Sunday, March 29, 2015

विश्व रंगमंच दिवस : समस्याओं से जूझता अलवर का रंगमंच

27 मार्च 2015 को अलवर में विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया। अभावों से जूझ रहे अलवर रंगमंच में यह विस्मित कर देने वाली बात थी कि इस दिन दो स्थानों पर, दो संस्थाओं पर अलग-अलग विचार गोष्टियां आयोजित हुई। अरावली आर्टिस्ट अकादमी द्वारा कलाभारती रंगमंच व इप्टा, अलवर द्वारा राज गुप्ता सभागार में आयोजन किया। दो-दो गोष्ठियां होना अलवर रंगकर्म की सक्रियता की निशानी कतई नहीं है। बल्कि इस बात की सूचक है कि अलवर के मुट्ठी भर रंगकर्मी विभाजित हैं। यूँ तो दो आयोजन होना किसी भी दृष्टि से अनुचित नहीं। लेकिन इससे जहाँ रंगकर्मी बंटता है उसके साथ दर्शक भी। 
लिहाज़ा मुझे इप्टा की ओर से आमंत्रण मिला तथा उसी में शिरकत कर पाया। यहाँ इस गोष्ठी में हुई प्रमुख बातों को यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है। मेरे लिए प्रमुख बात यह थी कि लगभग 10 सालों बाद जीवन सिंह मानवी जी को सुनने का मौका मिला। जब मैं कॉलेज में पढ़ रहा था तब मानवी जी हमारे प्राचार्य हुआ करते थे, और उन्ही दिनों वे सेवा निवृत्त हुए थे। यह उनका एक परिचय है, साहित्य जगत में वे एक प्रगतिशील चिंतक के रूप में जाने जाते है। उनके शरीर पर तो वृद्धावस्था का असर साफ देखा जा सकता है लेकिन उनकी वाणी में उम्र का बिलकुल भी असर दिखाई नहीं देता। उनका एक और रूप है जिससे बहुत से लोग इस गोष्ठी में परिचित हुए कि वे 30-35 वर्षों से हर साल अपने गांव की रामलीला में शामिल होने जाते रहे हैं। यही नहीं इसके साथ ही वे अपने गांव की रामलीला में रावण का किरदार निभाते रहे हैं। युवा रंगकर्मियों की ज़िद पर उन्होंने रावण शरूपनखा का प्रसंग अभिनीत करके भी दिखाया। उनके रंगकर्म के लिए समर्पण से नयी पीढ़ी के रंगकर्मी अवश्य प्रेरणा ले सकते है।
मानवी जी ने बताया नाटक लोकशिक्षण का बड़ा मज़बूत माध्यम है। उन्होंने बताया कि किस चतुराई से उनके गाँव की रामलीला मंचन में समसामयिक सन्दर्भों को जोड़ दिया जाता था। उन्होंने बताया कि कब रावण का दरबार सरकार की आर्थिक नीतियों की समीक्षा का मंच बन जाता था। कैसे रावण का मंत्री मंडल आधुनिक मंत्रिमंडल का रूपक बन जाता था।
उन्होंने बताया कि रंगमंच की सबसे बड़ी समस्या है कि रंगकर्मी दर्शकों को रसानुभूति करवाने में विफल रहे हैं। भरत मुनि ने नाटक में रस को प्रधान बताया है। उन्होंने कहा कि अभिनेता दर्शक के दिल के स्थायी भाव को जगाकर उसे रसानुभूति करवाने में विफल रहा है। उन्होंने कहा सच्चा नाटक तभी होता है जब नाटककार, अभिनेता व दर्शक का हृदय एक हो जाता है। उन्होंने साधारणीकरण पर प्रकाश डालते हुए बताया कि उनके गांव की रामलीला हज़ारों लोगों को इसी वजह से जोड़ पाती थी। नाटक के एक दूसरे पहलु पर रौशनी डालते हुए उन्होंने कहा कि उनकी रामलीला को देखने मुस्लिम औरते भी आती हैं। एक बार सांप्रदायिक माहौल बिगड़ा जिसकी वजह से गांव में कर्फ्यू लगा। उन्होंने बताया कर्फ्यू के बावजूद मुस्लिम महिलाऐं रामलीला देखने आईं। जिससे सशक्त सन्देश गया कि नाटक सांप्रदायिक दूरियां पाटने में बड़ी भूमिका निभाता है।
गोष्ठी का विषय था - समस्याओं से जूझता अलवर का रंगमंच। वरिष्ठ साहित्यकार रेवती रमण शर्मा ने विषय प्रवेश कराया। इसके पश्चात् विभिन्न वक्ताओं ने अपने-अपने विचार रखे। प्रो. नंदकिशोर नीलम, प्रो.रमेश बैरवा, प्रो. नीलाभ पंडित, दलीप वैरागी, गणेश जोशी, राज गुप्ता व मनीष जैन ने वक्ता के रूप में भाग लिया। सभी के वक्तव्यों से जो बात निकल कर आई कि जिन्हें हम अलवर रंगकर्म की समस्याएं कह रहे हैं वे दरअसल सार्वभौमिक समस्याएं हैं।  आज भी रंगकर्म को सम्मानजनक प्रोफेशन के रूप में स्वीकार नहीं किया जा रहा है। इस कारण से नयी पीढ़ी रंगमंच से नहीं जुड़ रही है। नयी पीढ़ी सिनेमा व रंगमंच की और आकृष्ट हो रही है, कुछ वक्ताओं के द्वारा यह चिंता भी व्यक्त की गई। नव निर्मित ऑडिटोरियम की कीमतों के रंगकर्मियों की पहुँच से बाहर होने के मुद्दे पर विचार रखते हुए वक्ताओं ने कहा कि उसकी कीमत कम होने के इंतज़ार में बैठे नहीं रहना चाहिए, बल्कि जहाँ भी जगह मिले वहीं सीमित साधनों में भी नाटक करने चाहिए और निरंतरता से करने चाहिए तभी रंगकर्म आगे बढ़ेगा।
गोष्टी के आखिर में इप्टा, अलवर के अध्यक्ष श्री कान्ति जैन ने सबका आभार व्यक्त किया। मेरे नज़रिये से अपने उद्देश्य में यह विचार गोष्टी सफल रही। 
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दलीप वैरागी 
09928986983 
 

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