Monday, July 4, 2016

“ भूलेंगे तो तब न, जब हम उसे रटेंगे!”

पिछली 29 - 30 जून 2016 को अजमेर के कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालयों की कुछ लड़कियां उनके विद्यालयों में होने वाली प्रमुख गतिविधियों की शेयरिंग व डेमोंस्ट्रेशन के लिए जयपुर आयीं थीं। इन केजीबीवी में समाज के सबसे वंचित तबके की लड़कियां पढ़ती हैं। ये लड़कियां उन दूर दराज क्षेत्रों से आती हैं जहां विद्यालय पहुँच में न होने के कारण शिक्षा से वंचित हो जाती हैं। केजीबीवी तसवारिया की लड़कियों ने  इंद्रलोक ऑडिटोरियम पर एक नाटक भी प्रस्तुत किया जिसने खूब सराहना बटोरी। एक पत्रकार वार्ता में जब इन लड़कियों से नाटक के बारे मे सवाल पूछे गए तो उनमे एक सावल था, “आप इतने लंबे संवाद कैसे याद रख पाती हैं, आप भूल नहीं जाती?” हमें एक बारगी लगा कि शायद इस सवाल का जवाब किसी तथाकथित बड़े को उठकर देना होगा। लेकिन इस आशंका को निर्मूल करते हुए कक्षा 8 की लक्ष्मी ने फटाक  से आत्मविश्वास के साथ जवाब दिया, “ भूलेंगे तो तब न, जब हम उसे रटेंगे!”
लक्ष्मी के इस जवाब के आखिरी शब्द की प्रतिध्वनि सुनाई दे उससे पहले पूरा हाल आधा मिनट के लिए तालियों की गड़गड़ाहट में डूब गया।  तालियों की डोर को अपने हाथ में थाम लक्ष्मी ने अपनी बात जो अभी तक हवा में तैर रही थी उसे तर्क के पैरों पर टिकाते हुए और स्पष्ट किया, “हम संवादों को रटते नहीं... ये हमारे आस-पास से अपने आप आते हैं।” उसने खुद ही उदाहरण भी रखा, बिलकुल शुक्ल जी की सूत्र व्याख्यान शैली में। लक्ष्मी किसी आचार्य सरीखी अब दृष्टांत रखती है, “अब देखो जैसे मैं बहू का रोल करती हूँ तो मुझे उसके लिए कोई संवाद रटने नहीं पड़ते। इसके लिए मैं अपने गाँव की किसी बहू को देखती हूँ और उसके जैसा करने की सोचती हूँ...” यहाँ लक्ष्मी नाट्यशास्त्र के किसी बड़े सिद्धान्त का प्रतिपादन तो नहीं कर रही लेकिन लक्ष्मी के चेहरे पर  वे संभावनाएं व उम्मीद साफ नज़र आती हैं, जो नाटक से की जाती है। लक्ष्मी की अभिव्यक्ति का आत्मविश्वास इस मान्यता को बल देता है कि नाटक अपनी मूल परिकल्पना में ही सीखने का यंत्र है। लक्ष्मी यह साबित करती है कि नाट्य निर्माण की प्रक्रिया से गुजरा हुआ कोई भी व्यक्ति सोचे समझे हुए जवाब आत्मविश्वास के साथ दे सकता है।
लक्ष्मी के इस अनुभव के बहाने से मुझे भी अपने ऐसे ही मुद्दे पर लिखे पुराने ब्लॉग याद आ गए उनके लिंक नीचे दे रहा हूँ।




Saturday, February 20, 2016

नाटक केवल प्रॉडक्ट नहीं होता


पिछले लगभग छ: महीने अलवर रंगकर्म में बहुत महत्व के रहे हैं। इस अवधि में रंगमंच पर प्रचुरता में गतिविधियां हुई हैं। माहौल में एक जुंबिश पैदा हुई है, जिसने पिछले दस साल के सूखे में फुहार का काम किया है। इसी सिलसिले में दिनांक 7 जनवरी 2016 को कलाभारती रंगमंच पर कबीरा थियेटर की ओर से रंजीत कपूर द्वारा लिखित तथा खेमचंद वर्मा द्वारा निर्देशित नाटक एपिसोड इन द लाइफ ऑफ़ एन ऑथर का मंचन किया गया। अगर अलवर रंगमंच को आगे बढ़ना है तो उसका सतत् व् समग्र मूल्यांकन भी होना चाहिए। पिछले साल से मेरी कोशिश रही है कि अलवर में हुई रंगमंच की गतिविधियों पर लिखने की, ताकि रंगकर्म की समीक्षा में सततता बनी रहे। इन प्रस्तुतियों को देखकर उनके बारे में लिख देने से सततता तो बनी है किन्तु, समग्रता भी है या नहीं? मेरा मानना है, नहीं।
नाटक केवल परफॉर्मेंस (Product) मात्र नहीं होता है। वह प्रक्रिया ज्यादा होता है। इसके आउटकम दोहरे होने चाहिए। एक दर्शक के स्तर पर और दूसरे अभिनेता के स्तर पर भी। अभिनेता दर्शक तक रस को प्रवाहित करने वाली वाहिनी मात्र नहीं है। वह मधुमक्खी की तरह है, जो  महीनों की मेहनत व कवायद के बाद छत्ते में मधु एकत्र करता है। और इस सारी प्रक्रिया में उसकी जिंदगी गहरे से प्रभावित होती है। समीक्षक का धर्म बनता है कि वह यह भी देखने का प्रयास करे कि मधुकोश में मधु इकट्ठा करने की प्रक्रिया क्या रही है। क्या मधुमक्खी बार-बार हलवाई की चासनी के थाल पर जाकर बैठी है या फिर उसने फूल दर फूल घूम कर उनके अंकुरण परागण को देखकर रस एकत्र किया है? किस्सा मुख़्तसर यह है कि नाटक अगर लोक शिक्षण करता है तो अभिनेता भी दर्शक से ज्यादा बड़ा बेनिफिशियरी है। नाटक के दर्शक पर प्रभाव का तो आकलन होता है लेकिन वह अभिनेता को कहाँ तक छू गया है यह चुनौती है समीक्षक के लिए और सीमा भी।
इस तरह केवल नाटक की प्रस्तुति पर राय देने और प्रक्रिया की अनदेखी से क्या समग्र मूल्यांकन हो सकेगा? हमारे यहाँ रंगप्रक्रियाओं के लिए कुछ समय से प्रोडकशन शब्दावली का प्रयोग बहुत होने लगा है। यद्यपि प्रोडक्शन शब्द भाषा की दृष्टि से क्रिया (प्रक्रिया) का द्योतक है किंतु, प्रोडक्शन शब्दावली शायद इंडस्ट्री से आती है। जो शब्द जिस क्षेत्र से आता है वहां का मूल्यबोध भी साथ लेकर आता है। उत्पाद व उत्पादन का जो नवीन अर्थशास्त्र अन्तिंम रूप से प्रोडक्ट के इर्दगिर्द केंद्रित हो जाता है, प्रक्रिया को कोई नहीं पूछता, वह कोई भी हो सकती है, असेंबलिंग, आउटसोर्सिंग...येन केन प्रकारेण। जो हमारी वर्तमान सांस्कृतिक मूल्यों का भी द्योतक है। जिस प्रकार हमारी अधिकतर प्राचीन शब्दावली युद्धों से प्रभावित है। क्योंकि इतिहास रक्तरंजित रहा है। साहस, वीरता, लक्ष्य, रणनीति आदि शब्दावली के साथ हमारे जेहन में कोई समुराई ही आता है, कोई लंगोटी वाला नहीं आता जो सत्य के लिए जीवट के साथ खड़ा होता है।
बहरहाल, अगर उपरोक्त नाटक के प्रस्तुति (प्रोडक्ट) पर कुछ कहना हो तो एक लाइन में कह कर समाप्त किया जा सकता कि 50 फीसदी नाटक दर्शकों तक पहुंचा ही नहीं। यह अतिशयोक्ति लग सकती है। लेकिन यह भी सच है कि प्रथम पंक्ति में बैठे लोगों को भी बहुत प्रयास करने पर संवाद सुनाई पड़ रहे थे।
इसका मतलब यह कतई नहीं कि नाटक का कलापक्ष कमज़ोर था। इस सम्प्रेषणीयता की समस्या के लिए अभिनेता बिलकुल जिम्मेदार नहीं। इसके पीछे तकनीकी पक्ष है। नाटक महीनों की अथक मेहनत से तैयार किया गया था। यह नाटक एक नाट्यप्रशिक्षण कार्यशाला में तैयार हुआ था। नाटक के युवा निर्देशक खेमचंद वर्मा अलवर रंगमंच पर नया नाम है। खेमचंद ने राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की सिक्किम इकाई से नाट्यकला का प्रशिक्षण प्राप्त किया है। सितम्बर माह में खेमचंद ने अलवर के युवाओं के साथ एक कार्यशाला की शुरुआत की। उन्होंने पेशेवर तरीके से इसे किया। उद्घाटन के वक़्त खेमचंद ने अलवर के समस्त नए पुराने रंगकर्मियों को आमंत्रित किया था। उसका यह विनम्र जेश्चर उनके बारे में सकारात्मक माहौल बनाने में मददगार रहा। खेमचंद की इस बात के लिए प्रशंसा की जानी चाहिए कि जहाँ अलवर में नाटक के लिए चार लोग जुटाने में बड़े बड़ों को पसीने आते हैं, वहीं इस नवयुवक ने 10-12  लोगों की एक ऐसी टीम तैयार कर ली, जो फीस चुकाकर सीखना चाहते हैं। उससे भी महत्वपूर्ण  है, उस टीम को चार महीने तक जोड़े रखना और उसे प्रस्तुति तक ले जाना। टीम के जुड़ाव व ठहराव के पीछे कार्यशाला का सही नियोजन है। वैविध्यपूर्ण गतिविधियाँ आधारित कार्यशाला उनकी रंगमंच में प्रशिक्षित होने का द्योतक है। इस कार्यशाला के दौरान उन्होंने लगभग हर सप्ताह शहर के किसी वरिष्ठ रंगकर्मी का संवाद कार्यशाला के संभागियों से करवाया। किसी भी कार्यशाला के आयोजन के लिए स्थान मिलना बहुत ही मुश्किल काम है। ऐसे में खेमचंद ने रघु कोम्पेक्स के बेसमेंट को अपने स्टूडियो के लिए सुसज्जित किया है, जिसे देखकर उनकी लंबी प्लानिंग के सूचक नज़र आते हैं।
यूँ तो खेमचंद नए पुराने रंगकर्मियों के संपर्क में सतत रूप से इस दौरान रहा फिर भी मंचन के लिए कला भारती रंगमंच को चुनने का निर्णय सूझबूझ का नहीं रहा। यह सभी रंगकर्मी अच्छे से जानते हैं कि कलाभारती का मंच नाटक के लिए नहीं है। इसमें साउंड की ईको (गूंज) की ज़बरदस्त समस्या है। नाटक में नाट्यशाला का अपना महत्व है। नाट्यशाला का रूपाकार नाटक की संप्रेषणीयता को गहरे प्रभावित करता है। यदि ऐसा न होता तो क्या जरूरत थी कि आज से हजारों साल पहले भरतमुनि नाट्यशास्त्र में रंगशाला के प्रकार व उसकी पैमाइश लिख रहे थे।
यद्यपि अलवर शहर में आधुनिक सुविधाओं से युक्त प्रताप ऑडिटोरियम बनकर तैयार है लेकिन उसकी ऊँची दरें रंगकर्मियों के लिए अफोर्डेबल नहीं हैं, यह सब जानते हैं। जब नाटक बिना टिकट के ही दिखाना हो तो सूचना केंद्र के मुक्ताकाशी रंगमंच का कोई जवाब नहीं। मैंने  अपने अधिकतर नाटक इसी मंच पर खेले हैं। वैसे भी यह मंच सबके लिए निशुल्क उपलब्ध है। दूसरा मंच राजर्षि अभय समाज का मंच है। यह भी लगभग कलाभारती जितना मूल्य चुकाने पर उपलब्ध है। तीसरा विकल्प है नगरपालिका का टाउन हॉल। यहाँ अभिनय स्थल पर छत है और सामने का आँगन खुला हुआ है। हालाँकि यहाँ पिछले 15 साल से कोई नाटक नहीं खेला गया। नगरपालिका की ईमारत के प्रथम तल पर जो हॉल है उसका भी सीमित दर्शकों के लिए उपयोग किया जा सकता है। आज से लगभग 10 साल पहले जेडी अश्वत्थामा ने इस हॉल का अपने नाटकों के मंचन के लिए बहुत इन्नोवेटिव तरीके से प्रयोग किया था। इसी प्रकार डेढ़ दशक पहले नीलाभ पंडित जी ने हम युवाओं को लेकर सैनिक स्कूल के रंगमंच पर कोर्टमार्शल नाटक खेला था। मेरी स्मृति में आज भी याद ताज़ा है कि किस प्रकार दिसंबर की कड़कड़ाती ठण्ड और कोहरे में दर्शक मुक्ताकाशी प्रांगण में जमे रहे थे।
इस इतिवृत्त को दोहराने के पीछे आशय महज़ इतना है कि रंगमंच में अभाव को नकारात्मक संज्ञा नहीं माना जाता। अभाव हमें रोकता नहीं हैं बल्कि अपनी सीमाओं को विस्तार देने को प्रेरित करता है। अभाव की वजह से ही अलवर रंगमंच में नवाचारी प्रयोग हो सके।
थोडा सा अभिनय के बारे में
नाटक में स्वयं खेमचंद लेखक की भूमिका में थे। उन्होंने जीवन की जटिल परिस्थितियों में फंसे लेखक की भूमिका से पूरा न्याय किया। उनकी पत्नी की भूमिका में अनामिका अपनी उपस्थिति मंच पर और दर्शकों के ज़ेहन में दर्ज करवा गई। अनामिका अपेक्षकृत मंच पर नई हैं। उनके अभिनय में बहुत निखार है। उन्होंने अलवर रंगमंच पर अपनी जगह बना ली है। पत्रकार के रूप में निधि चौहान ने सहज अभिनय किया। उनके साथ फोटोग्राफर के रूप में हिमांशु ने अपनी छरहरी काया से परिस्थितिजन्य हास्य बखूबी पैदा किया। नौकरानी के रूप में पराग शर्मा की हर एंट्री कहकहा पैदा कर जाती थी। मोहन छाबड़ा रंगमंच पर पुराने हैं। उनके अभिनय पर फ़िल्मी प्रभाव ज्यादा नज़र आता है। लेखक की माँ के रूप में जयशिला एम ने बहुत ही संतुलित अभिनय किया। उनमे बहुत संभावनाएँ नज़र आती हैं। उन्हें और अभिनय के अवसर मिलने चाहिए। विशाल शर्मा बहुत उम्दा अभिनेता हैं। वे पूरे शारीर से बोलते हैं। वो शरीर से लाउड हैं और वाणी से धीमे। उन्हें अपनी आवाज़ पर और काम करने की जरुरत है। वे जरुरत से ज्यादा धीमा बोलते हैं। अमित सोनी ने इन्स्पेक्टर के रूप में अपनी नाटकीयता से क्लाइमेक्स पर द्वंद्व को रचने में मदद की। इसके आलावा साज़िद और मंजू सैनी ने भी स्टेज पर थे।
हास्य नाटक में दर्शकों के कहकहे सफलता का सूचक होते हैं। क़हक़हों को भी अपने अभ्यासों में पूर्वानुमानों कर  नियोजित करना होता है। जब दर्शक लंबे क़हक़हों में चले जाते हैं तो अभिनेता को उनके लौटने का इंतज़ार करना होता है। अगर ऐसा न हो तो दर्शक के हाथ से कथा की डोर छूट जाती है। संगीत या ग़ज़ल के कार्यक्रम में इसे नियोजित करने की जरूरत नहीं होती है। जब किसी जगह पर दर्शक की दाद मिलती है तो गायक रुकता नहीं बल्कि अगले सम पर जाकर उसमे और खुशबू घोल कर पुनरावृत्ति कर देता है। कई बार तीन-चार पुनरावृत्तियाँ भी चमत्कार पैदा कर देती हैं.... लेकिन अभिनेता इतना खुशनसीब नहीं होता उसे ठहरना ही पड़ता है और उसी छूटे हुए सूत्र को दर्शक को वहीं से पकड़ना पड़ता है। इस नाटक में यह सूत्र कई बार फिसला।
कुछ खास बातें
  • मुझे लगता है कि इस नाटक का शीघ्र ही एक मंचन और होना चाहिए। इसके लिए कलाभारती के आलावा जगह को चुना जा सकता है।
  • इस कार्यशाला में एक बहुत ही उत्साही और नए कलाकारों की टीम निकल कर आई है। निःसंदेह ये ऊर्जा से भरे हुए हैं। ये टूट कर बैठ नहीं जाएं इनके साथ खेमचंद को कोई फॉलोअप प्लान करना चाहिए।
  • शहर की अन्य संस्थाओं के निर्देशक भी इस टीम को लेकर कोई गतिविधि शुरू कर सकते हैं।
  • खेमचंद ने बहुत सुरुचिपूर्ण तरीके से अपना स्टूडियो तैयार किया है। यदि वह अन्य संस्थाओं के लिए उपलब्ध हो जाए तो रिहरसल की जगह की समस्या का हल हो सकता है।
खेमचंद से अलवर रंगजगत को बहुत उम्मीद है। यह सिलसिला रुकना नहीं चाहिए।

Thursday, January 28, 2016

अलवर रंग महोत्सव: एक खूबसूरत नाट्यानुभव

यह समीक्षा देर से आ रही है। इसके लिए पूर्णतः मैं स्वयं जिम्मेदार हूँ। इसके पीछे की वजह व्यस्तताएं ही हैं, जिन्हें चाहते हुए भी दूसरी प्राथमिकता पर नहीं डाला जा सका था। अभी दो दिन पहले एक मित्र ने मुझे याद दिलाया कि इस कार्यक्रम की समीक्षा अभी तक क्यों नहीं की गयी है। कार्यक्रम के दौरान भी अलवर व बाहर के कुछ अभिनेताओं ने ऐसी ही अपेक्षा की थी।
इस बात ने एक विस्मय मिश्रित आनंद की अनुभूति दी। खैर, समीक्षक होने का मुगालता तो नहीं पाला है, मगर आश्चर्य यह हुआ कि  सहसा यह अपेक्षा यदा कदा ब्लॉगिंग से ही उपज आई है, और इसने एक विस्मृत अभिनेता व निर्देशक को नयी भूमिका में रूपांतरण के साथ जीवित कर दिया।
अलवर रंग महोत्सव के बारे में अगर एक वाक्य में कहा जाए, तो यह अलवर के मेरे ज्ञात इतिहास में भव्य व सफलतम् नाट्यानुभूति है। आगे के पूरे लेख में इस वाक्य का पल्लवन भर है। अलवर के दर्शक लम्बे समय तक इसे याद रखेंगे,इसमें कोई दोराय नहीं है।
निःसंदेह यह अनुभव रचने में रंग संस्कार थियेटर ग्रुप व कारवां फाउंडेशन ने अथक परिश्रम किया है। किन्तु इसका प्रस्थान बिंदु देशराज मीणा ही है। देशराज मीणा की प्रशंसा इसलिए की जानी चाहिए कि उन्होंने  पिछले साल नवम्बर में आयोजित “हास्य नाट्य” उत्सव की प्रतिध्वनि के विलीन होने से पहले रंगमंच के दूसरे तार को झंकृत कर दिया। रंगमंच को लेकर देशराज के जूनून व जज़्बे को पहले हम रंगकर्मी तो जानते थे किन्तु आज पूरा शहर उसका साक्षी है।  
बात उस समय की है, जब देशराज और हम साथ में रंगकर्म कर रहे थे, तब हम यह अक्सर चर्चा किया करते थे कि रंगकर्मी नाटक के कला पक्ष के लिए तो असीम ऊर्जा लगाकर काम कर लेते हैं लेकिन इसे पेशेवराना रूप देने की तमीज नहीं है। इसलिए रंगकर्मी थियेटर के स्कूल में चाहे न जाए लेकिन उसे एमबीए जरूर करना चाहिए। तब हमें इस बात का इल्म भी नहीं था कि देशराज ने एक नहीं दोनों काम किए। पहले राजस्थान विश्विद्यालय से नाट्यकला में डिप्लोमा, फिर नाट्यकला में एमए तथा उसके बाद अजमेर से एमबीए किया।
इसलिए इस बार देशराज ने नब्ज को दोनों तरफ से पकड़ा, और परिणाम सबके सामने है।
...और कारवां बनता गया

कारवाँ 
सही मददगार तलाशना बेशक एक बुनियादी जीवन कौशल है। देशराज के विचार को सतरंगी स्वरूप देना कारवां फाउंडेशन के बिना असंभव था। यूँ तो कारवां में अलग-अलग फील्ड के विशेषज्ञ लोगों की एक फेहरिश्त है, किन्तु प्रमुख सूत्रधार के रूप में अमित गोयल व जुगल गांधी नज़र आ रहे थे। जुगल गांधी का सुचित्रा फ़ोटो स्टूडियो से एस-टीवी चैनल तक का शानदार सफ़र हम सबके सामने है। जुगल जी, एक वक्त था जब हम उनसे अपना फोटो खिंचवाने जाते थे, तो वे अपने जबरदस्त हुनर से हमारे मन के कोनो में दबे छिपे भावों को चेहरे लाकर साकार कर देते थे। शायद ऐसा कोई व्यक्ति ही नव निर्मित प्रताप ऑडिटोरियम की लबालब भरी हुई बालकनी की कल्पना कर सकता  था।
अमित गोयल का रंगकर्म, साहित्य व संस्कृति के माहौल से गहरा रिश्ता है। साहित्य व संस्कृति से उनकी निकटता उन्हें अपने पिता श्री हरिशंकर गोयल से जेबख़र्ची सरीखा मिलती रही है। अमित गोयल के प्रकाशन व प्रिंटिंग के काम से आज कौन परिचित नहीं है। उनकासनप्रिंट्सजब चर्चरोड पर नया-नया आज से लगभग 15 साल पहले खुला था। तब हमने भी शिवरंजनी थियेटर ग्रुप की शुरुआत की थी। मुझे अच्छी तरह याद है कि अमित गोयल के साथ बैठ कर ही वहाँ हमारे नाटकों के कार्ड, ब्रोशर, पोस्टर व लोगो डिजाइन होते थे। शुरूआती तीन-चार नाटकों की सामग्री उन्होंने ने बिना कोई पैसा लिए छापी थी। रंग महोत्सव में भी सनप्रिन्ट द्वारा प्रकाशित कलात्मक प्रचार सामग्री का अहम् योगदान है।
यह देशराज की बुद्धिमानी है कि उसने पुरानी इन कड़ियों को मिलाकर कारवां के लिए भूमि तैयार कर दी और साथ हीअलवर रंग महोत्सवकी सफलता की बुनियाद भी रख दी। इसके बाद कारवां के अलग अलग क्षमताओ के लोग जुडने लगे जिनमें, डॉ जीडी मेहंदीरत्ता, अनिल कौशिक, अमित छाबड़ा, नीरज जैन, देवेंद्र विजय, अनिल खंडेलवाल,दिनेश शर्मा, अभिषेक तनेजा व अरुण जैन प्रमुख हैं। इनके जुड़ने से कार्यक्रम में प्रशासनिक अधिकारी, राजनेता, समाजसेवी व साहित्य के लोगों के जुड़ने का मार्ग प्रशस्त हो सका।
शुरुआत सेलिब्रिटीज़ से
दिनांक 14 जनवरी 2016 को अलवर रंगमहोत्सव का पहला दिन था। इस दिन राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के दो स्नातकों के नाटक खेले गए। मशहूर फ़िल्म अभिनेत्री सीमा बिस्वास अभिनीत एकल नाटकस्त्रीर पत्र का मंचन हुआ। पहले दिन ही हॉल खचाखच भरा हुआ था। बालकोनी की सीटें भी भरी हुई थीं। सीमा बिस्वास ने अपने जबरदस्त अभिनय से लोगों को पलक तक झपकने नहीं दी। जैसा उनका अभिनय है,  उसी के अनुरूप उन्होंने विषय उठाया, जो कि ज्वलंत मुद्दा है, और स्त्री की जेंडर आधारित भूमिकाओं पर सवाल उठता है। इस नाटक में महिला की दोहरी वंचितता को बखूबी उठाया है। एक तो वह समाज में स्त्री होने की वजह से वंचित है चाहे वह किसी संपन्न घर कीमझली बहु हो या फिर कोई और। एक स्त्री के लिए  यह वंचितता और भी नारकीय तब हो जाती है जब वह सुंदरता व रंगरूप के परंपरागत मापदंडों में फिट नहीं होती है। सीमा बिस्वास एक छोटी लड़की की त्रासद कहानी से पूरे प्रेक्षागृह को झकझोर के रख देतीं हैं।
दूसरा नाटक दौलत वैद्य द्वारा निर्देशितदिवाकर की गाथा शिल्प व कथ्य के स्तर पर नवीनता लिए हुए था। एक मछुआरे की कहानी है, जो प्यार करता है - नदी से, लोगों से भी... परिस्थितियाँ किस प्रकार उसे जल्लाद बनने पर मजबूर कर देती हैं। दो अभिनेताओं की जुगलबंदी ने क्षीण कथा को भी प्रभावी तरीके से रखा। असमियां खुशबू में डूबा हुआ संगीत इस नाटक के प्राण हैं। दौलत वैद्य ने प्रकाश व प्रोजेक्टर तकनीक के ताने-बाने में बुना अभिनव प्रयोग करके मंच पर त्रिआयामी चाक्षुस बिम्ब रच कर नदी की प्रचंडता का जीवंत अनुभव दर्शकों को करवाया। हालाँकि कभी-कभी पूरी स्क्रीन पर कंप्यूटर की कमांड्स भी नज़र आ जाती तो रसास्वादन में कंकड़ स्वरूप भी लगतीं। लेकिन इस तरीके की तकनीक में कलाकारों को कई बार स्थानीय उपकरणों पर भी निर्भर रहना पड़ता है। एक वजह यह भी हो सकती है।
गोष्ठियों जैसी एक और गोष्ठी
रंग महोत्सव के दूसरे दिन, यानी 15 जनवरी को गतिविधियों का सिलसिला सुबह से ही प्रारम्भ हो गया था। इसकी पहली कड़ी में एक संवाद का आयोजन किया गया, जिसका विषय था- अलवर रंगमंच की वर्तमान चुनौतियां। इस गोष्टी में दलीप वैरागी ने विषय प्रवेश किया। मुख्य वक्ता के रूप में डॉ वीरेंद्र विद्रोही ने रंगमंच की समस्याओं के हल के एक विकल्प के रूप में सुझाया कि इसे शिक्षा का अभिन्न हिस्सा बनाकर पाठ्यक्रम में शामिल करना होगा। इतिहासकार हरिशंकर गोयल ने इसे गांवों तक पहुँचाने की जरुरत पर बात की। दूसरी और युवा रंगकर्मियों का आक्रोश भी दिखाई दिया। युवा रंगकर्मी अविनाश ने ऑडिटोरियम की अतार्किक ऊँची दरों पर व संस्थाओं के मध्य मतभेदों पर गुस्से का इज़हार किया। गोष्ठी की अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार जीवन सिंह मानवी ने की। अधिकतर होने वाली गोष्ठियों की तरह यह गोष्ठी भी ज्यादा लोगों को नहीं जुटा पाई। दूसरा जल्दी समाप्त करने के आग्रह के कारण  सभी रंगकर्मी खुल कर बात नहीं रख पाए।
नए दर्शकों की तलाश में
गोष्ठी के तुरंत पश्चात् जबलपुर के नाट्यदल ने नाटक एक और दुर्घटना का मंचन किया। इस नाटक को देखने के लिए नए दर्शकों की तलाश की गयी, जो इस आयोजन को एक नया आयाम देती है। दर्शक स्वरुप स्थानीय बीएड कॉलेज की छात्राओं व एक सैनिक टुकड़ी को नाटक देखने के लिए आमंत्रित किया गया था। निःसंदेह शिक्षक प्रशिक्षुओं के लिए इस नाटक से बेहतर एक्सपोजर नहीं हो सकता था। आद्यंत कसावट में बुने हुए इस नाटक को युवा अभिनेताओं ने पूरी ऊर्जा के साथ अभिनीत किया। एक सनकी द्वारा जांच अधिकारी बनकर पुलिस द्वारा आम आदमी को अपराधी साबित करने की थ्योरियों पर से प्याज के छिलकों की मानिंद परतें उघाड़ने का अभिनय दुर्गेश सोनी ने बखूबी किया। युवा निर्देशक प्रिया साहू  की टीम (रोहित सिंह, अंशुल ठाकुर, सुहाली वारिस, सरस, अक्षय ठाकुर व पारुल जैन) में कोई कड़ी ऐसी नहीं थी जो दर्शकों के मानसपटल पर छाप न छोड़ गई हो। बहुत ही सार्थक, संतुलित व सौद्देश्य मरोरञ्जन इस नाटक ने प्रदान किया।
अंकुश शर्मा के निर्देशन में नाटकटैक्स फ़्रीके सभी पात्र अंधे है और एक अंधों के क्लब में रहते हैं। ये सभी अपनी विकलांगता को अभिशाप या दिव्य वरदान (दिव्यांग) मानने से आगे जाकर इंसानी संवेदना के रेशों को स्पंदित करते हैं। वे जिंदगी को उसी प्रकार रसमय बनाते हैं जैसे कोई भी व्यक्ति कर सकता है। वे एक दूसरे की जिंदगी की परिस्थितियों को (जो विकलांगता जनित स्थितियां नहीं) इस प्रकार रखते हैं उसमे स्वयं जोड़कर खुद भी आह्लादित होते हैं और दर्शकों पर भी रस की फुहार  छोड़ते हैं। चार दृष्टिबाधित व्यक्ति अनायास ही दार्शनिक महत्व के प्रश्नों को छोटे-छोटे कहकहों में सुलझाते नज़र आते हैं। वे खूबसूरती की पहेली को सहसा ही सुलझा देते हैं कि सुंदरता अंततः देखने वाले के मन में ही स्थित होती है। वे सभी पड़ौस में नहाने वाली युवती को, पड़ौस से आने वाले नल की आवाज से सुनते हैं और कल्पनाएँ करते हैं। यहाँ सब कुछ कल्पनाओं में है। यहाँ तक कि युवती भी और नहाना भी...  बहुत बारीक़ भावों की अभिव्यक्ति को अपनी देह पर धारण करना  और फिर उसे फैलाकर प्रेक्षागृह के दर्शकों पर जाल की तरह डाल कर पकडे रखना बहुत कुशल अभिनेता की कसौटी है। इसे अंकुश शर्मा व उसकी टीम ने बखूबी निभाया।
अंकुश से अलवर के दर्शकों का परिचय अब नया नहीं पिछले साल नवम्बर में उनके दो हास्य व्यंग्य नाटक निठल्ला बिच्छु का मंचन हो चुका है। अंकुश के सामने चुनौती यह भी थी कि वह हास्य में क्या विविधता दे पाएंगे। इस कसौटी पर वे सफल रहे हैं। उनकी टीम में क्रिश सारेश्वर, मोहम्मद हसन, मदन मोहन व धीरेंद्रपाल सिंह ने अपनी भूमिकाओं को शानदार तरीके से निभाया।
16 जनवरी 2016 की दोपहर को अलवर के रंगकर्मी प्रदीप प्रसन्न लिखित व निर्देशित नाटकचार कंधेखेला गया। प्रदीप अलवर के निवासी हैं अभी गुजरात में रहकर शोध कर रहे हैं। वहां पर उन्होंने विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों से मिलकर टीम बनाई है। वे दो महीने पहले  भी स्वलिखित नाटक लेकर इसी टीम के साथ अलवर आए थे। इतनी कम अवधि में ही एक और स्वलिखित व निर्देशित नाटक से गुदगुदाने के लिए प्रदीप का साधुवाद। ज्ञातव्य है कि प्रदीप के दो नाटक जवाहर कला केंद्र की नाट्यलेखन प्रतियोगिता में पुरुस्कृत हो चुके हैं। शोध में व्यस्तता के बावजूद प्रदीप की मंच पर यह सक्रियता अचंभित व प्रेरित करती है।
हास्य का विधा से ध्येय में तब्दील हो जाना  
इसी दिन शाम का नाटक था तपन भट्ट लिखित व निर्देशित नाटकहरिलाल एन्ड संस । अंतिम दिन भी दो प्रस्तुतियाँ थीं - फ्लर्ट और रॉन्ग नंबररोंग नंबर भी तपन भट्ट द्वारा लिखित व निर्देशित नाटक है। फ्लर्ट नरेंद्र कोहली द्वारा लिखित व गगन मिश्रा द्वारा निर्देशित है। तीनों नाटकों में समानता यह है कि अभीनेता कमोबेश वही हैं, यथा- विशाल भट्ट, तपन भट्ट, अभिषेक झाँकल, हिमांशु झाँकल, कपिल शर्मा व सौरभ भट्ट इत्यादि। ये सभी जयपुर रंगमंच के जबरदस्त प्रशिक्षित अभिनेता हैं। तीनों नाटकों में इन अभिनेताओं ने अपने अभिनय, गति व तारतम्य से भरे ऑडिटोरियम को बांधे रखा। विशाल भट्ट व अभिषेक झाँकल बहुत प्रतिभाशाली अभिनेता हैं लेकिन तीनों नाटकों में उन्हें एक ही शेड के रोल देना अचंभित करता है। इन दोनों अभिनेताओं के अभिनय के वैविध्य से अलवर के दर्शकों को परिचित करवाया जा सकता था। फ्लर्ट नाटक में गगन मिश्रा शिल्प के स्तर  पर वैविध्यपूर्ण पर प्रयोग करके जो रंगभाषा रचते हैं तो उनके ये प्रयोग काव्यात्मक नजर आते हैं।
तपन भट्ट के नाटकों में अभिनय व निर्देशन का काम बेहद उम्दा है, किन्तु उनके नाटककार से कुछ मुद्दों पर सवाल किए जा सकतेहैं। तपन भट्ट के दोनों नाटकों के संवादों में ऐसे बहुत से संवाद थे जो जेंडर, जेनरेशन, एवं संस्कृतियों के पूर्वाग्रहों से भरे हुए थे। रंगमहोत्सव की शुरुआत सीमा बिस्वास के स्त्रीर पत्र नाटक से होती है जो स्त्री को उसकी परमपरगत भूमिका से निकाल एक व्यक्ति के रूप में प्रतिष्ठित करने का आह्वान करती हैं, और दर्शकों को एक विचार के बादलों पर सवार करती हैं, वहीं नाटक 'हरीलाल एंड संस ' में  नौकरानी के लिए एक पात्र का यह संवाद,"मालिक, यह प्लॉट मेरे नाम कर दो" सरीखे संवाद, उस विचार प्रक्रिया को महोत्सव के आखिर तक आते-आते तार-तार कर देते हैं। उनके नाटक में इस तरह के संवादों की भरमार थी जो पाश्चात्य संगीत, सभ्यता व नई पीढ़ी को लेकर एकांगी दृष्टिकोण प्रस्तुत करतेहैं। इस तरह का हास्य प्रेक्षागृह के दर्शकों को विभाजित कर जाता है -  एक दर्शक वह जो इनके मार्फत परंपरा से अपने दृष्टिकोण और पुष्ट होते हुए पाता है, वह कहकहे लगता है। दूसरा दर्शक वह, जो  इस विडम्बना पर नहीं हंस सकता। यह विद्रूपता तब जन्म लेती है जब हास्य एक विधा से ध्येय में तब्दील हो जाता है। फिर कहानी का मुख्य कथ्य पीछे छूट जाता है, और कुछ भी कह के हँसाने की विवशता को  कलाकार ढोता है। हास्य एक रस है।  रसानुभूति एक दशा है ध्येय नहीं, सम्प्रेषण तो उन मूल्यों का होता जो लेखक का अभिप्रेत है। रस उसके सम्प्रेषण की गारंटी प्रदान करता है। लेकिन जब हास्य ही ध्येय हो जाता है तो वह विद्रूपता को जन्म दे सकता है। यह एक बहुत ही महीन धागा है जिसे पकड़ने की जरूरत है। आजकल टीवी पर छाए इस तरह के हास्य से ऊबकर जो दर्शक नाट्यशाला में आया होगा जरूर उसे निराशा हाथ लगी होगी। इसमे कोई दो राय नहीं की भट्ट जी के दोनों नाटको में दर्शकों की व ठहाकों की संख्या अनगिनत थी। तपन भट्ट अनुभवी व बहुमुखी प्रतिभा के कलाकार हैं। उन्हे अपने कथ्य में इस दृष्टि से भी नवाचार करने चाहिए। वे कर सकते हैं।
आखिर में कुछ सीखें व बातें जिन्हें कहा जाना चाहिए इस प्रकार हैं
  • पिछले दो महीने पहले जब पहला नाटक प्रताप ऑडिटोरियम में हुआ था तो आस-पास के लोग इस कंगूरेनुमा बिल्डिंग को बहुत विस्मय से देखते थे कि यह सरकार ने क्या बना कर रख दिया। इस बार जब यह इमारत चार दिन तक रोशनी में नहाई तो एक माहौल बना है। आस-पास  दुकान वालों को भी उम्मीद बंधी है कि इस इमारत की गतिविधियों की सातत्य उनकी दिहाड़ी में भी इजाफा करेगी।
  • दिन में एक कार्यक्रम संगीत व नृत्य का रखने के प्रयोग ने आयोजन को अलग आयाम दिया। स्वरांजलि संगीत क्लब अलवर में परिचित नाम है। संगीत के बेहतरीन जानकार इस क्लब से जुड़े हुए हैं। स्वरांजलि के साथ बहुत बड़ा दर्शक वर्ग भी जुड़ा हुआ है, जो इस जुगालबंदी से नाटक की ओर डायवर्ट हुआ है।
  • पिछले कार्यक्रम में जो कमी थी कि मीडिया ने, या मीडिया से परहेज किया गया था। इस बार मीडिया कवरेज अच्छा होने से दर्शक जोड़ने से फायदा मिला। व्हाट्स एप्प व फेसबुक पर जम कर प्रचार किया गया। स्थानी टीवी चैनल की शिरकत से इसमें इजाफा हुआ। नि:संदेह कारवां ने इस प्रचार-प्रसार में खूब भूमिका निभाई।
  • रंग संस्कार थियेटरकारवां ने इस कार्यक्रम को जिस भव्यता से किया है, यह अब इसकी आवृत्तियों की अपेक्षा भी करता है। किसी भी समूह की सार्थकता सही मायने में उसकी अगली गतिविधि में ही होती है। कारवां ने खुद ही बेंचमार्क इतना ऊंचा स्थापित कर दिया है। अब उनकी खुद से ही स्पर्धा है।
  • इस आयोजन में देशराज का दो बिन्दुओं से विचलन अलवर के रंगकर्मियों को साफ नज़र आया। पहला - बिना टिकट से नाटक दिखाना। दूसरा - नाटकों का समय पर शुरू न कर पाना। हालांकि मुफ्त में देखने से नया दर्शक भरी मात्रा में जुड़ा है, लेकिन यहाँ ज़िक्र इसलिए है कि देशराज का इस मूल्य पर ज़बरदस्त आग्रह रहा है। वीआईपी मेहमानों को बुलाना नाटक में देरी की प्रसिद्ध वजह है, जिसे न चाहते हुए भी आवश्यक बुराई के तौर पर स्वीकार किया जाता है।
इस लेख का आकार जरूरत से ज्यादा लंबा हो गया है। अंत में रंग संस्कार थियेटर ग्रुप व कारवां फाउंडेशन व अलवर के नागरिकों को एक सफल आयोजन के लिए बधाई।

दलीप वैरागी  








Friday, January 1, 2016

नए साल में तुकबंदी

गए का गीत छोड़ कर नए की तलाश कर।
सुर्ख पलाश महकेंगे वसंत की तलाश कर ।
माज़ी तेरा श्वेत है तो श्याम भी होगा कहीं,
व्यतीत के व्यामोह में न मुस्तकबिल की तलाश कर। 
चूल्हा जले हर सिम्त उठे रोटी की महक,
बुझी हुई राख में चिंगारियां तलाश कर।
कारवां में रहजनी हुक्काम ही कर जाते हैं,
प्रजातंत्र में सोच कर रहबर की तलाश कर।
चंचल, लोभी, आशिक औ बावला 'बैरागी' मन
इस नए साल में किसी रहगुज़र की तलाश कर।
नए साल की शुभकामनाओं के साथ
दलीप वैरागी

Saturday, October 31, 2015

अभिव्यक्ति अपना व्याकरण खुद रच लेती है।

राजस्थान के पाली ज़िले के फालना में किशोरियों के आवासीय शिक्षण शिविर में अकादमिक सम्बलन हेतु आया था। चार महीने के इस शिविर में गरासिया जनजाति की पचास किशोरियाँ आवासीय रूप शिक्षा प्राप्त कर रही हैं। अभी इस शिविर को शुरू हुए लगभग सप्ताह का समय हुआ था। जब मैंने शिक्षिकाओं से पूछा कि किस तरह के सपोर्ट की जरुरत है। सबने एक ही बात कही कि इन लड़कियों के साथ अभिव्यक्ति पर काम करने की जरुरत है।
मैंने लड़कियों से बातचीत शुरू की। लड़कियां मुखर नहीं थीं। वे बातचीत में नहीं जुड़ रही थीं। मैंने कुछ ऐसी गतिविधियाँ शुरू की जिससे लड़कियाँ बोलचाल में शामिल हों, सहज हों। पर इस सहजता के माने क्या हैं कई बार हमें खुद नहीं पता होते और अभिव्यक्ति के भी... लड़कियां हिंदी समझती हैं लेकिन ज्यादातर बातचीत मारवाड़ी में ही करती हैं। हिंदी वे बोलती नहीं तो फिर क्या किया जाए? सोचा जहाँ से वे मुखर हैं वहीँ से ही उन्हें सुना जाए। अभिव्यक्ति का भी एक जबरदस्त राजनैतिक रिश्ता होता है शिक्षक और विद्यार्थी के दरम्यान - जब उन्हें उनकी मातृ भाषा से अलग शिक्षक की भाषा या अन्य भाषा में सिखाया जाता है तो अनायास ही शिक्षक सत्ता के और भी ऊँचे शिखर पर जा बैठता है तथा विद्यार्थी हीनताबोध की गहरी खाई में। फलस्वरूप शिक्षक इस मुगालते को जुमले की तरह उछलता है कि विद्यार्थी अभिव्यक्ति में कमज़ोर है। यह मुगालता चेतन व अवचेतन दोनों में पलता है।
नाट्यकला ऐसी स्थिति में बहुत मदद करती है। नाट्याभिव्यक्ति का बहुत बड़ा हिस्सा शारीरिक भाषा का होता है। शारीरिक अभिव्यक्ति की भाषा कमोबेश सार्वभौमिक-सी होती है। उन लड़कियों से संवाद बनने की शुरुआत हो और वे बराबरी की हैसियत में आकर, होंसले से प्रक्रिया में शामिल हों, इन लड़कियों के साथ “शूज शफल” गतिविधि करवाई। शूज शफल एक बहुप्रचलित थियेटर एक्सर्साइज़ है। इसमें कोई वस्तु मंच पर रखी जाती है जिसे अभिनेता को अपनी कला से उसे अन्य वस्तु मान कर अभिनय करना होता है।
मैंने ऑब्जेक्ट के रूप में ढपली को रखा और लड़कियों से आकर अभिनय करने के लिए कहा। सन्नाटा। एक बार को मैंने मान ही लिया था कि यह गतिविधि भी अब तक आजमाई गई गतिविधियों में एक बन कर रह गई। फिर मैंने सोचा शायद यह मेरी हिंदी की सम्प्रेषणीयता का ही नतीजा तो नहीं। तो क्या मारवाड़ी में बोला जाए? या अनुवादक की भूमिका तय की जाए। अचानक मैंने शारीरिक अभिव्यक्ति के विकल्प को बेहतर माना और गतिविधि को एक बार डेमोन्सट्रेट कर दिया। इससे जैसे ठहरे पानी में लहरें उठीं और लड़कियां बारी-बारी से उठ कर आने लगीं। फेरी वाले की टोकरी, आरती का थाल, भिखारी का कटोरा, आटे की परात, चकला, बैठने की चौकी, आइना,आटा छलनी और जाने कौन-कौनसे रूपों में ढपली ढलने लगी।
एक तरफ ढपली है, दूसरे छोर पर लड़कियाँ और उनका शारीर इन दोनों को जोड़ते हुए एक विचार प्रवाहित हो रहा है दरम्यान। और यह विचार कल्पना को जन्म दे रहा है। और वह कल्पना अवचेतन की अँधेरी गलियों में से एक चरित्र को खोज लाई और उस चरित्र का जामा ओढ़कर लड़की खड़ी होती है और एक झीना पर्दा डाल देती है दर्शक की चेतना पर। उसी विचार की सरिता में  दर्शक भी डुबकी लगता है। अभिनेता की कल्पना दर्शक की छवि से एकाकार हो जाती है। जिससे चीजें जड़ होते हुए भी अलग-अलग रूपाकारों में नमूदार होने लगती हैं। शायद इसी कवायद को हम अभिनय कह देते हैं। छोटे बच्चे इस फन के उतने ही बड़े उस्ताद होते हैं। वे अपने नाटकीय खेलों में घंटो तक लकड़ी के चौकोर टुकड़े से हाथी के संवाद बुलवा  देते हैं और कोट के पुराने बटन की कश्ती बना सागर की लहरों पर छोड़ दें। मज़ाल है कोई चीज़ उनकी हुक्मउदूली कर दे। यहाँ दर्शक और अभिनेता वही होता है।
खैर, शूज शफल की गतिविधि चल निकली। अब वे लड़कियां भी सामने आने लगीं जो अब तक अपेक्षकृत कम सक्रीय थीं। कई तो दो तीन बार भी आ गईं। गतिविधि लंबी खिंच गई। मैं इसे समाप्त करना चाहता था या कोई नया मोड़ देना चाहता था। ऊब कही से भी प्रवेश कर जाती है।
इससे पहले मैं कोई तरीका सोचूं लड़कियों ने स्वयं ही एक बदलाव कर दिया। अचानक दो लड़कियाँ एक साथ उठकर आईं और रखे हुए ऑब्जेक्ट के साथ एक्ट करने लगीं। इसके साथ एक नया आयाम जुड़ गया जो विचार की नितांत आंतरिक निःशब्द यात्रा थी अब वह दो में साझा प्रक्रिया बन गया। फलस्वरूप इस साझा तैयारी ने शब्दों का ताना बाना भी बुनना शुरू कर दिया। विचार शब्दों के समुच्चय में उतरने लगा। इधर मैंने भी एक नया आयाम जोड़ दिया और ढपली के आलावा एक झाड़ू को भी रख दिया। अब झाड़ू भी उनकी साझा अभिनय यात्रा में शामिल हो गई। मैंने एक और वस्तु को शामिल कर दिया। पास रखी ढोलक को मंच पर सरका दिया। वस्तुएं बढ़ी तो चुनौती भी। पहले विचार में दो ही सहयात्री थे अब अन्य सिर भी आपस में जुड़ने लगे। धीरे-धीरे चीजें इस्तेमाल होने लगीं, अपने से जुदा रूपों में। धीरे-धीरे एक्ट में भाग लेने वाली लड़कियों की संख्या बढ़ने लगी। अपने आप जरुरत के अनुसार अन्य वस्तुएं भी जुड़ने लगीं और लोग भी। अब चौकोर (प्रोसिनीयम) रंगमंच गोल दायरे (एरिना) में बदलने लगा। गोल रूपाकार शायद लोगों के जुड़ने के लिए ही होता है। परिधि में कोई भी जुड़ जाए तो केंद्र नहीं बदलता। और चौखटे में केंद्र की कोई स्थिति कहाँ? किसी एक बाजु का घट बढ़त दूसरी तरफ का गणित गड़बड़ कर जाता है। शायद इसी लिए आदिवासी नृत्यों का फॉर्म वृत्ताकार परिधि में ही होता है। जबकि शास्त्रीय नृत्यों की कसावट एक चौखटे में कसी होती है। यहाँ आपके लिए दर्शक दीर्घा से मंच तक का फासला मीलों लंबा हो सकता है। लोक कलाओं में महज वृत्त की लकीर भर लाँघनी है।
गतिविधि में शामिल लड़कियों की संख्या इतनी बढ़ गई कि दर्शक और अभिनेता के बीच की रेखा धूमिल हो गई। अब गोल दायरे के बीच में विचार और बड़ा आकार ले चुका था एक क्षीण कथासूत्र के रूप में। प्रॉप्स भी यूज हो रहे थे अलहदा रूप में और अपने वास्तविक रूप में भी। खेल के नियम पीछे छूट गए। प्रारूप की जकड़न छूट गई। खेल अब खेला बन गया। सहज अभिव्यक्ति अपनी प्रकृति में ही विद्रोही होती है शायद। वह बाँध में नहीं बाँधी जा सकती।  वह अपने व्याकरण खुद रच लेती है। हॉल में अब अभिनय था, ऊर्जा थी और थी सरापा अभिव्यक्ति और सब उसमें सराबोर। मैं(निर्देशक) वहां होते हुए भी ओझल हो चुका था शायद अप्रासंगिक भी। कुछ था तो पूरे कमरे में तैर रहा था एक नाटक। अपने आप मिटटी में ऊगा हुआ सा। पूरे कमरे में अभिनय और ऊर्जा का सागर हिलोरें ले रहा था।उसने निर्देशक को नेपथ्य पर ला पटका।

Thursday, October 22, 2015

नाट्यकला पर एक प्रश्नावली

यूं तो हिन्दी रंग मंच की स्थिति किसी से छुपी हुई नहीं है, फिर भी इसकी वास्तविक स्थिति को जानना उन लोगों के लिए जरूरी होता है जो हिन्दी रंगकर्म को आगे ले जाने के लिए व्यवस्थित प्रयास करना चाहते हैं। यहा सवाल दर सवाल एक प्रश्नावली तैयार की है जिससे यह जानने का प्रयास किया गया है कि रंगकर्मियों, दर्शकों व अन्य जो नाट्यकला से अभी नहीं जुड़े हैं उनके मानस में नाटक को लेकर क्या छवि है। इस अध्ययन में यही जानने का प्रयास किया गया है। यह तभी हो सकता है जब ज्यादा से ज्यादा लोग इस फॉर्म को भरें। और इसे शेयर करें ताकि अधिक लोग इस अध्ययन का हिस्सा बन सकें।
इस प्रश्नावली को ऑनलाइन भरा जाना है। 
इसका लिंक नीचे दिया जा रहा है। 
क्लिक करके खोलें - 

Monday, October 12, 2015

स्वरांजलि संगीत क्लब की एक सुरमयी शाम

यूँ तो हर तरह का संगीत जबरदस्त अनुशासन का उदहारण है। जब कोई गान किसी पहले से तैयार म्यूजिकल म्यूजिकल ट्रैक पर करना हो तो वह और भी ज्यादा अनुशासन की मांग करता है। साजिंदों की संगत में लाइव वाद्य यंत्रों के साथ गाना गायक को शायद थोड़ी छूट देता है। वह छूट होती है फ्रेम से थोडा बाहर जाकर कोई नवाचार करने की यहाँ गायक और संगत दोनों जीवंत माध्यम हैं, दोनों एक दूसरे का सहयोग करके आगे बढ़ते हैं। दोनों के लिए ही उत्कृष्टता का आग्रह मोटिवेशन का उत्स है। यहाँ उत्कृष्टता के मापदंड परिभाषित नहीं, दोनों ही, गायक और संगत प्रत्यक्ष प्रस्तुति के वक़्त खुद उत्कृष्टता के मापदंड रचते हैं। म्यूज़िक ट्रैक पर गायन में फ्रेम से बहार जाने की छूट नहीं है। यहाँ आपको यन्त्र के साथ दौड़ना है। और किसी ने  पहले से उत्कृष्टता के मापदंड तय कर रखे हैं, उनके साथ न्याय करना ज़रूरी होता है, इससे कम पर काम नहीं चलेगा। बहरहाल कोई भी तरीका हो दोनों का आउटकम संगीत का लुत्फ़ ही होता है, श्रोता के लिए और गायक के लिए भी।
पिछले लगभग डेढ़ साल से म्यूजिकल ट्रैक पर इस तरह की गायकी से अलवर के संगीत प्रेमी रूबरू हो रहे हैं "स्वरांजलि संगीत क्लब की मार्फ़त।
गत 10 अक्टूबर 2015 को स्वरांजलि संगीत क्लब ने "गाता रहे मेरा दिल..." एक संगीतमय शाम आयोजित की। इस संगीत संध्या के बहाने से अलवर के गायक कलाकारों ने किशोर कुमार की यादों को ताज़ा किया। इसी कार्यक्रम में जानेमाने संगीतकार रवीन्द्र जैन के निधन पर सबने मौन धारण करके श्रद्धांजलि दी। इस संगीत संध्या में अलवर के कलाकारों ने किशोर कुमार के गानों को अपनी आवाज में गाकर शाम को सुरमयी बना दिया। कार्यक्रम को फरमाइशी स्वरुप भी दिया गया था। श्रोताओं के अनुरोध पर कलाकारों ने गीत सुनाकर अपनी गायकी की परिपक्वता का परिचय दिया। नए पुराने सभी कलाकारों ने एकल, युगल, सामूहिक व मेंडली विधाओं में अपनी प्रस्तुतियाँ दी। इसी के समान्तर सञ्चालन भी बहुत सधा हुआ था। सरला जैन व महिपाल सिंह जी की उद्घोषक जुगलबंदी लगातार कार्यक्रम को रोचक बनाते हुए चल रही थी। दर्शकों के साथ सीधे संवाद बनाना व संगीत के गुरुओं चीनू जी व विनीत जी से किशोर कुमार जी के जीवन के विभिन्न रोचक प्रसंगों को सुनना जहाँ नयी पीढ़ी के लिए ज्ञानवर्द्धक रहा वहीं इन उस्तादों के लिए सम्मान स्वरुप भी था। विनीत जी व चीनू जी ने पिछले 10-15 वर्षों में एक पीढ़ी को तराशा है जिसके नतीजे दिखाई देते हैं।

स्वरांजलि संगीत क्लब अब तक सात ऐसी संध्याएं आयोजित कर चुका है। यह अब संगीतप्रेमियों का इतना बड़ा कुनबा बन गया है कि आदिनाथ कॉलेज का सभागार खचाखच भरने के लिए काफी है। इस संगीत क्लब ने अलवर के गायकों को एक माला में तो पिरोया ही है वहीं एक रसिक दर्शकों का एक समुदाय भी खड़ा किया है। यह क्लब आज एक बड़ी टीम है लेकिन निःसंदेह इसके प्रणेता गायत्री म्यूजिक के सचिन जी हैं। पिछले डेढ़ दशक से सचिन इस तरह के कार्यक्रम की पृष्ठभूमि रच रहे थे। उन्होंने एक-एक करके बरसों से म्यूजिक ट्रेक्स का संग्रह किया है। इसके साथ ही वे हमेशा लोगों को इन ट्रेक्स के साथ गाने की तालीम भी देते रहे हैं। जब भी कभी अलवर में इस शैली के गायन का मूल्याङ्कन होगा तो सचिन जी इसके प्रारम्भ में अकेले खड़े दिखाई देंगे। आज उन्होंने अपने सतत प्रयासों व इस तरह के कार्यक्रमों की बारंबारता से गायकों के समूह को एक मंच प्रदान किया है।
इस कार्यक्रम से जुडी कुछ उल्लेखनीय बाते है -
  • यहाँ कोई वीआईपी कल्चर नहीं हैं। खास और आम मेहमानों वाला फर्क नज़र नहीं आता।
  • कर्यक्रम में बच्चों से दीप प्रज्ज्वलन करवाना एक एक नयी पहल है।
  • एक ही जगह पर कार्यक्रम की बारंबारता से इवेंट व स्थान दोनों को पहचान मिलती है। निःसंदेह स्वरांजलि ने ही रंगकर्मियों के सामने यहाँ गतिविधियाँ करने का एक विकल्प दर्शाया। आज रंगकर्मी आदिनाथ सभागार को एक विकल्प के तौर पर देख रहे हैं।
पिछले दिनों स्वरांजलि की तरफ से यह आवाज आ रही थी कि वे अपने साथ नाट्य गतिविधियों को भी जोड़ने जा रहे हैं। अभी उसकी कोई रूपरेखा उभर कर सामने नहीं आई है। यदि ऐसा संभव होता है तो दोनों को फायदा होगा। संगीत और नाट्यकर्म में
बहुत कुछ है जो साझा हो सकता है।
स्वरांजलि परिवार को सफल प्रस्तुति के लिए बधाई।
दलीप वैरागी 
9928986983 
(कृपया अपनी टिप्पणी अवश्य दें। यदि यह लेख आपको पसंद आया हो तो शेयर ज़रूर करें।  इससे इन्टरनेट पर हिन्दी को बढ़ावा मिलेगा तथा  मेरी नाट्यकला व  लेखन को प्रोत्साहन मिलेगा। ) 
Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...