Friday, December 16, 2016

भाषा शिक्षण का एक अनुभव: कहानी तो किसी पे भी बन सकती है

दिनांक : 8/ 12/ 2016
मैंने कक्षा में जाते ही कुछ वाहियात किस्म के सवाल पूछे, जैसे  - “आप क्या पढ़ रहे हैं?” लड़कियों का स्वाभाविक सा जवाब था, “सामाजिक ज्ञान।” मेरे हाथ क्या लगा? सवाल इसलिए व्यर्थ था चूंकि इसके पीछे कुछ जाने की इच्छा थी ही नहीं। लड़कियां अर्द्धवार्षिक परीक्षा की तैयारी कर रही थीं। यह मुझे पता था। मैं कुर्सी में धंसकर  आगे की तरतीब सोचने लगा। जवाब का सिरा थाम के वार्तालाप का सेतु बांधने की कोशिश की, “आपको सामाजिक ज्ञान पढ़ने में यानि समझने में कोई दिक्कत हो तो बताएँ।” मुझे लगता है सवाल से ज्यादा अहम संप्रेषित हुआ। लिहाजा लड़कियों ने या तो सवाल सुना ही नहीं या जवाब देना उचित नहीं समझा। बातचीत के लिए जमीन अभी समतल नहीं हुई थी। मेरे सामने शेरगढ़ कस्तूरबा विद्यालय की कक्षा 6 की लड़कियां बैठी हैं। कक्षा का विभाजन व बैठक व्यवस्था दो समूहों में है – एक समूह जो शिक्षिकाओं के मापदण्डों के आधार पर कक्षा 6 की दक्षताओं के अनुरूप हैं। दूसरा समूह उन लड़कियों का है जो पढ़ने – लिखने के बुनियादी कौशलों को हासिल करने में अभी संघर्षरत हैं। इन्हे कक्षा दो के स्तर की पुस्तकें दी हुई हैं। अभी पिछले माह की गई बेसलाइन मूल्यांकन की रिपोर्ट के अनुसार ज़्यादातर लड़कियां अभी पढ़ना नहीं जानती हैं।
मैं कमरे को निहार रहा था और बातचीत के सूत्र तलाश रहा था। मुझे लगता है कि किसी भी कक्षा में शुरू के पाँच मिनट शिक्षक के लिए बहुत आसान नहीं होते हैं। मेरे मामले में तो हमेशा ही ऐसा होता है चाहे बच्चे परिचित हों या अपरिचित। इन लड़कियों से मैं पहली बार मिल रहा था। मैंने नाम बताया और अपने बारे में संक्षिप्त परिचय दिया। इस बार फिर मैंने एक और ऐसा सवाल किया जिसका जवाब मुझे पहले ही पता था, “कहानी किस-किसको पसंद हैं।” जवाब में आवाज़ नहीं हाथों हा हवा में लहराना हुआ। इस सवाल के जवाब में मुझे एक और सवाल  एक अंकुर फूटता दिखा... मैंने कहा, “ये कहानियाँ आती कहाँ से हैं?”
“किताब से... ”
“लाइब्रेरी से... ”
“नानी से... ”
दादी से... मम्मी से ... टीवी से .... रेडियो से ... अखबार से .... दोस्त से... सहेली से... पड़ौसी से......
निरर्थक से सवालों के बीज इतनी जल्दी बातचीत की फसल के रूप में लहलहा उठेंगे यकीन न था। लड़कियां उमंग के साथ बातचीत में जुट गईं।  अब मेरे पैर भी सख्त मिट्टी पे खड़े थे मैंने पूर्व प्रश्न की बुनियाद पर ही दूसरी ईंट रखी, “अच्छा ये बताओ कि कहानी किस – किस पर बन सकती है?
एक झटके में हाथों की फसल फिर कमरे में लहलहा उठी। हाथों की गिनती से मुझे समझ आ गया कि अब हम किधर की दिशा ग्रहण करने वाले हैं। लड़कियों की शब्दावली का जायजा लेने के लिए मैंने उन्हें कहा कि आप बारी-बारी से बोलते जाएँ और मैं ब्लैक बोर्ड पर उन्हें लिखता जाऊंगा। निम्नलिखित शब्द बोर्ड  आकार लेने लगे। जो याद रह गए वे हैं -
बकरी
नाना
नानी
हाथी
मक्की
किसान
शेर
कुत्ता
दादा
रानी
कौआ
मक्खी
चिड़िया
मोर
पत्ता
दादी
पानी
औरत
हिरण
कबूतर
चोर

राजा





मैं शब्दों को बोर्ड पर जहां-तहां छितरा कर लिख रहा था। इसके पीछे था आज का उद्देश्य – शब्द पठन। जब बोर्ड पर चार-पाँच शब्द आते हैं तो शिक्षक के मन में उनको लेकर कई वर्गीकरण के विचार उभरने लगते हैं। जैसे सजीव – निर्जीव, जानवर-पक्षी या मनुष्य इत्यादि। मैंने इन वर्गीकरन के आधार पर इन शब्दों को बोर्ड पर न लेकर आगे की गतिविधियों के लिए स्थगित कर दिया। चूंकि इन लड़कियों के साथ पढ़ना सीखने के साथ काम किया जाना है इसलिए मैं एक जैसी ध्वनि वाले, शब्द मैत्री वाले या फिर जिनमें मात्राओं का कोई पैटर्न दिखाई दे, उन्हें एक जगह, पास-पास लिखना शुरू कर दिया। ताकि लड़कियों को पढ़ने में, अंदाजा लगाकर शब्द को पहचानने में मदद मिल सके।    
बोर्ड के शब्दों से भर जाने के बाद यह  बात भी स्पष्ट को गई कि कहानी में दुनिया की कोई बी शै आ सकती है। थोड़ी सी चर्चा के बाद ग्रुप इस निष्कर्ष पर भी पहुँच गया कि कहानी कोई भी बना सकता है चाहे वह पढ़ा-लिखा या या न हो। यह भी तय किया कि आज हम मिलकर एक कहानी भी लिखेंगे।
अभी तय यह हुआ कि पहले कोई लड़की बोर्ड के पास आकार इन सभी शब्दों को पढ़ के बताए। एक साथ चार हाथ हवा में लहराए। एक को बुलाया गया जिसे अच्छे से पढ़ना आता है। लड़की ने एक-एक करके सारे शब्दों को पढ़ दिया। फिर मैंने कहा कि कोई लड़की शब्दों पर उंगली रख कर एक बार पढ़ो। एक और लड़की ने आकर शब्दों पर उंगली रख कर वाचन किया।   इसमें कोशिश यह थी कि जिन लड़कियों के लिए यह उक्ति प्रचलित है कि “वे नहीं पढ़ सकती .... या इन्हें तो कुछ नहीं आता” वे इस सहभागी वचन प्रक्रिया में बोर्ड के शब्द जाल में से ध्वनियों व आकारों का तारतम्य व पैटर्न पकड़ पाएँ और उनके दरम्यान कोई संबंध समझकर अपने मन की छवियों को इन इबरतों के साथ रख कर देख लें। ये वो लड़कियां नहीं हैं जिन्हें  बिलकुल भी अक्षरों का एक्सपोजर न हो। बल्कि इनमे से अधिकतर तो 5- 6 सालों से अक्षरों के महासागर के भंवर में डोल रही हैं। बस इनके हाथ नहीं लगता है तो अर्थ रूपी किनारा।
तीन-चार बार लड़कियों (जो पहले से पढ़ सकती हैं) पढ़वाने के बाद  मेरा लक्ष्य अब वे  लड़कियां थीं जिनके बारे में यह प्रचलित था कि वे “पढ़ नहीं सकती”। अब मैंने इसे हल्का सा खेल का रूप दे दिया- दोना समूह से बारी बारी से एक लड़की आएगी और पढ़ेगी। इस बार बारी थी दूसरे वाले ग्रुप की। थोड़े संकोच के साथ आकर बोर्ड पर खड़ी हुई, मैंने कहा, “आपके लिए छूट है कि आप कहीं से भी पढ़ सकती हैं।” लड़की ने शुरू से शुरू किया जैसे ही उसने दो शब्दों को पढ़ा पीछे से दो लड़कियों के ताली बजने की आवाज़ आई। इन तालियों का समर्थन बाकी लड़कियो की नजरों में दृश्यमान था। यह वह  लड़की थी जिसके बारे में प्रचलित है, “वह नहीं पढ़ सकती।” अब वह उंगली बोर्ड कि और इंगित किए धीमें- धीमे पढ़ रही है अगले शब्द पर जाने से पहले पिछले को देखती है, मन मे बुदबुदाती है फिर मुखर होती है। आवाज़ बहुत धीमी है। उसकी आवाज को सुनने के लिए कमरे के शोर ने भी अपने आप को उसी कि फ्रिक्वेंसी पर ट्यून कर लिया है। वह पढ़ रही है। शब्द दर शब्द। आखिर जैसे ही बोर्ड पर का आखिरी शब्द उच्चरित किया तो उसकी ध्वनि से करतल ध्वनि शुरू हुई और पूरा हाल गुंजाएमान हो गया। लड़की के लिए इल्म का एक तिलिस्म खुलने के लिए बाकी आलिम लड़कियों का अहतराम था।
इस तरह दोनों समूहों से अनवरत क्रम चलता रहा। सबने पढ़ा। मज़े से पढ़ा। उत्साह से पढ़ा। इस गतिविधि में कोई नहीं थी जो निरक्षर थी।  उनकी टीचर कि नज़रें भी आश्चर्यचकित थीं।
किसी ने कहा, “सर कहानी तो अभी बाकी है।”
मैंने कहा, “कहानी किस पर बनाएँ ?
लड़कियाँ बोलीं, “कहानी तो किसी पर भी बन सकती है।”
मैंने कहा, “इतने सारे नाम लिखे हैं, तय करके बताओ इनमें से किस पर लिखें?
मोर
 “बिल्ली”
शेर.... चूहा .... खरगोश....... खूब सारी आवाज़ें आने लगीं।
एक लड़की बोली, “सर, जानवरों की नहीं हम इंसान की कहानी बनाएँ।”
दूसरी लड़की – “किसान की कहानी बनाते हैं।”
किसान पर सबकी सहमति बन गई। 
कमरे की पिछली दीवार पर एक और ब्लैक बोर्ड बना हुआ था। चूंकि सामने वाले बोर्ड पर शब्द लिखे हुए थे उसे हमने मिटाना उचित नहीं समझा। हमने तय किया पीछे वाले बोर्ड का प्रयोग करते हैं। सब लड़कियाँ उस और घूम गईं।
मैंने लड़कियों से कहा कि कहानी का शुरू का वाक्य मैं लिख देता हूँ, बाकी की कहानी आपको वाक्य दर वाक्य पूरी करनी है। मैंने वाक्य लिखा –
एक किसान था।
मेरे लिए पहला वाक्य लिखना आसान था। लिकिन कहानी में पहला वाक्य जितना आसान होता है दूसरा वाक्य उतना ही मुश्किल होता है। क्योंकि वह किसी अज्ञात घटना में धंसा हुआ होता है जिसे अभी कल्पित कियाया जाना बाकी है। दूसरे वाक्य के अवतरित होने से पहले सोचने वाले के मस्तिष्क में कहानी की एक रूपरेखा होना लाज़मी होती है। भाषण में शायद इसके उलट होता है वहाँ पहला वाक्य एक बड़ी चट्टान होती है। मैंने लड़कियों से कहा इसका दूसरा वाक्य सोचिए। लड़कियां एक दूसरे की तरफ ताकने लगीं। कुछ लड़कियों के सिर्फ बुदबुदाने का स्वर है लेकिन कोई मुखर नहीं हुई। फिर मैंने कहा कि आपका कोई भी बोला वाक्य इस कहानी का दूसरा वाक्य हो सकता है। देखें कौन लड़की अपना पहला वाक्य कहानी में जोड़ती है, मेरे ऐसा कहने पर उषा खड़ी हुई और बोली-
वह इधर – उधर घूम रहा था। ”
उषा वही लड़की है जिसके बारे में पूर्व धारणा है कि वह पढ़ नहीं सकती। लेकिन उसके पास भाषा है, एक जिंदा भाषा। जिसके साथ वह सोचने का काम करती है। जिसके माध्यम से वह दुनिया से जुड़ती है। वह कल्पनाएँ करती है , सपने देखती है और उन्हें सहेजकर स्मृति में रखती है। उसी कोश में से एक वाक्य इठला कर अब श्यामपट्ट पर जा चिपका है। बोर्ड का पाठ अब उसी रंग और शक्ल का है जो उसकी स्मृतियों मे बंदनवार सा आच्छादित है। अब उसके लिए पाठ और उसके शब्द सहोदर से हैं। शायद इसे ही तो  पढ़ना कहते  है।
उषा के लिए एक बार कमरा फिर तालियों से गुंजाएमन हुआ।
अब तीसरे वाक्य के लिए जद्दोजहद शुरू हो गई। मैंने कहा, “उषा का किसान कुछ आवारा किस्म का व्यक्ति लग रहा है। क्या आप उसके घूमने को कोई उद्देश्य देना चाहते हो? उषा की ही तरह संतोष, दरियाव पूजा जैसी लड़कियां हैं जिन्हें पढ़ने में दिक्कत है। इस बार दरियाव खड़ी हुई और बोली –
“वह खाने के लिए चीजें तलाश रहा था।”
दरियाव ने किसान की आवारगी को एक मक़सद देकर उसे अपने गाँव के ही किसी दुनियादार व्यक्ति की शक्ल दे डाली जो सुबह से शाम तक खाने के जुगाड़ में लगा रहता है। ज़िंदगी भर प्रेमचंद के होरी  की  तरह रोटी की  मरीचिका के पीछे भटकता रहता है।
एक और लड़की ने जैसे होरी की विडम्बना को भाँप लिया और चौथे वाक्य के रूप में उसकी नियति को तय कर दिया और बोली –
“उसके पास खाने की चीज़ें खरीदने के लिए पैसे नहीं थे।”
अब तक कहानी घुटनों के बल चल रही थी लेकिन इस वाक्य के बाद उसमें पहिये लग गए। एक साथ कई लड़कियों के हाथ खड़े हुए वाक्य जोड़ने के लिए। एक हाथ बाकायदा उषा का भी है। इस बार मौका मिला कक्षा 6 के स्तर की लड़की को। उसने वाक्य दर्ज़ करवाया – “वह अपने भाई के पास गया और बोला कि मुझे कुछ पैसे उधार चाहिए।” मैंने और तफसील के लिए लड़की से सवाल किया कि वह कौनसे भाई के पास गया, छोटे या बड़े? शायद वह अपने अनुभव में गई या यूं ही तुक्का लगाया और वाक्य को यूं फिर से लिखवाया-
“वह अपने बड़े भाई के पास गया और बोला कि मुझे कुछ पैसे उधार चाहिए।”
झट से एक लड़की खड़ी हुई और बोली, सर लिखो –
“उसके भाई ने कहा कि मेरे पास पैसे नहीं हैं।”
ईश्वर जाने यह वाक्य अनुभव की तल्खी से जन्मा या फिर उसने बड़ी चतुराई से घटना में नया मोड दे दिया। लेकिन वाक्य बोर्ड की इबारत में दर्ज़ हो चुका था। अब कुछ लड़कियों की शून्य में सोचते हुए थीं और कुछ  लड़कियों के सिर हल्की गुफ्तगू के किए जुड़े और एक अंतराल बाद एक वाक्य किसान के लिए उम्मीद सरीखा कमरे की चुप्पी में उग आया –
“वह अपने दोस्त के पास गया और बोला कि मुझे कुछ पैसों की जरूरत है।”
इस वाक्य ने जहां कहानी में एक उम्मीद जगाई वहीं एक पूर्वाभास ने मुझे चिंतित भी कर दिया कि अब कहीं कोई लड़की उठ कर किसान की इस उम्मीद को भी समाप्त न कर दे। और कह दे कि भाई ने भी मना कर दिया। मैंने भी सोच लिया था कि यदि ऐसा हुआ तो मैं लड़कियों से सवाल जवाब करूंगा कि ऐसा क्यों किया आपने। लेकिन लड़कियां प्रेमचंद की तरह निर्दयी नहीं निकलीं उन्होने प्रेमचंद की तरह होरी को तिल-तिल नहीं रुलाया। उसके लिए यह विकल्प खुला रखा लेकिन सस्पेंस बनाए रखा। अब नया वाक्य था-
“दोस्त ने पूछा कि आपको कितने पैसों की जरूरत है?
इस वाक्य का अगला वाक्य भी लगभग तय सा है। जो एक गणितीय संख्या होगा।  बस लड़कियों को किसान के अर्थशास्त्र का थोड़ा जायजा लेना है और हल्का सा मानसिक गणितीय आकलन करना है। जो भी, अब किसान ने कहा –
“मुझे पाँच सौ रुपयों की जरूरत है।”
वाह री लड़कियों, गज़ब आपकी बराबरी व न्याय की अवधारणा है आपकी ! आपने दोस्त की जेब भी किसान के ही नाप की सिल डाली। आखिर दोस्त से कहलवा ही दिया –
“इतने रुपये तो मेरे पास नहीं हैं।”
समझती क्या हैं ये लड़कियाँ ! पाँच सौ कोई बड़ी रकम तो नहीं थी, दिलवा देतीं तो क्या बिगड़ जाता दोस्त का? दोस्ती की सच्चाई पर संदेह अब लाज़मी हो गया है। आखिर लड़कियों के मन में क्या है? क्या कोई संभावना बची है? एक लड़की ने उठ कर संभावना को दोस्त में से ही निकाला। अब दोस्त आगे बढ़ कर पूछता है-
“आप इन पैसों का क्या करेंगे?
लड़कियां भलीभाँति जानती हैं कि किसान की सबसी बड़ी जरूरत वही चीज़ होती है जिसे वह सबसे ज्यादा उपजाता है और खेत – खलिहान से घर तक का सफर तय करने तक वह चीज़ सबसे कम बचती है। एक लड़की अब किसान की बात को अगले वाक्य में रखती है-
“इन पैसों से मैं बाजरा ख़रीदूँगा।”
ब्लैक बोर्ड की सीमाएं निर्धारित हैं लेकिन सृजनशीलता की नहीं, यदि दो वाक्यों में बात खत्म न हुई तो दूसरे बोर्ड की इबारत को मिटाना होगा। लड़कियों ने इसे भी भाँप लिया और और दोस्त के एक वाक्य में कहानी को सुखांत बनवा दिया –
“आप अपनी जरूरत के जितना बाजरा मेरे घर से ले जाओ।”
इस एक वाक्य में लड़कियों ने न केवल कहानी को खत्म किया बल्कि समाज में लगभग खत्म होती इस तरह की विनिमय की परंपरा का मुजाहिरा भी करा दिया। अब किसान से औपचारिकता का वाक्य कहलवा कर घर भेज दिया।
कहानी बोर्ड पर आ चुकी थी। अब मेरा शिक्षक फिर जाग गया। मैंने लड़कियों से कहा कि जरा पढ़कर तो देखो कि अपनी कहानी कैसी बनी नहीं। अपनी कहानी  पद लड़कियों को जहां बोर्ड पर लिखी इबारत से तदात्मय स्थापित करने में मदद करता है वहीं कहानी बनी  पद उन्हे सफलता का अहसास कराता है। जो कि हमारी परंपरागत शिक्षण प्रक्रियाओं में दुर्लभ सा है। सभी लड़कियाँ अपनी कहानी  पढ़ने को आतुर थीं। इसमें भी पूर्व की शब्द पठन की प्रक्रिया की तरह ही कहानी को पढ़ा गया। सभी लड़कियों ने कहानी को पढ़ा। हाँ, उषा ने भी पढ़ा। सफलता व अपनापे के अहसास के साथ।
दूसरी कहानियों पर सवाल जवाब हो सकते हैं तो क्या इस पर भी लड़कियां बातचीत कर सकती हैं? मैंने कुछ सवाल किए भी जैसे -
“भाई ने किसान को पैसों के लिए क्यों मना किया होगा?”
लड़कियों ने चर्चा में बताया कि “ऐसा नहीं कि भाई के पास पैसे नहीं थे, वह पैसे देना ही नहीं चाहता था।”
मैंने पूछा, “इसका क्या सबूत है कहानी में?”
लड़कियां – “इसका सबूत यह है कि जब किसान पैसे मांगने गया तो भाई ने शुरू में ही मना कर दिया यह जाने बिना कि उसे कितने पैसे चाहिए। इससे साबित होता है कि वह पैसे देना ही नहीं चाहता था। जैसे दोस्त ने पैसों के लिए तब मना किया जब उसने जान लिया कि किसान को कितने पैसों की जरूरत है। इससे पता चलता है कि सच में ही दोस्त के पास पैसे नहीं थे।”
बोर्ड और कालांश की सीमाओं में जकड़ी इस इबारत को हो सकता है आप कहानी न माने। लेकिन एक कहानी आज शुरू हो चुकी है जो इस बोर्ड से भविष्य के क्षितिज तक जाएगी। लड़कियां की इस इबारत में हो सकता है कहानी न हो लेकिन लड़कियों के लिए अनंत संभावना है सृजनशीलता के मुस्तकबिल तथा एक शिक्षक के लिए शिक्षण की।  तत्काल मुझे एक संभावना  नजर आई । मैंने लड़कियों से कहा कि पहले वाले बोर्ड पर जो शब्द लिखे हुए हैं उन्हे अपनी नोटबुक में लिख लो लेकिन उन्हे जैसे के तैसा नहीं लिखना है। इस शब्दों में कई तरह के समूहों मे रख कर देख सकते हैं। मैंने लड़कियों से इस शब्दों को वर्गिकरण करके तालिकाबद्ध करने के लिए कहा।

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दलीप वैरागी 
09928986983 

Tuesday, August 30, 2016

बच्चे अखबार क्यों पढ़ें ?

कल रात भारत और वेस्टइंडीज की टीमों के मध्य दूसरे टी-20 मुकाबले का प्रसारण आ रहा था। बेटा काव्य मेरे साथ बैठ कर देख रहा था। वेस्टइंडीज की पारी समाप्त हो हो चुकी थी। भारत ने खेलना शुरू किया था। बारिश के कारण मैच बाधित हो गया। मैंने कहा कि अब सोना चाहिए। लेकिन वह बोला कि मुझे पता करके ही सोना है कि कौन जीता और कौन हारा। चूँकि सुबह उसे स्कूल जाना है और मुझे जयपुर निकलना है, इसलिए मैंने टीवी के स्वीच की ओर हाथ बढ़ाते हुए कहा कि अगर मैच का निर्णय ही जानना है तो सुबह अख़बार से पता कर लेंगे। तर्क काम कर गया। सुबह  जब मैं 5 बजे उठा तो तो देखा वह भी जगा हुआ  था। मेरे साथ ही उठ गया। जो कि अप्रत्याशित था। उसने कहा कि अख़बार से पता करें कि कल के मैच में कौन जीता। मैंने उसे अख़बार खोलकर खबर पढ़ने के लिए कहा। उसने अनमने ढंग से खबर पढ़ने की कोशिश की और हैड लाइन पढ़कर अख़बार मेरी ओर बढ़ा दिया, “आप पढ़कर बताओमुझे हैरत हुई उसके अख़बार से इस तरह अलगाव को देखकर। मैं इसके कारण तलाशने लगा।
बात ज्यादा पुरानी नहीं है, जब मैंने उसका पहला परिचय अख़बार से करवाया था तब आईपीएल के क्रिकेट मुकाबले चल रहे थे। आज की तरह एक सुबह जब ऑफिस के लिए तैयार हुआ और निकलने से पहले ट्रेन का स्टेटस चेक किया, ट्रेन एक घंटा देरी से थी। इस समय का सदुपयोग करते हुए मैंने अख़बार उठा लिया और सुर्खियाँ देखने लगा। एक हैडलाइन आईपीएल के फाइनल मुकाबले की थी। खबर पर ध्यान जाने की बजाए ध्यान बेटे पर गया, जो अभी भी सो रहा था। मैंने उसे आवाज लगाई, "क्या हुआ फाइनल मुक़ाबले का?" बेटा 8 साल का है। उसने आईपीएल 9 के सारे मैच देखें है। बहुत से देशी-विदेशी, नए खिलाडियों के नाम मैंने उसी से सुने हैं। किस खिलाडी के कितने रन या विकेट हो गए, कौन किससे कितने रन पीछे चल रहा है, ऐसी क्रिकेट की जानकारियों का बहुत ही नया खजाना है उसके पास, जो महज दो महीने पुराना है। मैंने अख़बार की खबर न पढ़कर बेटे की जानकारी का आकलन करना चाहा। आईपीएल का नाम सुनते ही बेटा ऐसे उठा जैसे जाग ही रहा था, "आप बताओ, क्या हुआ... मैं तो सो गया था।"

मैंने अचरज से पुछा, "कमाल है ! आप बिना फाइनल मैच देखे ही सो गए।" वह बोला, " क्या करूँ मम्मा ने जबरदस्ती टीवी बंद कर दिया था।" मैं चुप रहा कि घर के निजाम पे कोई टिप्पणी करने का सही वक़्त नहीं। मेरी चुप्पी को बेटे ने तोड़ते हुए कहा, "बताओ न क्या हुआ मैच में?" मैंने कहा, "आप तो जानते हो कि मैं आईपीएल के मैच नहीं देख रहा हूँ... मैंने उसे कहा कि जब आज उस मैच का पुनः प्रसारण या हाइलाइट आएँगे तब देख लेना। सब जानते हैं कि हर बच्चे के लिएअभी और यहींका बहुत महत्व होता है - आज और अभी जैसा कि एक अभिनेता के लिए। अभिनेता तो बहुत अभ्यासों से अभी पर आता है जबकि बच्चा रहता ही वहीं है। उसने कहा कि मुझे तो अभी जानना है। मैंने उसकी तरफ अखबार बढ़ा दिया, "कल के मैच की सारी डिटेल्स इसमें छपी हैं, पढ़ लो।" उसे अचम्भा हुआ, "अच्छा! इसमें छप भी गया होगा?" शायद उसको अपने वाक्य के उपपाठ के रूप में अख़बार का जीवन में महत्व नज़र आया हो। शायद उसे घर में रोज सुबह सबसे जल्दी आने वाली वाहियात चीज की सार्थकता व ज़रूरत महसूस हुई हो। उसने उत्सुकता से अखबार के पन्नों को पलटना शुरू कर दिया। उसके पन्ने पलटने की बेचैनी यह जाहिर कर रही थी कि ये अख़बार नाहक 15-20 पेज की होती है, एक या दो पन्नों में क्यों नहीं होती। खैर, उसने अपने मतलब के पृष्ठ पर पहुँचने में आधा मिनट से ज्यादा ज़ाया नहीं किया। नीचे बिखरे बाकी पन्नों से मैं अब अंतर्राष्ट्रीय वाला पृष्ठ लेकर पढ़ने लगा। बेटा खेल पृष्ठ का सस्वर वाचन करने लगा। उसके वाचन को ज्यादा देर मैं नज़रअंदाज़ नहीं कर पाया। थोड़ी ही देर में मुझे समझ आ गया कि अख़बार उसके लिए एक मुश्किल चीज़ है। मैंने कई सारे मुश्किल और नए शब्दों के उच्चारणों को दुरुस्त करवाया। अब शुरुआत हो चुकी थी। बेटा भी इस खुदाई में शामिल हो गया और भारी शब्दों की चट्टानों को उखाड़ कर मेरी और लुढ़काने लगा। मैं उनको पूरी मुश्तैदी से थामता, छाँट कर उनमे छुपी अर्थों की मूरतों को उभरता और उसे थमाता जाता।
हमने शब्दों की भी कई श्रेणियां बना रखी हैं। कुछ ऐसे हैं जिन्हें हम रोज़ ओढ़ते बिछाते हैं और कुछ ऐसे हैं जिनको कलई करवाकर कांच की दराजों में सजा रखा है, दूसरों के लिए। जब कोई मेहमान आता है तो जैसे हम तहा कर रखे हुए मेजपोश और गिलाफ बदलते हैं ऐसे ही हम रोज़मर्रा की शब्दावली को छुट्टी देकर तहाए हुए शब्द अख़बारों व किताबों में परोसते हैं। ये दोहरापन हम सामाजिक रूप से ग्रहण करते हैं। और यह हमारे पूरे वज़ूद में पसर जाता है जो अवसर पाते ही व्यवहार में भी झलकता है।
मेरे मन में फिर सवाल आया जो ये अखबार दावा करते हैं कि वे सबसे तेज़ गति से बढ़ रहे हैं, तो ये किस और बढ़ रहे हैं? ये कहाँ तक अपनी पहुँच बढ़ाना चाहते है? बच्चों की ओर तो ये मुखतिब ही नहीं! अगर ये अख़बार बच्चों तक पहुंचना चाहते हैं तो सिर्फ चाहने से नहीं चलेगा।
इसक सवाल के जवाब में लगभग सभी अख़बारों के बच्चों पर आधारित परिशिष्ट, साप्ताहिक, पाक्षिक या मासिक प्रकाशन हैं जो पाठकों को अतिरिक्त पैसा चुकाने के बाद प्राप्त होते हैं। अब सवाल है कि क्या इन परिशिष्टों से बच्चों को ख़बरें मिल पाती हैं, वही खबर जिसको सुनते या टीवी पर देखते वे कल रात सो गए थे। निसंदेह बच्चों को नयी जानकरियाँ चाहिए और ताज़ा ख़बरें भी। शर्त यह है कि खबरनवीसों को अर्थशास्त्र के साथ बच्चों का सौंदर्यशास्त्र भी समझना होगा। बच्चों की भाषा और व्याकरण भी समझना होगा। नहीं तो एक घर में दो तरीके के अख़बार की कल्पना अभी मैं नहीं कर पा रहा।

 इन दोनों घटनाओं, अर्थात बेटे के अखबार को पहली बार जरूरत महसूस करते हुए छूने और वितृष्णा से उसे परे कर देने के मध्य मुझे लगता है कुछ कारण रहे होंगे इस अलगाव के। इसके साथ ही मुझे उन बच्चों के चेहरे भी नज़र आने लगे जो रोज़ सुबह अनिवार्य रूप से अखबार पढ़ने की नसीहतें और फ़ज़ीहतें सहते हैं, स्कूलों की प्रार्थना सभाओं में अख़बार में चेहरा धँसाए ख़बरों से मुठभेड़ करते हैं। मुझे उन शिक्षविदों के चेहरे भी दिखाई देते हैं जो अख़बार वाचन को प्रार्थना सत्र का अभिन्न व अनिवार्य हिस्सा बनाने पर ज़ोर देते हैं।
दलील यह भी है कि अगर बच्चों को रूचि की ख़बरें पढ़ने के लिए कहा जाए तो वे उत्साह के साथ पढ़ते हैं। ये तो वही बात हो गई कि भात में खूब सारा घी डला हो और उतनी ही मात्रा में कंकड़ भी हों तो स्वाद के बावजूद भी किसे रुचेगा? पढ़ने और सीखने में सन्दर्भ से जोड़ना तो महत्वपूर्ण है लेकिन भाषा और शब्दावली को देखना होगा संदर्भ से असंपृक्त बना सकती है।
मुझे किसी से कुछ नहीं कहना है, आलावा उन अखबारों के जो तथाकथित रूप से रोज़ सबसे तेज गति से बढ़ रही हैं! क्या उनके पास कोई योजना है बच्चों को लेकर? ऐसी योजना जो उनके अख़बार को बच्चों  के बर्दाश्त के लायक बना सके। क्या  एक अलग अख़बार पर सोचा जा सकता है? क्या मौजूदा अख़बार में एक कविता कहानी का कॉलम लगा देने भर से काम चल जाएगा? इससे तो बच्चों को हम बचकाना चीजों तक ही सीमित रखना चाहते हैं। सवाल तो ख़बरों का है, दुनिया से जुड़ने का है। कहानियाँ अतीत के माध्यम से दुनिया में लेकर लाती हैं। बच्चे वर्तमान से सीधा साक्षात्कार कैसे करें, यह विचारणीय है। इन अख़बारों में कोई एक ऐसा वातायन खोलना ही होगा जिसके माध्यम से बच्चे खुद की व बड़ो  की दुनिया को समझ सकें। जब तक ऐसा नहीं हो सकता तब तक अख़बार भी उसी तरह बच्चों के लिए नाकाबिलेबर्दाश्त रहेंगे जिस तरह हमने उनके लिए अपने घर, रिवाज, इमारतें, बसें, ट्रेनें, पाठ्यपुस्तकें बना रखी हैं।

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दलीप वैरागी 
09928986983 

Monday, July 4, 2016

“ भूलेंगे तो तब न, जब हम उसे रटेंगे!”

पिछली 29 - 30 जून 2016 को अजमेर के कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालयों की कुछ लड़कियां उनके विद्यालयों में होने वाली प्रमुख गतिविधियों की शेयरिंग व डेमोंस्ट्रेशन के लिए जयपुर आयीं थीं। इन केजीबीवी में समाज के सबसे वंचित तबके की लड़कियां पढ़ती हैं। ये लड़कियां उन दूर दराज क्षेत्रों से आती हैं जहां विद्यालय पहुँच में न होने के कारण शिक्षा से वंचित हो जाती हैं। केजीबीवी तसवारिया की लड़कियों ने  इंद्रलोक ऑडिटोरियम पर एक नाटक भी प्रस्तुत किया जिसने खूब सराहना बटोरी। एक पत्रकार वार्ता में जब इन लड़कियों से नाटक के बारे मे सवाल पूछे गए तो उनमे एक सावल था, “आप इतने लंबे संवाद कैसे याद रख पाती हैं, आप भूल नहीं जाती?” हमें एक बारगी लगा कि शायद इस सवाल का जवाब किसी तथाकथित बड़े को उठकर देना होगा। लेकिन इस आशंका को निर्मूल करते हुए कक्षा 8 की लक्ष्मी ने फटाक  से आत्मविश्वास के साथ जवाब दिया, “ भूलेंगे तो तब न, जब हम उसे रटेंगे!”
लक्ष्मी के इस जवाब के आखिरी शब्द की प्रतिध्वनि सुनाई दे उससे पहले पूरा हाल आधा मिनट के लिए तालियों की गड़गड़ाहट में डूब गया।  तालियों की डोर को अपने हाथ में थाम लक्ष्मी ने अपनी बात जो अभी तक हवा में तैर रही थी उसे तर्क के पैरों पर टिकाते हुए और स्पष्ट किया, “हम संवादों को रटते नहीं... ये हमारे आस-पास से अपने आप आते हैं।” उसने खुद ही उदाहरण भी रखा, बिलकुल शुक्ल जी की सूत्र व्याख्यान शैली में। लक्ष्मी किसी आचार्य सरीखी अब दृष्टांत रखती है, “अब देखो जैसे मैं बहू का रोल करती हूँ तो मुझे उसके लिए कोई संवाद रटने नहीं पड़ते। इसके लिए मैं अपने गाँव की किसी बहू को देखती हूँ और उसके जैसा करने की सोचती हूँ...” यहाँ लक्ष्मी नाट्यशास्त्र के किसी बड़े सिद्धान्त का प्रतिपादन तो नहीं कर रही लेकिन लक्ष्मी के चेहरे पर  वे संभावनाएं व उम्मीद साफ नज़र आती हैं, जो नाटक से की जाती है। लक्ष्मी की अभिव्यक्ति का आत्मविश्वास इस मान्यता को बल देता है कि नाटक अपनी मूल परिकल्पना में ही सीखने का यंत्र है। लक्ष्मी यह साबित करती है कि नाट्य निर्माण की प्रक्रिया से गुजरा हुआ कोई भी व्यक्ति सोचे समझे हुए जवाब आत्मविश्वास के साथ दे सकता है।
लक्ष्मी के इस अनुभव के बहाने से मुझे भी अपने ऐसे ही मुद्दे पर लिखे पुराने ब्लॉग याद आ गए उनके लिंक नीचे दे रहा हूँ।



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दलीप वैरागी 
09928986983 

Saturday, February 20, 2016

नाटक केवल प्रॉडक्ट नहीं होता


पिछले लगभग छ: महीने अलवर रंगकर्म में बहुत महत्व के रहे हैं। इस अवधि में रंगमंच पर प्रचुरता में गतिविधियां हुई हैं। माहौल में एक जुंबिश पैदा हुई है, जिसने पिछले दस साल के सूखे में फुहार का काम किया है। इसी सिलसिले में दिनांक 7 जनवरी 2016 को कलाभारती रंगमंच पर कबीरा थियेटर की ओर से रंजीत कपूर द्वारा लिखित तथा खेमचंद वर्मा द्वारा निर्देशित नाटक एपिसोड इन द लाइफ ऑफ़ एन ऑथर का मंचन किया गया। अगर अलवर रंगमंच को आगे बढ़ना है तो उसका सतत् व् समग्र मूल्यांकन भी होना चाहिए। पिछले साल से मेरी कोशिश रही है कि अलवर में हुई रंगमंच की गतिविधियों पर लिखने की, ताकि रंगकर्म की समीक्षा में सततता बनी रहे। इन प्रस्तुतियों को देखकर उनके बारे में लिख देने से सततता तो बनी है किन्तु, समग्रता भी है या नहीं? मेरा मानना है, नहीं।
नाटक केवल परफॉर्मेंस (Product) मात्र नहीं होता है। वह प्रक्रिया ज्यादा होता है। इसके आउटकम दोहरे होने चाहिए। एक दर्शक के स्तर पर और दूसरे अभिनेता के स्तर पर भी। अभिनेता दर्शक तक रस को प्रवाहित करने वाली वाहिनी मात्र नहीं है। वह मधुमक्खी की तरह है, जो  महीनों की मेहनत व कवायद के बाद छत्ते में मधु एकत्र करता है। और इस सारी प्रक्रिया में उसकी जिंदगी गहरे से प्रभावित होती है। समीक्षक का धर्म बनता है कि वह यह भी देखने का प्रयास करे कि मधुकोश में मधु इकट्ठा करने की प्रक्रिया क्या रही है। क्या मधुमक्खी बार-बार हलवाई की चासनी के थाल पर जाकर बैठी है या फिर उसने फूल दर फूल घूम कर उनके अंकुरण परागण को देखकर रस एकत्र किया है? किस्सा मुख़्तसर यह है कि नाटक अगर लोक शिक्षण करता है तो अभिनेता भी दर्शक से ज्यादा बड़ा बेनिफिशियरी है। नाटक के दर्शक पर प्रभाव का तो आकलन होता है लेकिन वह अभिनेता को कहाँ तक छू गया है यह चुनौती है समीक्षक के लिए और सीमा भी।
इस तरह केवल नाटक की प्रस्तुति पर राय देने और प्रक्रिया की अनदेखी से क्या समग्र मूल्यांकन हो सकेगा? हमारे यहाँ रंगप्रक्रियाओं के लिए कुछ समय से प्रोडकशन शब्दावली का प्रयोग बहुत होने लगा है। यद्यपि प्रोडक्शन शब्द भाषा की दृष्टि से क्रिया (प्रक्रिया) का द्योतक है किंतु, प्रोडक्शन शब्दावली शायद इंडस्ट्री से आती है। जो शब्द जिस क्षेत्र से आता है वहां का मूल्यबोध भी साथ लेकर आता है। उत्पाद व उत्पादन का जो नवीन अर्थशास्त्र अन्तिंम रूप से प्रोडक्ट के इर्दगिर्द केंद्रित हो जाता है, प्रक्रिया को कोई नहीं पूछता, वह कोई भी हो सकती है, असेंबलिंग, आउटसोर्सिंग...येन केन प्रकारेण। जो हमारी वर्तमान सांस्कृतिक मूल्यों का भी द्योतक है। जिस प्रकार हमारी अधिकतर प्राचीन शब्दावली युद्धों से प्रभावित है। क्योंकि इतिहास रक्तरंजित रहा है। साहस, वीरता, लक्ष्य, रणनीति आदि शब्दावली के साथ हमारे जेहन में कोई समुराई ही आता है, कोई लंगोटी वाला नहीं आता जो सत्य के लिए जीवट के साथ खड़ा होता है।
बहरहाल, अगर उपरोक्त नाटक के प्रस्तुति (प्रोडक्ट) पर कुछ कहना हो तो एक लाइन में कह कर समाप्त किया जा सकता कि 50 फीसदी नाटक दर्शकों तक पहुंचा ही नहीं। यह अतिशयोक्ति लग सकती है। लेकिन यह भी सच है कि प्रथम पंक्ति में बैठे लोगों को भी बहुत प्रयास करने पर संवाद सुनाई पड़ रहे थे।
इसका मतलब यह कतई नहीं कि नाटक का कलापक्ष कमज़ोर था। इस सम्प्रेषणीयता की समस्या के लिए अभिनेता बिलकुल जिम्मेदार नहीं। इसके पीछे तकनीकी पक्ष है। नाटक महीनों की अथक मेहनत से तैयार किया गया था। यह नाटक एक नाट्यप्रशिक्षण कार्यशाला में तैयार हुआ था। नाटक के युवा निर्देशक खेमचंद वर्मा अलवर रंगमंच पर नया नाम है। खेमचंद ने राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की सिक्किम इकाई से नाट्यकला का प्रशिक्षण प्राप्त किया है। सितम्बर माह में खेमचंद ने अलवर के युवाओं के साथ एक कार्यशाला की शुरुआत की। उन्होंने पेशेवर तरीके से इसे किया। उद्घाटन के वक़्त खेमचंद ने अलवर के समस्त नए पुराने रंगकर्मियों को आमंत्रित किया था। उसका यह विनम्र जेश्चर उनके बारे में सकारात्मक माहौल बनाने में मददगार रहा। खेमचंद की इस बात के लिए प्रशंसा की जानी चाहिए कि जहाँ अलवर में नाटक के लिए चार लोग जुटाने में बड़े बड़ों को पसीने आते हैं, वहीं इस नवयुवक ने 10-12  लोगों की एक ऐसी टीम तैयार कर ली, जो फीस चुकाकर सीखना चाहते हैं। उससे भी महत्वपूर्ण  है, उस टीम को चार महीने तक जोड़े रखना और उसे प्रस्तुति तक ले जाना। टीम के जुड़ाव व ठहराव के पीछे कार्यशाला का सही नियोजन है। वैविध्यपूर्ण गतिविधियाँ आधारित कार्यशाला उनकी रंगमंच में प्रशिक्षित होने का द्योतक है। इस कार्यशाला के दौरान उन्होंने लगभग हर सप्ताह शहर के किसी वरिष्ठ रंगकर्मी का संवाद कार्यशाला के संभागियों से करवाया। किसी भी कार्यशाला के आयोजन के लिए स्थान मिलना बहुत ही मुश्किल काम है। ऐसे में खेमचंद ने रघु कोम्पेक्स के बेसमेंट को अपने स्टूडियो के लिए सुसज्जित किया है, जिसे देखकर उनकी लंबी प्लानिंग के सूचक नज़र आते हैं।
यूँ तो खेमचंद नए पुराने रंगकर्मियों के संपर्क में सतत रूप से इस दौरान रहा फिर भी मंचन के लिए कला भारती रंगमंच को चुनने का निर्णय सूझबूझ का नहीं रहा। यह सभी रंगकर्मी अच्छे से जानते हैं कि कलाभारती का मंच नाटक के लिए नहीं है। इसमें साउंड की ईको (गूंज) की ज़बरदस्त समस्या है। नाटक में नाट्यशाला का अपना महत्व है। नाट्यशाला का रूपाकार नाटक की संप्रेषणीयता को गहरे प्रभावित करता है। यदि ऐसा न होता तो क्या जरूरत थी कि आज से हजारों साल पहले भरतमुनि नाट्यशास्त्र में रंगशाला के प्रकार व उसकी पैमाइश लिख रहे थे।
यद्यपि अलवर शहर में आधुनिक सुविधाओं से युक्त प्रताप ऑडिटोरियम बनकर तैयार है लेकिन उसकी ऊँची दरें रंगकर्मियों के लिए अफोर्डेबल नहीं हैं, यह सब जानते हैं। जब नाटक बिना टिकट के ही दिखाना हो तो सूचना केंद्र के मुक्ताकाशी रंगमंच का कोई जवाब नहीं। मैंने  अपने अधिकतर नाटक इसी मंच पर खेले हैं। वैसे भी यह मंच सबके लिए निशुल्क उपलब्ध है। दूसरा मंच राजर्षि अभय समाज का मंच है। यह भी लगभग कलाभारती जितना मूल्य चुकाने पर उपलब्ध है। तीसरा विकल्प है नगरपालिका का टाउन हॉल। यहाँ अभिनय स्थल पर छत है और सामने का आँगन खुला हुआ है। हालाँकि यहाँ पिछले 15 साल से कोई नाटक नहीं खेला गया। नगरपालिका की ईमारत के प्रथम तल पर जो हॉल है उसका भी सीमित दर्शकों के लिए उपयोग किया जा सकता है। आज से लगभग 10 साल पहले जेडी अश्वत्थामा ने इस हॉल का अपने नाटकों के मंचन के लिए बहुत इन्नोवेटिव तरीके से प्रयोग किया था। इसी प्रकार डेढ़ दशक पहले नीलाभ पंडित जी ने हम युवाओं को लेकर सैनिक स्कूल के रंगमंच पर कोर्टमार्शल नाटक खेला था। मेरी स्मृति में आज भी याद ताज़ा है कि किस प्रकार दिसंबर की कड़कड़ाती ठण्ड और कोहरे में दर्शक मुक्ताकाशी प्रांगण में जमे रहे थे।
इस इतिवृत्त को दोहराने के पीछे आशय महज़ इतना है कि रंगमंच में अभाव को नकारात्मक संज्ञा नहीं माना जाता। अभाव हमें रोकता नहीं हैं बल्कि अपनी सीमाओं को विस्तार देने को प्रेरित करता है। अभाव की वजह से ही अलवर रंगमंच में नवाचारी प्रयोग हो सके।
थोडा सा अभिनय के बारे में
नाटक में स्वयं खेमचंद लेखक की भूमिका में थे। उन्होंने जीवन की जटिल परिस्थितियों में फंसे लेखक की भूमिका से पूरा न्याय किया। उनकी पत्नी की भूमिका में अनामिका अपनी उपस्थिति मंच पर और दर्शकों के ज़ेहन में दर्ज करवा गई। अनामिका अपेक्षकृत मंच पर नई हैं। उनके अभिनय में बहुत निखार है। उन्होंने अलवर रंगमंच पर अपनी जगह बना ली है। पत्रकार के रूप में निधि चौहान ने सहज अभिनय किया। उनके साथ फोटोग्राफर के रूप में हिमांशु ने अपनी छरहरी काया से परिस्थितिजन्य हास्य बखूबी पैदा किया। नौकरानी के रूप में पराग शर्मा की हर एंट्री कहकहा पैदा कर जाती थी। मोहन छाबड़ा रंगमंच पर पुराने हैं। उनके अभिनय पर फ़िल्मी प्रभाव ज्यादा नज़र आता है। लेखक की माँ के रूप में जयशिला एम ने बहुत ही संतुलित अभिनय किया। उनमे बहुत संभावनाएँ नज़र आती हैं। उन्हें और अभिनय के अवसर मिलने चाहिए। विशाल शर्मा बहुत उम्दा अभिनेता हैं। वे पूरे शारीर से बोलते हैं। वो शरीर से लाउड हैं और वाणी से धीमे। उन्हें अपनी आवाज़ पर और काम करने की जरुरत है। वे जरुरत से ज्यादा धीमा बोलते हैं। अमित सोनी ने इन्स्पेक्टर के रूप में अपनी नाटकीयता से क्लाइमेक्स पर द्वंद्व को रचने में मदद की। इसके आलावा साज़िद और मंजू सैनी ने भी स्टेज पर थे।
हास्य नाटक में दर्शकों के कहकहे सफलता का सूचक होते हैं। क़हक़हों को भी अपने अभ्यासों में पूर्वानुमानों कर  नियोजित करना होता है। जब दर्शक लंबे क़हक़हों में चले जाते हैं तो अभिनेता को उनके लौटने का इंतज़ार करना होता है। अगर ऐसा न हो तो दर्शक के हाथ से कथा की डोर छूट जाती है। संगीत या ग़ज़ल के कार्यक्रम में इसे नियोजित करने की जरूरत नहीं होती है। जब किसी जगह पर दर्शक की दाद मिलती है तो गायक रुकता नहीं बल्कि अगले सम पर जाकर उसमे और खुशबू घोल कर पुनरावृत्ति कर देता है। कई बार तीन-चार पुनरावृत्तियाँ भी चमत्कार पैदा कर देती हैं.... लेकिन अभिनेता इतना खुशनसीब नहीं होता उसे ठहरना ही पड़ता है और उसी छूटे हुए सूत्र को दर्शक को वहीं से पकड़ना पड़ता है। इस नाटक में यह सूत्र कई बार फिसला।
कुछ खास बातें
  • मुझे लगता है कि इस नाटक का शीघ्र ही एक मंचन और होना चाहिए। इसके लिए कलाभारती के आलावा जगह को चुना जा सकता है।
  • इस कार्यशाला में एक बहुत ही उत्साही और नए कलाकारों की टीम निकल कर आई है। निःसंदेह ये ऊर्जा से भरे हुए हैं। ये टूट कर बैठ नहीं जाएं इनके साथ खेमचंद को कोई फॉलोअप प्लान करना चाहिए।
  • शहर की अन्य संस्थाओं के निर्देशक भी इस टीम को लेकर कोई गतिविधि शुरू कर सकते हैं।
  • खेमचंद ने बहुत सुरुचिपूर्ण तरीके से अपना स्टूडियो तैयार किया है। यदि वह अन्य संस्थाओं के लिए उपलब्ध हो जाए तो रिहरसल की जगह की समस्या का हल हो सकता है।
खेमचंद से अलवर रंगजगत को बहुत उम्मीद है। यह सिलसिला रुकना नहीं चाहिए।

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