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Sunday, July 19, 2020

नए अभिनेता बैकस्टेज (Backstage) नहीं करना चाहते हैं ?

Why newly joined actor don't like to do backstage

अभी पिछले दिनों थियेटर की एक वेबिनर से जुड़ा था। वहाँ किसी रंगकर्मी ने प्रश्न किया था। थियेटर से नए - नए जुड़ने वाले अभिनेता Backstage क्यों नहीं करना चाहते हैं ? इस प्रश्न का उस समय जो जवाब बना मैंने देने की कोशिश की थी किन्तु मुझे लगा कि इस प्रश्न पर एक रंगमरमी के तौर पर और मंथन करना चाहिए। 

भाषा की दृष्टि से समस्या का बयान 

अगर शब्दावली पर गौर की जाए तो Backstage शब्द में ही दिक्कत है।  क्योंकि Back एक तुलनतमक शब्द है  जो पीछे होने का आभास कराता है। इसके मतलब को समझने के लिए उस स्थिति को समझना पड़ता है कि किससे पीछे ? .... दरअसल हमारे यहाँ आगे-पीछे .... ऊपर-नीचे... बड़ा-छोटा जैसी शब्दावलियों के शब्दकोशीय अर्थों के अलावा समाजशास्त्रीय पर्याय भी होते हैं और ये समाज शास्त्रीय पर्याय अलग संदर्भों में भी अर्थ ग्रहण को प्रभावित कर जाते है। यह अर्थ भंगिमा हमारे चिंतन और चीजों को देखने के दृष्टिकोण को भी प्रभावित करती हैं। यह तो समस्या को भाषा वैज्ञानिक रूप से देखना हुआ। अब नाट्यशास्त्र के अनुसार देखते हैं। 

नाट्यशास्त्र क्या कहता है 

नाट्यशास्त्र के अनुसार देखें तो वहाँ अभिनय को Onstage या Backstage में बाँट कर नहीं देखा गया है। यहाँ हर चीज़ सेंटर स्टेज है। कोई आगे-पीछे नहीं, ऊपर-नीचे नहीं। यहाँ नाटक का एक बड़ा छाता है, जिससे भरत मुनि ने विविधरूपा कलाओं को  पूरे सम्मान के साथ आच्छादित कर दिया है। 
थियेटर से नए जुडने वालों का Backstage की गतिविधियों से न जुड़ पाने का एक और कारण अभिनय को लेकर भ्रांत धारणा है। उनकी नजर में अभिनय का आलंबन केवल मंच के ऊपर आकर चल फिर रहा तथाकथित अभिनेता ही है। उसके अलावा जो भी कार्यव्यापार है वह अभिनय नहीं है। जाने अनजाने में हम तथाकथित वरिष्ठ रंगकर्मी भी उनकी इस धारणा को मजबूत ही करते हैं। दरअसल नाट्यशास्त्र रंगमंच की परिधि में लगभग सभी आयामों को अभिनय के चार रूपों यथा आंगिक, वाचिक, आहार्य तथा सात्विक में ही समेट  कर रख देते हैं। फिर यह आगे व पीछे का भाव ही समाप्त हो जाता है।   नए शामिल होने वाले अभिनेताओं को शुरू में ही थियेटर की यह  वृहद तस्वीर दिखानी चाहिए। केवल अभिनेता ही रंगमंच का केंद्र नहीं जैसा कि दिखाई देता है। यद्यपि Stanislavsky भी अभिनेता को केंद्र में रख कर अपना अभिनय सिद्धान्त रचते हैं लेकिन वे अभिनेता को मंच दूसरी चीजों से इस कदर बांधते हैं कि उसमें वह अलगाव पैदा ही नहीं हो सकता है। 

क्या होना चाहिए  

जब भी नए अभिनेता थियेटर से जुडते हैं तो वे अपने साथ एक समृद्ध कलात्मक अनुभव या कौशल लेकर आते हैं। निर्देशक उन्हें रिक्त पात्र मान कर नए ज्ञान से स्नान करना शुरू कर देते हैं। जबकि निर्देशक को नए जुडने वाले कलाकार का एक Baseline assessment करना चाहिए कि 
वह किस विशेष हुनर को अपने में धारण किए हुए है?
वह हुनर किस स्थिति में है?
उस हुनर को किस दिशा में आगे बढ़ाया जा सकेगा?
रंगमंच पर वह दक्षता किस रूप में अपना योगदान दे सकेगी?
यदि निर्देशक उपरोक्त बातों पर गौर करके आगे बढ़े तो वह उस यक्ष प्रश्न का समाधान पा जाएगा कि "क्यों लोग Backstage नहीं करना चाहते? 
यदि नए जुडने वाले कलाकार की रुचियाँ, रुझान व कौशलों को रंगमंच की प्रक्रिया (प्रस्तुति निर्माण ) में स्थान व महत्व मिलेगा तो वे अवश्य जुड़ना चाहेंगे।  

(कृपया अपनी टिप्पणी अवश्य दें। यदि यह लेख आपको पसंद आया हो तो शेयर ज़रूर करें।  इससे इन्टरनेट पर हिन्दी को बढ़ावा मिलेगा तथा  मेरी नाट्यकला व  लेखन को प्रोत्साहन मिलेगा। यदि आप चाहते है कि भविष्य में भी ब्लॉग पोस्ट मिलते रहें तो पोस्ट की दायीं ओर Follow बटन को दबाएँ) 

दलीप वैरागी 
09928986983 

Wednesday, February 8, 2017

चित्र – कविता

 केजीबीवी ओसियां का अनुभव
जनवरी 31, 2017
जोधपुर के प्रत्येक कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय (KGBV)की सभी लड़कियों को एक ड्राइंग बुक तथा एक सेट प्लास्टिक क्रेयोंस कलर के दिये गए है। इसी कड़ी के तहत कल ओसियां में था। सामग्री कक्षा के अनुसार ही वितरित की जा रही थी। यहाँ देखा जाए तो चार कमरों में बैठक व्यवस्था है। एक कमरा आठवीं का, दूसरा सातवीं, तीसरा छठी व चौथा कंडेंस्ड कोर्स का। इस कमरे में वे लड़कियां बैठकर पढ़ती हैं जिनका केजीबीवी में नया प्रवेश हुआ है, जो हैं तो उपरोक्त कक्षाओं की लेकिन अभी पढ़ना लिखना सीख रही हैं। शिक्षिकाएँ हर कक्षा में बारी – बारी से सामग्री वितरित कर रहीं थीं। वितरण के साथ ही मैं लड़कियों को गाइड कर देता। हालांकि चित्रकला विषय में कोई दाखल नहीं है फिर भी मैं लड़कियों से कह रहा था कि आप  इसमें वे चित्र बनाएँ जो आपके मौलिक विचारों और भावनाओं को अभिव्यक्त करें। यह कैसे होगा यह मैं भी अभी तक नहीं जानता था। यद्यपि मैं यह जरूर कह रहा था कि आप इसमें मेहँदी के डिज़ाइन, रंगोली, फूल झोंपड़ी इत्यादि स्टीरियोटाइप चित्र न बनाएँ तो बेहतर होगा। यह सारी बातें मैं इससे पूर्व सात – आठ केजीबीवी में कह चुका हूँ। आज भी पहले  आठवीं, सातवीं फिर छठी में वही बाते दोहराईं तथा लड़कियों ने भी सहमति में गर्दन हिलाई।
किसका चित्र बनाएँ
आखिर में मैं कंडेंस्ड कोर्स के बच्चों के साथ था। इस बार मैंने इन लड़कियों से पूर्व की बाते नहीं कीं। मैंने लड़कियों से कहा हम चित्र बनाएँगे लेकिन पहले ठीक से तय कर लें कि क्या बनाएँगे। मैंने कहा, “आप लोग 5 मिनट के लिए बाहर मैदान घूम के आइये और जो चीज़ आपको पसंद लगे तो आकर इसी चीज़ पर चित्र बना सकते है।” लड़कियों को मशविरा पसंद आया वे दौड़ कर मैदान में चली गईं। मैं कमरे में बैठा अंदाज़ा लगा रहा था कि लड़कियों के लिए चित्र बनाना कोई मुश्किल नहीं होगा मगर मैं इस गतिविधि को क्या मोड देकर पाठ्यचर्या के बिन्दुओं से जोड़ पाऊँगा। यहाँ सोचने की गुंजाइश थी और फुर्सत भी। दिशा निकल ही आई।
शब्दों के चित्र
लड़कियां लौट कर आ गईं। वो अपनी पेंसिल संभालें उससे पहले मैने उन्हे रोका। मुझे लगा कि जो जो वस्तु वे देख कर आईं हैं उसके दोनों चित्र अगर एक साथ बनें तो कैसा रहे।? एक वह वस्तु जो वे देख कर आयीं है। एक वह चित्र जो वे अभी बनाने वाली हैं। इसके साथ ही अगर उस वस्तु का शब्द चित्र भी बन जाए तो साक्षारता की जिस प्रक्रिया से ये लड़कियां गुजर रही हैं वह मजबूत होगी। मैंने लड़कियों से कहा कि आप जो वस्तु देख कर आई हैं पहले उसे बोर्ड पर लिखवा दो ताकि सब को पता रहे कि कौन लड़की क्या बना रही है। लड़कियों ने अपने नाम के सामने वस्तुएँ लिखवा दीं। मैंने उन्हें एक तालिका में मोटे-मोटे अक्षरों में लिख दिया।
लड़की का नाम
वस्तु का नाम
लड़की का नाम
वास्तु का नाम 
प्रियंका
नीम का पेड़
ममता
कार
किरण
पिल्ला
पूजा
हज़ारे का फूल
सुमन
कुत्ता
सुमन
पिल्ला
सोनिया
फिसल पट्टी
संगीता
सूरज
विमला
चिड़िया
अनीता
बादल
सोनू
चिड़िया
मोनिका
कार
पूजा
झूला
पुष्पा
पीपल का पेड़
रंग रेखाएँ और आजमाइश
लिखने के बाद एक बार लड़कियों से वाचन करवाया। इसके बाद उनसे कहा कि अब वे चित्र बनाना शुरू कर सकती हैं।
पेंसिल छीलना शुरू .... लाइन खिची ...... रबर से मिटाई .... फिर खिची ..... फिर मिटाई .....
अचानक लड़कियों ने कहा, “ क्या हम अपनी वस्तु के पास बैठ कर उसे देख कर चित्र बना सकते है।” इस एक संवाद ने कक्षा कक्ष के दायरों को एक बार फिर फैला दियाया। ऐसे में न कहने का सवाल ही कहाँ है। एक लड़की आँगन में बैठ कर हज़ारे को निहार रही है।
एक लड़की प्रवेश द्वार की सीढ़ियों पर बैठ गई है, सामने से कार साफ दिखाई दे रही है।
दो लड़कियां पानी के टांके के ऊपर बैठ गईं, वहाँ चिड़ियों को आने जाने में कोई अवरोध नहीं है।
एक रैम्प पर धूप सेक रहे पिल्ले को देख रही है कि वह काला है? सफ़ेद है? या दोनों है?
कोई सूरज से नज़र मिलाने  की कोशिश कर रही है...
कोई बादलों को समेटने की कोशिश कर रही है...
आज हर चिरपरिचित चीज़ एक नए दृष्टिकोण व अजनबीपने से देखी जा रही है।
पानी के टांके के पास चोंच में पानी भरती हुई चिड़िया जाने कब फुदक कर विमला के कागज पर आ बैठी। विमला को गोरैया तो चाहिए लेकिन भूरे फीके रंग की नहीं... विमला ने अपनी डब्बी के सारे रंग छोड़ दिये गोरैया के ऊपर... गौरैया ने उसमे से रंग चुन लिए और विमला के हाथ से छिटक कर अब सोनू के पन्ने पर जा चिपकी। ये क्या किरण और सुमन का पिल्ला तो बड़ा नटखट उठ कर भाग गया। किरण और सुमन भी उधर ही चली जिधर गया पिल्ला। पिल्ला वहाँ से उठ कर फिर बरामदे में.... बरामदे से आँगन में... अब किरण और सुमन को लगा कि मुश्किल चीज़ का चुनाव कर लिया... सुमन मुझसे आकार बोली, “पिल्ला नहीं बन रहा है” मैंने कहा, “कोई और चीज़ को चुन लो... ” सुमन ने थोड़ी देर सोचा और इस कायनात की सबसे अचल चीज़ का चुनाव किया, “सर मैं सूरज बनाऊँगी।”
झट से किरण ने भी पिल्ले से पीछा छुड़ाया और बोली, “सर मैं घंटी बनाऊँगी...”
मोनिका सीढ़ियों  में बैठी अपनी कार व सामने खड़ी कार का मिलान कर रही है... परसेप्शन सेट कर रही है शायद पेड़ पीछे है या आगे?
कूची की बनी कलम
थोड़ी देर में सब कक्षा कक्ष की और लौट चले। अब हमने हिन्दी की शिक्षिका को भी बुलवा लिया था। कक्षा में आकार प्रस्तुतीकरण की बारी थी। मिलकर एक प्रक्रिया तय की। अब भाषा की और चलने का समय था। क्योंकि गतिविधि का सुर रोचकता के जिस बिन्दु पर चढ़ गया था वहाँ से शब्दों से वाक्य बनाने की नीरस कवायद करवाने से मैं  बचना चाहता था। यह बहुत आसान था कि चलो अपने अपने चित्र के बारे में कोई एक बात बोलो। जब कला में बच्चे आकंठ डूबें हो तो गतिविधि को सौंदर्यशास्त्रीय मौड़ देना भी जरूरी है। लड़कियों से कहा कि प्रत्येक लड़की अपना चित्र दिखाने के लिए आएगी... चित्र देखने के बाद उसके बारे में बातचीत करेंगे।
सबसे पहले किरण अपनी घंटी लेकर आई। घंटी पर बात शुरू ही हुई थी कि एक लड़की बोली-
“घंटी बजी  शाला की
टन – टन – टन – टन ”
मैंने पूछा कि और घंटी कहाँ कहाँ होती है ?
 लड़कियों ने कहा, “मंदिर में... ”
“मंदिर की घंटी कैसे बजती है?
“”टन – टन ”
अब अगली लाइन जोड़िए” मैंने लड़कियो से कहा।
“घंटी बजी मंदिर की
टन – टन – टन – टन ”
हालांकि जिस लड़की ने यह लाइन जोड़ी उसने सिर्फ एक शब्द का ही योगदान दिया लेकिन इस योगदान में व काफिये – रदीफ़ की तुरपाई को सीख गई।
एक लड़की ने जोड़ा, “घंटी बोली किरण की... ” अब इसके बाद शायद उम्मीद टन – टन की थी लेकिन इस बात को लड़कियों ने यूं समाप्त किया।
“घंटी बोली किरण की
पढ़ेगी तो बनेगी नंबर वन ”
इस प्रकार यह तय कर लिया कि हर चित्र पर लड़कियों की मदद से तुकबंदी करनी है। चाहे निरर्थक ही हो ... कोशिश यह थी कि टेक्स्ट में भी लड़कियों की दिलचस्पी उतनी ही बनी रहे जितनी कि चित्रों में थी। लड़कियों के चित्र दिखाने का सिलसिला चलता रहा और तुकबंदियों से कविताएं निकलती रही।
कविता 1
मोनिका की तो चलती है
ममता की तो खड़ी है
दोनों की कार बड़ी है


कविता 2
झूला है कितना सुंदर
उस पर झूल रहा है बंदर
देख के पूजा भागी घर के अंदर
कविता 3
चिड़िया चुग रही है
तितली उड़ रही है
चिड़िया चीं – चीं करती है
तितली फुर - फुर करती है




कविता 4
 संगीता का सूरज गुस्से में है
प्रियंका का सूरज झूम रहा है
सुमन का सूरज चमक रहा है




कविता 5
फिसल पट्टी पे सोनिया फिसल गई
कपड़ों पे उसके मिट्टी लग गई
जल्दी से जाकर धोने लग गई
धोते – धोते रोने लग गई

कविता 6
पीपल है छोटा लकड़ी है बड़ी
पुष्पा चित्र बनाए खड़ी – खड़ी
सुमन है छोटी नीम है बड़ा
नीम की डाल पर झूला पड़ा

प्रस्तुतीकरण
कविताएं बन जाने के पश्चात लड़कियों से कहा गया कि आप अपनी कविताएं ब्लैक बोर्ड से उतार कर अपनी पेंटिंग के साथ वाले पन्ने पर लिख लें। उनके लिख लेने के पश्चात यह तय किया गया कि जो भी सृजन हुआ है उसका प्रदर्शन भी किया जाएगा। यूं भी पास के कमरे से कक्षा 6 की लड़कियां बार-बार झांक रही थी कि आज कंडेंस्ड कोर्स में क्या हो रहा है। स्कूल की बाकी लड़कियों को भी एक्टिविटी हॉल में बुलाया गया। पूरा स्टाफ भी उपस्थित हो गया। इसके बाद सभी लड़कियों ने सामने आकार अपने चित्र दिखाए। और चित्र के साथ जो सबने मिलकर तुकबंदियाँ की वे भी प्रस्तुत की गईं। प्रस्तुति से आशय यह भी कि लड़कियों ने कविताएं बकायदा पढ़ के सुनाईं, उत्साह और उमंग के साथ। एक बार फिर कक्षा की सीमाओं का अतिक्रमण हुआ। पहले ज्ञान प्राप्ति के प्रयासों में अबकी बार निर्मित ज्ञान को साझा करने के लिए।
मेरी पिछले कुछ दिनों से यह मान्यता और भी पुष्ट हुई है कि स्कोलास्टिक और को-स्कोलास्टिक के बीच  बहुत बारीक दीवार है जो थोड़े से प्रयास में ढह जाती है। और फिर दो तरफा रास्ता बन जाता है। रास्ता आने जाने का, सीखने – सिखाने का

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दलीप वैरागी 
09928986983 

Friday, December 16, 2016

भाषा शिक्षण का एक अनुभव: कहानी तो किसी पे भी बन सकती है

दिनांक : 8/ 12/ 2016
मैंने कक्षा में जाते ही कुछ वाहियात किस्म के सवाल पूछे, जैसे  - “आप क्या पढ़ रहे हैं?” लड़कियों का स्वाभाविक सा जवाब था, “सामाजिक ज्ञान।” मेरे हाथ क्या लगा? सवाल इसलिए व्यर्थ था चूंकि इसके पीछे कुछ जाने की इच्छा थी ही नहीं। लड़कियां अर्द्धवार्षिक परीक्षा की तैयारी कर रही थीं। यह मुझे पता था। मैं कुर्सी में धंसकर  आगे की तरतीब सोचने लगा। जवाब का सिरा थाम के वार्तालाप का सेतु बांधने की कोशिश की, “आपको सामाजिक ज्ञान पढ़ने में यानि समझने में कोई दिक्कत हो तो बताएँ।” मुझे लगता है सवाल से ज्यादा अहम संप्रेषित हुआ। लिहाजा लड़कियों ने या तो सवाल सुना ही नहीं या जवाब देना उचित नहीं समझा। बातचीत के लिए जमीन अभी समतल नहीं हुई थी। मेरे सामने शेरगढ़ कस्तूरबा विद्यालय की कक्षा 6 की लड़कियां बैठी हैं। कक्षा का विभाजन व बैठक व्यवस्था दो समूहों में है – एक समूह जो शिक्षिकाओं के मापदण्डों के आधार पर कक्षा 6 की दक्षताओं के अनुरूप हैं। दूसरा समूह उन लड़कियों का है जो पढ़ने – लिखने के बुनियादी कौशलों को हासिल करने में अभी संघर्षरत हैं। इन्हे कक्षा दो के स्तर की पुस्तकें दी हुई हैं। अभी पिछले माह की गई बेसलाइन मूल्यांकन की रिपोर्ट के अनुसार ज़्यादातर लड़कियां अभी पढ़ना नहीं जानती हैं।
मैं कमरे को निहार रहा था और बातचीत के सूत्र तलाश रहा था। मुझे लगता है कि किसी भी कक्षा में शुरू के पाँच मिनट शिक्षक के लिए बहुत आसान नहीं होते हैं। मेरे मामले में तो हमेशा ही ऐसा होता है चाहे बच्चे परिचित हों या अपरिचित। इन लड़कियों से मैं पहली बार मिल रहा था। मैंने नाम बताया और अपने बारे में संक्षिप्त परिचय दिया। इस बार फिर मैंने एक और ऐसा सवाल किया जिसका जवाब मुझे पहले ही पता था, “कहानी किस-किसको पसंद हैं।” जवाब में आवाज़ नहीं हाथों हा हवा में लहराना हुआ। इस सवाल के जवाब में मुझे एक और सवाल  एक अंकुर फूटता दिखा... मैंने कहा, “ये कहानियाँ आती कहाँ से हैं?”
“किताब से... ”
“लाइब्रेरी से... ”
“नानी से... ”
दादी से... मम्मी से ... टीवी से .... रेडियो से ... अखबार से .... दोस्त से... सहेली से... पड़ौसी से......
निरर्थक से सवालों के बीज इतनी जल्दी बातचीत की फसल के रूप में लहलहा उठेंगे यकीन न था। लड़कियां उमंग के साथ बातचीत में जुट गईं।  अब मेरे पैर भी सख्त मिट्टी पे खड़े थे मैंने पूर्व प्रश्न की बुनियाद पर ही दूसरी ईंट रखी, “अच्छा ये बताओ कि कहानी किस – किस पर बन सकती है?
एक झटके में हाथों की फसल फिर कमरे में लहलहा उठी। हाथों की गिनती से मुझे समझ आ गया कि अब हम किधर की दिशा ग्रहण करने वाले हैं। लड़कियों की शब्दावली का जायजा लेने के लिए मैंने उन्हें कहा कि आप बारी-बारी से बोलते जाएँ और मैं ब्लैक बोर्ड पर उन्हें लिखता जाऊंगा। निम्नलिखित शब्द बोर्ड  आकार लेने लगे। जो याद रह गए वे हैं -
बकरी
नाना
नानी
हाथी
मक्की
किसान
शेर
कुत्ता
दादा
रानी
कौआ
मक्खी
चिड़िया
मोर
पत्ता
दादी
पानी
औरत
हिरण
कबूतर
चोर

राजा





मैं शब्दों को बोर्ड पर जहां-तहां छितरा कर लिख रहा था। इसके पीछे था आज का उद्देश्य – शब्द पठन। जब बोर्ड पर चार-पाँच शब्द आते हैं तो शिक्षक के मन में उनको लेकर कई वर्गीकरण के विचार उभरने लगते हैं। जैसे सजीव – निर्जीव, जानवर-पक्षी या मनुष्य इत्यादि। मैंने इन वर्गीकरन के आधार पर इन शब्दों को बोर्ड पर न लेकर आगे की गतिविधियों के लिए स्थगित कर दिया। चूंकि इन लड़कियों के साथ पढ़ना सीखने के साथ काम किया जाना है इसलिए मैं एक जैसी ध्वनि वाले, शब्द मैत्री वाले या फिर जिनमें मात्राओं का कोई पैटर्न दिखाई दे, उन्हें एक जगह, पास-पास लिखना शुरू कर दिया। ताकि लड़कियों को पढ़ने में, अंदाजा लगाकर शब्द को पहचानने में मदद मिल सके।    
बोर्ड के शब्दों से भर जाने के बाद यह  बात भी स्पष्ट को गई कि कहानी में दुनिया की कोई बी शै आ सकती है। थोड़ी सी चर्चा के बाद ग्रुप इस निष्कर्ष पर भी पहुँच गया कि कहानी कोई भी बना सकता है चाहे वह पढ़ा-लिखा या या न हो। यह भी तय किया कि आज हम मिलकर एक कहानी भी लिखेंगे।
अभी तय यह हुआ कि पहले कोई लड़की बोर्ड के पास आकार इन सभी शब्दों को पढ़ के बताए। एक साथ चार हाथ हवा में लहराए। एक को बुलाया गया जिसे अच्छे से पढ़ना आता है। लड़की ने एक-एक करके सारे शब्दों को पढ़ दिया। फिर मैंने कहा कि कोई लड़की शब्दों पर उंगली रख कर एक बार पढ़ो। एक और लड़की ने आकर शब्दों पर उंगली रख कर वाचन किया।   इसमें कोशिश यह थी कि जिन लड़कियों के लिए यह उक्ति प्रचलित है कि “वे नहीं पढ़ सकती .... या इन्हें तो कुछ नहीं आता” वे इस सहभागी वचन प्रक्रिया में बोर्ड के शब्द जाल में से ध्वनियों व आकारों का तारतम्य व पैटर्न पकड़ पाएँ और उनके दरम्यान कोई संबंध समझकर अपने मन की छवियों को इन इबरतों के साथ रख कर देख लें। ये वो लड़कियां नहीं हैं जिन्हें  बिलकुल भी अक्षरों का एक्सपोजर न हो। बल्कि इनमे से अधिकतर तो 5- 6 सालों से अक्षरों के महासागर के भंवर में डोल रही हैं। बस इनके हाथ नहीं लगता है तो अर्थ रूपी किनारा।
तीन-चार बार लड़कियों (जो पहले से पढ़ सकती हैं) पढ़वाने के बाद  मेरा लक्ष्य अब वे  लड़कियां थीं जिनके बारे में यह प्रचलित था कि वे “पढ़ नहीं सकती”। अब मैंने इसे हल्का सा खेल का रूप दे दिया- दोना समूह से बारी बारी से एक लड़की आएगी और पढ़ेगी। इस बार बारी थी दूसरे वाले ग्रुप की। थोड़े संकोच के साथ आकर बोर्ड पर खड़ी हुई, मैंने कहा, “आपके लिए छूट है कि आप कहीं से भी पढ़ सकती हैं।” लड़की ने शुरू से शुरू किया जैसे ही उसने दो शब्दों को पढ़ा पीछे से दो लड़कियों के ताली बजने की आवाज़ आई। इन तालियों का समर्थन बाकी लड़कियो की नजरों में दृश्यमान था। यह वह  लड़की थी जिसके बारे में प्रचलित है, “वह नहीं पढ़ सकती।” अब वह उंगली बोर्ड कि और इंगित किए धीमें- धीमे पढ़ रही है अगले शब्द पर जाने से पहले पिछले को देखती है, मन मे बुदबुदाती है फिर मुखर होती है। आवाज़ बहुत धीमी है। उसकी आवाज को सुनने के लिए कमरे के शोर ने भी अपने आप को उसी कि फ्रिक्वेंसी पर ट्यून कर लिया है। वह पढ़ रही है। शब्द दर शब्द। आखिर जैसे ही बोर्ड पर का आखिरी शब्द उच्चरित किया तो उसकी ध्वनि से करतल ध्वनि शुरू हुई और पूरा हाल गुंजाएमान हो गया। लड़की के लिए इल्म का एक तिलिस्म खुलने के लिए बाकी आलिम लड़कियों का अहतराम था।
इस तरह दोनों समूहों से अनवरत क्रम चलता रहा। सबने पढ़ा। मज़े से पढ़ा। उत्साह से पढ़ा। इस गतिविधि में कोई नहीं थी जो निरक्षर थी।  उनकी टीचर कि नज़रें भी आश्चर्यचकित थीं।
किसी ने कहा, “सर कहानी तो अभी बाकी है।”
मैंने कहा, “कहानी किस पर बनाएँ ?
लड़कियाँ बोलीं, “कहानी तो किसी पर भी बन सकती है।”
मैंने कहा, “इतने सारे नाम लिखे हैं, तय करके बताओ इनमें से किस पर लिखें?
मोर
 “बिल्ली”
शेर.... चूहा .... खरगोश....... खूब सारी आवाज़ें आने लगीं।
एक लड़की बोली, “सर, जानवरों की नहीं हम इंसान की कहानी बनाएँ।”
दूसरी लड़की – “किसान की कहानी बनाते हैं।”
किसान पर सबकी सहमति बन गई। 
कमरे की पिछली दीवार पर एक और ब्लैक बोर्ड बना हुआ था। चूंकि सामने वाले बोर्ड पर शब्द लिखे हुए थे उसे हमने मिटाना उचित नहीं समझा। हमने तय किया पीछे वाले बोर्ड का प्रयोग करते हैं। सब लड़कियाँ उस और घूम गईं।
मैंने लड़कियों से कहा कि कहानी का शुरू का वाक्य मैं लिख देता हूँ, बाकी की कहानी आपको वाक्य दर वाक्य पूरी करनी है। मैंने वाक्य लिखा –
एक किसान था।
मेरे लिए पहला वाक्य लिखना आसान था। लिकिन कहानी में पहला वाक्य जितना आसान होता है दूसरा वाक्य उतना ही मुश्किल होता है। क्योंकि वह किसी अज्ञात घटना में धंसा हुआ होता है जिसे अभी कल्पित कियाया जाना बाकी है। दूसरे वाक्य के अवतरित होने से पहले सोचने वाले के मस्तिष्क में कहानी की एक रूपरेखा होना लाज़मी होती है। भाषण में शायद इसके उलट होता है वहाँ पहला वाक्य एक बड़ी चट्टान होती है। मैंने लड़कियों से कहा इसका दूसरा वाक्य सोचिए। लड़कियां एक दूसरे की तरफ ताकने लगीं। कुछ लड़कियों के सिर्फ बुदबुदाने का स्वर है लेकिन कोई मुखर नहीं हुई। फिर मैंने कहा कि आपका कोई भी बोला वाक्य इस कहानी का दूसरा वाक्य हो सकता है। देखें कौन लड़की अपना पहला वाक्य कहानी में जोड़ती है, मेरे ऐसा कहने पर उषा खड़ी हुई और बोली-
वह इधर – उधर घूम रहा था। ”
उषा वही लड़की है जिसके बारे में पूर्व धारणा है कि वह पढ़ नहीं सकती। लेकिन उसके पास भाषा है, एक जिंदा भाषा। जिसके साथ वह सोचने का काम करती है। जिसके माध्यम से वह दुनिया से जुड़ती है। वह कल्पनाएँ करती है , सपने देखती है और उन्हें सहेजकर स्मृति में रखती है। उसी कोश में से एक वाक्य इठला कर अब श्यामपट्ट पर जा चिपका है। बोर्ड का पाठ अब उसी रंग और शक्ल का है जो उसकी स्मृतियों मे बंदनवार सा आच्छादित है। अब उसके लिए पाठ और उसके शब्द सहोदर से हैं। शायद इसे ही तो  पढ़ना कहते  है।
उषा के लिए एक बार कमरा फिर तालियों से गुंजाएमन हुआ।
अब तीसरे वाक्य के लिए जद्दोजहद शुरू हो गई। मैंने कहा, “उषा का किसान कुछ आवारा किस्म का व्यक्ति लग रहा है। क्या आप उसके घूमने को कोई उद्देश्य देना चाहते हो? उषा की ही तरह संतोष, दरियाव पूजा जैसी लड़कियां हैं जिन्हें पढ़ने में दिक्कत है। इस बार दरियाव खड़ी हुई और बोली –
“वह खाने के लिए चीजें तलाश रहा था।”
दरियाव ने किसान की आवारगी को एक मक़सद देकर उसे अपने गाँव के ही किसी दुनियादार व्यक्ति की शक्ल दे डाली जो सुबह से शाम तक खाने के जुगाड़ में लगा रहता है। ज़िंदगी भर प्रेमचंद के होरी  की  तरह रोटी की  मरीचिका के पीछे भटकता रहता है।
एक और लड़की ने जैसे होरी की विडम्बना को भाँप लिया और चौथे वाक्य के रूप में उसकी नियति को तय कर दिया और बोली –
“उसके पास खाने की चीज़ें खरीदने के लिए पैसे नहीं थे।”
अब तक कहानी घुटनों के बल चल रही थी लेकिन इस वाक्य के बाद उसमें पहिये लग गए। एक साथ कई लड़कियों के हाथ खड़े हुए वाक्य जोड़ने के लिए। एक हाथ बाकायदा उषा का भी है। इस बार मौका मिला कक्षा 6 के स्तर की लड़की को। उसने वाक्य दर्ज़ करवाया – “वह अपने भाई के पास गया और बोला कि मुझे कुछ पैसे उधार चाहिए।” मैंने और तफसील के लिए लड़की से सवाल किया कि वह कौनसे भाई के पास गया, छोटे या बड़े? शायद वह अपने अनुभव में गई या यूं ही तुक्का लगाया और वाक्य को यूं फिर से लिखवाया-
“वह अपने बड़े भाई के पास गया और बोला कि मुझे कुछ पैसे उधार चाहिए।”
झट से एक लड़की खड़ी हुई और बोली, सर लिखो –
“उसके भाई ने कहा कि मेरे पास पैसे नहीं हैं।”
ईश्वर जाने यह वाक्य अनुभव की तल्खी से जन्मा या फिर उसने बड़ी चतुराई से घटना में नया मोड दे दिया। लेकिन वाक्य बोर्ड की इबारत में दर्ज़ हो चुका था। अब कुछ लड़कियों की शून्य में सोचते हुए थीं और कुछ  लड़कियों के सिर हल्की गुफ्तगू के किए जुड़े और एक अंतराल बाद एक वाक्य किसान के लिए उम्मीद सरीखा कमरे की चुप्पी में उग आया –
“वह अपने दोस्त के पास गया और बोला कि मुझे कुछ पैसों की जरूरत है।”
इस वाक्य ने जहां कहानी में एक उम्मीद जगाई वहीं एक पूर्वाभास ने मुझे चिंतित भी कर दिया कि अब कहीं कोई लड़की उठ कर किसान की इस उम्मीद को भी समाप्त न कर दे। और कह दे कि भाई ने भी मना कर दिया। मैंने भी सोच लिया था कि यदि ऐसा हुआ तो मैं लड़कियों से सवाल जवाब करूंगा कि ऐसा क्यों किया आपने। लेकिन लड़कियां प्रेमचंद की तरह निर्दयी नहीं निकलीं उन्होने प्रेमचंद की तरह होरी को तिल-तिल नहीं रुलाया। उसके लिए यह विकल्प खुला रखा लेकिन सस्पेंस बनाए रखा। अब नया वाक्य था-
“दोस्त ने पूछा कि आपको कितने पैसों की जरूरत है?
इस वाक्य का अगला वाक्य भी लगभग तय सा है। जो एक गणितीय संख्या होगा।  बस लड़कियों को किसान के अर्थशास्त्र का थोड़ा जायजा लेना है और हल्का सा मानसिक गणितीय आकलन करना है। जो भी, अब किसान ने कहा –
“मुझे पाँच सौ रुपयों की जरूरत है।”
वाह री लड़कियों, गज़ब आपकी बराबरी व न्याय की अवधारणा है आपकी ! आपने दोस्त की जेब भी किसान के ही नाप की सिल डाली। आखिर दोस्त से कहलवा ही दिया –
“इतने रुपये तो मेरे पास नहीं हैं।”
समझती क्या हैं ये लड़कियाँ ! पाँच सौ कोई बड़ी रकम तो नहीं थी, दिलवा देतीं तो क्या बिगड़ जाता दोस्त का? दोस्ती की सच्चाई पर संदेह अब लाज़मी हो गया है। आखिर लड़कियों के मन में क्या है? क्या कोई संभावना बची है? एक लड़की ने उठ कर संभावना को दोस्त में से ही निकाला। अब दोस्त आगे बढ़ कर पूछता है-
“आप इन पैसों का क्या करेंगे?
लड़कियां भलीभाँति जानती हैं कि किसान की सबसी बड़ी जरूरत वही चीज़ होती है जिसे वह सबसे ज्यादा उपजाता है और खेत – खलिहान से घर तक का सफर तय करने तक वह चीज़ सबसे कम बचती है। एक लड़की अब किसान की बात को अगले वाक्य में रखती है-
“इन पैसों से मैं बाजरा ख़रीदूँगा।”
ब्लैक बोर्ड की सीमाएं निर्धारित हैं लेकिन सृजनशीलता की नहीं, यदि दो वाक्यों में बात खत्म न हुई तो दूसरे बोर्ड की इबारत को मिटाना होगा। लड़कियों ने इसे भी भाँप लिया और और दोस्त के एक वाक्य में कहानी को सुखांत बनवा दिया –
“आप अपनी जरूरत के जितना बाजरा मेरे घर से ले जाओ।”
इस एक वाक्य में लड़कियों ने न केवल कहानी को खत्म किया बल्कि समाज में लगभग खत्म होती इस तरह की विनिमय की परंपरा का मुजाहिरा भी करा दिया। अब किसान से औपचारिकता का वाक्य कहलवा कर घर भेज दिया।
कहानी बोर्ड पर आ चुकी थी। अब मेरा शिक्षक फिर जाग गया। मैंने लड़कियों से कहा कि जरा पढ़कर तो देखो कि अपनी कहानी कैसी बनी नहीं। अपनी कहानी  पद लड़कियों को जहां बोर्ड पर लिखी इबारत से तदात्मय स्थापित करने में मदद करता है वहीं कहानी बनी  पद उन्हे सफलता का अहसास कराता है। जो कि हमारी परंपरागत शिक्षण प्रक्रियाओं में दुर्लभ सा है। सभी लड़कियाँ अपनी कहानी  पढ़ने को आतुर थीं। इसमें भी पूर्व की शब्द पठन की प्रक्रिया की तरह ही कहानी को पढ़ा गया। सभी लड़कियों ने कहानी को पढ़ा। हाँ, उषा ने भी पढ़ा। सफलता व अपनापे के अहसास के साथ।
दूसरी कहानियों पर सवाल जवाब हो सकते हैं तो क्या इस पर भी लड़कियां बातचीत कर सकती हैं? मैंने कुछ सवाल किए भी जैसे -
“भाई ने किसान को पैसों के लिए क्यों मना किया होगा?”
लड़कियों ने चर्चा में बताया कि “ऐसा नहीं कि भाई के पास पैसे नहीं थे, वह पैसे देना ही नहीं चाहता था।”
मैंने पूछा, “इसका क्या सबूत है कहानी में?”
लड़कियां – “इसका सबूत यह है कि जब किसान पैसे मांगने गया तो भाई ने शुरू में ही मना कर दिया यह जाने बिना कि उसे कितने पैसे चाहिए। इससे साबित होता है कि वह पैसे देना ही नहीं चाहता था। जैसे दोस्त ने पैसों के लिए तब मना किया जब उसने जान लिया कि किसान को कितने पैसों की जरूरत है। इससे पता चलता है कि सच में ही दोस्त के पास पैसे नहीं थे।”
बोर्ड और कालांश की सीमाओं में जकड़ी इस इबारत को हो सकता है आप कहानी न माने। लेकिन एक कहानी आज शुरू हो चुकी है जो इस बोर्ड से भविष्य के क्षितिज तक जाएगी। लड़कियां की इस इबारत में हो सकता है कहानी न हो लेकिन लड़कियों के लिए अनंत संभावना है सृजनशीलता के मुस्तकबिल तथा एक शिक्षक के लिए शिक्षण की।  तत्काल मुझे एक संभावना  नजर आई । मैंने लड़कियों से कहा कि पहले वाले बोर्ड पर जो शब्द लिखे हुए हैं उन्हे अपनी नोटबुक में लिख लो लेकिन उन्हे जैसे के तैसा नहीं लिखना है। इस शब्दों में कई तरह के समूहों मे रख कर देख सकते हैं। मैंने लड़कियों से इस शब्दों को वर्गिकरण करके तालिकाबद्ध करने के लिए कहा।

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दलीप वैरागी 
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