Friday, June 3, 2011

रटना और समझना

मौजूदा शैक्षिक विमर्श में एक यह शब्द ‘रटना' बहुतायात में प्रयोग किया जाता है | अधिकतर इस शब्द का नाम pejorative term के रूप में ही किया जाता है | जो लोग  इसको इस रूप में देखते हैं उनका मानना है कि rot learning समझ कर सीखने में बाधक है | निसंदेह यह सही बात है | जब किसी भी शिक्षण प्रक्रिया में अवधारणाओं को ठीक से नहीं समझाया जाता है तो बच्चे चीजों को बिना समझे ही रटना शुरू कर देते हैं | वस्तु को इस तरह से कंठस्थ याद कर लेते हैं कि काफी समय तक तो टीचर को पता ही नहीं चलता कि दरअसल बच्चा जो जवाब दे रहा है वे समझे हुए नहीं बल्कि रटे हुए हैं | मेरा अकसर स्कूलों में जाना होता है वहाँ पर प्राइमरी लेवल पर हर कक्षा में ऐसे बच्चे होते हैं जिनको अभी शब्द, वर्ण और मात्राओं की बिलकुल जानकारी नहीं है लेकिन उन्होंने अपनी पाठ्यपुस्तक के पन्नों जो जबानी याद कर रखा है | जब शिक्षक उनसे पढ़ने के लिए कहता है तो वे निरर्थक ही टेक्स्ट पर ऊँगली घुमाता रहता है और याद किये हुए को ऐसे बोलते हैं जैसे  वाचन कर रहे हों | बच्चे इस तरह का एक डिफैंस मकेनिज्म डवलप कर लेते हैं जो कि एक जबर्दस्त कौशल है लेकिन उसके आयाम अलग हैं उसपे फिर कभी चर्चा होगी | इसमें बच्चे और टीचर दोनों की विवशता यह है कि इसके बिना काम चल नहीं रहा है | टीचर के पास text book के आलावा और कोई टेक्स्ट मौजूद नहीं है जिनको विविध रूप से बच्चों के सामने रख कर वह इस रट्टा लगाने को तोड़ सके | आकलन के लिए भी टीचर के पास वही पुरानी परीक्षा पद्धति है, अब बच्चा समझ कर पास हो या रट कर | बच्चे इस लिए खुश हैं कि रटने का  काम चाहे मानसिक यातनादायी ही सही लेकिन टीचर की शारीरिक प्रताडना से तो बच जाएँगे और किसी तरह पास भी हो जाएँगे | यह केवल प्राथमिक स्तर तक ही नहीं चलता है बल्कि रटने कि गुंजाईश माध्यमिक व कालेज स्तर तक है | अपनी जरूरत और सामर्थ्य के हिसाब से बच्चे अपने इस कौशल को आयाम दे लेते हैं | मुझे अच्छी तरह याद है कि माध्यमिक स्तर पर मैंने लेन्ज, फैराडे, न्यूटन और  आइंस्टीन के नियम की परिभाषाएँ कंठस्थ याद थीं लेकिन इनका अवधारणात्मक पहलु क्या था यह बिलकुल पता नहीं था और ज्यादातर का आज तक भी नहीं है | आइंस्टीन का सापेक्षता का सिद्धान्त तो तब समझ में आया जब वर्तमान  शैक्षिक और साहित्यिक डिस्कोर्स से जुड़ा | जब यह समझ आया तब क्या नशा चढा,  अंदर से क्या आनंद की अनुभूति हुई वह अनिर्वचनीय है | लेकिन जब इन परिभाषाओं को याद करने के लिए हम सिर फोड़ रहे थे तब आनंद कहाँ था ? थी केवल कोरी कवायद अक्षरों, वाक्यों, पैरों और डॉयग्रामो की फोटो खींच-खींच कर चित के चौखटे में फिट बैठाने की | टीचर का भी स्पष्ट आग्रह इसी पर रहता था कि हम उन्हें रट लें क्योंकि नम्बर उसी से ही मिलेंगे |
इस विमर्श में एक वर्ग ऐसा है जो सीखने में समझ को तो दरकिनार नहीं करता लेकिन उनका मानना है कि रटना कोई बुरी बात नहीं है | ऐसे लोग नाटक, शास्त्रीय संगीत और शास्त्रीय नृत्य का उदाहरण देकर कहते है कि इन क्षेत्रों में बिना रटे काम काम चल ही नहीं सकता है | जो रटने के पक्ष में नाटक की दलील देते हैं वे केवल नाटक के लंबे आलेख को देखते हैं और उसके फिनिश्ड प्रोडक्ट को देखकर कहते हैं | उनको मंच पर आकर लंबे-लंबे संवाद बोलता अभिनेता दिखाई देता है | दर्शक को लगता है कि ये सब लाइनें अभिनेता ने रट ली हैं | क्या अभिनेता मंच पर केवल लाइनें बोल रहा होता है | दरअस्ल वह संवादों के साथ देह  भाषा का भी प्रयोग कर रहा होता है | क्या यह देहभाष महज लाइनें रटने से आ जाती है ? यह समझने के लिए आप किसी थियेटर ग्रुप की रिहर्सल में चार-छह दिन जाकर बैठें और देखें कि एक अभिनेता अपनी भूमिका पर कैसे काम करता है ? दरअसल नाटक के नेपथ्य में निर्देशक व लेखक के साथ बैठ कर नाटक के अर्थ पर लंबी चर्चाएं और बैठकें होती हैं | जिसमे अभिनेता समूह में अपनी भूमिका की चारित्रिक विशेषताएँ, संवादों के टेक्स्ट को समझना और टेक्स्ट का सब् टेक्स्ट को भी पकड़ कर देखना और उसके बाद भूमिका में उतरना  ये सारी अर्थ को समझने की महीने भर के अभ्यास होते हैं | इन अभ्यासों में ही अभिनेता अपनी लाइनों को सहज ही हृदयस्थ कर लेता है | आजकल जो निर्देशक गंभीर किस्म का रंगमंच कर रहे हैं वे आलेख को मात्र कथा के मार्गदर्शक तौर पर देखते हैं | अर्थों को समझने के पश्चात अभनेता पर छोड़ते हैं कि वह चरित्र के अनुकूल अपने संवादों को इम्प्रोवाइज करे | थियेटर तो दुनिया को समझने का बेहतरीन टूल है यहाँ महज रटने से काम नहीं चलेगा | ऐसा नहीं कि रटंत वीर यहाँ नहीं हैं ऐसे यहाँ भी बहुत हैं जो दूसरे या तीसरे अभ्यास तक अपनी लाइनें याद कर लेते हैं और ये यह भी बड़ी कुशलता से याद कर लेते हैं कि साथी कलाकार के किस शब्द के बाद उसे अपनी लाइन बोलनी है | अब सोचो अगर साथी कलाकार अपनी लाइन सही जगह पर अपना संवाद  नहीं करे तो ऐसे रटंत वीर का क्या हो ? जहाँ इस तरह के कलाकार होते हैं उस ग्रुप में नाटक में एक भूमिका का ओर सृजन करना पड़ता है जो है प्रोम्प्टर की भूमिका ताकि प्रोम्प्टर विंग में खड़ा होकर अभिनेता को प्रोम्प्ट करता रहे कि आगे उसे अब कौनसी लें बोलनी है | इस प्रकार के अभिनेता अभिनय नहीं कर रहे होते बल्कि लाइनें ही पढ़ रहे होते हैं |
एक दलील यह दी जाती है कि अगर बच्चों को पहाड़े नहीं याद कराएं तो आगे चल कर बच्चे गणित की संक्रियाएं कैसे करेंगे ? बच्चे को पहाडा रटाया जा सकता है लेकिन उससे पहले गुना की अवधारणा की समझ बच्चे को होनी चाहिए | उसे यह पता तो होना चाहिए कि पहाडा बनता कैसे है ? उसके बाद पहाड़े याद करें | लेकिन यहाँ तो दाखिले के पहले दिन से ही गिनती और पहाड़े शुरुआत टीचर कर देता है | इसके विपक्ष में लोग दलील देते हैं कि जब बच्चे को जब गणित की संक्रियाएँ करने के लिए कहा जायेगा तो क्या बच्चा कॉपी पेन लेकर पहाड़ा बनाने बैठेगा ! दरअसल ऐसा होता नहीं है | इंसान का मस्तिष्क कुछ अलहदा कार्य करता है जब बच्चा  पहाड़ा बनाने की छोटी-छोटी संक्रियाएँ करता है तो संख्याओं में रिलेशन को देखता है, बारम्बारता को देखता है, उनमे पैटर्न ढूँढता है | अभ्यासों में पहचाने पैटर्न और संख्याएं अवचेतन में दर्ज हो जाती है जो फिर कभी भी उन संख्याओं रिलेशन सामने आता है तो तो गुणन फल की संख्या चेतन मस्तिष्क में प्रकट हो जाती है | बिलकुल ऐसा ही भाषा सीखने में होता है | शुरू में बच्चा जब पढ़ना सीख रहा होता है तो वर्ण और मात्राओं को तोड़-तोड़ कर पढता है फिर शब्द को पहचानता है लेलिन पठन के बहुत से अभ्यासों में सारे शब्द अचेतन में दर्ज हो जाते है | जब भी उसके सामने कोई लिखित शब्द आता है तो वह उस सम्पूर्ण शब्द चित्र को ही पढता है ना कि वर्णों और मात्राओं के सम्बन्धों की खोजबीन करने बैठता है |  इस प्रक्रिया के तहत लगभग दो तीन हजार शब्द तो बच्चे की मेमोरी में होंगे | तो क्या हम यह कहेंगे कि ये सारे शब्द बच्चे के रटे हुए हैं ? नहीं , ये सारे शब्द उसने अर्थों की अवधारणाओं के साथ सीख कर हृदयस्थ कर लिए हैं | 
दरअसल सीखना-समझना एक आनंद देने वाली प्रक्रिया है | इस आनंद के साथ ज्ञान का सृजन होता है | जो सीख या ज्ञान भावनाओं को छू जाता है उसे मस्तिष्क संजो लेता है, याद कर लेता है | छूती हुई चीजों को  याद कर लेना मस्तिष्क का सहज धर्म है | ध्यान रहे इंसान चाहे रटे या समझे मस्तिष्क उसी चीज़ की  स्मृति पर अमिट छाप लगता है जो भावनाओं से जुडी हो या आनंदायी हो |
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दलीप वैरागी 
09928986983 

2 comments:

  1. लेखक महोदय, आपका ये लेख रटना और समझने को बहुत ही अच्छी तरह समझाने का तरीका है इसमे जो बच्चे की विवसता और रटने का सम्बन्ध बताया है वह बहुत ही सही बैठता है और नाटक को तो वही समझ सकता है जो इसके पात्रों में उतरता है वो जो गम्भीर दर्शक वर्ग नही है वो एस गहराई को नही समझ सकते उन्हें तो डायलाग रटे हुए ही नजर आते है आप आगे भी हमे एसी जानकारियां देते रहे ऐसे आलेख हमारी भी रटंत परिपाटी को तोडेगें अच्छी जानकारी के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद

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