Sunday, May 31, 2015

गोरेपन के मिथक और बाज़ार

आज सुबह की अख़बार देख रहा था तो दो ख़बरें थीं जो महत्वपूर्ण थीं। पहली खबर यह थी मैगी को लेकर उठे हुए विवाद के बारे में थी। मेरा सात साल का बेटा भी अख़बार की सुर्ख़ियों को मेरे साथ दोहरा रहा था।अचानक मैगी व दूसरे  फ़ूड प्रोडक्ट की जाँच व खतरों से सम्बंधित हैडलाइन आई तो उसने भी पढ़ी, उसे कितनी समझ आई यह तो पता नहीं लेकिन उसे यह जरूर पता चल गया कि उसका पसंदीदा खाद्य पदार्थ किन्हीं कारणों से सुर्ख़ियों व संदेह में है। उसे यह भी समझ आ गया कि माँ इस अख़बार के टुकड़े का संग्रह करके रखेगी और उसकी फेवरेट डिश पे इसी आधार पर पाबंदियां आयद करेगी।
दूसरी तरफ इस सदी का महानायक भारतीय बच्चों के सामने रोज मैगी पर लार टपकाता दिखाई देता है। संभव है महानायक जी अपनी लाड़ली पौती के लिए भी उसकी माँ से दो मिनट वाली डिश बनाकर लाने के लिए कहते होंगे।
दरअसल ऐसा नहीं होता। ये तथाकथित महानायक केवल बाजार की संस्कृति के वाहक हैं, शायद शिकार नहीं बनतेहैं। ये पूरे तंत्र के एक पुर्ज़ा भर है। ये उस पुर्ज़े की बात है जो सिस्टम में बिलकुल फिट बैठ रहा है।
आज की दूसरी खबर एक ऐसे पुर्जे की है जिसने सिस्टम का हिस्सा बनने से इंकार कर दिया। नवोदित अभिनेत्री कंगना रानौत ने गोरा बनाने वाले सौंदर्य प्रसाधन का विज्ञापन करने से इंकार करके सबको चौंका दिया है। उनके इंकार की वजह न केवल स्वास्थ्य का मुद्दा है बल्कि वे गोरेपन की अवधारणा पर बुनियादी सवाल खड़ा भी करती हैं, जो ऐसे अंधेयुग में एक रौशनी को किरण सरीखा है।
अंधायुग संज्ञा इसलिए प्रयोग की गई है क्योंकि लगभग चौथाई सदी से शर्तिया गोरा करने के दावों के साथ क्रीम बेचीं जा रही हैं वो भी केवल दो सप्ताह मेगोरापन! मगर दो दशक गुजर जाने पर कोई 'अंग्रेज़' नहीं बना। जिसने पहली बार क्रीम लगाई उनकी घिसते-घिसते जवानी हाथ से फिसल गई लेकिन गोरी रंगत पकड़ में नहीं आई। क्रीम घिसना फिर भी जारी है। पहले खुद पच रहे थे अब गोरेपन का सपना अपनी संतानों पर चस्पा कर दिया है। पहले गोरे होने पर केवल लड़कियों का ही अधिकार था। अब इन संस्कृति के वाहकों ने इस क्षेत्र में भी बराबरी लाने का महत्वपूर्ण कार्य करते हुए मर्दों वाली क्रीम भी इज़ाद की है।
एक झूठ बड़ी खूबसूरती से प्रसारित व  प्रतिष्ठित किया जा रहा है बल्कि बेचा भी जा रहा है। हम भी कमाल के लोग हैं, यदि पंखा, मिक्सी या बल्ब दो साल की वारंटी में ख़राब होता है तो आप अपने रिटेलर या मैकेनिक की जान खा जाते हैं कि आपने धोखा किया है हमारे साथ। सब्जी के थैले में से दो बैंगन सड़े निकल जाएं तो आप पूरा थैला ले जाकर सब्जीवाले के दे मारते हैं। ताज्जुब तब होता है जब आपसे कोई दो सप्ताह में गोरा करने का वादा करता है और आप दो दशक तक चूँ तक नहीं करते। कोई इन सौंदर्य प्रसाधनो की खाली शीशी इनको वापस नहीं दे मरता। अजब देश है, गजब लोग हैं।
गोरेपन की अवधारणा इंसानियत के खिलाफ सोच है। एक ऐसा वक्त जब रंगभेद को पूरी दुनिया में अमानवीय, अवैधानिक व शर्मनाक घोषित किया जा चुका हो, ऐसे समय में यह रंगभेद का एक नया संस्करण हमारे सामने है जिसे हमारे वक़्त के महानायक व नायिकाएं स्थापित करने में लगे हुए हैं।
दरअसल बाजार भी हमारे सांस्कृतिक मिथकों को पकड़ता है और उन्हें अतृप्त अभिलाषाओं से सींच कर सपने दिखता है तथा उन्हीं सपनों की चाबी अपने प्रोडक्ट में रख देता है। इसमें दोराय नहीं कि औपनिवेशिक दौर में योरोपीय सुंदरता के मानक अवश्य प्रतिष्टित हुए हैं लेकिन गोरेपन की चाहत  की जड़ें हमारे सुदूर अतीत में भी हैं। बिहारी के इस दोहे में आप श्वेत रंग की पराकाष्ठा देखिए  -
"पत्रा ही तिथि पाइए वा घर के चहुँ पास,
नित प्रति पून्यो ही रहे आनन ओप उजास।"
बिहारी कहते हैं कि नायिका के पड़ौस में तिथि पता करने के लिए पंचांग की जरुरत पड़ती है। क्योंकि उसका मुख चन्द्रमा है इसलिए मोहल्ले में हमेशा पूनम ही रहती है। मुख चंद्रमा है, कमल के सामान है, दूधिया रंगत है इस तरह की उपमाओं से हमारा साहित्य भरा पड़ा है। ये उपमान महिलाओं के लिए थे। देवियों का रंग गोरा ही है और देवताओं का सांवला। हाँ लेकिन माँ काली का उदहारण है लेकिन काली रूप की प्रतिष्ठा तभी होती है जब वह असुरों का संहार करती है जो कि परम्परा में पुरूषोचित कार्य है। इसका मिलाजुला असर यह है कि भारतीय लड़की में भले ही दूसरे तमाम गुण हो लेकिन  यदि सही वर प्राप्त करना है तो गोरा होना ही पड़ेगा।
बाजार केवल प्राचीन मिथकों का इस्तेमाल ही नहीं करता बल्कि नए मिथक गढ़ता भी रहता है क्योंकि बाजार की दौड़ में बने रहना है। इसी का सटीक उदहारण है - मर्दों वाली क्रीम। हज़ार बार दोहरा कर उसे क्रीम बेच ही दी। यहाँ भी बाजार ने पुरुष की दुखती रग पे हाथ रखा। कि "अरे मर्द बनो, शर्म आनी चाहिए तुम्हें औरतों वाली क्रीम इस्तेमाल कर रहे हो।" जो बरसों से उसी डिब्बी से क्रीम निकाल कर लगा रहा था जिसमे से स्त्री लगा रही थी, अचानक पुरुष को अहसास हुआ कि किसी ने उनके पेंट-पतलून छीन कर घाघरा चोली पहना दिए हों। आनन फानन में वह दौड़ पड़ा अपने रिटेलर की तरफ,"भाई वो मर्दों वाली क्रीम कहाँ है..." इस तरह भारतीय पुरुष यह क्रीम गोरेपन के लिए लगा रहा है या नहीं पर एक बात पक्की है कि वह इस क्रीम से मर्दानगी के अहसास व दंभ को कायम रखने की कोशिश तो कर रहा है। इस तरह से बाजार नए मिथक खड़े कर देता है पुराने की बुनियाद पर।
बाजार के दूसरे हथकंडे है उन लोगों के लिए जो तरक्की पसंद है व साइंस में यकीन रखते हैं। इसके लिए वैज्ञानिक रिसर्चों का हवाला देकर कहना कि अमुक उत्पाद सारे किटाणु धो डालता है, दूसरा कहेगा धोता ही नहीं मार डालता है, कोई दावा करता है कि हमारा फ़ूड सप्लीमेंट पीने से इतने बच्चे लंबे हो गए... इत्यादि... इत्यादि...
तीसरा हथकंडा है प्रतिस्पर्द्धा का। सभी कंपनियां अपने उत्पादों को लेकर प्रतियोगिता रचती हैं जो केवल विज्ञापन के स्तर पर ही होती है, न कि गुणवत्ता की। गुणवत्ता में सब बराबर ही ठहरती हैं। किसी का कोल्ड ड्रिंक काला है, किसी का ऑरेन्ज और किसी का पीला, किसी का नीबू वाला है और किसी का आम वाला, फर्क रंग और खुशबू काहै। लेकिन इस बाजार सिस्टम की मज़बूरी है प्रतियोगिता करना। कोई और नहीं तो ये खुद अपने उत्पाद से ही प्रतियोगिता रच देते हैं। आप किसी कंपनी का टूथब्रश इस्तेमाल कर रहे है और अचानक उसी कंपनी का विज्ञापन आपको साबित कर देता है कि आप कितने पिछड़े व अज्ञानी है। आपका ब्रश सीधा है भीतर तक सफाई नहीं करता है। जब आप उस ब्रश को अपना लेते हैं तो कुछ दिन बाद एक विज्ञापन आपको आकर चेता देता है कि आपका ब्रश तो एक तरफ से ही सफाई करता है और आपको तो दोनों तरफ से सफाई करने वाला ब्रश चाहिए। आप इस ब्रुश से दो चार हो ही रहे होते हैं अचानक फिर एक विज्ञापन आपका दिमाग खराब कर देता है कि आपके ब्रुश की जो डंडी है वह ठीक नहीं, पकड़ सही नहीं बन सकती... पकड़ सही न होगी तो सफाई क्या खाक होगी! आपको मुर्ख बनाने की तैयारी में पूरा बाजार लगा हुआ है। और आप बाकायदा बन भी रहे हैं। तमाम शिक्षा व प्रगतिशीलता से लैस होने के बावजूद भी। सहर्ष बन रहे हैं। इस सिस्टम में जो जितना बनता है उसकी प्रतिष्ठा उतनी ही बढ़ती जाती है ।  
ऐसे में कंगना रनौत जैसे प्रभावशाली लोग जब बाजार की मानसिकता पर सवाल उठाकर चुनौती देते हैं तो एक उम्मीद जागती है। कंगना की तारीफ इस लिए भी की जानी चाहिए क्योंकि उन्होंने अपने करियर के शिखर पर इन विज्ञापनों को ना कहा है। आज से दस साल पहले बैडमिंटन स्टार फुलला गोपीचंद ने भी शीतल पेय का विज्ञापन को ना कह कर यह परिचय दिया कि प्रतिभा, तार्किकता और मानवीयता एक ही शरीर में निवास कर सकते हैं।
बाज़ार ने हमें इस तरह अपनी जकड़बंदी में लिया है कि सोचने समझने को कुंद कर दिया है और  सवाल उठाना बंद कर दिया है। सुंदरता का यह आलम है कि हमारे शारीर के जितने अंग हैं उनको धोने, पोंछने व चमकाने के उतने ही तरीके के साबुन, शैम्पू लोशन, तेल व लेपन मौजूद हैं। एक पूरा भ्रम बना दिया गया है कि आपको सुन्दर बनना है तो ये सारे बाहरी उपक्रम करने पड़ेंगे। संतरा, एलोविरा, बेसन, मलाई, दूध, दही, आवला, शहद सब बाहर से ही लेपन करने हैं यदि आपने इन्हें खुराक में लिया तो फिर ज़ीरो फिगर का क्या होगा। हनीसिंह ज़ीरो फिगर की नेशनल एंथम बना दी है - लाक ट्वेंटी एट कुड़ी डा, फोर्टी सेवन वेट कुड़ी डा.... युवा पीढ़ी इसे अक्षरशः पालन करते दिखाई दे रही है।
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दलीप वैरागी 
09928986983 

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