Thursday, May 18, 2017

ग्रीष्म नाट्य उत्सव 2017 : उसके इंतज़ार में उर्फ आखिर तक सुर बदल गया

ग्रीष्म नाट्य उत्सव 2017 अभी समाप्त होकर चुका है। उत्सव की समीक्षा लिखी जानी है। हर इवेंट की समीक्षा लिखे जाने से पहले मेरे सामने यही बुनियादी सवाल होता है कि समीक्षा क्यो लिखी जाए। समीक्षा यदि जवाब है तो फिर वह सवाल क्या है? मैं सवाल की तलाश में लग जाता हूँ। जवाब तो सामने है, सवाल तक पहुँच की कोशिश ही मेरे लिए समीक्षा है।  इस ग्रीष्म नाट्य उत्सव में तीन दिनों में (12-14 मई 2017) चार रंग प्रस्तुतियाँ हुईं
·        मैरिज प्रपोज़ल
·        आधी रात के बाद
·        मरणोपरांत
·        उसके इंतज़ार में
पहले दिन की समीक्षा पूर्व में आ चुकी है उसे इस लिंक पर पढ़ा जा सकता है।
नाटक “आधी रात के बाद” शंकर शेष का लिखा हुआ नाटक है, जिसे जयपुर के युवा रंगकर्मी शिव सिंह पलवात ने निर्देशित किया। इस नाटक में दो मुख्य पात्र है एक चोर और जज। चोर चोरी से इतर उद्देश्य के तहत एक जज के घर रात को घुसता है और जज से कहता है कि वे पुलिस को फोन करे ताकि वह जेल जा सके। यह नाटक सहज ही समय की उस विडम्बना को भी संप्रेषित कर जाता है कि व्यक्ति समाज से अधिक जेल में सुरक्षित है। बेहद कसे हुए कथोपकथन विधान  में यह नाटक कसावट के साथ आगे बढ़ता है शिव सिंह पलवात व योगेंद्र अगरवाल ने अपनी भूमिकाओं के साथ पूरा न्याय किया। पार्श्व ध्वनियों का बहुत सुंदर प्रयोग किया। पृष्ठभूमि में घड़ी की टिकटिक समय की गतिशीलता को बखूबी प्रदर्शित कर रही थी। यदि बेचैनी तनाव के क्षणों में यह ध्वनि तीव्र होकर फिर धीरे होती तो और भी प्रभाव पैदा करती। सम्पूर्ण प्रभाव पैदा करने में यह नाटक पूर्णत: सफल रहा।
तीसरे दिन दो प्रस्तुतियाँ हुईं - सुरेन्द्र वर्मा द्वारा लिखित व अंकुश शर्मा द्वारा निर्देशित लघुनाटक “ मरणोपरांत” तथा प्रदीप कुमार द्वारा लिखित व देशराज मीना द्वारा निर्देशित नाटक “उसके इंतज़ार में”। मरणोपरांत दो पुरुषों की दास्तां है जो एक ही महिला को चाहते हैं। एक पति(अंकुश शर्मा) है तो दूसरा प्रेमी(कृश सारेश्वर) है । जैसा कि नाटक के नाम से ही स्पष्ट है कि महिला के मरणोपरांत पति को पता चलता है कि उसकी ज़िंदगी में कोई और पुरुष भी है। दोनों पुरुष मिलते हैं यद्यपि दोनों एक दूसरे को नाकाबिले बर्दाश्त हैं लेकिन वे एक ऐसे सूत्र से जुड़े हुए हैं जो अब नहीं है। आद्यंत यह नाटक दोनों पात्रों  के माध्यम से रिश्तों में आई रिक्तता को प्रदर्शित करता है। यहाँ दोनों के सवाल हैं। और सवाल के दो रेस्पोंस है एक पहला जवाब और दूसरा खामोशी। अंकुश शर्मा ने नाटक के पात्रों की ज़िंदगी की रिक्तता को पकड़ा और नाटक के संवादों के मध्य में जगह-जगह फैला दिया। इस नाटक  में सन्नाटे को रूपायित करने का बखूबी प्रयोग किया गया है। इस सन्नाटे को और गहरे रंग देने का काम किया मदन मोहन के संगीत ने। जहां वे नाटक में चंद क्षणो के लिए मंच पर सहयोगी भूमिका में दिखाई देते है वही वे ज्यादार समय बैक स्टेज में रहकर संवादों के दरम्यान पसरे सन्नाटे को अपने आलापों के माध्यम से गहरे अर्थ देते हैं।
तीसरे दिन की अंतिम प्रस्तुति थी प्रदीप कुमार द्वारा लिखित व देशराज मीना द्वारा निर्देशित नाटक – “उसके इंतज़ार में”।  इस नाटक में प्रदीप कुमार ने स्वयं अभिनय भी किया। जब वे मंच पर आते हैं तो वे नाटक के संवादों के अतिरिक्त अपनी रंगकर्मियों और समसामयिक मुद्दों पर आशु टिप्पणियों से दर्शकों को अपने साथ बांध लेते हैं। ऐसा लगता है कि उनका मंच कवि नाटक में भी उनके अवैतनिक सहयोगी के रूप में आकार खड़ा हो जाता है। प्रदीप में गजब की संप्रेषणीयता है।
जहां कवि व अभिनेता के रूप में प्रदीप बेजोड़ हैं वहीं उनके नाटककार व निर्देशक से कुछ सवाल पूछा जाना जरूरी हो जाता है। ज्ञातव्य है कि “उसके इंतज़ार में” नाम से प्रदीप पहले भी एकल नाटक प्रस्तुत कर चुके हैं जिसके लिए उन्हे बहुत सराहना मिल चुकी है। इस बार इसे टीम के रूप में प्रस्तुत किया गया। नाटक दो दृश्यों में विभाजित है। वस्तत: ये दो दृश्य न होकर फॉर्म के स्तर पर दो नाटक दिखाई हैं देते हैं। जिन्हें एक नाटक में पिरोने का पूर्णतया विफल व निरर्थक प्रयास  किया गया था। दोनो के जोड़ने में इसका जोड़ ज्यादा मुखरित हो रहा है। इन दोनों नाटकों में एक ही समानता है कि दोनों का मूल कथ्य एक है।  लेकिन पूर्वार्द्ध  का काम उत्तरार्द्ध  के बिना और उत्तरार्द्ध का पूर्वार्द्ध के बिना चल सकता है। नाटक “उसका इंतज़ार... ” जब शुरू होता है तो मंच पर दो अभिनेता ऋषभ एवं हेमेन्द्र सिंह आते है और गज़ब संवाद अदायगी, गति व टाइमिंग से पूरे दृश्य में आखिर तक अपनी सशक्त उपस्थिति से दर्शकों को प्रभावित करते हैं। मंच पर अस्त अस्त व्यस्त सज्जा उनके अभिनय में सहयोग प्रदान करती है। पहले दृश्य के खत्म होने के पश्चात एक कौतूहल के साथ पूर्वानुमान था कि नाटक में आगे जाकर एक क्लाइमेक्स बनेगा और उस बिन्दु पर नाटक खत्म होगा। लेकिन दूसरे दृश्य में नाटक का सुर ही बदल जाता है। ऐसा लगता है कि मुखड़ा किसी राग में है और अंतरा दूसरे राग में । फॉर्म का घालमेल हो जाता है। पूरे मंच पर प्रदीप अतिव्यापित हो जाते हैं। पहले दृश्य के सशक्त चरित्र ओझल हो जाते हैं। या यूं कहे कि प्रदीप उन्हे सोख लेते हैं । वे पृष्ठभूमि के साय मात्र बनकर रह जाते हैं। देशराज इस नाटक के निर्देशक है। वे तार्किक रूप से इस नाटक में यह जस्टिफ़ाई नहीं कर पाते हैं कि जब उत्तरार्द्ध का दृश्य एकल है तो मंच पर उपरोक्त तीनों नाटकों के अभिनेताओं कों क्यू झोंक देते है। जबकि उनकी जरूरत नहीं थी। देशराज इस  नाट्य उत्सव के सशक्त अभिनेताओं कों मंच पर क्यूँ छितरा देते हैं। पृष्टभूमि के ये अभिनेता नाटक मे सहयोग करने की बनिस्पत नोइस ही क्रिएट कर रहे थे। उम्मीद है कि प्रदीप अपने नाटक के फॉर्म पर पुनर्विचार करेंगे। मुझे लगता है इसके पीछे प्रदीप जी के साथ एक जनरल फिनोमिना  भी है जो उनकी विवशता बन रहा है कि खुद के लिखे आलेखों पर ही काम करना। मुझे लगता है कि प्रदीप कुमार को इसे बदलना चाहिए और दूसरे लेखकों के आलेखों पर भी काम करना चाहिए।
देशराज की एक खूबी यह रही कि मंच विधान ऐसा रखा जो सभी नाटकों कों सपोर्ट करे। जाहीर है आलेखों के चयन में उनकी सूजबूझ रही होगी जो कि कबीले तारीफ है। तीसरे दिन तक देशराज मीना टिकटिया दर्शको की संख्या पहले दिन के अनुपात में बढ़ाने में कामयाब रहे। काश इसी अनुपात में टिकटिया रंगकर्मी भी बढ़ते। खैर, सभी कों बधाई जो इस आयोजन ने जुड़े, उन्हें भी जो नहीं जुड़े।

 -(कृपया अपनी टिप्पणी अवश्य दें। यदि यह लेख आपको पसंद आया हो तो शेयर ज़रूर करें।  इससे इन्टरनेट पर हिन्दी को बढ़ावा मिलेगा तथा  मेरी नाट्यकला व  लेखन को प्रोत्साहन मिलेगा। ) 


दलीप वैरागी 
09928986983 

Saturday, May 13, 2017

द मैरिज प्रोपोज़ल : अरण्य में कहकहे तलाशता एक हास्य





रंग संस्कार थियेटर ग्रुप द्वारा आयोजित “समर थियेटर फेस्टिवल” की प्रथम प्रस्तुति के रूप में दिनांक 12 मई 2017 को एंटोन चेखव द्वारा लिखित, देशराज मीना द्वारा रूपांतरित तथा जयपुर के धीरेन्द्र पाल सिंह द्वारा निर्देशित नाटक “द मैरिज प्रोपोज़ल” का मंचन किया गया। इस नाटक में धीरेन्द्र पाल, योगेन्द्र अगरवाल व विमला डागला ने अभिनय किया। इस नाटक की समीक्षा में बहुत सारी बाते हैं जो कही जा सकती हैं किन्तु बहुत सी ऐसी बाते हैं जो इस नाटक से बाहर हैं और कही जानी चाहिए। ये नाटक से सीधे जुड़ी न होते हुए भी नाटक को प्रभावित तो करती हैं। इसलिए उन्हें समीक्षा की जद में आना चाहिए।
नाटक के विषय में एक ही बात कह कर बात खत्म की जा सकती है कि यह नाटक दरअसल अरण्य में रचा गया एक हास्य है। दरअसल नाटक  में ह्यूमर तो  है लेकिन सामने से कोई कहकहा नहीं सुनाई देता। दरअसल खाली कुर्सियों से क़हक़हों की उम्मीद बेमानी है।  इस नाटक के कलाकारों के उत्साह के ग्राफ में उतना ही अंतर था जितना कि एक हाउसफुल औडिटोरियम और खाली कुर्सियों के समक्ष आनुपातिक रूप से होता है। रंगमंच एक जीवंत माध्यम है उसे मंच और दर्शक को अलग करके देखा नहीं जा सकता। कलाकार दर्शक से त्वरित रेस्पोंस की उम्मीद करता है। जब उसे वह नहीं मिलता तो उसके घुटनो से जान निकल जाती है। फिर वह तमाम नाटक में अपने कंधों पर ही अभिनय को ढोता रहता है। दर्शकों का यह तात्कालिक रेस्पोंस नकारात्मक व सकारात्मक दोनों होता है। जब यह नकारात्मक होता है तो वह कलाकार को और दम लगानेकी चुनौती देकर प्रोत्साहित करता है। जब यह सकारात्मक होता है तो अभिनेता में पंख लगा देता है। मुश्किल तब आती है जब यह फीडबैक आता ही नहीं। लगभग यही कल की प्रस्तुति में हुआ।  
बहुत बड़ी विडम्बना है कि शहर की लगभग साढ़े तीन लाख आबादी में से मुश्किल से 50 दर्शक नहीं जुट पाए। अलवर शहर में लगभग 30 नाट्य संस्थाओं से मुट्ठी भर प्रतिनिधि भी नहीं थे। अलवर थियेटर आर्टिस्ट एसोसिएशन के नाम से व्हटस एप्प पर संचालित ग्रुप में 103 रंगकर्मी (?) नामांकित हैं उनमे से कल के नाटक में उपस्थिति दहाई का आंकड़ा भी नहीं छू  पाई। यह तब है जबकि इसी वाट्स एप्प समूह में इस इस ग्रीष्म नाट्य उत्सव की सूचना लगभग एक पखवाड़े से  रोज प्रसारित की जा रही है। यूं तो ग्रुप में सदस्यों की सक्रियता देखते बनती है। दिन भर मैसेज की इनबॉक्स में धारासार वर्षा होती है। अधिकारों, दायित्वों व आंदोलनों की बाते होती हैं। लेकिन जब भौतिक रूप से उपस्थिति की बात होती है तो वहाँ पर एक चुप्पी ही पहुँचती है। इस आभासी सक्रियता को पहचाना जाना चाहिए। आभासी सक्रियता किसी काम की नहीं हैं। अलवर में तीन-चार तरह के तरह के रंगकर्मी हैं।
·        पहले दर्जे में वे हैं जो लगातार नाटक कर रहे हैं।
·        दूसरे दर्जे में वे हैं जो प्रक्रिया में हैं लेकिन उनके नाटक मंच तक नहीं पहुँच रहे हैं।
·        तीसरी श्रेणी वे हैं जो सक्रिय नहीं हैं किन्तु नाटक देखने जरूर जाते हैं।
·        चौथे दर्जे में  वे हैं जो अतीत के स्मृतियों के जमाखर्च से अभी तक काम चला रहे हैं।
एक श्रेणी और है जो केवल वाट्स एप्प पर आभासी सक्रियता दर्शा रहे हैं। इस छद्म सक्रियता को पहचानना होगा।
इसी वाट्सएएप्पी सक्रियता से शहर में औडिटोरियम की मांग को लेकर आंदोलन चलाया जा रहा है। अजीब विडम्बना है कि औडिटोरियम की निशुल्क मांग को लेकर आंदोलन चलाया जाए और जब औडिटोरियम में कोई नाटक हो तो वहाँ नाटक देखने न जाया जाए। इससे यही निगमित होता है कि दरअसल रंगकर्मियों को औडिटोरियम की जरूरत ही नहीं? या फिर वे औडिटोरियम की मुफ्त में उपलब्धता के बाद ही नाटक करने या देखने जाएंगे! समूह में सभी बाते होती हैं लेकिन किसी ने यह नहीं कहा कि मैं नाटक देखने आ रहा हूँ या नहीं आ सकता...  नाटक के मंचन के पश्चात ग्रुप में तस्वीरें डाली गईं, अखबार की कतरन डाली गईं। 17 घंटे के बाद किसी की कोई प्रतिक्रिया नहीं है.... यह सायास या अनायास चुप्पी शंकित करती है कि कहीं हमारी सक्रियता आभासी तो नहीं। खैर, इस समर उत्सव में दो पहल मजबूती से हुई हैं –
·        नाटक को समय से शुरू करना
·        टिकट से नाटक दिखाना
यह नाटक समय पर शुरू कर दिया गया था। जो भी दर्शक आए उन्हे दिखाया गया। यह एक अच्छी पहल है। ये नए दर्शक निर्माण की और उठाया गया कदम है। जो दर्शक आए उनकी लिटरेसी हो गयी कि भविष्य की प्रस्तुतियों में टाइम का महत्व है।
इस बार नाटक का टिकट 50/- का रखा गया था। थियेटर एसोसिएशन के कलाकारों को 50% की छूट थी। इस छूट का लाभ नगण्य रूप से ही लिया जा सका। लेकिन प्रेक्षाग्रह में प्रविष्टि टिकट से थी यह बात महत्वपूर्ण है। शहर के रंगकर्मियों को भी अब मुफ्त की प्रवृति को बदल कर काउंटर से टिकट लेना सीखना चाहिए। पुराने व वरिष्ठ रंगकर्मियों को अब आमंत्रण पत्रों की घर पर प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए। उन्हे मीडिया से सूचना पाकर प्रेक्षागृह तक पहुँचने में अपना मान समझना चाहिए। घर-घर आमंत्रण पत्र देने में रंगकर्मी का बहुत समय, ऊर्जा व संसाधन जाया हो रहे हैं यह समझना चाहिए।
बहरहाल, आज शंकर शेष द्वारा लिखित व शिव सिंह पलवात द्वारा निर्देशित नाटक “आधी रात के बाद” का मंचन है। स्थान वही है – महावर औडिटोरियम समय ठीक 7.30 पीएम।
बड़ी संख्या में पहुँच कर ग्रीष्म नाट्य उत्सव का आनंद लें।
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दलीप वैरागी 
09928986983 


Friday, March 31, 2017

अलवर की एक शाम किस्सागोई के नाम - दलीप वैरागी

इस लेख को नाट्य समीक्षा न समझा जाए तो ही सही होगा। क्योंकि यह कहीं पर इतिहास है, कहीं पर इतिवृत, कहीं रिपोर्ट है, कहीं संस्मरण है, कहीं पर आत्मावलोकन है कहीं पर आत्मालोचन...  खैर...
27 मार्च 2017, विश्व रंगमंच दिवस के मौक़े पर अलवर में “कहानी रंगोत्सव” का सफलतापूर्वक आयोजन हुआ। यह कार्यक्रम कई मायनों में सफल माना जा सकता है। इसमें पहला बिन्दु है – जिस प्रकार 4 अक्तूबर 2015 को रंग संस्कार थियेटर व उसी से सम्बद्ध देशराज मीना ने जो सिलसिला शुरू किया था व अनवरत चल रहा है। यदि मेरे स्मृति क्षीण नहीं हुई है तो इसकी शुरुआत एक दिवसीय हास्य नाट्य उत्सव के रूप में प्रताप औडिटोरियम में हुई थी। उस समय तीन नाटकों का प्रस्तुतीकरण हुआ, जिसमें एक मोलियर का नाटक बिच्छू, हरीशंकर परसाई का निठल्ले तथा तीसरा नाटक प्रदीप कुमार का “उसके इंतज़ार में था”। शुरू के दोनों नाटकों में  दिल्ली के रंगकर्मी मंच पर नज़र आए हालांकि प्रदीप कुमार भी अलवर से हैं लेकिन उन दिनों वे गुजरात प्रवास पर  थे। तब तमाम अच्छाइयों के बीच एक बात यह भी उठ रही थी कि स्थानीय प्रतिनिधित्व नहीं है।
इसकी दूसरी आवृत्ती  के रूप में 14 से 17 जनवरी 2016 को “अलवर नाट्य महोत्सव के रूप में हुई।” अलवर के दर्शकों को देशभर के जाने माने कलाकारों से विविधता भरे नाटकों का पाँच दिन तक फुल डोज़ मनोरंजन मिला। इसका तीसरा चरण 26 जनवरी 2017 एक दिवसीय नाट्य संध्या के रूप में आयोजित किया गया जिसमे दिल्ली और लखनऊ के समूहों ने हास्य नाटको का प्रदर्शन किया। यद्यपि मैं इस कार्यक्रम को नहीं देख पाया लेकिन देखने वालों ने बताया कि एक नाटक मे देशराज ने भी अभिनय किया था।

इस संक्षिप्त इतिहास का विवेचन इसलिए हो रहा है क्योंकि यह एक गति को दर्शाता है। यह गति मात्रा, आवृत्ती व गुणवत्ता की ओर उत्तरोत्तर बढ़ रही है। गुणवत्ता के आशय यहाँ  बहु आयामी हैं। एक आशय यह भी है कि इसकी प्रस्तुतियों ने एक  समन्वित प्रभाव छोड़ा है। दस साल के निर्वात को भरा है। प्रभाव को इस रूप में देखा जा सकता है। आज अलवर में अलग अलग रंग मंडलियों में सक्रियता देखी  जा रही  है भले ही ज्यादरतर प्रस्तुतियाँ मंच तक नहीं पहुँच पाई हैं लेकिन रिहर्सल तक सक्रियता रंगमंच में जुंबिश तो है। हालांकि किसी भी बदलाव के लिए एक ही कारण जिम्मेदार नहीं होता लेकिन बदलाव दृष्टिगोचर है। नाटकों के मंच तक न पहुँच पाने के कारण भी हैं। उन पर भी बात होनी चाहिए तथा वे नाटक किन कारणो से दलदल में धँसे हैं, हो सके तो वहाँ भी इनपुट दिये जाने चाहिए।
खैर, “कहानी रंगोत्सव” की मार्फत रंग संस्कार थियेटर ने एक और सोपान तय किया है। वह है कि इस बार प्रस्तुतियों में 50 प्रतिशत नाटक अलवर की मिट्टी में ही उगे और खड़े हुए।  कहानियों में दलीप वैरागी (यानि मेरे द्वारा ) रवि बुले की कहानी “हीरो एक लव स्टोरी”, नीलाभ पंडित द्वारा माई द पोसा की कहानी “उन्मादी” तथा प्रदीप कुमार द्वारा स्वलिखित कहानी “उसके इंतज़ार में” ये तीन कहानियाँ अलवर के रंगकर्मियों द्वारा प्रस्तुत की गईं।
दरअसल यह गतिविधि मेरे रंगकर्म में एक मील का पत्थर साबित हुई। अलवर के किसी भी मंच पर मैं लगभग डेढ़ दशक बाद दिखाई दिया हूँ। हीरो एक लव स्टोरी ने आज वही जोश व उमंग अंदर भर दी है, जैसा उस वक्त महसूस किया करता था। यह कहानी 2000 के आस पास इडिया टुडे की साहित्य वार्षिकी में छपी थी। एक किशोर को केंद्र में रखकर लिखी गई इस कहानी को जब पहली बार पढ़ा तब मैं भी लगभग किशोर था। यह कहानी कहीं उम्र के मूक  प्रश्नो को आवाज देती लगी। तब नाटक का मंच इतनी पकड़ में नहीं था कि कहानी की रंग परिकल्पना की जाए। नाटक का सिलसिला चलता रहा। अंतराल बाद चार-पाँच नाटक निर्देशित करने के बाद भी कहानी तसव्वुर में थी लेकिन हाथ से चली गई। तब विनय मिश्र जी हमें पढ़ाते थे तो उनसे साहित्य वार्षिकी का अंक लिया। लेकिन कॉलेज के बाद दुनियादारी के दलदल में कुछ इस तरह धंस गए कि किशोरावस्था से युवावस्था के रांगडपाने का सफर तय कर लिया पता ही नहीं चला, लेकिन कहानी अभी तक कंधों पर सवार थी। रवि बुले के दोनों कहानी संग्रह भी पढ़ डाले। पिछले साल नरेंद्र को लेकर कहानी की उसके साथ रिहर्सल शुरू की लेकिन कुछ दिन रिहर्सल के बाद बात नहीं बनी। कहानी छूट गई। अभी दो सप्ताह पहले देशराज ने लगभग आदेश भरे स्वर में कहा, “तुम 27 मार्च को एक कहानी का मंचन करने वाले हो।”
मैंने कहा, “भाई कहानी भी बता दो... ”
“रवि बुले की – हीरो : एक लव स्टोरी।”
मुझे लगा कि ईश्वर को यही मंजूर है। कहानी का मंचन होने के बाद मेरे पास दोस्तों के फोन और संदेश आए। वे सब मुझे पुराने अंदाज़ में देख पर खुश लग रहे थे। ये कहानी ही मेरा अटका हुआ प्रोजेक्ट नहीं है बल्कि ऐसे बहुत से नाटक हैं जो अभी तक मंच तक नहीं पहुंचे है। एक बात तो समझ आई कि रिहर्सलों की भी एक्सपयरी डेट तो होनी चाहिए। अभ्यासों का गुणवत्ता के साथ रिश्ता तो है लेकिन अनंत अभ्यासों के साथ बुलकुल भी नहीं है। नाटक के विचार के कंसीव के बाद प्रस्तुति को एक निश्चित समय तक मंच पर आना ही चाहिए। माँ भी 9 महीने के बाद बच्चे को प्रसव कर देती है। अब चाहे वह किसान बने,डॉक्टर बने या चोर। सबको 9 महीने ही गर्भ में रखती है।
बहरहाल कहानी एक नई ऊर्जा का संचार कर के गई है। कहानी में गीतों व ध्वनियों के प्रयोग  से अविनाश ने इसकी प्रभावोत्पादकता को और बढ़ा दिया। प्रकाश परिकल्पना भी अविनाश की रही। मंच के परे सचिन, राजेश महीवाल व नरेंद्र सेन  का सहयोग उल्लेखनीय रहा। कोशिश है कि किसी न किसी तरह उस ऊर्जा के सहारे मंच पर उपस्थिति को बनाए रखने की कोशिश हो।
दूसरी कहानी हरीशंकर परसाई का प्रसिद्ध व्यंग्य।, “भोलारम का जीव ” थी। इसे अंकुश शर्मा ने निर्देशित किया था। अभिनेता के रूप में कृष सारेश्वर, मदन मोहन, चित्रा सिंह व अंकुश शर्मा थे। वे एक कर्मचारी की रुकी हुई पेंशन को पाने के लिए दफ्तरों के चक्कर काटते ईश्वर को प्यारे हुए भोलारम के जीव की दास्तान है। इस कहनी मे परसाई जी यमराज के मिथक को  कहानी से  जोड़ देते है। हालांकि अब जैसा माहौल है उसमे मिथकों से काम लेना कम खतरे का काम नहीं। इस कहानी में  नारद है, यमराज है, चित्रगुप्त है।  अंकुश शर्मा इस मिथक में भी कल्पना की छूट लेते हुए यमलोक में भी डिजिटल क्रांति के मॉडल को दर्शा देते हैं वही नारद से वीणा की जगह हारमोनियम पर पॉप म्यूजिक बजवा देते हैं। ये प्रयोग काम करते हैं और दर्शकों को इस लगभग सभी की एक बार पढ़ी कहानी में भी नवीन मनोरंजन परोस देते हैं। सभी कलाकारों का अभिनय बहुत उम्दा था।
तीसरी कहानी माई द पोसा की कहानी “उन्मादी ” थी। यह एक फ्रेंच भाषा की कहानी है जिसके हिन्दी अनुवाद को वरिष्ठ रंगकर्मी नीलाभ पंडित ने प्रस्तुत किया। इस कननी का प्रस्तुतीकरण अन्य कहानियों से जुदा रहा। नीलाभ पंडित जी इस कहानी को दर्शकों को वाचन शैली में सुना रहे थे। निसंदेह वाचन भी कहानी के प्रस्तुतीकरण का एक प्रभावी रूप है। किन्तु जब पूर्व में एक कहानी को दर्शक ड्रामा के रूप में मंच पर चार छ: पात्रों  के रूप में जीवंत देख लें तो उनके मन में किस्सागो से कुछ अलग अपेक्षाएँ बन जाती हैं, शायद । शायद इस वजह से दर्शक वाचन के दौरान अंत तक कहानी के साथ जोड़े नहीं रख पाए। कहानी का विषय भी मनोवैज्ञानिक गाम्भीर्य लिए हुए था। मुझे लगता है कि यह कहानी क्रम में प्रथम कहानी के रूप मे आती तो बेहतर होता। कहानी का चयन भी इसमे एक कारण हो सकता है।
चौथी कहानी फिर से अंकुश शर्मा द्वारा निर्देशित तथा गुलजार द्वारा लिखित कहानी “रावी पार थी।” यह कहानी 1947 के विभाजन में निर्वासन का दंश झेले एक परिवार की त्रासदी है। कहानी का पहला संवाद है – “पता नहीं दर्शन सिंह क्यों पागल नहीं हो गया ? बाप घर पे मर गया। माँ उस बचे-खुचे गुरद्वारे में गुम हो गई। शाहनी ने एक साथ दो जुड़वां बेटे जन दिये। उसे समझ नहीं आता था कि हँसे या रोए! इस हाथ ले उस हाथ दे का सौदा किया था किस्मत ने...
सामन्यात: वेदना और संत्रास के जिस बिन्दु पर चढ़ कर कहानियाँ समाप्त होती हैं। ये कहानी दर्शन सिंह की इस अजीब स्थिति से शुरू होती है। उपरोक्त  संवाद बोलने में जितना जीभ को सर्द और सुन्न कर देने वाला है इसे अभिनेता का अपने शरीर पे धारण करना शोलों को धारण करने जैसा है। अंकुश शर्मा जैसे ही किस्सागो की जगह बैठ कर इस संवाद को उच्चारित करते हैं। विंग से बाहर दर्शन सिंह के रूप में कृष सारेश्वर की पथराई हुई चाल दिखाई देती है। चाल ऐसी जिसे देख कर प्रतीत होता है कि कदम कहीं नहीं पहुँचना चाहते लेकिन चलना चाहते  है। उसके साथ अनुगामी चित्रा सिंह है शाहनी के रूप में। मंच के बीच आकार बैठ जाते हैं। कहानी का यह पहला वाक्य अब कृष सारेश्वर के सारे वजूद में नुमाया हो उठता है उसकी यह अजीब सी कैफियत आँखों के फट कर बाहर आ जाने को झाँकती है। कहानी के पहले वाक्य पर दर्शन सिंह के अभिनय ने दर्शकों के दिमाग में इस तरह से पैठ बनाई दर्शक अपलक पूरी कहानी को देखते चले गए। मदन मोहन कहानी मे संगीत के संपुट लगा रहे थे। अंकुश किस्सागो के अंदाज में बोल कर घटनाओं को बोल कर बता रहे थे। और वह जो सब बोला नहीं जा सकता उसे कृष सारेश्वर और चित्रा सिंह  बकायदा अपनी मूक छवि से बता रहे थे।
Image may contain: 1 person, standingपाँचवी कहानी “उसके इंतज़ार में” प्रदीप कुमार लिखित व अभिनीत थी। यहाँ यह बता देना जरूरी है कि यह कहानी उनके पूर्व में किए गए नाटक “उसके इंतज़ार में ” से बुनियादी रूप से अलग है। उसके इंतज़ार में एक युवक की कहानी है। जो प्रेम करता है, प्रेमिका से, देश से, हुनर से, कला से, भाषा से व शौक से। बाधाएँ भी है और संघर्ष भी है। उसे इंतज़ार  है समाज बदलने का, वह सब कुछ आने का। प्रदीप कुमार की लिखी कहानी में कथा क्षीण है लेकिन सूत्र बहुत हैं कथा से लोगों को जोड़ने के। कहनी में घटनाओं का अभाव है और विमर्श ज्यादा हैं। प्रदीप कुमार एक मंझे हुए अभिनेता हैं। वे अपने जबर्दस्त अभिनय से कहानी को सफलता पूर्वक निकाल ले गए। अगर किसी प्रस्तुति में दर्शक सबसे ज्यादा जुड़े हुए दिखाई दिये वो इस कहानी में। यहाँ प्रदीप कुमार का मंच कवि भी उनके साथ  आ खड़ा होता है। वे अपनी कहानी की एक-एक सींवन मंच पर खड़े होकर खोलते जाते हैं और धागे निकाल निकाल-निकाल कर दर्शकों में थमाते जाते हैं। वे कहानी के साथ दर्शकों पर एक अदृश्य जाल सा बुनते जाते हैं। वह जाल दर्शकों को गुदगुदता प्रतीत होता है किन्तु प्रदीप गहरी चोट भी करते जाते है। चाहे वह डिजिटल क्रांति के नाम पर जियो के सहारे जियो जीवन  हो या राजनैतिक परिदृश्य हो, सुविधाओं के नाम पर बुनियादी चीजों को बाजार से लगभग एक साजिश के तहत गायब करके गैर जरूरी चीजों के थोपने की बात हो। शिक्षा व्यवस्था के दोहरेपन पे भी वे गम्भीरे चोट करते हैं। इस कहानी में जो सबसे महत्वपूर्ण बात लगी वह है दर्शकों की सक्रिय सी दिखने वाली भागीदारी। परंपरागत किस्सागो जिस तरह हुंकारा भरवाए बिना आगे नहीं बढ़ता, वैसे ही प्रदीप कुमार दर्शक के चेहरे का रेस्पोंस जाँचे बिना आगे नहीं बढ़ते। यह एक अद्भुत कौशल है।   
छठी व अंतिम कहानी थी कारेल चापेक की कहानी “टिकटों का संग्रह”। कहानी का अनुवाद निर्मल वर्मा का किया हुआ है। कहानी का  अभिनय दिनकर शर्मा ने किया। दिनकर शर्मा झारखंड में रहते हैं व एकल प्रस्तुतियों के लिए सिद्धस्त अभिनेता हैं। यह कहानी एक बच्चे की कहानी है जिसे टिकटों का संग्रह करने का शौक है लेकिन यह शौक उसके पिता को बिलकुल पसंद नहीं है। एक दिन बच्चे को पता चलता है कि उसका संग्रह किया हुआ खजाना चोरी हो चुका है। बाहर से यह एक छोटी सी चोरी है लेकिन उस बच्चे के भीतर से बहुत कुछ सिरे से गायब कर जाती है – उसका व्यक्तित्व। वह अपने दोस्त से नफरत करने लगता है। अपनी पत्नी से जीवन भर प्यार नहीं कर पता है। उसका पूरा जीवन कड़वाहट का इतिहास बन कर रह जाता है। आखिर में जब उसे पता चलता है कि उसके पिता ने .... तो वह फिर से टिकटों का संग्रह शुरू कर देता है... इस कहानी को दिनकर शर्मा बहुत सहजता से धीमी आवाज में शुरू करते हैं। धीरे धीरी अपने सहज सधे  हुए अभिनय से वे दर्शकों को कहानी की दुनिया की सैर पर ले जाने में कामयाब हो जाते हैं। उन्होने बहुत ही सात्विक अभिनय किया ऐसे बहुत से स्थान कहानी में आते हैं जहां वे अपने सात्विक अश्रुधारा में दर्शकों को भी नम व सराबोर कर जाते हैं। कहानी के अंतर्निहित संदेश कि छोटी से छोटी घटनाएँ बच्चों की ज़िंदगी बदल देती है। अत: उन्हे दुनिया को अपनी निगाहों से देखने समझने दिया जाए। दूसरा संदेश या कि जिंदगी के किसी भी मोड पर सपनों को पंख दिये जा सकते हैं।  संदेश दर्शकों तक सटीकता से पहुंचे।  
इस कार्यक्रम का दूसरा आकर्षण रहा रंगकर्मियों का सम्मान समारोह। इसके तहत रंगकर्म में उल्लेखनीय योगदान के लिए रंगकर्मियों का शॉल व सम्मान पत्र भेंट कर सम्मान किया, जिसमे पुराने व नए सभी प्रकार के रंगकर्मी शामिल थे। एक तरफ जहां यह  रंग संस्कार थियेटर ग्रुप  की अनूठी पहल है वही यह पहल देशराज को कुछ दिन परेशान भी करेगी। क्योंकि इतने बड़े जिले में कुछ नामों का छूटना अवश्यंभावी है। उन सवालों का सामना देशराज को शायद करना पड़े। खैर यह पहल अच्छी है। इसे आगे बढ़ाया जाना चाहिए। हर साल रंगकर्म में उत्कृष्ट कार्य के लिए एक दो रंगकर्मियों का सम्मान होना चाहिए ताकि लोगों का उत्कृष्टता के लिए आग्रह भी हो। उसकी चयन प्रक्रिया भी निर्धारित होनी चाहिए।  
इस कार्यक्रम के सूत्रधार देशराज के लिए जितना कहा जाए कम है। बस इतना ही कहना है कि उनका जज्बा और होसला बना रहे। इसी शिद्दत के साथ वह रंगकर्म में सलग्न रहे। अपनी विनम्रता को बनाए रखे। क्योंकि सफलता सबसे पहले विनम्रता को चाटती है। विनम्रता के साथ ही व्यक्ति स्थायी रूप से सफलता के शिखर पर बैठ सकता है। इस कार्यक्रम में नेपथ्य से चार लोगों का योगदान साफ दृष्टिगोचर हो रहा था – अमित गोयल, नीलाभ ठाकुर, संदीप शर्मा, अविनाश और सचिन।

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दलीप वैरागी 
09928986983 

Wednesday, February 8, 2017

चित्र – कविता

 केजीबीवी ओसियां का अनुभव
जनवरी 31, 2017
जोधपुर के प्रत्येक कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय (KGBV)की सभी लड़कियों को एक ड्राइंग बुक तथा एक सेट प्लास्टिक क्रेयोंस कलर के दिये गए है। इसी कड़ी के तहत कल ओसियां में था। सामग्री कक्षा के अनुसार ही वितरित की जा रही थी। यहाँ देखा जाए तो चार कमरों में बैठक व्यवस्था है। एक कमरा आठवीं का, दूसरा सातवीं, तीसरा छठी व चौथा कंडेंस्ड कोर्स का। इस कमरे में वे लड़कियां बैठकर पढ़ती हैं जिनका केजीबीवी में नया प्रवेश हुआ है, जो हैं तो उपरोक्त कक्षाओं की लेकिन अभी पढ़ना लिखना सीख रही हैं। शिक्षिकाएँ हर कक्षा में बारी – बारी से सामग्री वितरित कर रहीं थीं। वितरण के साथ ही मैं लड़कियों को गाइड कर देता। हालांकि चित्रकला विषय में कोई दाखल नहीं है फिर भी मैं लड़कियों से कह रहा था कि आप  इसमें वे चित्र बनाएँ जो आपके मौलिक विचारों और भावनाओं को अभिव्यक्त करें। यह कैसे होगा यह मैं भी अभी तक नहीं जानता था। यद्यपि मैं यह जरूर कह रहा था कि आप इसमें मेहँदी के डिज़ाइन, रंगोली, फूल झोंपड़ी इत्यादि स्टीरियोटाइप चित्र न बनाएँ तो बेहतर होगा। यह सारी बातें मैं इससे पूर्व सात – आठ केजीबीवी में कह चुका हूँ। आज भी पहले  आठवीं, सातवीं फिर छठी में वही बाते दोहराईं तथा लड़कियों ने भी सहमति में गर्दन हिलाई।
किसका चित्र बनाएँ
आखिर में मैं कंडेंस्ड कोर्स के बच्चों के साथ था। इस बार मैंने इन लड़कियों से पूर्व की बाते नहीं कीं। मैंने लड़कियों से कहा हम चित्र बनाएँगे लेकिन पहले ठीक से तय कर लें कि क्या बनाएँगे। मैंने कहा, “आप लोग 5 मिनट के लिए बाहर मैदान घूम के आइये और जो चीज़ आपको पसंद लगे तो आकर इसी चीज़ पर चित्र बना सकते है।” लड़कियों को मशविरा पसंद आया वे दौड़ कर मैदान में चली गईं। मैं कमरे में बैठा अंदाज़ा लगा रहा था कि लड़कियों के लिए चित्र बनाना कोई मुश्किल नहीं होगा मगर मैं इस गतिविधि को क्या मोड देकर पाठ्यचर्या के बिन्दुओं से जोड़ पाऊँगा। यहाँ सोचने की गुंजाइश थी और फुर्सत भी। दिशा निकल ही आई।
शब्दों के चित्र
लड़कियां लौट कर आ गईं। वो अपनी पेंसिल संभालें उससे पहले मैने उन्हे रोका। मुझे लगा कि जो जो वस्तु वे देख कर आईं हैं उसके दोनों चित्र अगर एक साथ बनें तो कैसा रहे।? एक वह वस्तु जो वे देख कर आयीं है। एक वह चित्र जो वे अभी बनाने वाली हैं। इसके साथ ही अगर उस वस्तु का शब्द चित्र भी बन जाए तो साक्षारता की जिस प्रक्रिया से ये लड़कियां गुजर रही हैं वह मजबूत होगी। मैंने लड़कियों से कहा कि आप जो वस्तु देख कर आई हैं पहले उसे बोर्ड पर लिखवा दो ताकि सब को पता रहे कि कौन लड़की क्या बना रही है। लड़कियों ने अपने नाम के सामने वस्तुएँ लिखवा दीं। मैंने उन्हें एक तालिका में मोटे-मोटे अक्षरों में लिख दिया।
लड़की का नाम
वस्तु का नाम
लड़की का नाम
वास्तु का नाम 
प्रियंका
नीम का पेड़
ममता
कार
किरण
पिल्ला
पूजा
हज़ारे का फूल
सुमन
कुत्ता
सुमन
पिल्ला
सोनिया
फिसल पट्टी
संगीता
सूरज
विमला
चिड़िया
अनीता
बादल
सोनू
चिड़िया
मोनिका
कार
पूजा
झूला
पुष्पा
पीपल का पेड़
रंग रेखाएँ और आजमाइश
लिखने के बाद एक बार लड़कियों से वाचन करवाया। इसके बाद उनसे कहा कि अब वे चित्र बनाना शुरू कर सकती हैं।
पेंसिल छीलना शुरू .... लाइन खिची ...... रबर से मिटाई .... फिर खिची ..... फिर मिटाई .....
अचानक लड़कियों ने कहा, “ क्या हम अपनी वस्तु के पास बैठ कर उसे देख कर चित्र बना सकते है।” इस एक संवाद ने कक्षा कक्ष के दायरों को एक बार फिर फैला दियाया। ऐसे में न कहने का सवाल ही कहाँ है। एक लड़की आँगन में बैठ कर हज़ारे को निहार रही है।
एक लड़की प्रवेश द्वार की सीढ़ियों पर बैठ गई है, सामने से कार साफ दिखाई दे रही है।
दो लड़कियां पानी के टांके के ऊपर बैठ गईं, वहाँ चिड़ियों को आने जाने में कोई अवरोध नहीं है।
एक रैम्प पर धूप सेक रहे पिल्ले को देख रही है कि वह काला है? सफ़ेद है? या दोनों है?
कोई सूरज से नज़र मिलाने  की कोशिश कर रही है...
कोई बादलों को समेटने की कोशिश कर रही है...
आज हर चिरपरिचित चीज़ एक नए दृष्टिकोण व अजनबीपने से देखी जा रही है।
पानी के टांके के पास चोंच में पानी भरती हुई चिड़िया जाने कब फुदक कर विमला के कागज पर आ बैठी। विमला को गोरैया तो चाहिए लेकिन भूरे फीके रंग की नहीं... विमला ने अपनी डब्बी के सारे रंग छोड़ दिये गोरैया के ऊपर... गौरैया ने उसमे से रंग चुन लिए और विमला के हाथ से छिटक कर अब सोनू के पन्ने पर जा चिपकी। ये क्या किरण और सुमन का पिल्ला तो बड़ा नटखट उठ कर भाग गया। किरण और सुमन भी उधर ही चली जिधर गया पिल्ला। पिल्ला वहाँ से उठ कर फिर बरामदे में.... बरामदे से आँगन में... अब किरण और सुमन को लगा कि मुश्किल चीज़ का चुनाव कर लिया... सुमन मुझसे आकार बोली, “पिल्ला नहीं बन रहा है” मैंने कहा, “कोई और चीज़ को चुन लो... ” सुमन ने थोड़ी देर सोचा और इस कायनात की सबसे अचल चीज़ का चुनाव किया, “सर मैं सूरज बनाऊँगी।”
झट से किरण ने भी पिल्ले से पीछा छुड़ाया और बोली, “सर मैं घंटी बनाऊँगी...”
मोनिका सीढ़ियों  में बैठी अपनी कार व सामने खड़ी कार का मिलान कर रही है... परसेप्शन सेट कर रही है शायद पेड़ पीछे है या आगे?
कूची की बनी कलम
थोड़ी देर में सब कक्षा कक्ष की और लौट चले। अब हमने हिन्दी की शिक्षिका को भी बुलवा लिया था। कक्षा में आकार प्रस्तुतीकरण की बारी थी। मिलकर एक प्रक्रिया तय की। अब भाषा की और चलने का समय था। क्योंकि गतिविधि का सुर रोचकता के जिस बिन्दु पर चढ़ गया था वहाँ से शब्दों से वाक्य बनाने की नीरस कवायद करवाने से मैं  बचना चाहता था। यह बहुत आसान था कि चलो अपने अपने चित्र के बारे में कोई एक बात बोलो। जब कला में बच्चे आकंठ डूबें हो तो गतिविधि को सौंदर्यशास्त्रीय मौड़ देना भी जरूरी है। लड़कियों से कहा कि प्रत्येक लड़की अपना चित्र दिखाने के लिए आएगी... चित्र देखने के बाद उसके बारे में बातचीत करेंगे।
सबसे पहले किरण अपनी घंटी लेकर आई। घंटी पर बात शुरू ही हुई थी कि एक लड़की बोली-
“घंटी बजी  शाला की
टन – टन – टन – टन ”
मैंने पूछा कि और घंटी कहाँ कहाँ होती है ?
 लड़कियों ने कहा, “मंदिर में... ”
“मंदिर की घंटी कैसे बजती है?
“”टन – टन ”
अब अगली लाइन जोड़िए” मैंने लड़कियो से कहा।
“घंटी बजी मंदिर की
टन – टन – टन – टन ”
हालांकि जिस लड़की ने यह लाइन जोड़ी उसने सिर्फ एक शब्द का ही योगदान दिया लेकिन इस योगदान में व काफिये – रदीफ़ की तुरपाई को सीख गई।
एक लड़की ने जोड़ा, “घंटी बोली किरण की... ” अब इसके बाद शायद उम्मीद टन – टन की थी लेकिन इस बात को लड़कियों ने यूं समाप्त किया।
“घंटी बोली किरण की
पढ़ेगी तो बनेगी नंबर वन ”
इस प्रकार यह तय कर लिया कि हर चित्र पर लड़कियों की मदद से तुकबंदी करनी है। चाहे निरर्थक ही हो ... कोशिश यह थी कि टेक्स्ट में भी लड़कियों की दिलचस्पी उतनी ही बनी रहे जितनी कि चित्रों में थी। लड़कियों के चित्र दिखाने का सिलसिला चलता रहा और तुकबंदियों से कविताएं निकलती रही।
कविता 1
मोनिका की तो चलती है
ममता की तो खड़ी है
दोनों की कार बड़ी है


कविता 2
झूला है कितना सुंदर
उस पर झूल रहा है बंदर
देख के पूजा भागी घर के अंदर
कविता 3
चिड़िया चुग रही है
तितली उड़ रही है
चिड़िया चीं – चीं करती है
तितली फुर - फुर करती है




कविता 4
 संगीता का सूरज गुस्से में है
प्रियंका का सूरज झूम रहा है
सुमन का सूरज चमक रहा है




कविता 5
फिसल पट्टी पे सोनिया फिसल गई
कपड़ों पे उसके मिट्टी लग गई
जल्दी से जाकर धोने लग गई
धोते – धोते रोने लग गई

कविता 6
पीपल है छोटा लकड़ी है बड़ी
पुष्पा चित्र बनाए खड़ी – खड़ी
सुमन है छोटी नीम है बड़ा
नीम की डाल पर झूला पड़ा

प्रस्तुतीकरण
कविताएं बन जाने के पश्चात लड़कियों से कहा गया कि आप अपनी कविताएं ब्लैक बोर्ड से उतार कर अपनी पेंटिंग के साथ वाले पन्ने पर लिख लें। उनके लिख लेने के पश्चात यह तय किया गया कि जो भी सृजन हुआ है उसका प्रदर्शन भी किया जाएगा। यूं भी पास के कमरे से कक्षा 6 की लड़कियां बार-बार झांक रही थी कि आज कंडेंस्ड कोर्स में क्या हो रहा है। स्कूल की बाकी लड़कियों को भी एक्टिविटी हॉल में बुलाया गया। पूरा स्टाफ भी उपस्थित हो गया। इसके बाद सभी लड़कियों ने सामने आकार अपने चित्र दिखाए। और चित्र के साथ जो सबने मिलकर तुकबंदियाँ की वे भी प्रस्तुत की गईं। प्रस्तुति से आशय यह भी कि लड़कियों ने कविताएं बकायदा पढ़ के सुनाईं, उत्साह और उमंग के साथ। एक बार फिर कक्षा की सीमाओं का अतिक्रमण हुआ। पहले ज्ञान प्राप्ति के प्रयासों में अबकी बार निर्मित ज्ञान को साझा करने के लिए।
मेरी पिछले कुछ दिनों से यह मान्यता और भी पुष्ट हुई है कि स्कोलास्टिक और को-स्कोलास्टिक के बीच  बहुत बारीक दीवार है जो थोड़े से प्रयास में ढह जाती है। और फिर दो तरफा रास्ता बन जाता है। रास्ता आने जाने का, सीखने – सिखाने का

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दलीप वैरागी 
09928986983 
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