड़बड़झाला दिखता है। लड़के की थाली बनाम लड़की की थाली।
पाँचवी कहानी में लड़की की पढ़ाई छुड़ाई जा रही है।
छठी कहानी में एक छोटी लड़की का विवाह किया जा रहा है।  
सभी कहानियाँ पढ़कर समझ में आया कि इन सभी कहानियों में कहानियों का प्लाट तो है लेकिन अभी इनकी और फिलिंग होनी बाकी है।
मैंने कहा, “ये कहानियाँ अभी कुछ विवरणों को चाह रही हैं।” उदाहरण के लिए लड़कियों को निम्न वाक्यों पर ध्यान देने के लिए कहा –
महिला पर ससुराल वालों ने भ्रूण जांच करने का दबाव बनाया।”
घरवालों ने लड़की की पढ़ाई छुड़ा दी।”
उपरोक्त वाक्यों पर गौर करें तो यहाँ शब्दों के तीन युग्म हैं।  जैसे – (एक) महिला व लड़की (दो) ससुरालवालों, घरवालों और (तीन) दबाव बनाया तथा छुड़ा दी। लड़कियों से कहा कि पहले युग्म में कहानी के केंद्रीय पात्र हैं इनमे जान तो डालनी ही पड़ेगी। इसके लिए पहले इनका नामकरण करना होगा तभी पात्र का आगे के चरित्र उभरेगा। दूसरे युग्म की संज्ञा भी जातिवाचक है इन्हे व्यक्तिवाचक करने पर कहानी के निर्दोष पात्र बच सकते हैं। कहानियाँ तो आखिर इंसाफ करती हैं न। मुख़तसर में लड़कियों से कहा गया कि जो पात्र ओप्रेसर हैं उन नामों व रिश्तों कों भी संज्ञा दीजिए। तीसरे युग्म के बारे में तफसील इसलिए दी कि इसी से ही कहानियों में संवाद आ पाएंगे। लड़कियों से कहा गया कि आपने लिखा कि पढ़ाई छुड़ा दी। लेकिन यहा यह नहीं पता चल रहा कि किसने क्या कह कर या कर के पढ़ाई छुड़ा दी, या क्या कह कर दबाव बनाया ? यहाँ कुछ बातचीत की गुंजाइश है जिसे दिये बिना कहानी में सच्चाई नहीं आ पाएगी।   अब कुछ क्रिएटिव लड़कियों के ग्रुप ने एक घंटे का समय लिया और कहानियों को मरम्मत करके सोंप दिया।
सभी कहानियों में एक क्रम नज़र आता है। अगर गुड्डी भारतीय महिला का रूपक है तथा गुड्डी को सभी कहानियों का केंद्रीय पात्र मानें तो दरअसल ये सभी कहानियाँ एक ही कथा के विभिन्न सोपान है।
तटस्थता मतलब आइडिया ग्रुप
अब लड़कियों के समूह उनकी रुचि और सामर्थ्य के हिसाब से बनाने का समय था।
एक समूह अभिनेताओं का
दूसरा समूह संगीत का
तीसरा समूह मंच सज्जा के लिए डिज़ाइनर्स का
लड़कियों का एक ऐसा तटस्थ समूह था जिसने किसी भी समूह में जाने की रुचि नहीं दिखाई। एक बार तो मन में आया कि सबको बराबर संख्या में प्रत्येक समूह में धकेल दिया जाए। यह बहुत आसान है। कई बार इसे संभावित एक मात्र विकल्प के रूप में किया भी है। हमेशा शिक्षक का आसान विकल्प की और जाना नवाचार की सम्भावना को कुचलना भी होता है। अचानक मुझे ख्याल आया... मैंने कहा कि यह आइडिया समूह है। यह समूह हमारे साथ रहेगा... विशेष तौर पर अभिनेताओं के समूह के साथ। यह विचार रंग भी लाया। जब हम अभिनेताओं के साथ स्क्रिप्ट पे काम कर रहे थे तब इस तथाकथित तटस्थ समूह से आइडिया तो आए बल्कि अधिकतर ने अपनी तटस्थता को भंग करते हुए समय-समय पर आकार कहा कि क्या यह मैं ट्राई कर सकती हूँ? इस प्रकार आइडिया  समूह का आइडिया काम कर गया।
गहरे पानी पैठ
अभनेताओं वाले समूह के साथ स्क्रिप्ट पर काम आगे का कहानी पर काम करने के दौरान स्क्रिप्ट के संवाद लगभग लिखे जा चुके थे। उनके सम्पादन व संयोजन के साथ अभिनय पर काम समांतर रूप से चल रहा था। गुड्डी गायब है यह तथ्य हर लड़की के लिए कोई पहेली जैसा नहीं था। इस अभिधा को वे व्यंजना के रूप में प्रयोग करना सीख चुकी थीं। जब ऐसा था तो उन्हे पता था कि पूरे भारत मे 1000 पुरुषों की तुलना में कितनी गुड्डियाँ गायब हैं। मालूम करना था तो राजस्थान का लिंगानुपात। गूगल पर लिख कर एक बार एंटर मारने पर आ गया।
लेकिन लड़कियों के सवाल इससे आगे जाते हैं-
जोधपुरा का ?
लूनी का?
गाँव नंदवान का?
इसकी पड़ताल में जनगणना 2011 के दस्तावेज़ खंगाले गए। वहाँ जनसंख्या के आंकड़े तो हैं लेकिन लिंगानुपात तो निकालना सीखना होगा... टीचर्स और टीम के लिए चुनौती ... मदद लेना जारी... यहा फोन लगाओ... वहाँ फोन लगाओ ... भंवर जी से पूछो ... खुद भी हिसाब लगाओ ... गणित के नतीजे पर पहुँचना बहूत उत्साह वर्द्धक होता है। जनसंख्या के इन आंकड़ों ने नाटक के आखिरी दृश्य को एक अद्भुत गणितीय अभिव्यक्ति बना दिया।
नाटक के आखिरी दृश्य मे बाल विवाह के आखिरी संवाद "स्वाहा..." के पश्चात जब एक लड़की आकार बोलती है, "इस तरह एक और गुड्डी गायब हो गई..." तो यह सिलसिला चल पड़ता है।
"इसी तरह रोज हजारों लाखों गायब होती हैं..."
"अलग-अलग तरीकों से... "
“पूरे देश में...”
"आपके राज्य मे... "
"आपके शहर में ... "
"आपके गाँव में ... जी हाँ नंदवान में ... "
नंदवान की कुल जनसंख्या है .........5648  
"नंदवान में पुरुषों की संख्या है ........2893 "
"नंदवान में महिलाओं कि संख्या है ........2755  "
"सीधा सा गणित है कि आपके गाँव नंदवान में 138 गुड्डियाँ गायब है।"
"जी हाँ, 138 गुड्डियाँ गायब हैं आपके नंदवान में ..."
"कुछ सुना आपने?"
केजीबीवी के आँगन के बीच में खड़ी लड़कियां अपना सवाल चारों और से दर्शकों भरे बरामदों तथा छज्जों की और उछालती हैं। सबसे पहले वे सामने की खास चार कुर्सियों से मुखातिब हैं। इन चारों कुर्सियों पर चार खास महिलाएं बैठी हैं। दो पंचायतों की दो सरपंच, एक उप सरपंच,  एक पंचायत समिति सदस्य। तीन घूघट में हैं। जवाब शायद यहाँ है लेकिन पुरानी जमी हुई खामोशी दिखाई दे रही है। अब लड़कियां दायीं और की दर्शक दीर्घा से भी पूछती हैं, “कुछ सुना आपने?
यहाँ गाँव के प्रोढ़ पुरुष बैठे हैं। ये सामने की कुर्सियों की खामोशी की एक वजह भी हो सकते हैं। सवाल इधर की दीवार से भी टकराकर लौट आया। लड़कियों ने अब सवाल सामने के छज्जों पर बैठे नवयुवक व नवयुवतियों के समक्ष शटलकोक सरीखा उछाल दिया। यहाँ शायद प्रश्न के उत्तर हैं और प्रश्न के प्रतिप्रश्न भी। लेकिन सवालों से पेश आने का होंसला व अभ्यास नहीं। अब एक खुसर-पुसर शुरू हो गई। लड़कियों ने फिर पूछा, “कुछ सुना आपने.... कुछ कहना है आपको...?
कोरस – “नहीं कुछ नहीं सुना... ”
कोरस – “क्यो...?
कोरस – “क्योंकि जनता ऊंचा सुनती है।”  

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दलीप वैरागी 
09928986983 

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