Tuesday, June 14, 2011

कितना मुश्किल है रोजमर्रा की ज़िन्दगी में कानून का पालन कर पाना …


(1) Polythene पर रोक के संदर्भ में
अभी पाँच - छह महीने पहले राजस्थान सरकार ने एक बहुत ही महत्वपूर्ण निर्णय किया जिसके तहत पूरे प्रदेश में पोलीथिन के इस्तेमाल पर रोक लगा दी | आम आदमी ने इस निर्णय का स्वागत किया कि अब शायद पारिस्थितिकी संतुलन में कुछ मदद मिलेगी | पोलीथिन हर तरह से पर्यावरण को दूषित कर रहा था | कानून लागू होने के अगले दिन इसका असर भी दिखाई दिया | जो लोग बजाए जाते वक्त घर से थैला लेकर नहीं गए थे उनकी तस्वीरें अखबार में छपी थीं कोई झोली में सब्ज़ी ला रहा था तो कोई अपने हैलमेट में ही डाल कर ला रहा था | सरकारी अमले ने चार-छह व्यापारिक प्रतिष्ठानों पर छापे मार कर कार्यवाही की | लगने लगा कि अब धरती पर स्वर्ग आने ही वाला है | दूकानदारों ने पन्नियाँ काउंटरों से हटा कर छुपा दीं और पन्द्रह-बीस दर्जन कागज के लिफ़ाफे रख लिए शायद यह सोच कर कि देर सवेर कानून की हवा तो निकलनी ही है  |  बात सच भी निकली अगले ही दिन से इसकी नाफरमानी शुरू हो गई | 
इन दिनों जो विचित्र बात हुई वह यह कि मेरे अपने परम्परागत दूकानदार से रिश्ते बदलने लगे | वही दुकानदार जो मुझे सड़क पर देख कर ही आवाज लगा लेता था अब देख कर उपेक्षा से मुह फेर लेता है | बात दरअसल यूँ है कि  सरकारी आदेश के अगले दिन ही जब मैं घर से महीने भर के राशन की लिस्ट लेकर दूकान पर पहुंचा तो देखा कि दूकानदार धड़ल्ले से polythene की थैलियों में सामान बांध कर दे रहा था | मेरे दूकान पर पहुँचते ही ग्राहकों से कहने लगा “ आप लोग घर से थैला लेकर आया करो आगे से थैली बंद हो गयी हैं |” फिर मुझे देखकर बोला “भाई साहब क्या करें पुराना स्टॉक तो खत्म करना पड़ेगा |”  मेरी लिस्ट लेकर सामान लिकालने लगा | मैंने कहा कि मैं तो पॉली बैग में सामान नहीं लूँगा | मेरी बात सुन वह अजीब स्थिति में आ गया | महत्वपूर्ण ग्राहक छोड़ना भी नहीं है लेकिन सामान किसमें दे | मेहनत से खोज कर दर्जन भर लिफाए निकले | मुश्किल पहले तो पांच किलो चीनी एक थैली में ही डल जाती थी अब वही दस लिफाफों में आई | कुछ सामान लिफाफों में भरा तो अधिकतर अखबारी पुड़ियों में लपेटा और सारे सामान को एक बोरे के सपुर्द किया | बिल थमाते वक्त दूकानदार के चेहरे पर एक रहस्यमई मुस्कान थी जो शायद कह रही थी कि आप हमारे लिए सबसे मुश्किल ग्राहक हो | खैर, दुकानों पर पॉलीबैग कभी नहीं रुके | अगले महीने जब मैं सामान लेने गया तो मैं भी मैं ही था, बनिया भी वही था लेकिन हमारे रिश्ते बदल चुके थे | वही जो सड़क पर से आवाज लगा देता था अब उसने मुझे कोई तवज्जो नहीं दी | दुकान पर खड़ी ग्राहकों की भीड़ को निपटता रहा | मैं अपनी बारी आने का इंतजार करता रहा | उसकी उपेक्षा से मुझे लग रहा था जैसे वो कह रहा हो ‘  सामान लेना है तो ऐसे ही लो ज्यादा नखरे हैं तो बिग बाज़ार या सुपर मार्केट जाओ |’ आज मैं बनिये की दूकान पर खड़ा सबसे अयाचित और अवांछित ग्राहक होता हूँ |
जैसा लग रहा था कि स्वर्ग आ जायेगा ऐसा कुछ भी नहीं हुआ पूरे जयपुर शहरभर में पॉलीबैग धड़ल्ले  से चल रहे हैं सब्जी बाजार में , थानों के इर्द गिर्द , अस्पतालों, स्कूलों, बस स्टैंड सब जगह | दूकानदार भी दे रहे है और ग्राहक भी ले रहे हैं और सरकारी अमला भी देख रहा है | किसी पर भी कोई कार्यवाही नहीं है | अख़बारों में भी कोई खबर नहीं है | इसे लागू करवाने की सरकार की कोई इच्छा शक्ति दिखाई नहीं दे रही है | उत्साही लोगों को सूचना के अधिकार के तहत अर्जी लगा कर पता करना चाहिए कि अब तक कितने दुकानदारों व ग्राहकों पर कार्यवाही हुई है | प्रशासन की गंभीरता का पता उसी से चल सकता है
(2) चौराहे का सिग्नल और मैं
रोज़ ऑफिस आने के लिए रास्ते में मुझे दो ट्रैफिक सिग्नल पार करने होते हैं | दोनों ही सिग्नल ऐसे हैं जहाँ सुबह के वक्त कोई ट्रैफिक पुलिस का सिपाही खड़ा नहीं होता है | लेकिन सिग्नल अपना काम अच्छे से करता है | सुबह ९-१० बजे के लगभग ट्रैफिक खूब होता है |  मैं जिन सिग्नल की बात कर रहा हूँ उसके बारे में दरअसल मेरी मुश्किल यह है कि जब लाल बत्ती होती है तो मैं रुक जाता हूँ और  उसका हरा होने तक इन्तेजार करता हूँ | अधिकतर लोग फर्राटे से मेरी बगल से निकल जाते हैं | कभी-कभी इक्का-दुक्का और होते है जो लाल बत्ती देख कर रुक जाते हैं | सामान्यतः मैं अकेला ही होता हूँ | मैं जब आगे खड़ा होता हूँ तो पीछे वाले वाहनों के होर्न कान फोड़ देते है |  और बगल से निकलते वक़्त पलटकर मुझे देखते हैं उनके देखने से ऐसा ध्वनित होता है जैसे कह रहे हों ‘ अज़ीब प्राणी है ! भला खाली सिग्नल पर भी कोई खड़ा होता है ?”  मुझे ऐसा लगता है कि लोग समझ रहे हों कि मैं इस महानगर का वाशिंदा ना होकर किसी अर्धविकसित सभ्यता का व्यक्ति होऊं | चलो अपने लिए यह उपमान भी बर्दाश्त किया जा सकता है लेकिन मुझे सबसे बड़ा खतरा यह लगता है कि कहीं ऐसा ना हों कि मैं इस देश के कानून की पालनार्थ रेड सिग्नल पर रुका होऊं और कोई तेज रफ़्तार वाहन पीछे से ….. आप ही बताओ कि मेरे जैसा व्यक्ति जिसकी आस्था कानून में है ऐसी स्थिति में क्या करे ? इन छोटी - छोटी बातों से कई सवाल उठते है | क्या नियमों का पालन करने के लिए हमेशा डंडे की जरूरत है | क्या हर सिग्नल पर सिपाही खड़ा करना लाजमी है  तकनीक का इस्तेमाल तो इसलिए किया गया था कि कम मानव संसाधन लगाना पड़े | लेकिन इस तरह तो यह और खर्चीला हों जायेगा | क्या आज आम आदमी का राष्ट्रीय चरित्र ऐसा हों गया है कि उसे अब रोजमर्रा कि जिंदगी में कानून तोड़ने में कोई झिझक नहीं होती है |  जब आम इंसान कि स्थिति ऐसी है तो फिर भ्रष्ट नेता और अफ़सर की क्या कहें | प्रधानमंत्री तक पर अन्ना हजारे लोकपाल बैठना चाहते है | मैं पूछता हूँ ऐसे लोगों के लिए क्या तैयारी है जो सौ-पचास नहीं करोड़ों की संख्या में हैं ?
चलो एक काम करें और सुबह से शाम तक पता करें कि जाने अनजाने में हम कितने कानून तोड़ते हैं | निसंदेह लिस्ट लंबी बनेगी | फिर हम आत्मावलोकन करें कि हम कितने अच्छे नागरिक हैं ?

3 comments:

  1. पोलिथिन के संदर्भ में मैं इतना ही कहूँगा की जब यह समझ आता है ‘फला चीज बेकार है तब तक वह जन-जन की आदत बन चुकी होती हैं’| जब तक आदत में आने से पहले पता नहीं किया जाता यह हानिकारक है या नहीं तब तक इस तरह की दुविधाओं से सामना होता रहेगा |

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