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Monday, October 5, 2015

हास्य नाट्य समारोह के ठहाकों की गूंज अलवर की फिज़ाओं में कई दिन तक रहेगी

कल 4 अक्तूबर 2015 का दिन अलवर रंगकर्म में काफी महत्त्व का था। वह इस लिए कि अलवर में नवनिर्मित प्रताप ऑडिटोरियम में पहली बार कोई नाट्य गतिविधि संपन्न हुई। यूँ तो यह ऑडिटोरियम बने हुए लगभग दो साल का वक़्त हो गया है लेकिन रंगकर्मियों के लिए यह आज भी मरीचिका बना हुआ है। इसको बुक करने का शुल्क इतना अतार्किक है कि रंगकर्मी इसको बुक करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे थे। अंततः यह काम रंग संस्कार थियेटर ग्रुप के देशराज मीणा ने कर दिखाया। और उन्होंने "हास्य नाट्य महोत्सव" के रूप में एक खूबसूरत शाम का अनुभव अलवर के दर्शकों के लिए रच दिया।
कल शाम प्रताप ऑडिटोरियम पर तीन नाटकों का मंचन हुआ जिसका विवरण इस प्रकार है -
पहला नाटक – “निठल्ला”
हरिशंकर परसाई के व्यंग्य रचनाओं पर आधारित इस नाटक का निर्देशन देशराज मीणा ने किया। इस नाटक में दो अभिनेताओं दीपक पाल सिंह व अंकुश शर्मा ने अपने सधे हुए अभिनय से दर्शकों को आद्यंत जोड़े रखा। दोनों अभिनेताओं ने सादगी से मंच पर कथा का नैरेशन भी किया और विभिन्न चरित्रों को भी निभाकर दर्शकों को गुदगुदाया और  परसाई जी के व्यंग धार से कहीं दर्शकों के मानस पर नश्तर भी छोड़े। यह सधे हुए अभिनय की मिसाल ही है कि कोई अभिनेता बड़ी चतुराई से दर्शक दीर्घा में बेबाकी से फोन पर बात करते हुई दर्शक की भी खबर ले डाले, बिना अपनी भूमिका से विचलित हुए। इस व्यंग नाटक ने जहाँ इन अभिनेताओं ने नेता, नौकरशाह व संतों की पोल खोली वहीं आखिरी संवाद तक आकर दर्शक को भी नहीं छोड़ा और गिरेबां में झांकने के लिए मज़बूर कर दिया।
दूसरे नाटक " उसके इंतज़ार में" के लेखक निर्देशक प्रदीप प्रसन्न हैं । इन्होंने नाटक में अभिनय भी किया। प्रदीप इन दिनों अहमदाबाद में रहकर शोध कर रहे हैं तथा वहां रहते हुए उन्होंने वहां शौकिया रंगकर्मियों की एक अच्छी खासी टीम बना ली है, जो वास्तव में बहुत बड़ी बात हैं। अपनी टीम के साथ अलवर में मंचन के लिए आए थे। उसके इंतज़ार में एक पूर्णतया हास्य नाटक है।  इस नाटक में एक परिवार की कहानी है, जहाँ लड़की को देखने के लिए आए हैं। विभिन्न परिस्थितियों के माध्यम से प्रदीप हास्य रचते हैं। पारिवारिक नोकझोक है, नौकरानी से इश्क है, बेरोजगारी है व मनुष्य की सहज दुर्बलताएँ हैं । इन छोटी-छोटी स्थितियों के माध्यम से प्रदीप जहाँ गुदगुदाते हैं वहीं गंभीर चोट भी कर जाते हैं और अगले ही पल हास्य की मसाज भी कर देते हैं। एक नाटककार के रूप में प्रदीप प्रसन्न विधा की नब्ज़ पकड़ चुके हैं। उनसे इसी तरह और लेखन की आगे भी उम्मीद है।
तीसरे नाटक के रूप में मोलियार की रचना "बिच्छू " का मंचन किया गया। इस नाटक का निर्देशन अंकुश शर्मा ने किया। अंकुश इस नाटक में भी प्रमुख भूमिका में थे। मोलियार की इस क्लासिक कृति के हिंदुस्तानी अनुवाद में दो परिवारों की कहानी है। जहाँ रूढ़िवादी कंजूस पिता भी हैं तो उनकी तथाकथित तरक्कीपसंद इश्कमिज़ाज़ सन्तानें भी।  इस पीढ़ी अंतराल और इस खाई को अपने अजीबोगरीब कौशल से सामंजस्य बनाने और उनकी खबर लेते हुए रहमत के किरदार को पूरी ऊंचाई पर लेकर जाते हैं अंकुश शर्मा। रहमत का किरदार सबको अपने इर्द-गिर्द मौज़ूद तुर्प के इक्के की याद दिलाता है जो किसी भी गाँव मौहल्ले के लिए उतना ही अपरिहार्य है जितना कि वह तिरस्कृत भी है। ये सारी परिस्थितिया गजब का हास्य रचती हैं। उर्दू ज़बान के शब्दों के साथ सभी कलाकारों ने उच्चारण की शुद्धता का ख्याल रखते हुए यह साबित किया कि वे प्रशिक्षित व पेशेवर अभिनेता हैं।
यह आयोजन एक दिन में कई बाते अलवर रंगकर्म को कह गया -
  • ऑडिटोरियम की शुल्क कम करने के लिए प्रशासन से मांग करना जरुरी तो है लेकिन उसके कम होने के इंतज़ार में बैठे रहना भी ठीक नहीं। जब तक उस जगह पर कोई गतिविधि नहीं होगी तो प्रशासन को उसकी जरुरत भी समझ नहीं आएगी।
  • यहाँ आयोजन होने से ही इसकी अंदर की खामी पता चली कि उसकी बनावट में बुनियादी चूक भी हुई हैं। साईक मंच के इतने पीछे चिपका कर लगाई गई है कि अभिनेता के मूवमेंट के लिए भी पर्याप्त स्थान नहीं। पंखे हैं नहीं, एसी लगे नहीं। दो घंटे की अवधि दर्शको को गर्मी में तलने के लिए काफी हैं।
  • नाटक को समय पर शुरू करना बहुत जरुरी है। लेकिन यह उतना ही दुर्लभ भी है। लेकिन कल का शो समय पर शुरू होने के पीछे निसंदेह देशराज की जिद को ही माना जा सकता है। इसके लिए देशराज साधुवाद के पात्र हैं। उन्होंने विशिष्ठ अतिथियों को भी आमंत्रित किया लेकिन उनके आदर सत्कार को बरक़रार रखते हुए उन्होंने दर्शको के समय व रसास्वादन को बाधित नहीं होने दिया।
  • इतनी महत्वपूर्ण गतिविधि की अगले दिन किसी अख़बार में कोई खबर नहीं मिलने पर अच्छा नहीं लगा। प्रिंट मिडिया की यह  दूरी समझ में नहीं आई।
  • इस रंग अनुभव को रचने में हालाँकि देशराज व प्रदीप अलवर के रंगकर्मी हैं लेकिन इनके अतिरिक्त पूरे अभिनेता दिल्ली जयपुर व  अहमदाबाद से थे। निःसंदेह इन अभिनेताओं ने अलवर के रंगकर्म को एक्सीलेंस के मापदंडों से परचित अवश्य करवाया। उम्मीद है भविष्य में अलवर के रंगकर्मी भी इस ऑडिटोरियम पर शिरकत करते दिखाई देंगे।
सारांशत: यह कहा जा सकता है कि रंग संस्कार थियेटर ग्रुप द्वारा आयोजित "हास्य नाट्य समारोह" के ठहाके की गूंज काफी समय तक अलवर रंगमंच की फिजा में गूँजेगी। अपनी तमाम मज़बूतियों के बावज़ूद यह कहे बिना बात ख़त्म नहीं की जा सकती कि यह हास्य का ओवरडोज़ भी था। काश! ये तीनो नाटक, तीन दिन क्रमिकता से मंचित होते तो माहौल और सघन बन सकता था। कुछ अधिक दर्शक जुटाए जा सकते थे। फिर भी आयोजकों बधाई , दर्शकों को बधाई !
(कृपया अपनी टिप्पणी अवश्य दें। यदि यह लेख आपको पसंद आया हो तो शेयर ज़रूर करें।  इससे इन्टरनेट पर हिन्दी को बढ़ावा मिलेगा तथा  मेरी नाट्यकला व  लेखन को प्रोत्साहन मिलेगा। ) 

दलीप वैरागी 
09928986983 


Sunday, May 31, 2015

गोरेपन के मिथक और बाज़ार

आज सुबह की अख़बार देख रहा था तो दो ख़बरें थीं जो महत्वपूर्ण थीं। पहली खबर यह थी मैगी को लेकर उठे हुए विवाद के बारे में थी। मेरा सात साल का बेटा भी अख़बार की सुर्ख़ियों को मेरे साथ दोहरा रहा था।अचानक मैगी व दूसरे  फ़ूड प्रोडक्ट की जाँच व खतरों से सम्बंधित हैडलाइन आई तो उसने भी पढ़ी, उसे कितनी समझ आई यह तो पता नहीं लेकिन उसे यह जरूर पता चल गया कि उसका पसंदीदा खाद्य पदार्थ किन्हीं कारणों से सुर्ख़ियों व संदेह में है। उसे यह भी समझ आ गया कि माँ इस अख़बार के टुकड़े का संग्रह करके रखेगी और उसकी फेवरेट डिश पे इसी आधार पर पाबंदियां आयद करेगी।
दूसरी तरफ इस सदी का महानायक भारतीय बच्चों के सामने रोज मैगी पर लार टपकाता दिखाई देता है। संभव है महानायक जी अपनी लाड़ली पौती के लिए भी उसकी माँ से दो मिनट वाली डिश बनाकर लाने के लिए कहते होंगे।
दरअसल ऐसा नहीं होता। ये तथाकथित महानायक केवल बाजार की संस्कृति के वाहक हैं, शायद शिकार नहीं बनतेहैं। ये पूरे तंत्र के एक पुर्ज़ा भर है। ये उस पुर्ज़े की बात है जो सिस्टम में बिलकुल फिट बैठ रहा है।
आज की दूसरी खबर एक ऐसे पुर्जे की है जिसने सिस्टम का हिस्सा बनने से इंकार कर दिया। नवोदित अभिनेत्री कंगना रानौत ने गोरा बनाने वाले सौंदर्य प्रसाधन का विज्ञापन करने से इंकार करके सबको चौंका दिया है। उनके इंकार की वजह न केवल स्वास्थ्य का मुद्दा है बल्कि वे गोरेपन की अवधारणा पर बुनियादी सवाल खड़ा भी करती हैं, जो ऐसे अंधेयुग में एक रौशनी को किरण सरीखा है।
अंधायुग संज्ञा इसलिए प्रयोग की गई है क्योंकि लगभग चौथाई सदी से शर्तिया गोरा करने के दावों के साथ क्रीम बेचीं जा रही हैं वो भी केवल दो सप्ताह मेगोरापन! मगर दो दशक गुजर जाने पर कोई 'अंग्रेज़' नहीं बना। जिसने पहली बार क्रीम लगाई उनकी घिसते-घिसते जवानी हाथ से फिसल गई लेकिन गोरी रंगत पकड़ में नहीं आई। क्रीम घिसना फिर भी जारी है। पहले खुद पच रहे थे अब गोरेपन का सपना अपनी संतानों पर चस्पा कर दिया है। पहले गोरे होने पर केवल लड़कियों का ही अधिकार था। अब इन संस्कृति के वाहकों ने इस क्षेत्र में भी बराबरी लाने का महत्वपूर्ण कार्य करते हुए मर्दों वाली क्रीम भी इज़ाद की है।
एक झूठ बड़ी खूबसूरती से प्रसारित व  प्रतिष्ठित किया जा रहा है बल्कि बेचा भी जा रहा है। हम भी कमाल के लोग हैं, यदि पंखा, मिक्सी या बल्ब दो साल की वारंटी में ख़राब होता है तो आप अपने रिटेलर या मैकेनिक की जान खा जाते हैं कि आपने धोखा किया है हमारे साथ। सब्जी के थैले में से दो बैंगन सड़े निकल जाएं तो आप पूरा थैला ले जाकर सब्जीवाले के दे मारते हैं। ताज्जुब तब होता है जब आपसे कोई दो सप्ताह में गोरा करने का वादा करता है और आप दो दशक तक चूँ तक नहीं करते। कोई इन सौंदर्य प्रसाधनो की खाली शीशी इनको वापस नहीं दे मरता। अजब देश है, गजब लोग हैं।
गोरेपन की अवधारणा इंसानियत के खिलाफ सोच है। एक ऐसा वक्त जब रंगभेद को पूरी दुनिया में अमानवीय, अवैधानिक व शर्मनाक घोषित किया जा चुका हो, ऐसे समय में यह रंगभेद का एक नया संस्करण हमारे सामने है जिसे हमारे वक़्त के महानायक व नायिकाएं स्थापित करने में लगे हुए हैं।
दरअसल बाजार भी हमारे सांस्कृतिक मिथकों को पकड़ता है और उन्हें अतृप्त अभिलाषाओं से सींच कर सपने दिखता है तथा उन्हीं सपनों की चाबी अपने प्रोडक्ट में रख देता है। इसमें दोराय नहीं कि औपनिवेशिक दौर में योरोपीय सुंदरता के मानक अवश्य प्रतिष्टित हुए हैं लेकिन गोरेपन की चाहत  की जड़ें हमारे सुदूर अतीत में भी हैं। बिहारी के इस दोहे में आप श्वेत रंग की पराकाष्ठा देखिए  -
"पत्रा ही तिथि पाइए वा घर के चहुँ पास,
नित प्रति पून्यो ही रहे आनन ओप उजास।"
बिहारी कहते हैं कि नायिका के पड़ौस में तिथि पता करने के लिए पंचांग की जरुरत पड़ती है। क्योंकि उसका मुख चन्द्रमा है इसलिए मोहल्ले में हमेशा पूनम ही रहती है। मुख चंद्रमा है, कमल के सामान है, दूधिया रंगत है इस तरह की उपमाओं से हमारा साहित्य भरा पड़ा है। ये उपमान महिलाओं के लिए थे। देवियों का रंग गोरा ही है और देवताओं का सांवला। हाँ लेकिन माँ काली का उदहारण है लेकिन काली रूप की प्रतिष्ठा तभी होती है जब वह असुरों का संहार करती है जो कि परम्परा में पुरूषोचित कार्य है। इसका मिलाजुला असर यह है कि भारतीय लड़की में भले ही दूसरे तमाम गुण हो लेकिन  यदि सही वर प्राप्त करना है तो गोरा होना ही पड़ेगा।
बाजार केवल प्राचीन मिथकों का इस्तेमाल ही नहीं करता बल्कि नए मिथक गढ़ता भी रहता है क्योंकि बाजार की दौड़ में बने रहना है। इसी का सटीक उदहारण है - मर्दों वाली क्रीम। हज़ार बार दोहरा कर उसे क्रीम बेच ही दी। यहाँ भी बाजार ने पुरुष की दुखती रग पे हाथ रखा। कि "अरे मर्द बनो, शर्म आनी चाहिए तुम्हें औरतों वाली क्रीम इस्तेमाल कर रहे हो।" जो बरसों से उसी डिब्बी से क्रीम निकाल कर लगा रहा था जिसमे से स्त्री लगा रही थी, अचानक पुरुष को अहसास हुआ कि किसी ने उनके पेंट-पतलून छीन कर घाघरा चोली पहना दिए हों। आनन फानन में वह दौड़ पड़ा अपने रिटेलर की तरफ,"भाई वो मर्दों वाली क्रीम कहाँ है..." इस तरह भारतीय पुरुष यह क्रीम गोरेपन के लिए लगा रहा है या नहीं पर एक बात पक्की है कि वह इस क्रीम से मर्दानगी के अहसास व दंभ को कायम रखने की कोशिश तो कर रहा है। इस तरह से बाजार नए मिथक खड़े कर देता है पुराने की बुनियाद पर।
बाजार के दूसरे हथकंडे है उन लोगों के लिए जो तरक्की पसंद है व साइंस में यकीन रखते हैं। इसके लिए वैज्ञानिक रिसर्चों का हवाला देकर कहना कि अमुक उत्पाद सारे किटाणु धो डालता है, दूसरा कहेगा धोता ही नहीं मार डालता है, कोई दावा करता है कि हमारा फ़ूड सप्लीमेंट पीने से इतने बच्चे लंबे हो गए... इत्यादि... इत्यादि...
तीसरा हथकंडा है प्रतिस्पर्द्धा का। सभी कंपनियां अपने उत्पादों को लेकर प्रतियोगिता रचती हैं जो केवल विज्ञापन के स्तर पर ही होती है, न कि गुणवत्ता की। गुणवत्ता में सब बराबर ही ठहरती हैं। किसी का कोल्ड ड्रिंक काला है, किसी का ऑरेन्ज और किसी का पीला, किसी का नीबू वाला है और किसी का आम वाला, फर्क रंग और खुशबू काहै। लेकिन इस बाजार सिस्टम की मज़बूरी है प्रतियोगिता करना। कोई और नहीं तो ये खुद अपने उत्पाद से ही प्रतियोगिता रच देते हैं। आप किसी कंपनी का टूथब्रश इस्तेमाल कर रहे है और अचानक उसी कंपनी का विज्ञापन आपको साबित कर देता है कि आप कितने पिछड़े व अज्ञानी है। आपका ब्रश सीधा है भीतर तक सफाई नहीं करता है। जब आप उस ब्रश को अपना लेते हैं तो कुछ दिन बाद एक विज्ञापन आपको आकर चेता देता है कि आपका ब्रश तो एक तरफ से ही सफाई करता है और आपको तो दोनों तरफ से सफाई करने वाला ब्रश चाहिए। आप इस ब्रुश से दो चार हो ही रहे होते हैं अचानक फिर एक विज्ञापन आपका दिमाग खराब कर देता है कि आपके ब्रुश की जो डंडी है वह ठीक नहीं, पकड़ सही नहीं बन सकती... पकड़ सही न होगी तो सफाई क्या खाक होगी! आपको मुर्ख बनाने की तैयारी में पूरा बाजार लगा हुआ है। और आप बाकायदा बन भी रहे हैं। तमाम शिक्षा व प्रगतिशीलता से लैस होने के बावजूद भी। सहर्ष बन रहे हैं। इस सिस्टम में जो जितना बनता है उसकी प्रतिष्ठा उतनी ही बढ़ती जाती है ।  
ऐसे में कंगना रनौत जैसे प्रभावशाली लोग जब बाजार की मानसिकता पर सवाल उठाकर चुनौती देते हैं तो एक उम्मीद जागती है। कंगना की तारीफ इस लिए भी की जानी चाहिए क्योंकि उन्होंने अपने करियर के शिखर पर इन विज्ञापनों को ना कहा है। आज से दस साल पहले बैडमिंटन स्टार फुलला गोपीचंद ने भी शीतल पेय का विज्ञापन को ना कह कर यह परिचय दिया कि प्रतिभा, तार्किकता और मानवीयता एक ही शरीर में निवास कर सकते हैं।
बाज़ार ने हमें इस तरह अपनी जकड़बंदी में लिया है कि सोचने समझने को कुंद कर दिया है और  सवाल उठाना बंद कर दिया है। सुंदरता का यह आलम है कि हमारे शारीर के जितने अंग हैं उनको धोने, पोंछने व चमकाने के उतने ही तरीके के साबुन, शैम्पू लोशन, तेल व लेपन मौजूद हैं। एक पूरा भ्रम बना दिया गया है कि आपको सुन्दर बनना है तो ये सारे बाहरी उपक्रम करने पड़ेंगे। संतरा, एलोविरा, बेसन, मलाई, दूध, दही, आवला, शहद सब बाहर से ही लेपन करने हैं यदि आपने इन्हें खुराक में लिया तो फिर ज़ीरो फिगर का क्या होगा। हनीसिंह ज़ीरो फिगर की नेशनल एंथम बना दी है - लाक ट्वेंटी एट कुड़ी डा, फोर्टी सेवन वेट कुड़ी डा.... युवा पीढ़ी इसे अक्षरशः पालन करते दिखाई दे रही है।
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दलीप वैरागी 
09928986983 

Wednesday, June 29, 2011

अखबार या इश्तिहार !

इलैक्ट्रोनिक मीडिया के चेहरे के बारे में मुख्तसर सी जानकारी मैंने पिछले पोस्ट में दी थी. आज प्रिंट मीडिया के बारे में लिखने के लिए मुझे आज के अखबार ने मजबूर कर दिया . दरअसल आज सुबह जब मैंने अखबार उठाया तो उसके मुख पृष्ठ एक भी ख़बर नहीं थी. पहले पन्ने पर पूरे पेज का इश्तिहार था. पिछले साल भर से अखबारों का चेहरा इतनी जल्दी से बदला है कि अब कोई चेहरा रहा ही नहीं महज इश्तिहार हों गया है. यह किसी एक अखबार की बात नहीं है बल्कि यह हर नेशनल मीडिया कहलाने वाले अखबार की कहानी है चाहे वह हिंदी का हों या अंग्रेजी वाला. अखबार का मुख पृष्ठ उसका मैनिफेस्टो होता है. हर सुबह पाठक जब सारे दिन की भागदौड़ में शमिल होने जाने से पहले नजर भर अखबार को देखना चाहता है कि उसके अखबार ने किस घटना को प्रमुखता देते हुए सुर्खियों में रखा है; चाय की गुमटी और बस की सीट पर बैठा कोई व्यक्ति जब अपना सिर जब अखबार में दे पढ़ रहा होता है तो बगल में बैठा भी कोई  तिरछी नजर से अखबार की सुर्खियाँ देख लेता है. लेकिन आज पाठक को हर तरफ इश्तिहार ही दिखाई देते है चाहे अखबार का पहला पन्ना हों या सडक का किनारा . अखबार और होर्डिंग में कोई फर्क नहीं रह गया है . जब मुख पृष्ठ के पूरे पन्ने पर किसी बिल्डर, सीमेंट, गाइड बुक और कोचिंग संस्थान के इश्तिहार से पूछता हूँ की खबरें कहाँ हैं तो ऐसा लगता है कि मानो वह इश्तिहार कह रहा हों , ‘कंगाल तेरे खर्चे हुए तीन रुपयों से यह अखबार नहीं चलता है; यह चलता है इस विज्ञापन से.’  सही बात है कि जिनके पैसे से अखबार चलता है पहला पन्ना भी उसका ही होगा . यह सही है कि आज मीडिया में विज्ञापनों से इनकार नहीं किया जा सकता लेकिन एक बुनियादी तमीज़ तो रहनी चाहिए कि क्या कहाँ छपना चाहिए.  ऐसी स्थिति में कैसे कहा जा सकता है कि अखबार जनता आवाज है? अखबार लोकतंत्र की आवाज़ है ? कहने को कह सकते हैं लेकिन कहने से आवाज़ में असर नहीं आएगा. आवाज़ में असर के लिए तो मुख पृष्ठ पर अखबार के असली चेहरे को ही आना होगा . उस चेहरे को जो होना चाहिए. अखबार जनता के सरोकारों से तभी जुड़ेगा जब उसका काम पाठक की जेब से निकले पैसे चलेगा.

Monday, June 27, 2011

मीडिया का असली चेहरा कौनसा है ?

आज शाम को जब मैं टीवी पर न्यूज़ देख रहा तब बड़ी अज़ीब व हास्यास्पद स्थिति पैदा हों गई.  मैं पहले उस टीवी स्क्रीन के बारे में आपको बता दूँ जो किसी भी न्यूज़ चैनल पर दिखाई देती है . दरअसल समाचार चैनल टीवी स्क्रीन को दो तीन भागों में बाँट देते हैं, एक विंडो का मुख्य भाग होता है जहाँ ख़बर का विडियो  दिखाई देता है. दूसरा भाग वह पट्टी है जो मुख्य विंडो के नीचे होती है जिसमे ब्रेकिंग न्यूज की पट्टी चलती रहती है या फिर सारा दिन प्रसारित होने वाले न्यूज बारी-बारी से ब्लिंक होते रहते हैं. मसला दरअसल यह है कि आज शाम से ही सभी न्यूज़ चैनलों पर उत्तर प्रदेश पुलिस अफसरों द्वारा टीवी पत्रकारों की पिटाई की ख़बर प्रमुखता से आ रही थी. निसंदेह यह बहुत ही निंदनीय घटना है. समाचर प्रस्तुतकर्ता लगातार उत्तर प्रदेश की कानून व्यवस्था को  कोस रहे थे.  यह गिन-गिन कर बताया जा रहा था कि पिछले दिनों यू.पी. में कहाँ व कितने अपराध हुए हैं.  ये सभी चल रहा था तभी एक लंबा विज्ञापन मुख्य विंडो पर प्रकट होता है जिसमे यू.पी. सरकार के विकास कार्यों का महिमामंडन था . इस विज्ञापन ने मुख्य समाचार जो कि एक पत्रकार से बदसलूकी का था, को नीचे की पट्टी पर धकेल दिया . टीवी की स्क्रीन पर दो जगह पर दो विपरीत बाते चल रही थीं -
मुख्य विंडो पर विज्ञापन के रूप में  -
यू.पी. में सुराज आया है …लोगों को रोजगार मिले … सड़क निर्माण… शिक्षा, चिकित्सा, आवास … अमन चैन कायम हुआ… मजदूरों, किसानों, व्यापारियों के हित की रक्षा …कानून व्यवस्था तथा पक्षपात रहित न्याय लोगों को मिला है …इत्यादि .
नीचे की पट्टी पर -
पत्रकार पर हमला … यू.पी. पुलिस द्वारा पत्रकारों को पीटकर धमकाया … लोकतंत्र पर पर हमला … जनता की आवाज पर हमला …जंगलराज …इत्यादि .
ये दोनों संदेश एक ही स्क्रीन पर एक साथ चल रहे थे .  मैं दोनों में किसी को सही या गलत नहीं ठहरा रहा मैं तो यह जानना चाह रहा हूँ कि इसमें से मीडिया का असली चेहरा कौनसा है ?

Friday, June 24, 2011

“जूनियर बच्चन आने वाला …” उर्फ़ शर्म मीडिया को मगर आती नहीं !

अमिताभ बच्चन ने ट्वीट करके यह घोषणा की है कि वे दादा बनने  वाले हैं | जैसा कि ऐसी ट्वीट के साथ होता है इसे न्यूज चैनल वाले तुरंत ले उड़े और जोर शोर से प्रसारित किया | एक प्रमुख न्यूज चैनल की खबर कुछ इस तरह थी, “ जूनियर बच्चन आने वाला वाला है |”  यह समाचार प्राइम टाइम में मौखिक एवं लिखित दोनों रूपों में चैनल पर दिखाई देता रहा | चैनल वालो की नज़रें क्या अब इतनी रेडियोधर्मी हों गयी हैं कि वो गर्भ में ही जान लेती हैं कि लड़का आने वाला है | क्यों क्या यह वाक्य ऐसा नहीं हो सकता , “ जूनियर बच्चन आने वाली है |” या यहाँ कोई और भाषाई विकल्प हो सकता है जिसमे जेंडर को लेकर पूर्वाग्रह नहीं हों | क्या न्यूज चैनल वालों के पास कायदे के पढ़े लिखे लोग नहीं बचे हैं जो भाषा का सतर्कता से इस्तेमाल कर सकें ? मुझे अच्छी तरह याद है कि अभिषेक – ऐश्वर्या  की शादी के बाद किसी मंच से अमिताभ ने कहा था की ‘ मुझे जल्दी से एक पौता दे दो …’ उस वक्त इन्हीं चैनल वालों ने जमकर अमिताभ की खिंचाई की थी कि इस देश का सुपर स्टार लड़के की कामना कर रहा है ना की लड़की की | अमिताभ बहुत विचक्षण व्यक्ति हैं वे एक गलती को दुबारा नहीं दोहराते इस बार उन्होंने बहुत सोच समझ कर वक्तव्य दिया है भले ही वे चाहते कुछ भी हों |  लेकिन एक बात जरूर है कि इस बार मिडिया वालों की वैचारिक गरीबी पर हँस जरूर रहे होंगे | बहुत दिनों बाद कुछ मसाला मिला था चैनल वालों को इसलिए वे इस खबर को खूब खींचना  चाह  रहे थे | फील्ड से लाइव रिपोर्टिंग भी शुरू हों गई; रिपोर्टर पूछता है ‘ बिग बी के घर किलकारी गूंजेगी इस बारे में आपको क्या कहना है |’ जनता भी आखिर जनता है … लोग कह रहे थे ‘ बच्चन साब के पौता आ रहा है हमें इस बात की बहुत खुशी है …|’  सुपर स्टार, जनता, मिडिया इनमे और चाहे हजारों विविधताएं हों लेकिन इस दिमागी कंगाली में सब बराबर हैं | सारी तथाकथित तरक्की के बावजूद आज भी हमारे घरों में लड़की की पैदाइश अयाचित है | दरअसल जेंडर विभेद की जड़ें हमारे सामूहिक अवचेतन में इतनी गहरी है कि हमारा एक नजरिया बन गया है | खासकर हिंदी भाषा में तो यह कई स्तर पर है | जहाँ हमारी परवरिश में तो यह घुट्टी की तरह तो आता ही है इसके अलावा भाषा में हर चीज़ के लिए जेंडर है संज्ञा में जेंडर, क्रिया में जेंडर विशेषण में भी जेंडर… यहाँ सब वाक्य ता या ती पर खत्म होते हैं | आपको हर स्टेटमेंट को किसी पाले में रखना ही होगा | न्यूट्रल जेंडर स्टेटमेंट बनाने के लिए बहुत जोर आता है | भाषा सोचने का टूल होती है और जब टूल ही ऐसा हों तो सोच में एक बेचारगी तो दिखाई देगी ही | इसी लिए जब हम किसी भूमिका या काम का नाम लेते हैं तो उनके लिए हमने शक्ले पहले ही सोच  रखी है | किसान का नाम लेते ही कोई लंगोटी वाला पुरुष दिमाग में क्यों आ खड़ा होता है कोई महिला क्यों नहीं ? नर्स के नाम पर महिला का ही पोर्ट्रेट क्यों उभरता है | क्यूँ आज भी हमने भूमिकाएं महिला पुरुष के नाम पर फिक्स कर रखी हैं | जबकि महिलाऐं हिमालय चढ़ चुकी हैं, समन्दर लाँघ चुकी हैं | दरअसल इस जहालत से निकलने की जद्दोजहद कई तरह की होगी -विचार भाषा और व्यवहार | तब जाकर हम एक समता मुल्क समाज की स्थपना कर सकते हैं |

अलवर में 'पार्क' का मंचन : समानुभूति के स्तर पर दर्शकों को छूता एक नाट्यनुभाव

  रविवार, 13 अगस्त 2023 को हरुमल तोलानी ऑडीटोरियम, अलवर में मानव कौल लिखित तथा युवा रंगकर्मी हितेश जैमन द्वारा निर्देशित नाटक ‘पार्क’ का मंच...