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Sunday, March 24, 2013
क्लासरूम से जुड़े मेरे कुछ अनुभव
Friday, February 22, 2013
“बातचीत” न्यूज़लेटर : टीएलएम की पुनर्व्याख्या
| यह लेख पूर्व में संधान व सेव द चिलड्रन द्वारा प्रकाशित Exploring Possibilities, Good Practices from KGBVs में Newsletter- “Baatcheet”: Reinterpreting Teaching Learning Material शीर्षक से प्रकाशित हुआ है। |
दृश्य – 1, समय - जुलाई 2012, स्थान – कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय
जैसे ही हमारी दृष्टि केजीवीवी पर ठहरती है दृश्य में है कस्तूरबा विद्यालय की लड़कियां जो छोटे-छोटे समूहों में काम कर रही हैं। तल्लीनता है, आनंदमाय माहौल है। सीन को थोड़ा और ज़ूम करके देखते हैं। लड़कियों के हाथों में केजीबीवी न्यूज़लेटर “बातचीत” है। वे उसको पढ़ रही हैं और उस पर आपस में बातचीत भी कर रही हैं। कुछ के हाथ में खुद के केजीबीवी का व कुछ के हाथ में दूसरे केजीबीवी का ”बातचीत” है। कैमरा को थोड़ा और फोकस करते हैं अब लड़कियों द्वारा लिखी इबारतें साफ दीख पड़ती हैं।
सातवी कक्षा की तारा लिखती है – “यहाँ मैं ‘नव्या’ व ‘झांसी की रानी’ सीरियल रोज देखती हूँ। दोनों मुझे बहुत पसंद हैं। घर पर इन्हें नहीं देख पाऊँगी। घर पे तो डिश एंटीना नहीं है। यहाँ की बहुत याद आएगी।”
“मुझे ‘प्रतिज्ञा’ अच्छी लगती है ... वह पढ़ी लिखी है ... वह ईमानदार है वह हमेशा कानून के हिसाब से चलती है।”
चंदा डूड़ी कक्षा VIII
ये दोनों लड़कियां टीवी पे देखे गए नाटकों पर अपनी लेखनी के मध्यान से राय रख रही हैं।
चलो अब आगे के पृष्ठों को पलटते हुए देखते हैं ...
इसमे बात राय रखने से आगे बढ़ती दिखती है –
धन्नी जाट – “मैं आठवी में हूँ। मेरा एक भाई और पाँच बहने हैं... मेरा भाई एक ऐसे स्कूल में पढ़ता है जहां चालीस हज़ार रुपये साल की फीस लगती है... मेरा एडमिशन मम्मी-पापा ने केजीबीवी में करवाया... स्कूल अलग-अलग क्यों? ”
शोभा - “मैं तब पाँचवी में थी... एक लड़के ने मुझसे झगड़ा किया और मेरा हाथ पकड़ा तो मैंने उसके हाथ पर काट लिया। ... शिकायत होने पर सर ने हमें डांटा। गलती उस लड़के की थी लेकिन मुझे कहा कि लड़कियों को लड़कों से झगड़ा नहीं करना चाहिए।”
यहाँ लड़कियां अभिव्यक्ति को नया आयाम दे रही हैं और सहज मिले माध्यम का प्रयोग करते हुए अपने साथ जाने अंजाने में हुए भेदभाव पर संजीदगी से सवाल भी उठा रही हैं।
अब आँखों के कैमरे को थोड़ा पैन करते हैं। अब सब लड़कियां दृश्य में आती जा रही हैं। लड़कियां लिखे हुए को पढ़ रही हैं, लड़कियां चर्चा कर रही हैं। लड़कियां दिख रही है, पढ़ने वाली भी और किताब के अंदर से लिखने वाली भी अभिव्यक्ति से मुखर, आत्मविश्वास से लबरेज़।
सविता रावत कक्षा VIII लिखती है।
“मुझे अब कस्तूरबा आवासीय विद्यालय में बहुत अच्छा लगता है। यहाँ आने के बाद खूब पढ़ाई करने लगी हूँ। मुझे मैडम ने स्टोर से समान निकालने की ज़िम्मेदारी दे रखी है। मुझे पता है कि सौ लड़कियों के लिए कितना समान चाहिए। रसोइये को सामान देकर रजिस्टर में दर्ज़ करती हूँ। कभी सोच भी नहीं सकती थी कि स्टोर का काम संभाल सकूँगी... सातवीं कक्षा में मैंने सिलाई सीखी थी, इस बार ब्यूटीपार्लर की पढ़ाई कर रही हूँ। मैं पास होऊँगी मुझे पूरा विश्वास है।”
इस तरह के उदाहरण एक दो नहीं जिनके पास कहने को बहुत कुछ है और शब्द भी, तरीके भी। ललिता कुमावत भी इसी तरह खुद को अभिव्यक्त कर रही हैं।
“मैं जब आई थी तब पढ़ना नहीं जानती थी। पढ़ना अब मुझे आ गया है। इसके अलावा कबड्डी खेलना, डांस करना, नाटक करना अच्छा लगता है। कोई भी छोटा काम हो मैं खुद ही कर लेती हूँ। मिस्त्री आता है तो पैसे लेता है। एक बार मिस्त्री ने वाटर कूलर ठीक किया मैंने भी देख कर सीख लिया। दूसरी बार खुद ही ठीक कर लिया। टीवी की पिन टूट जाती है, डीवीडी मे गलत पिन लगे या इनवर्टर में खराबी सब मिस्टेक ठीक कर देती हूँ। यहाँ आने के बाद अपनी जिम्मेदारियाँ निभाने लगी हूँ।”
।। सीन कट ।। यह दृश्य थोड़ा लंबा खींच गया। यह वर्तमान है। हर वर्तमान के साथ उससे पल्लू छुड़ाता, भविष्य के रथ के गर्दोगुबार में ओझल होता एक अतीत होता है। चलो इसके फ्लैश बैक मे थोड़ा झाँकते हैं।
दृश्य – 2, समय - अक्टूबर 2011, स्थान - कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय
यह अजमेर ज़िले के कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालयों में बेसलाइन का दृश्य है। लड़कियां कक्षा में कतारबद्ध बैठी हैं। उनके हाथ में एक वर्कशीट है। वर्क शीट पर निम्न लिखित अनुच्छेद दिया गया है।
नगमा और उसका भाई अमन एक दिन बाज़ार गए। वहाँ अमन ने देखा कि एक खोमचे वाला पकौड़े बना रहा है। उसका मन पकौड़े खाने के लिए ललचाया। नगमा ने कहा कि पकौड़े तीखे होंगे। मगर अमन नहीं माना। अमन ने पकौड़े खाए और उसकी आँखों से आँसू निकालने लगे।
इस अनुच्छेद को पढ़ कर लड़कियों को कुछ सवालों के जवाब देने थे ताकि उनके शैक्षणिक स्तर का जायजा लिया जा सके। इन सवालों में एक सवाल यह भी है। तुम्हें खाने में क्या पसंद है?
लड़कियों ने जवाब लिखे हैं और नीरसता से अपनी-अपनी कॉपी टीचर के सपुर्द कर रही हैं। चलो एक –एक करके देखें लड़कियों ने क्या-क्या जवाब लिखे हैं? यह क्या ?
सभी लड़कियों ने एक ही जवाब लिखा है !
तुम्हें खाने मे क्या पसंद है?
खोमचा ...............!!
।। सीन कट।।
हम सब चकित थे कि सभी लड़कियों का एक जैसा जवाब कैसे हो सकता है? लड़कियों की पसंद इतनी यूनिफ़ोर्मिक कैसे हो सकती है? मुझे खाने में दरअसल क्या पसंद है यह बात अभिव्यक्त होकर बाहर आने में क्या रुकावट है? लड़कियो की होम वर्क की कॉपी देखने से सब पता चल गया। सभी लड़कियो के जवाब एक जैसे थे, गाइड बुक से नकल किए हुए। लड़कियों की लिखित अभिव्यक्ति पाठ्य पुस्तक से इस कदर बंधी हुई थी कि उनका यह (अंध)विश्वास इतना प्रबल था कि सारे समाधान पुस्तक में ही होते हैं। उन्होने भी समाधान पूर्वक अनुच्छेद में से ही “खोमचा” शब्द तलाश कर रख दिया। भले ही उन्हे खोमचा शब्द का मतलब पता न था।
लड़कियों की अभिव्यक्ति को सहज रूप से खोला जा सके इसके लिए एक सशक्त विधा की जरूरत महसूस की जा रही थी। वह भी एक ऐसे माहौल में जहां बंधे बंधाए लेखन के फ़ारमैट पर काम करने की प्रैक्टिस है। प्रथना पत्र, प्रतिज्ञा, वंदना, श्लोक गणितीय सूत्र और भी तथाकथित ज्ञान टीएलएम स्वरूप दीवारों पर पुतवा दिया गया हो। “संधान”[2] पिछले तीन सालों से टोंक और उदयपुर के केजीबीवी में न्यूज़लेटर पर काम कर रहा था। शुरू मे विचार यह था कि सबसे पहले लड़कियों को यह एक्सपोजर हो कि दूसरी जगह कि लड़कियां किस तरह से सोच और लिख रही हैं। टोंक उदयपुर की लड़कियों ने जितने न्यूज़ लेटर निकाले थे सभी की रंगीन फोटो कॉपी करके दी गई। ये न्यूज़ लेटर लड़कियों के हाथ में जाते ही करिश्मा हो गया। लड़कियों ने इसका जबर्दस्त इस्तक़बाल किया। खुद पढ़ा, दूसरों को पढ़कर सुनाया, सराहा और फिर पढे हुए के बारे में अपने विचार लिखे, प्रतिक्रियाएँ लिखी। इसके अलावा अपनी मौलिक कविताएं, कहानियाँ लेख व अनुभव लिखे। खूबसूरत चित्र बनाए उनमें रंग भरे और सब हमे सपुर्द किए – “हमारी भी बातचीत निकले।” मानो सृजनशीलता का बांध टूट गया।
यह सब आशातीत था। अब हमारे सामने एक सवाल था कि टीएलएम किसे कहेंगे? क्या दीवारों पर ऊंचाई में टंगे फ्रेम टीएलएम है? दीवारों पर लिखी इबारतें टीएलएम है? या बाज़ार में बिकते महंगे समान टीएलएम है। न्यूज़ लेटर की गतिविधि ने टीएलएम को नए अर्थ प्रदान किए। टीएलएम वही है जो अंतत: सीखने को बढ़ाए, वह भी खुशनुमा माहौल में रटने की पकी हुई आदतों को तोड़ दे। काफी हद तक न्यूज़ लेटर ने धसी हुई आदतों को तोड़ा है। जो लड़कियां पत्र के नाम पर अकसर बीमार पड़ने व जरूरी काम के लिए छुट्टी की अर्ज़ी बंधे बंधाए फ़ारमैट में लिखती थी। वही लड़कियां कुछ जुदा अंदाज में अब लिखती हैं। “बातचीत” में छपे इस पत्र की बानगी देखने के साथ ही हैप्पी एंडिंग करते हैं।
पत्र केजीबीवी तबीजी के नाम प्रिय सहेलियों,
आप सब कैसी हो? बहुत दिन हुए आपसे मिले हुए। सर्व प्रथम आपने जो हमारे रहने खाने की व्यवस्था की थी उसके लिए धन्यवाद। वहाँ सभी केजीबीवी की लड़कियों को एक साथ खेल के मैदान में देखकर बहुत खुशी हुई। हमने सच्चे मन और खेल की भावना से आपके साथ और आपने हमारे साथ खेला। खेल में लड़ाई तो हो ही जाती है। हम भी लड़े और एक भी हो गए। हमारे स्कूल में खेल का मैदान नहीं है, इस कारण जब कभी आप लोग खेलने के लिए आते हो तो तुम्हें दूर ले जाना पड़ता है। इससे तुम्हें व हमे बहुत समस्या होती है। इसके लिए खेद है। खेल प्रतियोगिता में आपके व हमारे विद्यालय ने बराबर अंक आने पर जो समूहिक शील्ड जीती थी, उसे 15 मई को छ: महीने पूरे हो जाएंगे। हम चाहते हैं कि वह शील्ड अब हम रखें। आपके उत्तर की प्रतीक्षा में।
केजीबीवी श्रीनगर, अजमेर से आपकी सहेलियाँ
[1] कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय (KGBV) – केजीबीवी वह विद्यालय हैं जहां समाज के वंचित तबके की लड़कियाँ आवासीय रूप से रह कर कक्षा 6 से 8 तक की पढ़ाई करती हैं। यहाँ इन्हें सभी सुविधाएं निशुल्क मिलती हैं। इनमें वो लड़कियां होती हैं जो या तो कभी स्कूल में दाखिल ही नहीं हुई थी या फिर खभी किसी स्कूल में दाखिला तो लिया लेकिन एक दो कक्षा के बाद ड्रॉप आउट हो गई। इनमें ज़्यादातर लड़कियां पढ़ने लिखने की बुनियादी सक्षताओं पर भी नहीं होती हैं।
[2] संधान – संधान – Society for Study of Education and Development
(कृपया अपनी टिप्पणी अवश्य दें। यदि यह लेख आपको पसंद आया हो तो शेयर ज़रूर करें। इससे इन्टरनेट पर हिन्दी को बढ़ावा मिलेगा तथा मेरे लेखन को प्रोत्साहन मिलेगा। )
दलीप वैरागी
09928986983
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Wednesday, September 12, 2012
CCE (सतत एवम समग्र मूल्यांकन): कुछ नोट्स, क्लासरूम के अंदर व कुछ क्लासरूम के बाहर
कल्पनाशीलता कहाँ देखें
कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय में शनिवारीय स्टाफ बैठक... यह बैठक विशेषकर सतत व व्यापक मूल्यांकन लागू होने के बाद अस्तित्व में आने लगी है। इस बैठक में शिक्षिकाएँ एक मंच पर बैठ कर प्रत्येक लड़की की प्रगति का जायजा लेती हैं और मिलकर लड़की की प्रोफ़ाइल व पोर्टफोलियो को अपडेट करती हैं। डेमोंस्ट्रेशन के तौर पर किसी एक लड़की की प्रोफ़ाइल को अपडेट करने की बात आई। कक्षा 6 की रानी जाट की प्रोफ़ाइल भरी गई। रानी जाट विषय कि समझ में ए ग्रेड लिखित- मौखिक अभिव्यक्ति व सम्प्रेषण में ए ग्रेड। इन ग्रेडिंग के सबूत रानी जाट की वर्क शीट्स, नोटबुक, पोर्टफोलियो में खूब सारे हैं। बात कल्पनाशीलता पर आकार कुछ अटकती जान पड़ी। “इसको कैसे भरेंगे?” एक शिक्षिका ने कहा। दूसरी ने कहा कि “कल्पनाशीलता के लिए हमने किया क्या है?” “कविता में देखते हैं जो रानी ने अपनी कॉपी मे लिखी है।“ “लेकिन यह क्या .... हम पंछी उन्मुक्त गगन के पिंजर बद्ध न रह पाएंगे / कनक तीलियों से टकराकर .... ये तो किताबी कविता है। इसमे रानी की कल्पना कहाँ है?” “चलो किसी पेंटिंग में देखते हैं जो रानी ने बनाई हो .... यह क्या यह भी पुस्तकालय की किताब से देख कर बनाई हूबहू नकल है... रानी की अपनी कल्पना कहाँ है?” क्या रानी सपने देखती है, क्या रानी सपने देख सकती है, क्या रानी कल्पनाएँ करती है, क्या रानी कल्पनाएँ कर सकती है? इसकी कोई विश्वसनीय जानकारी शिक्षिकाओं के पास आज नहीं है। इन सब जानकारियों को जुटाने के लिए फिर से पढ़ना पड़ेगा नई संकल्पनाओं के साथ, नई योजनाओं के साथ, फिर क्लास रूम में जाना ही पड़ेगा।
बात कुछ यूं शुरू हुई
साफ सुथरा कक्षा-कक्ष, उसमें बैठी स्वस्थ व प्रसन्नचित्त दिखाई देती लड़कियां, लड़कियों के चेहरों पर रोनक से साफ पता चलता है कि वहाँ मेरी उपस्थिति व कक्षा का वातावरण बोझिल नहीं है। चेहरों के अलावा कमरे की दीवारों पर अब दृष्टि पड़ रही है। दीवारों पर कुछ जरूरी चार्ट व नक्शे चस्पा हैं। सॉफ्ट बोर्ड पर लड़कियों का आर्ट वर्क प्रदर्शित है। नज़र ठिठकती है बायीं दीवार की ऊपर की तरफ मोटे नीले अक्षरों में लिखी इबारत पर “असफलता सफलता की पहली सीढ़ी है।” दाहिनी दीवार पर भी एक इबारत वैसे ही लिखी है लेकिन अब स्मृति-पटल पर धूमिल हो गई है। शायद ‘ईमानदारी ही सर्वोत्तम नीति है’ नही शायद ‘सदा सच बोलो’ पता नहीं... लेकिन सामने की दीवार पर लिखा सुभाषित वाक्य बिलकुल साफ दिखाई दे रहा है। “अपनी जीत हो लेकिन किसी की हार न हो।” क्या मतलब हैं इन सुभाषित वाक्यों के ? अभी इनकी जरूरत पर बात नहीं करेंगे। किससे पूछें इनके मतलब? शिक्षिकाओं से ? निसंदेह उनको ज़रूर पता होंगे लेकिन मेरा तजुर्बा बताता है कि सब मतलब टीचर को पता होते हैं लेकिन वे मतलबों के करीब रहते हुए भी उतने ही असंपृक्त रहते हैं। क्या इनके मतलब बच्चों से पता किए जाएँ, क्या उन्होने इन परिभाषाओं की कोई व्याख्याएँ बना रखी हैं? वैसे ही जैसे अपने बचपन मे हमने अपनी सोच, सामर्थ्य व अपनी युग(उम्र) चेतना के हिसाब से प्रार्थना, प्रतिज्ञा व दैनिक इस्तेमाल होने वाले श्लोकों के अपने निजी अर्थ गढ़ रखे थे। चलो पूछते हैं।
दीवार से कुछ यूं उतरा सुभाषित
मैंने लड़कियों से सवाल किया, “इस लाइन का क्या अर्थ है?” एक सन्नाटा पूरे कमरे में पसर गया। अभी तक कमरे में बातचीत का जो स्वाभाविक कोलाहल था उस पर इस सवाल ने लगभग रोलर फेर दिया। सवाल के जवाब में मेरे सामने हैं लड़कियों की सवालिया नज़रें ‘ये कैसा सावल है?’ बिलकुल अप्रत्याशित सवाल था। दीवारों पर लिखी बातों पर सवाल थोड़ी होते हैं! ये तो स्वयं सिद्ध कथन हैं! मैंने सवाल फिर दोहराया। इस बार सवाल ने सन्नाटे को तार-तार कर दिया। सन्नाटा काँच के मानिंद चटक कर ढेर हो गया। अब लड़कियो में कुनमुनाहट हुई। आपस में बातों का सिलसिला चल निकला। जवाब बताने के लिए दो-तीन हाथों में जुंबिश हुई। एक लड़की, “सर इसका मतलब यह होना चाहिए कि अगर हम खेल में जीत जाएँ तो जो हार गया है उसकी इन्सल्ट कभी नहीं करनी चाहिए।” कुछ हाथ उसके समर्थन में तने लेकिन कुछ ने कहा “दो लड़ेंगे तो एक को तो हराना ही पड़ेगा” बहस चल पड़ी। चलना लाज़मी भी है और उसको बीच मे रोकना उतना ही गैर वाजिब। लिहाजा इसे एक सौंदर्यबोधीय मोड़ देने की सूझी। मैंने वाक्य को फिर दोहराया - अपनी जीत हो लेकिन किसी की हार न हो। और फिर कहा, “मुझे ऐसा लग रहा है कि यह किसी कविता की पहली लाइन है। इसी तरह इसकी दूसरी, तीसरी, चौथी.... लाइनें भी होनी चाहिए।” मैंने लड़कियों से कहा कि इसी लाइन की तुक मिलते हुए कोई दूसरी लाइन गढ़ो। इस बार फिर एक मंथन शुरू हो गया लड़कियों के दरम्यान। लेकिन तत्परता दिखाई एक शिक्षिका ने मैंने बोर्ड पर पहले से ही उस पंक्ति को लिखा था। उसके ठीक नीचे उन्होने दूसरी पंक्ति लिख दी। बिलकुल ऐसे –
अपनी जीत हो लेकिन किसी की हार न हो। वह इंसान ही कैसा जिसके मन मे प्यार न हो।
लगता है लड़कियों का काम अब थोड़ा आसान हो गया है। शायद मेरा भी। मैंने सवाल किया कि बताइये दोनों लाइनों में क्या समानता है? लड़कियों ने कहा आखिर कि आवाज़ों ‘हार न हो’ और ‘प्यार न हो’ में समानता है। मुझे लगा कि अब लोहा गरम है और उसे आसानी से ढाला जा सकता है। मैंने कहा कि कविता लिखना आसान हो जाएगा अगर हम ऐसे आवाज़ों को पहले से ही सोच के रख लें जो कविता की लाइनों के अंत में आ सकती हों।
एक लड़की सर मैं बताऊँ, परोपकार न हो टीचर विस्तार न हो
दूसरी लड़की पार न हो
तीसरी लड़की प्रचार न हो
चौथी लड़की हथियार न हो
पाँचवी लड़की विचार न हो
छठी लड़की आकार न हो
इस तरह से एक अनंत सिलसिला निकल पड़ा, जिसमे टीचर व लड़कियां बराबर शामिल थी ... संसार न हो, परोपकार न हो, इंतज़ार न हो, जिम्मेदार न हो, उपकार न हो, अधिकार न हो, तैयार न हो, पहरेदार न हो, चौकीदार न हो, प्रहार न हो, व्यवहार न हो…. इस तरह मैं बताऊँ – मैं बताऊँ का शोर और शब्दों आवाज़ों का मिश्रण सरापा एनर्जी में तब्दील हो गया। इस कोलाहल में कहीं एक स्वर शिक्षिकाओं का भी सुनाई पड़ा “अब मुश्किल नहीं है कल्पना शीलता को देखना।” अब लड़कियों को पाँच-पाँच के समूहों में काम करने को कहा कि आप इन आवाजों सहित कुछ और पंक्तियाँ लिख कर लाएँ।
मेरे हाथ में चंद कागज है
जिनमें चंद लाइनें हैं। लाइनों में कविताएं हैं और नहीं भी है। उन लाइनों का खुलसा यहाँ नहीं करना बेहतर है। यदि खुलासा होता है तो कविता पर कला के पंडित शिक्षा के जानकार फतवा दे सकते हैं। फतवे चाहते हैं कि चीज़ें सिर्फ सीढ़ी लाइन में ही चलें। लेकिन सीढ़ी लाइन में दोनों ही नहीं चलते ज़िंदगी और न कविता।
तो फिर कविता कहाँ है ?
पहली लाइन और मिलाए गए काफ़ियों में जो रिक्त स्थान है उसमे असीम संभावनाएं हैं, अर्थ की, संगीत व कल्पनाशीलता की। कविता के लिए ये खाली जगह है। कागज के इस छोर से उस छोर तक, इस पन्ने से नोट बुक के आखिरी पन्ने तक... इस कक्षा के कमरे से लेकर क्षितिज की ओर तक या फिर क्षितिज से आगे संसार के छोर तक अनंत जगह बिछी पड़ी है कविता के लिए। कविता का क्या है, कहीं भी, कभी भी उतर आएगी। एक पकड़ उनके हाथ में आ चुकी है.... काफिया मिल जाना एक तरह से बारिश से पहले की शदीद गर्मी या कभी सौंधी महक-सा होता है। वीरान रेगिस्तान में मिले इंसानी पदचाप सा होता है।
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दलीप वैरागी
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