Monday, April 29, 2013

कहानी शिक्षण : पाठ्यक्रम के साथ और पाठ्यक्रम के आगे *

 
 
clip_image002यह एक अमेरिकी लोक कथा है।
अजमेर ज़िले के कस्तूरबा गांधी बालिका आवासीय विद्यालय (केजीबीवी), तस्वारिया, केकड़ी,  में ‘प्रथम बुक्स की किताबों को उलटते-पलटते यह किताब हाथ में आ
गई। खूबसूरत चित्रों वाली इस किताब को मैं एक बार ही में पढ़ गया। दुबारा भी पढ़ा और दुबारा पढ़ने के साथ ही एक योजना मन में आकार लेने लगी कि इसे केजीबीवी की लड़कियों को कैसे सुनाना है। शिक्षिकाओं के साथ मिल कर सभी लड़कियों को आँगन में इकट्ठा किया और बातचीत शुरू की।
‘‘यह कहानी अमेरिका की है। ...आपने अमेरिका के बारे में सुन रखा है?” मैंने पूर्व
जानकारी को जाँचना चाहा,
‘‘हाँ...”
लड़कियों का लगभग समवेत स्वर उभरा।
‘‘कहाँ है अमेरिका?”
लड़कियों ने जवाब दिया - ‘‘नक्शे में, ग्लोब में, किताब में, टीवी में, अखबार में...”
मैं बोला - ‘‘सच ! कहाँ नहीं है अमेरिका !”
कहानी शुरू हुई। मुख्तसर में कहानी कुछ यूं हैं -
चतुर खरगोश ने आग चुराई
एक वक्त था जब इंसान व जानवर हिलमिल कर रहते थे। सर्दियों में खाना खत्म होने पर इंसान जानवरों को खाना दे देते थे लेकिन जानवरों को यह अच्छा नहीं लगclip_image004ता था कि इंसानों को जब ठण्ड लगती है तो वे उनकी कोई मदद नहीं कर पाते थे। उस वक्त लोगों के पास आग नहीं थी। आग तब राक्षसों के पास थी मगर वे उस पर पहरा रखते थे। जानवरों ने इस बारे में कुछ करना चाहा। खरगोश ने नेतृत्व किया और पंखों का एक मुकुट बनाया। फिर उसने राक्षसों के यहाँ जाकर उन्हें बेहद मज़ेदार लतीफ़े सुनाए, जिन्हें सुनकर हँसी के मारे उनके पेट में पड़ गए। जब हँसते-हँसते उनकी आँखों में पानी आने लगा तो खरगोश मुकुट में आग लेकर भागा। सब जानवरों ने बारी-बारी से मुकुट को थाम कर आग इंसानों तक पहुँचाई। इस जद्दोजहद में किसी की पूँछ जल गई, किसी की गर्दन और किसी का सारा शरीर काला पड़ गया...।

कहानी की शुरूआत से ही चर्चा शुरू हो चुकी थी। क्या अब भी जानवर हमसे हिलमिल कर रहते हैं? कौन-कौन से जानवर हमसे आज भी हिलमिल कर रहते हैं? हिलमिल के रहना किसे कहेंगे? वही जो हमारे साथclip_image006 रहते हैं... साथ तो गाय रहती है, भैंस, बकरी और कुत्ते भी रहते हैं... तो क्या छिपकली भी? नहीं वह नहीं... इसमें वही जानवर आएँगे जो हमारे साथ रहते हैं और हमारे काम भी आते हैं। पालतू जानवर हमसे मिल कर रहते हैं।
बहरहाल, कहानी आगे बढ़ी , कहानी में जानवरों के नाम भी आते रहे। कुछ देशी और कुछ खाँटी अमेरिकी। चित्र भी देखे गए, रेकून तो अपने बन्दर जैसा दिखाई देता है ! कोयोटी तो भेड़िए जैसा है... पीरू तो बिलकुल मुर्गे जैसा है।
कहानी खत्म होने पर लड़कियों से बात की कि इस किताब के आखीर में कहानी में आए उन जीवों के बारे में संक्षिप्त जानकारी दी हुई है जो अमेरिका में रहते हैं; क्या आप अमेरिका के बारे में और कुछ जानकारियाँ लेना चाहती हैं? जैसे वहाँ की जनसंख्या कितनी है, फसलें कौनसी होती हैं, मौसम कैसे होते हैं, इत्यादि। लड़कियों ने एक स्वर में हाँ कहा। मैंने पूछा कि आप यह सब कहाँ से पता करेंगी? उन्होंने कहा यह सब एटलस में clip_image008मिल जाएगा। इस तरह १०-१२ लड़कियों का एक समूह बन गया जिसे एटलस से उत्तरी अमेरिका महाद्वीप के बारे में जानकारियाँ एकत्र कर अगले दिन सभी लड़कियों के समक्ष रखना था। लड़कियों का एक और समूह भी इसी काम को करने में उत्साहित दिखाई दिया। इस समूह के पास काम तो वैसा ही था लेकिन चुनौती अलग तरह की थी। उसे एटलस के साथ काम करने के अलावा इकट्ठी की गई जानकारियों पर आधारित सवाल भी पूछने थे। ये सवाल पहले वाले समूह से पूछे जाने वाले थे। इस तरह अब एक चुनौती पहले वाले समूह के सामने भी थी।
कहानी में खरगोश दानवों से आग चुराने के लिए एक तरकीब सोचता है। क्या इस कहानी में आग हासिल करने में नेगोसिएशन यानी बातचीत द्वारा आदान-प्रदान के और भी तरीके हो सकते थे? इस काम को करने के लिए लड़कियों का एक समूह बना जिसे अपना कोई तरीका शामिल करते हुए कहानी को आगे बढ़ाना तय हुआ कि –
एक समूह इस कहानी पर नाटक तैयार करेगा।
एक समूह इस कहानी पर कठपुतली प्रदर्शन करेगा।
एक समूह कहानी को चित्रों में प्रदर्शित करेगा।
तब तक छुट्टी का वक्त हो चला था। सभी समूहों को रात को आवासीय समय के दौरान कार्य करना था। समूह आपस में मदद कर सकते थे और ज़रूरत पड़ने पर वार्डन व शिक्षिकाओं की मदद ली जा सकती थी। छुट्टी की घंटी बजी लेकिन किसी को आज उसकी परवाह नहीं थी। सब अपने-अपने काम में लगे हुए थे।
अगले दिन सभी लड़कियाँ तैयार थीं। अपने-अपने काम के प्रदर्शन के लिए पूरे आत्मविश्वास से लबरेज। सभी शिक्षिकाएँ व लड़कियाँ एक हॉल में इकट्ठे हुए। पहला और दूसरा समूह अलग-अलग खड़े हो गए। एक समूह को सवाल पूछने थे और दूसरे को जवाब देने थे। सवाल इस तरह थे –
- अमेरिका के सबसे बड़े बैंक का नाम?
-  डाक टिकट संग्रह करने का शौकीन राष्ट्रपति?
-  दास प्रथा का अन्त करने वाला राष्ट्रपति?
-  विश्व की सबसे बड़ी बस कहाँ है व इसकी लम्बाई क्या है?
-  अमेरिका के वन, फसलें, घरेलू पशु?
-  अमेरिका की आज़ादी... ओलम्पिक खेलों का बहिष्कार।
-  सबसे ज्यादा सल्फर डॉइ ऑक्साइड छो‹डने वाला देश... सबसे ज्यादा प्रदूषण
फैलाने वाला देश... इत्यादि।
धाराप्रवाह सवाल-जवाब सुन कर ऐसा लग रहा था मानों वे इसकी तैयारी में अमेरिका का कोना-कोना झांक आई हैं। सवालों की शुरूआत में ही लग गया था कि उनकी खोजबीन सिर्फ एटलस तक ही सीमित नहीं रही थी। पूछने पर उन्होंने बताया - ‘‘हमने एटलस के अलावा अपनी सामाजिक विज्ञान, भूगोल की किताब व मैडम की जी.के. (जनरल नॉलेज यानी सामान्य ज्ञान) की किताब को भी देखा है।” इसके अलावा उन्होंने कहा - ‘‘दो-तीन बार शिक्षिका से भी मदद ली।” अचानक मेरी समझ में आया कि प्राय: नीरस सी लगने वाली ये पाठ्य पुस्तकें अनायास ही इस गतिविधि से जीवन्त हो उठी थी और उनकी ज़रूरत का हिस्सा बन गर्इं थी। इस दौरान एक बात जो उल्लेखनीय रूप से नज़र आई वह थी कि जब दूसरा समूह जवाब देने में थोड़ी सी देर करता तो शेष बड़े समूह की लड़कियाँ झट से जवाब देतीं। मुझसे रहा नहीं गया। मैंने कहा - ‘‘आपको यह तैयारी करने को तो नहीं कहा गया था। फिर आप कैसे इतना कुछ बता रही हैं?”
‘‘सर, आपने यह काम तो हमें नहीं दिया था लेकिन कहा था कि हम समूहों की मदद कर सकते हैं, सो हमने मदद करने के लिए ही जानकारियाँ हासिल की।”
वह समूह जिसे कहानी में कुछ और मोड़ सुझाने थे भी तैयार था। इस समूह ने कहानी को लेकर कुछ इस तरह की परिकल्पनाएँ की –
‘‘खरगोश दानवों के पास जाता और कहता कि जंगल के लोग मुझे बहुत अपमानित करते हैं इसलिए मैं उनसे बदला लेना चाहता हूँ। ...इसलिए तु मुझे थोड़ी सी आग दे दो, जिससे मैं उस जंगल को जला दूंगा। इस तरह मेरे और तुम्हारे दुश्मन मर जाएँगे और हम राज करेंगे... इस तरह दानव खरगोश की बातों में आकर आग दे देते।”
‘‘खरगोश जानवरों से कहता - ‘‘मैं जंगल के अच्छे से अच्छे फूलों के ताज बनाकर तुम्हें पहनाऊँगा लेकिन फूलों को तोड़ने के लिए थोड़ी रोशनी दे दो...” दानव खुश होकर रोशनी दे देते।”
‘‘खरगोश उन्हें मांस-मदिरा का लालच देता। वह उनसे कहता ‘‘मैं तुम्हें बेहतरीन मदिरा पिलाऊँगा,” दानव खरगोश की बातों में आ जाते... खरगोश व रेकून की पहले से ही योजना थी कि बारी-बारी से आग को जंगल तक कैसे पहुँचाना है।”
लड़कियों ने इस कहानी में जो विकल्प सुझाए, उस प्रक्रिया में वे जहाँ अपनी कल्पनाशीलता को परवाज़ दे रही थीं वहीं वे सब मिल कर किसी समस्या के हल के विकल्पों पर भी गौर करने के अभ्यासों की शुरूआत कर रही थीं।
एक लड़की ने जब अपने समूह के काम के प्रस्तुतिकरण में जानवरों के साथ जुड़े उनके स्वभाव के बारे में बताना शुरू किया तो वहाँ भी खुली बहस शुरू हो गई।
‘‘कौआ चालाक कैसे होता है ?”
‘‘क्योंकि वह बच्चों से रोटी छीन कर ले जाता है।”
‘‘चालाक नहीं, वह तो क्रूर है...।”
‘‘गधा कैसे मूर्ख है ?”
‘‘उस पर कितना ही लाद दो, वह तो कैसे भी ले जाता है।”
‘‘इस हिसाब से तो वह मेहनती हुआ न....”
‘‘कबूतर चालाक नहीं होता... उसको चबूतरे पर दाना डाल दो, चुपचाप चुग कर उड़ जाता है।”
‘‘ये तो कोई बात नहीं कबूतर तो किसी ज़माने में चिट्ठियाँ ले जाने का काम करते थे।”
लड़कियों की चर्चा में जो तर्क थे, हो सकता है उतने धारदार न हों। लेकिन एक बात पक्की है कि वे पहली बार उन कहानियों पर सवाल उठा रही थीं जिनमें जानवरों पर कुछ विशेष स्वभाव चस्पा कर दिए गए हैं। निस्सन्देह उनकी यह पहल आगे जाकर खुद पर समाज द्वारा थोपी गई पहचानों के मुलम्मे को उतार फेंकने में मदद करेगी। चित्र बनाने वाले समूह ने कहानी पर आधारित बेहद खूबसूरत चित्र बनाए। इसमें किसी ने लाइनें खींच कर स्केच बनाए तो किसी ने रंग भरने शुरू कर दिए। इस प्रकार धीरे-धीरे सामूहिक प्रयास से तस्वीरें अपने रंग में आने लगीं।
नाटक समूह की प्रस्तुति ढीली रह जाने पर लड़कियों ने उसकी अभिव्यक्ति में कमियाँ गिनवानी शुरू कर दीं। ‘‘आपका नाटक पता ही नहीं चला की कब खत्म हो गया।” ‘‘खरगोश द्वारा राक्षसों को बातों में उलझाने वाला सीन साफ़ समझ में नहीं आ रहा था...।” ‘‘आग को लेकर भागने व उसे एक-दूसरे को देने का काम इतनी जल्दी हो गया कि कुछ समझ में ही नहीं आया।”
हम लड़कियों द्वारा नाटक पर की गई समीक्षात्मक टिप्पणियों से हैरान थे। अगर अवसर दिया जाए तो लड़कियाँ किसी भी मुद्दे पर निर्भीकता से अपनी समीक्षात्मक राय दे सकती हैं।
अन्त में, कठपुतली वाले समूह की बारी थी। ये लोग पूरी तरह तैयार थे और तैयारी उनके चेहरे से बेसब्री बन कर झलक रही थी। शुरूआत होने से पहले मैंने उस समूह से माफी मांगी कि आपको थोड़ा कठिन काम दे दिया है, क्योंकि आपके पास जो
पहले से तैयार पपेट्स हैं उनमें जानवरों का एक भी चेहरा नहीं है और इसमें अधिकतर पात्र इंसानों के हैं।
इसके जवाब में लड़कियों ने मुझे आश्वस्त करते हुए कहा –
‘‘सर, आप चिन्ता मत करो।”
यह वाक्य किसी भी शिक्षक के लिए पुरस्कार स्वरूप ही हो सकता था।

*कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालयों में कहानी शिक्षण के अनुभवों को “खोलती हैं दरवाज़े कहानियाँ” के नाम से संकलित किया है, जिसे संधान ने सेव द चिल्ड्रन के सहयोग से प्रकाशित किया है। यह लेख इस संकलन में “पाठ्यक्रम के साथ व पाठ्यक्रम के आगे ”के शीर्षक से छपा है। इस पुस्तक के लिए चित्रांकन वाग्मी रांगेयराघव ने किया है। उनका बहुत आभार।
(कृपया अपनी टिप्पणी अवश्य दें। यदि यह लेख आपको पसंद आया हो तो शेयर ज़रूर करें।  इससे इन्टरनेट पर हिन्दी को बढ़ावा मिलेगा तथा  मेरे  लेखन को प्रोत्साहन मिलेगा। ) 

दलीप वैरागी 
09928986983 

Tuesday, April 23, 2013

कहानी शिक्षण : खोलती हैं दरवाज़े कहानियाँ

कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालयों में कहानी शिक्षण के अनुभवों को “खोलती हैं दरवाज़े कहानियाँ” के नाम से संकलित किया है, जिसे संधान ने सेव द चिल्ड्रन के सहयोग से प्रकाशित किया है। यह लेख इस संकलन में संपादकीय के रूप में छपा है। इस पुस्तक के लिए चित्रांकन वाग्मी रांगेयराघव ने किया है। उनका बहुत आभार।
कहानी का नाम आते ही मन में कई किरदार जीवन्त आकार लेने लगते हैं। इन किरदारों में सुनी हुई कहानियों के वे शख्स जिनमें जादूगर, परियाँ, प्रेत, जिन्नात, राक्षस, उड़ने वाले घोड़े व कालीन और इन घोड़ों व कालीनों पर सवार कहानी के नायक-नायिका शामिल होते हैं, cover-1जो हमेशा परिस्थितियों व समस्याओं से जूझते हैं। कहानी को सुनते वक्त अनेक बार हमने भी इन पात्रों के साथ खुद को समस्याओं से दो-चार होते पाया है; किसी तिलिस्मी दरवाजे के अचानक बन्द होने पर और अलीबाबा द्वारा पासवर्ड यानी गुप्त शब्द भूलने पर उसे याद दिलाने के लिए ‘खुल जा सिम सिम’ जोर-जोर से चिल्लाया है। रामायण में कभी खुद को राम के साथ रखा। कभी महाभारत में किसी एक पक्ष के साथ न रह पाने पर खुद को ‘जीव की जेवड़ी’ होते पाया। इन कहानियों के उड़ान खटोलों पर बैठ कर हम बचपन में ही समुद्रों, पहाड़ों, कन्दराओं, बीहड़ों, राजनीति के अखाड़ों और युद्ध के मैदानों का एक-एक कोना झाँक आए हैं। किस्सों के इन पात्रों ने छुटपन से ही हमारे ज़ेहन में डर, हर्ष, विषाद, वीरता और सचाई जैसी भावनाओं व अवधारणाओं को गढ़ने में हमारी मदद की है। न केवल मदद की है बल्कि, आज भी इन भावनाओं की डोर थामे वे हमारे अवचेतन में बैठे हुए हैं। इन कहानियों ने हमें हमारी ज़िंदगी की शुरुआत में ही उन अनुभवों से परिचित कराया है जिनसे हमें अपनी ज़िंदगी में अभी साबका करना है। दरअसल यह ज़िंदगी की तैयारी है।
कहानी की दर्ज़ीगिरी
कहानी के ज़िक्र के साथ सबसे पहले अपना बचपन याद आना लाज़िमी है। बचपन के साथ ही नानी, दादी या किसी ऐसे अज़ीज़ का चेहरा याद आता है जिससे खूब ज़िद व मनुहार करके कहानियाँ सुनी हों। ऐसे में अपने पड़ोस के ताऊ जी का चेहरा मेरी आँखों के सामने आ जाता है। सफ़ेद कुर्ता, सफ़ेद तहमद व सिर पर वैसा ही तुर्रेदार सफ़ेद साफ़ा, चेहरे पर हुक्के के धुएँ से पीली पड़ गई सफ़ेद और तिरछी मूँछें। यही मूँछे न जाने ताऊ जी की कितनी कहानियों में राजा, दरोगा, डाकू व मुखियाओं के किरदारों के चेहरों पर, कल्पना के रंग बदल-बदल कर हमने चस्पाँ की हैं। उनकी आँख के नीचे का बड़ा मस्सा कहानी सुनते-सुनते न जाने कब चुपके से राक्षस के चेहरे पर जाकर टंग जाता।
खैर, ताऊ जी का किस्सागोई यानी कहानी कहने में जवाब नहीं था। उनके पास सब तरह के किस्से थे, छोटे से छोटे, बड़े से बड़े। बड़ों के लिए और छोटों के लिए भी। सबके लिए। जब बड़ों की महफ़िल में सुनाना शुरू करते तो किस्सा मीलों लम्बा हो जाता और खत्म होने का नाम न लेता। जाने कहाँ से बीच में गीत और चौपाईयाँ आ जातीं। बात ही बात में ‘बात’ बुझा लेते। कब सवाल और पहेली सरका देते और क्या से क्या बीच में लाकर रख देते - रिश्तेदारियाँ, अय्यारियाँ, समझदारियाँ और देश-दुनिया की मिसालें व मसले। जब कभी ताऊ जी बच्चों की टोली से घिर जाते जो उसी किस्से को दुबारा सुनाने की जिद करती तो ताऊ जी उसी किस्से को गज भर का करके तहा देते। वे ऐसा कैसे करते हैं यह जानने के लिए कई बार कहानी सुनने के दौरान, हम उनकी गोद में बैठ कर उनकी जेबों की तलाशी भी ले डालते कि उनके पास ऐसा कौनसा टेप या फीता है जिससे वे माप-जोख करके किस्से को घटा-ब‹ढा कर लेते हैं?
जब कभी वे बच्चों की विस्मय से फैली आँखों में से झाँकती जिज्ञासा को भाँप लेते तो जम कर किस्सा सुनाते और उनके किस्सों के अन्दर से किस्से निकलते जाते। यूँ लगता मानो उनके किस्सों में जेबें लगी हुई हैं जिसमें से वे सिक्के की तरह खनखनाती कहानियाँ निकालते हैं और बच्चों की हथेलियों पर रखते जाते हैं।
खैर, एक बात पक्की है ताऊ जी कहानी की दर्ज़ीगिरी के उस्ताद थे। खुदा जाने वे नाप कैसे लेते थे - बच्चों की कौतूहल में फैलती आँखों की पुतलियों से या फिर बड़ों के हुंकारा भरने के आरोह-अवरोह से, लेकिन वे सबकी ज़रूरत व रूचि के हिसाब से किस्सों की काटछाँट कर नाप का सील देते। यहाँ तक आकर ताऊ जी कोई एक व्यक्ति नहीं रह जाते, बल्कि यह एक रूपक बन जाता है। वह रूपक है दास्तानगोई का जिसमें दादी, नानी, मामा कोई भी शामिल है या वे जिनका बच्चों के साथ रिश्ता कहानी की मार्फ़त है।
स्कूल और चौखटे में जड़ी कहानी
ताऊ जी पढ़े-लिखे नहीं थे। हम पढ़ गए हैं। आज हमारे इर्द-गिर्द बच्चे भी हैं और उनके सरोकारों से जुड़ने के बहाने व अवसर भी। आज हममें किस्सागो भी है और अध्यापक (ज्ञानी) भी हैं। दोनों हैं एक में ही, लेकिन वजूद अलग-अलग, एक-दूसरे से तन्हा-तन्हा। दोनों का एक खांचें में फ़िट बैठना हो नहीं पा रहा है। एक बरसों से चली आ रही परम्परा से पोषित हुआ है, तो वहीं दूसरे को पोथियों को रटने की अनवरत कवायद के बाद बड़े जतन से पाया है। एक जहाँ अपने होने के साथ ही बच्चों को सहज सवालों और कल्पनाओं में ले जाता है वहीं दूसरा अपेक्षा में रहता है कि सब सीधी लाइन में चलें, अनुशासन में रहें, सपाट सवाल हों, सीधे जवाब हों। ये द्वन्द्व हमारे अन्दर बना रहता है। जब हम पहले दिन स्कूल जाते हैं तो किस्सागो हमारे कंधे पर सवार स्कूल तक जाता तो है लेकिन हम उसे कक्षा के बाहर जूतों की तरह खोल देते हैं। जूते तो जूते हैं, आखिर घिस ही जाते हैं। स्कूल का काम किसी तरह पूरा कर अपने शिक्षक को दफ्तर की किसी कुर्सी पर टांग कर वापस घर लौटते हैं। और फिर से मां, पिता, नानी या ताऊ बन कर किस्सागो के चोले को रफ़ू करने बैठ जाते हैं। मेरा मानना यह कदापि नहीं कि कहानी स्कूली अन्त:क्रिया से पूरी तरह बहिष्कृत है। अक्सर स्कूल बच्चे के हाथ में कहानी पकड़ाता है लेकिन कहानी को चौखटे (फ्रेम) में कस के। स्कूल से लौटे बच्चे को एक बार स्कूल में सिखाई कहानी की एक-दो पंक्ति या शब्द के हेर-फेर से अपनी तरह से सुना कर तो देखिए। बच्चा तत्काल कहता है ‘‘यह गलत है, सही कहानी सुनाओ...” सही कहानी मतलब वह कहानी जिसमें पहले शब्दों व पंक्तियों का व्यवस्थित नपा-तुला क्रम और इस सब पर पालथी मार कर बैठा एक शिक्षा रूपी सूत्र वाक्य, ‘‘इस कहानी से यह शिक्षा मिलती है कि...” और शिक्षा भी न सूत भर कम, न सूत भर ज़्यादा।
एक थे विष्णु शर्मा
हमारे समय की विडम्बना यही है कि ‘ताऊ’ टीचर नहीं है और टीचर से किस्सागो छूटा हुआ है। कहानी कहने वाला हर इंसान में होता है। निस्संदेह शिक्षक में भी। याद कीजिए अपने किसी खुशनुमा अनुभव को, जिसे आपने मित्र मंडली में बड़े उत्साह से दसियों बार सुनाया है। उस वक्त आँखों में जो चमक आ जाती है वह सुनने वालों को भी उसी में रंग लेती है। यह इसलिए होता है कि उस अनुभव से गहन अपनापा होता है और वह भावनाओं से इस कदर जुड़ा होता है कि स्मृति में खच से बैठ गया होता है। कहानी में वह ताकत होती है कि वह जल्दी ही अपनी बन जाती है, भावनाओं से जुड़ जाती है। कहानियाँ किताबों में आराम फ़रमाती हैं लेकिन खेलती किस्सागो की ज़ुबान पर हैं। किस्सागो की ज़ुबान पर आने के बाद कहानी लेखक की नहीं रह जाती और कान तक पहुँचते-पहुँचते जन-जन की हो जाती है।
शिक्षा में कहानी की क्या भूमिका है, इसे विष्णु शर्मा के संदर्भ में समझा जा सकता है। कहते हैं, किसी राजा की संतान उद्दण्ड व नालायक निकलीं। जब राजा को लगाकि राजकुमारों के हाथ से पढ़ने का वक्त छूट जाने के बाद अब कैसे इन्हें शिक्षित किया जाए, तब विष्णु शर्मा नामक शिक्षक ने उन राजकुमारों को शिक्षित करने के लिए पंचतंत्र की कहानियों का ऐसा ताना-बाना बुना कि महज़ छह माह में राजकुमारों को अर्थशास्त्र व राजनीति में निष्णात कर दिया। दरअसल विष्णु शर्मा ने ताऊ जी (किस्सा गो) व शिक्षक को एक कर दिया।
कस्तूरबा गाँधी बालिका विद्यालयों यानी केजीबीवी में जो लड़कियाँ हैं वे न तो हूबहू राजकुमारों जैसी हैं और न यह वक्त विष्णु शर्मा वाला है लेकिन एक बात जो आज भी समान है वह यह कि इन लड़कियों के हाथ से भी प‹ढने का मौका छूटा हुआ था। और उम्र के जिस पड़ाव पर वे हैं वहाँ उन्हें तेज़ गति से सीखने-सिखाने की प्रक्रियाएँ अपनाने की ज़रूरत है।
इसी सोच को लेकर संधान के साथियों ने अजमेर के छह केजीबीवी में कहानी विधा को लेकर प्रयोग किए हैं। उन प्रयोगों के अनुभव यहाँ दिए जा रहे हैं, इस आशा के साथ कि आप भी कहानी से ज़रा नज़दीकी बनाएँ, उसे अपना बनाएँ और विद्यार्थियों के नज़दीक ले जाएं।
कहानी के अनुभव अगली किस्त में...
धन्यवाद
(कृपया अपनी टिप्पणी अवश्य दें। यदि यह लेख आपको पसंद आया हो तो शेयर ज़रूर करें।  इससे इन्टरनेट पर हिन्दी को बढ़ावा मिलेगा तथा  मेरी नाट्यकला व  लेखन को प्रोत्साहन मिलेगा। ) 

दलीप वैरागी 
09928986983 
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