Thursday, December 8, 2011

अंकुरजी उवाच : रगमंच जैसी विधा पैरों पर खड़ी नहीं हो सकती।

पिछले दिनों मैंने रंगायन डॉट कॉम पर ऑनलाइन प्रकाशित देवेंद्र राज अंकुर का साक्षात्कार पढ़ा। जिसका शीर्षक एनएसडी रोजी-रोटी की गारंटी नहीं दे सकता है । अंकुरजी NSD (राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय ) से हैं और उसके निदेशक भी रह चुके हैं और रंगजगत के सम्मानित व्यक्ति हैं। अंकुर जी ही यह बात बेहतर तरीके से कह सकते हैं। कोई भी संस्थान अगर ऐसा दावा करता है की वह रोजी रोटी की गारंटी देता है तो उसकी ईमानदारी पर शक करना चाहिए। बात यहीं तक हो तो ठीक है लेकिन अंकुर साहब इससे आगे जाकर एक भविष्यवाणी करते हैं –
रंगमंच जैसी विधा कभी भी अपने पैरों पर खड़ी नहीं हो सकती। यह बेहद अर्थ साध्य और सामूहिक कला है। नाटक और रंगमंच का पूरा इतिहास उठाकर देख लीजिए। यह भारत ही नहीं पश्चिम में भी बिना सरकारी या निजी सहायता के कभी आगे नहीं बढ़ पाया है। नाटक घर में तो बैठकर किया नहीं जा सकता। इसमें ऑडिटोरियम से लेकर कॉस्ट्यूम तक बहुत खर्च होता है। फिर नाटक को एक समय में एक ही जगह दिखाया जा सकता है। फिल्म तो एक बार बनने के बाद एक साथ लाखों जगह दिखाई जा सकती है। लेकिन नाटक में यह सुविधा नहीं होती। इसलिए नाटक का खर्च टिकट की बिक्री से नहीं निकाला जा सकता।
अंकुर साब की इस बात से असहमति जताने बाबत मैं यह ब्लॉग लिख रहा हूँ। ऐसा नहीं कि नाट्यविद्यालय से ऐसी बात पहली बार आई हो समय-समय पर वहाँ से इस तरह के बयान आते रहते हैं। आज से लगभग 10 साल पहले एनएसडी के ही एक वरिष्ठतम निर्देशक जयपुर में एक नाटक की कार्यशाला करने आए थे तब उनका भी ऐसा ही बयान दैनिक भास्कर में छपा था कि नाटक हमेशा सरकारी व निजी क्षेत्र की मदद पर निर्भर रहेगा। उस वक़्त हम कॉलेज में पढ़ रहे थे और इक्का-दुक्का नाटकों में काम करते हुए नाटक में अपने भविष्य के लिए बहुत आशावान थे। उस वक़्त भी मैंने पत्र लिख कर इस तरह निराशा न फैलाने की अर्ज़ की थी।
अंकुर जी जो इतिहास की बात करते हैं कि यह पूरी तरह सरकारी व निजी मदद के आगे नहीं बढ़ पाया है। यह कह कर अंकुर जी रंगमंच के इतिहास से पारसी रंगमंच के 80 साल निकाल बाहर करते हैं । वही पारसी रंगमंच जिसमे धनाढ्य पारसी व्यापारियों ने अपनी पूंजी लगाई और लोगों को प्रेक्षागृह मे खींचा और मनोरंजन भी किया । आप कैसे कह सकते है कि ये रंगमंच मदद के लिए निजी या सरकारी चौखट पर खड़ा हो सकता था? मदद और निवेश मे फर्क होता है। अंकुर जी कहते हैं कि इसके पैरों पर न खड़ा हो पाने के पीछे एक कारण यह है कि यह बहुत ही अर्थसाध्य कला है । इसमे वे ऑडिटोरियम, कॉस्टयूम इत्यादि के खर्चे गिनाते हैं। पारसी थियेटर पर इससे कहीं ज्यादा तामझाम होते थे। और आज अगर पारसी रंगमंच खत्म हुआ तो तो उसकी वजह भी उसमे ज्यादा पैसा ही रही, मंच शिल्प और साजोसमान पर अधिक ज़ोर व इसके साथ – साथ अभिनय में भी अतिरंजना। पर इसमे कोई दो राय नहीं कि भारत मे रंगमंच का एक दौर रहा जो अपने दम पर खड़ा हुआ । क्या अंकुर साहब नहीं जानते कि उनके एनएसडी (दिल्ली) के नाक के नीचे लगभग 1947 से आज तक पारसी रंगमंच हो रहा है। दिल्ली से केवल 150 किलोमीटर कि दूरी पर अलवर जैसे छोटे शहर में पारसी शैली का रंगमंच हर साल हजारों दर्शकों को अपनी तरफ खींचता है बाकायदा टिकट के साथ। यहाँ एनएसडी का कर्तव्य बनता है कि एक बार समीक्षा तो हो कि इस जगह पर यह अभी तक जीवित है तो क्यों और इससे आगे नहीं बढ़ा तो क्यों । दरअसल नाटक की दुर्दशा तो तब हुई जब हमने दर्शकों में मुफ्तखोरी की आदत डाल दी। कुछ दिन पहले फेसबुक पर पता चला कि पुराना किला में “अंधयुग” खेला गया और इसमे सप्ताह भर दर्शकों की भरमार रही। लेकिन इस नाटक के फ्री पास बांटे गए यह व्ज्ञपन भी फेसबुक पर था। क्या पूरी दिल्ली मे हज़ार डेढ़ हज़ार टिकटिया दर्शक हम पैदा नहीं कर पाए। नहीं ऐसा नहीं है। अगर टिकट भी होता तो लोग दोहरे होकर आते इस नाटक को देखने आते। जब इतना बड़ा सरकारी बजट हो तो फिर टिकट बेचने की जहमत कोन  उठाए।
‘‘हिंदी क्षेत्र में बंगाल, महाराष्ट्र या दक्षिण भारत की तरह रंग दर्शक क्यों नहीं विकसित हो पाए?’ इस सवाल का जवाब देते हुए भी वे यह कहते हैं कि “हिंदी क्षेत्र राजनैतिक रूप से हमेशा अस्थिर रहा है। विदेशी आक्रमणकारी उत्तर भारत की ओर से ही आए। महाराष्ट्र, दक्षिण भारत और बंगाल अपेक्षाकृत काफी शांत रहे। ऐसे में वहां रंगमंच और दूसरी कलाओं के विकसित होने का ज्यादा मौका मिला। वहीं हिंदी क्षेत्र में दौड़ते-भागते गाने बजाने वाली कला ही विकसित हो पाई। यही वजह है कि सांस्कृतिक रूप से उस तरह विकसित ही नहीं हो पाया।
अगर इस दलील पर गौर करें तो यह भी कम ही गले उतरती है। अगर ऐसा होता तो इस दृष्टि से सबसे अशांत तो यूरोप रहा है। वहाँ तो सदियों का रक्तरंजित इतिहास रहा है। वहाँ एक देश दूसरे पर हमला करता रहा है। सिकंदर...नेपोलियन...हिटलर...मुसोलिनी वहाँ हुए, बड़ी-बड़ी क्रांतियाँ वहाँ हुई, दो-दो विश्वयुद्ध उस धरती पर लड़े गए हैं फिर ग्रीक त्रासदियाँ, फिर शेक्सपियर का रंगमंच कैसे विकसित हो गया? शेक्सपियर ही नहीं पश्चिम और पूर्व के ज़्यादातर महान नाटकों के कथानक युद्धों और साज़िशों के ही कथानक हैं। फिर यह कैसे कहा जा सकता है कि गाना बजाना तो भागने-दौड़ने वाली काला है और नाटक जैसी दूसरी कलाएँ निठल्ले बैठने की कलाएँ हैं। जिस वक्त देश पर बाहरी आक्रमण हो रहे थे उस वक़्त रासो जैसे काव्य लिखे जा रहे थे, अमीर खुसरो और सूफी-भक्ति काव्य लिखे जा रहे थे। इसके अलावा चित्रकलाएँ और दूसरी स्थापत्य कलाएं कैसे विकसित हो रही थीं । ये सब उत्तर भारत मे ही हो रहा था । क्या इन सबको भागने दौड़ने वाली कलाएँ ही कहा जाएगा।
दरअसल नाटक के अपने पैरों पर खड़ा न हो पाने के कारण वर्तमान में है और उसे इतिहास मे तलाशा जा रहा है। और इसके कारणों को इतिहास में प्रक्षेपित करके नियति मान यह आवाज कि “नाटक कभी अपने पैरो पर खड़ा नहीं हो सकता...” उस संस्था से आ रही है जहां नाटक “अंधयुग” अनेक बार खेला जाता रहा है। एनएसडी में “अंधायुग” का अपना इतिहास रहा है। उसी अंधयुग में एक पात्र वृद्ध याचक का संवाद है –
“जब कोई भी मनुष्य
अनासक्त होकर चुनौती देता है इतिहास को,
उस दिन नक्षत्रों की दिशा बदल जाती है।
नियति नहीं है पूर्वनिर्धारित-
उसको हर क्षण मानव-निर्णय बनाता-मिटाता है।”
ये पंक्तियाँ एनएसडी के प्रत्येक व्यक्ति को याद होंगी लेकिन अफसोस कि वहाँ से एक भी ऐसा स्वर सुनाई नहीं देता जो नियति को चुनौती देने के लिए खड़ा हो । लेकिन जब अंकुर जी जैसा व्यक्ति ऐसा कहता है कि “रंग मंच अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो सकता ... ” तो दूरस्थ क्षेत्रों मे रंगकर्म कर रहे उन युवाओं को अफसोस होता है जो रंगकर्म को उम्मीद की नज़र से देख रहे हैं।
(कृपया अपनी टिप्पणी अवश्य दें। यदि यह लेख आपको पसंद आया हो तो शेयर ज़रूर करें।  इससे इन्टरनेट पर हिन्दी को बढ़ावा मिलेगा तथा  मेरी नाट्यकला व  लेखन को प्रोत्साहन मिलेगा। ) 

दलीप वैरागी 
09928986983 

Saturday, November 19, 2011

सुचना का अधिकार अधिनियम (Right to information act) : कानून में दम है

यह घटना सूचना का अधिकार कानून कि ताकत की सक्सेस स्टोरी  है | इस ताकत को हमने आजमाया है |इसकी सिर्फ जानकाRTI-Logoरी होना ही काफी नहीं है बल्कि इसको आजमा कर देखना चाहिए | अगर देश का हर जागरूक इंसान ऐसे अपनी मुश्किलों में इस कानून का इस्तेमाल करेगा तो भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए किसी लोक पाल बिल  की जरूरत नहीं |
 
बात पिछले दो साल की है | दिन व तारीख तो याद नहीं, हाँ इतना पता है कि उस दिन सूर्य ग्रहण पड़ा था |  ग्रहण खग्रास नहीं खण्ड ग्रास था | ऐसा नहीं कि ग्रहण होने की वजह जयपुर थम गया हो लेकिन फिर भी ऐसे बहुत से लोग रहे होंगे जो उस वक्त घर से नहीं निकले होंगे | दो तीन तो हमारे ऑफिस में ही थे जिन्होंने खुले में जाने से परहेज किया | बावजूद इसके मैं और मेरा दोस्त जो कि मेरा सहकर्मी भी है ने इन दो घंटों का इस्तेमाल एक महत्वपूर्ण काम को करने में किया | काम दरअसल यह था कि मेरे दोस्त भँवर ने बताया कि उन्होंने LIC (जीवन बीमा) की एक पॉलिसी विड्रो करवाई थी, तीन - चार महीने पहले | लेकिन भुगतान का चैक जो कि एक सप्ताह में उनके पास पहुंचना चाहिए था वह अभी तक उनके पास नहीं पहुंचा था | इसके लिए भँवर जी उनके ऑफिस में कई चक्कर लगा चुके थे | कई बार फोन भी किया | कभी काम से सम्बन्धित जिम्मेदार व्यक्ति सीट पर नहीं होता तो कभी मिल जाता तो प्रकिया  में है कह कर टरका देता | ग्रहण वाले दिन हमने योजना बनाई कि क्यों न हम (RTI)   सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत अर्जी लगाकर पता तो करे कि मामला कहाँ अटका हुआ है ? भंवर  जी ने कहा कि यह ठीक बात है “हम दूसरों को तो सूचना का अधिकार के लिए जाग्रत करते हैं,  आज खुद के लिए भी कर के देखें | तुरंत हमने एक अर्जी सूचना अधिकारी , जीवन बीमा कार्यालय जयपुर के नाम लिखी | याद रखें सूचना अधिकारी नाम का प्राणी हर कार्यालय में होता है | और कार्यालय की किसी दीवार पर उसका नाम भी चस्पा होना चाहिए | तो हमने लिखा कि हमें सूचना का अधिकार अधिनियम  २००५ तहत निम्न लिखित  जानकारियां चाहिए -
  1. मेरे काम में हो रहे विलम्ब का यथोचित कारण बताएँ |
  2. मेरे काम की अब तक की प्रगति की स्थिति बताएँ | तथा
  3. मेरे काम के लिए कौन-कौन व्यक्ति जिम्मेदार  हैं | उनके नाम बताएँ ताकि प्रमाद पाए जाने पर जरूरी कानूनी कार्यवाही उनके खिलाफ की जा सके |
अर्जी लिखने तक सूर्य ग्रहण कि गिरफ्त में आ चूका था | और हम  तय  कर चुके थे कि आज हम और सूर्य एक साथ ग्रहण से निकलेंगे | सूर्य चन्द्रमा की छाया से और हम भ्रष्टाचार की गिरफ्त से | हम सीधे LIC ऑफिस पहुंचे | सेकंड फ्लोर पर बड़ा सा हॉल,  हॉल में कुर्सियां ही कुर्सियां … कुर्सियों के आगे मेजें ही मेजें …  मेजों पर फाइलों के ढेर … कुछ कुर्सियों पर बाबू लोग आसीन, कुछ पर टंगे कोट… इसके अलावा भी बहुत साजो सामान | 
जैसा हम सोच रहे थे वैसा यहाँ कुछ भी नहीं था | यहाँ किसी भी कोने पर सूचना अधिकारी का नाम नहीं लिखा था |  क्या करें, किससे पूछें ?  इसी उहापोह में एक टेबल पर फाइलों से झांकते हुए हमने एक बड़े ऑफिस कर्मी से पूछ लिया “ यहाँ का सूचना अधिकारी कौन है ?”  इस एक वाक्य ने जैसे वहाँ रुके हुए पानी में पत्थर मार दिया हो | अभी तक जो सभी जो एक दूसरे से असम्प्रक्त से  अपनी गतिविधियों में मस्त थे | कही बातचीत भी तो ‘वोटिंग फॉर गोडो’ के पात्रों की तरह उकताहट मिटाने  की विवशता युक्त प्रयास –सी | इस एक वाक्य ने सब को जोड़ कर रख दिया | सबकी नज़रें हम पर केंद्रित हो गईं | ऐसे सवाल से सामना करने की उम्मीद किसी को नहीं थी | हमने फिर अपना सवाल दोहराया | वह चुप , चुप्पी कुछ सघन हो गयी थी क्योंकि उसकी चुप्पी में अब सभी  चुप्पियाँ शामिल हो गयीं थीं और मानो उन सब चुप्पियों ने एक बड़े  सन्नाटे का निर्माण कर दिया हो | वह सन्नाटा जैसे हमसे ही सवाल कर रहा था -  वाह ! भला यह भी कोई बात है ? ऐसा  भी कहीं होता है  ? अरे भाई कानून है तो क्या लेकिन काम तो काम के तरीके से ही होता है ! सन्नाटे कागुब्बारा जल्दी ही फूट गया | उसे हमने ही फोड़ा यह कह कर “ हमें सूचना अधिकारी का नाम बताइए हमें अर्जी लगानी है और आपने यहाँ उसका नाम भी नहीं लिख रखा जो कि यहाँ होना चाहिए |” इतने में ही भंवर जी ने अर्जी टेबल पर दे मारी | मगर मजाल है किसी ने उसे छुआ, अर्जी नहीं जैसे वर्जित फल हो !  इतने में ही पीछे से आवाज़ आयी आपको मैनेजर साब ने बुलाया है | हम मैनेजर के केबिन में चले गए | हमारा प्रयोजन पहले ही प्रेषित था,  भूमिका पहले ही बन गई थी | इसलिए बिना भूमिका के हमने अर्जी सरकाई | साहब ने पढ़ी , साहब की घंटी घनघनाई , तुरंत एक महिला कर्मचरी आई … साहब बोले , “ इन सर का काम क्यों नहीं हुआ ?”
कर्मचारी बोलीं , “ सर …सर.. इनका…वो ….जो …जो छुट्टी पर …
मैनेजर बोला , “ वो छुट्टी पर है तो क्या काम नहीं होगा … जाओ फोरन इनका चेक बना कर लाओ|  "
अगले १० मिनट में चैक भँवर जी के हाथ में था |
मैनेजर बोले, “ कोई और काम हो तो जरूर बताएँ |”
हम बोले, “ अभी तो काम यही है कि आप इस अर्जी को विधवत लगाओ |”
मैनेजर - अब तो रहने दो आपका काम तो हो गया |
हम - पता तो चले कि चूक कहाँ है ?
सारांश यह है कि मैनेजर ने कहा कि आप जिसकी गलती है माफ़ कर दीजिए .. नौकरी … बाल बच्चों का सवाल …
हम  चलने  लगे तो मैनेजर ने कहा कि आप यह अर्जी मुझे देते जाओ ताकि मैं अपने स्टाफ को दिखा सकूँ कि अब पुराने वाला तरीका नहीं चलेगा |
जब हम वहाँ से निकले तो ग्रहण हट चूका था सूर्य का भी और भ्रष्टाचार का भी | लेकिन ग्रहण तो आते रहते हैं | लेकिन जज्बा सूरज वाला होना चाहिए जो हर बड़े ग्रहण के बाद निकल के आता है नयी रौशनी के साथ |
(मेरे दूसरे  ब्लॉग बतकही से)













Monday, November 14, 2011

कहीं यह जनश्रुति न बन जाए ....

 

यह अनुबाव मैंने अपने दूसरे ब्लॉग बतकही शेयर किया था लेकिन आज मैंने एक शिक्षिका प्रशिक्षण में मैंने इस अनुभव को फिर सुनाया तो मेरी इच्छा हुई कि इसे 'कथोपकथन पर फिर से शेयर किया जाए ।

के जी बी वी पीपलू की लड़कियों की शैक्षणिक स्तिथि का ग्रोथ चार्ट मैंने शिक्षिकाओं से बात की कि जो लड़किया ए समूह में पहले से हैं वो तो हैं , लेजिन जो पिछले महीने बी या सी में थीं उन्हें ठीक से पता करो कि वो कहाँ पहुंची हैं. इस कम को करने के बाद शिक्षिकाओं ने जो रिपोर्ट बनाई उसे देख कर मैं चोंक गया . सब लड़कियां ए में थीं. यह उम्मीद से कहीं ज्यादा था. मैंने कहा अगर ऐसा है तो यह बड़ी बात है. उन्होंने कहा मौसमी और पाना को छोड़ कर सब लड़कियां किताब पढ़ने लग गयी हैं और गणित कि संक्रियाओं को कर रहियो है. मैंने उन सभी लड़कियों से किताब पढवा कर देखी .सब धाराप्रवाह पढ़ रहीं थीं . हाँ अभी उन लड़कियों को तीन संख्याओं का भाग करने में दिक्कत है. लेकिन उनके साथ कक्षा के अनुरूप पाठ्यपुस्तक के साथ काम शुरू कर दिया है . अतिरिक्त समय में बुनियादी चीज़ों को मजबूत करने पर काम हो रहा है.
यहाँ बात रह जाती है मौसमी और पाना की . ये दोनों आठवीं जमात की लड़कियां हैं. एक बात पूरे के जी बी वी में जनश्रुति कि तरह फैली है कि “ मौसमी और पाना पढ़ नहीं सकती “ ये तीन साल से के जी बी वी में हैं.
मैंने टीचर्स से पूछा कि क्या बात है इन लड़कियों की दिमागी सेहत तो ठीक है? वे बोलीं हाँ एकदम ठीक है . बस इनका मन पढ़ने में नहीं लगता . मैंने सोचा, ‘ मौसमी पढ़ नहीं सकती वाला मिथक अब टूटना चाहिय.’ मैं कक्षा कक्ष में गया . हैड टीचर तारा नामा भी मेरे साथ थीं. मैंने पाना को पढ़ने के लिए कहा तो वह वाक्यों और शब्दों को तोड़ तोड़ कर पढ़ रही थी . इसके बाद पाठ्य पुस्तक मौसमी के हाथ में दी. मौसमी पुस्तक खोले कड़ी रही लेकिन पढ़ने के लिए लैब तक नहीं हिलाया. हम दोनों ने उसे खूब प्रोत्साहित किया . वह किताब देखते हुए भी किताब से अलगाव बनाए हुए थी . मौसमी में कोई जुम्बिश नहीं हुई. मैं सोच रहा था कि अब क्या किय जाए. तभी मुझे ध्यान आया कि मेरे हाथ में के जी बी वी कि लड़कियों के नामों कि लिस्ट है . मैंने मौसमी से कहा कि यह तुम्हारे स्कूल कि लड़कियों के नामों कि लिस्ट है, ‘इन्हें पढ़ो तो जरा.’ मौसमी पूरी लिस्ट धारा प्रवाह पढ़ गयी . यह क्या हुआ! हम चकित थे . मैं के जी बी वी से लौट कर होटल में देर तक सो नहीं पाया . सोचता रहा कि तीन साल तक इस लड़की को कुछ भी सुपाठ्य नहीं मिला जिसे पढ़ कर मौसमी सफलता का अहसास कर सके. उसके सामने तो हमेशा (कु) पाठ्य पुस्तक ही रही. जिसके अर्थों के तिलस्मी द्वार वह खोल नहीं पाती. तहरीरों में उसे कही. तक़रीर जज़र नहीं आती. उसे पता नहीं इन किताबों से कहाँ पहुंचा जाता है. फलस्वरूप यह फतवा “मौसमी पढ़ नहीं सकती.” उसकी नियति से जुड़ जाता है. होना यह चाहिए कि उसके बस्ते से सारी पाठ्य पुस्तकें निकाल कर उतनी ही संख्या में कहानियों कि किताबें रख देनी चाहिए और फिर देखा जाए कि “मौसमी पढ़ सकती ....”
अगले दिन ताराजी से मैंने बात की. उनहोंने दोनों लड़कियों को बुलाकर कहा कि कंप्यूटर रूम में लाईब्रेरी कि किताबें राखी हैं , जो भी , जितनी भी पसंद आए ले लो. दोनों लड़कियां किताबों कि तरफ दौड़ चलीं . ईश्वर करें ये कभी न रुकें .

Sunday, October 9, 2011

रंगमंच (Theatre) : वंचित वर्ग की शिक्षा का माध्यम को हमेशा हाशिये पर रखा गया है।

तब मैं 8-9 वी कक्षा मे पढ़ रहा था जब मुझे पहली बार मुझे किसी नाटक मे काम करने का मौका मिला। देखने का अवसर शायद उससे भी 4-5 साल पहले मिला होगा । ये सभी अनुभव मुझे गाँव में ही हुए । रूप-बसंत, हीर-रांझा, नल-दमयंती, सरवर-नीर, हरिश्चंद्र ये सभी दास्तानें मैं गाँव मे ही रंगमंच पर देख चुका था । गाँव के युवा एक टोली बनाकर साल मे एक दो एक शोकीया तरह का रंगमंच किया करते थे। मंचन के बाद तक उनके अभिनय की चर्चाएँ हुआ करती थीं। हम जो उस वक़्त किशोर थे, मन में इच्छा होती थी कि हमे भी किसी नाटक में अभिनय का मौका मिले। मौका मिला, रिहर्सलें शुरू हुई, शाम का घूमने का समय रिहासलो मे जाने लगा... तैयारियां ... उत्साह.... मस्ती ... 12-13 सौ आबादी वाला पूरा गाँव जुटा सिवा हमारे घरवालों के ...चूंकि घर की दीवार से जुडते हुए स्कूल मे ही रंगमंच बनाया जाता था। इसी स्कूल मे पिताजी दिन भर बच्चों को पढ़ते थे लेकिन नाटक देखने नहीं आए । दादा जी के आने का तो सवाल ही नहीं था... वो तो शादी मे ढ़ोल तक नहीं बजने देते थे, नाटक तो बहुत आगे की चीज़ थी। माँ ने शायद घर के छज्जे से देखा था। मंचन के बीच लोग पैसे भी देने लगे । चूंकि यह पेशेवर समूह नहीं था इसलिए लोगों से कहा गया कि अगर आपको देना है तो स्कूल के कमरे बनाने के लिए दें ... कोई ईंटों के लिए बोल रहा है, कोई पत्थरों, चुना बजरी... इत्यादि... इससे पहले प्रतिस्पर्धा ज्यादा बढ़े इसे भी तुरंत बंद किया गया । लोगों को खूब मज़ा आया। नाटक के अगले दिन ही नाटक का शास्त्र (समाज शास्त्र) समझ आने लगा। नाटक के दर्शकों की तो सराहना मिली लेकिन अपने घर से उतनी ही प्रताड़णा। सभी अभिनेताओं के साथ कमोबेश यही स्थिति थी। कुछ ही दिनों मे पड़ौस से दो तीन गांवों से भी मंचन के आमंत्रण भी आए लेकिन घर वालों ने सीमा रेखा खींच दी .... यह कैसे हो सकता है कि किसी कला माध्यम का प्रतिफल मंचन सम्माननीय हो लेकिन उसका कलाकर्म या कलाकर्मी को उतना ही हेय या तिरस्कार योग्य समझा जाता हो। उसके बाद  नाटक से तो दूरी बन गई लेकिन  बावजूद इन वर्जनाओं के नाटक के लिए प्रेम व रुचि बनी रही और साथ मे यह सवाल भी जिंदा रहा कि एक सशक्त कलकर्म के प्रति समाज का यह दोहरा रवैया क्यों है ?
यह तो गाँव की बात थी लेकिन जब आगे कॉलेज की पढ़ाई करने शहर गया तो यहाँ भी स्थिति कोई फर्क नहीं थी। जैसा की किशोर उम्र मे होता है जिस काम के लिए मनाही होती है वही चुनौती बन जाती है । शहर जाने पर रोज़मर्रा की ज़िंदगी मे हस्तक्षेप ढीला होते ही थियेटर शुरू कर दिया । सबसे पहले कॉलेज में । यहाँ कोई दिक्कत नहीं थी ... खूब मान और प्रोत्साहन मिला । एक स्कूल-कॉलेज ही ऐसी जगह हैं जो नाटक के संस्कार को कुछ हद तक बच्चों मे डालते हैं और इस विधा को बचाए हुए हैं नहीं तो यह विधा भी विदा हो गई होती । कॉलेज के बाद जब शहर मे मुख्य धारा का रंगमंच शुरू किया तो यहाँ भी स्थितिया कुछ अलग नहीं थी । सबसे बड़ी मुश्किल तो साथी actor मिलने की होती है। एक औसत शहर मे नाटक करने के लिए 10-12 लोग जुटाना बहुत बड़ी चुनौती है। महिलाओं का आना तो असंभव सा दिखता है। एक बार की घटना है मैं एक जगह पर अपनी टीम के साथ नुक्कड़ नाटक कर रहा था । वहीं पर एक कॉलेज के समय का मित्र मिला। नाटक के बाद हमसे मिला मंचन की तारीफ की। साथ मे चाय पी और बातों ही बातों मे कहा “ दलीप भाई कोई काम क्यूँ नहीं करते... मैं एक दो अच्छे स्कूलों को जनता हूँ ... ठीक पैसे दे देंगे ...।" लोग यह बात समझने को तैयार ही नहीं थे कि मैं नाटक में ठीक-ठीक आजीविका कमा रहा था और मेरे साथ मेरे समूह के भी 5-7 लड़कों को रोजगार मिला हुआ था। लेकिन लोग आज इक्कीसवीं सदी में भी नाटक को सम्मानजनक रोजगार के रूप मे नहीं देखते हैं। सम्मानजनक ही नहीं लोग तो इसको काम ही नहीं मानते। ढाई-तीन घंटे का नाटक देखने के बाद मंच के पीछे आकार मिलने वालों मे ऐसे लोगों की संख्या अच्छी ख़ासी होती है जो यह कहते हैं, “अच्छा अभिनय करते हैं... वैसे आप काम क्या करते हैं?”
ऐसी स्थिति दूसरे कला माध्यमों के साथ नहीं है। यों तो सभी कलाओं का उद्देश्य लोकरंजन करना होता है लेकिन एक हेतु है जो नाट्य कला को अन्य कला रूपों से अलग करता है, वह है लोक शिक्षण की भूमिका । इसकी यही लोक शिक्षण की भूमिका ही इसकी स्थिति के लिए जिम्मेदार है। ऐसा हर युग मे होता रहा है कि शिक्षा व्यवस्था को राज सत्ता या शक्ति सम्पन्न वर्ग ने अपने नियंत्रण मे रखा है। प्राचीन काल मे शिक्षा राजाओं के नियंत्रण मे रही और वर्तमान मे यह सरकार और पूँजीपतियों के आश्रय पर है । हर काल मे इन वर्गों का हित इसी मे था कि यह कभी वंचित या शोषित तक नहीं पहुँच पाए । यूं तो सभी कलाएं कमोबेश लोक शिक्षण का काम करती हैं लेकिन नाट्य कला की उत्पत्ति का मुख्य उद्देश्य शिक्षण ही माना है।
नाट्य शास्त्र की उत्पत्ति के पीछे एक कथा प्रचलित है कि नाट्य शास्त्र के लिखे जाने से पहले चारों वेद ही ज्ञान का स्रोत व शिक्षण का माध्यम रहे हैं... जब ब्रह्मा ने देखा कि समाज के एक बड़े तबके के लिए वेदाध्ययन वर्जित कर दिया गया था, जिनमे स्त्रियाँ और शूद्र थे। लगभग समाज की आधे से ज्यादा आबादी शिक्षा प्रक्रिया से काट दी गई थी। दलित और वंचित वर्गों को भी शिक्षित किया जा सके इसके लिए ब्रह्मा ने पांचवे वेद की रचना करने का काम भरत मुनि को सोंपा। भरत मुनि ने नाट्य शास्त्र के रूप में पांचवें वेद की रचना की।
भरत मुनि और उसके सौ पुत्रों ने नाटक का अभ्यास शुरू किया। नाट्य शास्त्र के चौथे अध्याय मे भरत मुनि ने बताया कि उन्होने नाट्यवेद का प्रयोग करते हुए दो नाटक तैयार किए एक 'अमृत-मंथन' और दूसरा 'त्रिपुरदाह'। दोनों नाटकों को देखकर देवता बहुत खुश हुए। देवलोक और पृथ्वी पर नाट्यवेद की धूम मच गई कि इसका प्रयोग बहुत अच्छा हो रहा है। देवताओं का खुश होना जरूरी है। पहले देवलोक मे जब नाटकों के मंचन होते थे तो कथानक शास्त्र आधारित होते थे । जिनमें देवताओं और असुरों के युद्धों पर आधारित कथानक होते थे। लेकिन नाटक का अवतरण जब धरती पर हुआ तो भरत मुनि के शिष्यों ने मनचाहे प्रयोग करने शुरू कर दिये । यह छूट भरत मुनि ने अपने अभिनेताओ को दे रखी थी कि वे अपने मन से प्रयोग कर सकते हैं। राधावल्ल्भ त्रिपाठी , अपने लेख मे नाट्य शस्त्र की व्याख्या करते हुए बताते हैं ...
“ भरत मुनि ने नाट्य के तीन मापदंड बताए हैं – लोक, वेद(शास्त्र) और  अध्यात्म यानि अभिनेता की अपनी चेतना । भरत मुनि ने अभिनेता को बार-बार चेताया है कि जो शास्त्र से पता न चले तो उसे लोक यानि आस-पास की दुनिया से समझे और जो लोक और शास्त्र दोनों से समझ मे न आए उसे अपनी स्वयं की चेतना से समझे..”
– राधवाल्ल्भ त्रिपाठी, ‘भरतमुनि के बारे मे’ (रंग मंच के सिद्धान्त)
भरत के शिष्य लोक कथनक आधारित ऐसे प्रहसन दिखाने लगे जिनमे ऋषियों पर व्यंग्य प्रहार होते थे। दरअसल अब नाटक लोक शिक्षण की सही भूमिका मे आया था। जिसमे उन्होने अपने आस-पास की चीजों को और अपने अनुभवों को शामिल करना शुरू कर दिया। सवाल उठाना शुरू कर दिया । ये प्रयोग देखकर ऋषिगण क्रोधित हो गए और उन्होने श्राप दिया -
“ हे द्विजों, क्या तुम लोगों के लिए हमारी इस तरह विडम्बना दिखाना और परिहास उचित था? यह हमे स्वीकार नहीं। जाओ तुम लोगों का ज्ञान नष्ट हो जाएगा, तुम लोग व्रत और होम से रहित होकर हो जाओगे। तुम लोगों का वंश अपवित्र होगा।”
जैसा की ऋषियों के श्राप में होता है की उनके शाप का अक्षरश: पालन होता है। भरत मुनि के सौ पुत्र एक शाप से शूद्र से भी शूद्रतम हो गए। एक बार फिर आम जनता के शिक्षण के माध्यम को जनता से काटने का काम कर डाला गया। नाटक के लोक शिक्षण का माध्यम बनने के लिए यह जरूरी था कि लोग इससे जुड़ें और अपने अनुभवों को नाटक के माध्यम से साझा करके ज्ञान के निर्माण और सार्वजनीनकरण में अपनी भूमिका अदा करें। ज्ञान सृजन की इस प्रक्रिया को बाधित कर दिया गया। इस तरह नाट्यकर्म एक जाति तक ही सीमित हो गया। इनको गाँव या शहर मे रहने की इजाज़त नहीं थी। रहना तो दूर गाँव में घुसने की भी आज़ादी नहीं थी।  शूद्र वर्ण मे आने वाली जतियों की भी बसावट यों तो गाँव की परिधि पर होती थी लेकिन नक्शे से बाहर नहीं थी । क्योंकि इन जतियों का गाँव की अर्थ व्यवस्था में बहुत योगदान था । इसलिए इनका गाँव मे रहना अपरिहार्य था । जबकि भरतमुनि के वंशज जो कालांतर में नट और कंजर(जो नाट्य कर्म करते रहे) उन्हे जरायम पेशा (अपराधी जाति) माना गया । गाँव या शहर में दिखते ही इन्हे गिरफ्तार कर लिया जाता था। जरायम पेशा जातियों के बारे मे अधिक जानने के लिए उपन्यास, कब तक पुकारूँ (रांगेय राघव) तथा अल्मा कबूतरी (मैत्रेयी पुष्पा) को देख सकते हैं। अभिनेता की दुनिया दर्शक की दुनिया से ज़ुदा हो गई। पीड़ाएँ अलग हो गईं, सरोकार अलग हो गए। जहां से एक कलाकार का अनुभव संसार समृद्ध होता है वह है समाज से सहचर्य और संगति और वहीं से उसे भावनात्मक ऊष्मा मिलती है, वह स्रोत रोक दिया गया । दोनों के सच अलग हो गए। उद्देश्य लोक शिक्षण से हट कर मनोरंजन हो गया। इस तरह के रंगमंच के पनपने की सबसे सही जगह थी राजदरबार। राज सभाओं मे वही पुराने आख्यानक मंचित होने लगे। इन नाटको के कथानक तो पौराणिक होते थे लेकिन परोक्ष रूप से राज कुलों को ही महिमामंडित किया जाता रहा। इस किस्म के कथानकों से शासक वर्ग आसानी से तदात्मय कर लेना आसान था। जनता इससे कटती चली गई। वहीं से शुरुआत होती है एक तरह के शासक वर्ग के आश्रय पर चलने वाले रंगमंच की । इसके प्राचीन प्रमाण बाणभट्ट के नाट्यकर्म मे मिलते हैं । बाणभट्ट अपने लिखे नाटकों को हर्ष के नाम से मंचित किया करते थे ।
... कालिदास के कदमो पर चल कर बाण सिर्फ खुशामदी कवि ही बना रहा... खुद के लिखे नाटकों नागानंद, रत्नावली और प्रियदर्शी को हर्ष के नाम से मंचित किया... हर्ष चरित्र की रचना भी खुशामदी के लिए की... कादम्बरी मे भी जो राजदरबार, रनिवास प्रासाद आदि के वर्णन भी अतिशयोक्ति पूर्ण किया है...
- राहुल सांकृत्यायन , दुर्मुख (वोल्गा से गंगा)
इसके पश्चात रंग मंच राजश्र्य से कभी मुक्त नहीं हो पाया । अपनी शिक्षण की भूमिका मे लौटने की जद्दोजहद हमेशा रही। कई उत्थान आए । पारसी रंगमंडलिया, भारतेन्दु युग का रंगमंच जो इसको मुक्त करके असली एजेंडे की तरफ लाने के प्रयास हैं । या फिर आजादी के बाद रगमंच का सफदर नुक्कड़ के माध्यम से प्रयास होते हैं जो उनको शहादत की कीमत पर होते है। या अब देखने मे आता है की समकालीन रगमंच मे भी अरविंद गौड़ जैसे व्यक्ति की टीम के कलाकारों को इस लिए आतंकी समझ कर गिरफ्तार कर लिया जाता है कि उन्होने काले कपड़े पहन रखे हैं । इसकी सिर्फ एक वजह है कि वो एक ऐसे रंगमंच की तरफ अग्रसर हैं जो सरकारी अकादेमियों के रहमो कर्म पर नहीं चलता।
अपने उद्भव से लेकर आज तक रंगमंच मे कई उत्थान-पतन आए। नाटक लिखे भी गए। नाटक मंडलियाँ भी बनी। नाटक कि बेहतरी के लिए अकादमियां भी बनी, बजट भी बने। लेकिन नाटक लोक शिक्षण की भूमिका में नहीं आ सका। एक चीज़ जो तब से लेकर आज तक बिलकुल नहीं बदली वह है रंगकर्मी और रंगकर्म के बारे में समाज का रवैया । रगकर्म के प्रोफेशन को आज भी सम्मानजनक स्थान नहीं मिल पाया है। इसकी कील भी वही ठुकी हुई है जहां हमारी  चेतना मे वर्ण व्यवस्था की ठुकी हुई है।
क्योंकि गरीब दलित या वंचित की शिक्षा को यहाँ हाशिये पर रखने की साजिश हर युग मे होती रही है। चाहे वह नाटक के माध्यम से शिक्षा हो या किसी और माध्यम से । वर्तमान में भारत मे प्राथमिक शिक्षा की स्थिति किसी से छुपी नहीं है। अभी एक रिसर्च के सिलसिले मे देखा कि कक्षा 6-7 तक ऐसे लड़के लड़कियां पहुँच जाते है जिनको अभी शब्द पढ़ने नहीं आते गणित की जोड़-बाकी बुनियादी गणनाएँ नहीं कर पाते हैं। ये सभी बच्चे सरकारी स्कूलों से हैं। वही सरकारी स्कूल जिनके लिए पिछले 10 सालों से हजारों करोड़ के हर साल बजट का सर्व शिक्षा अभियान चलाया जा रहा है। और पिछले दो साल से शिक्षा का अधिकार अधिनियम चल रहा है लेकिन स्थिति ढाक के तीन पात है। यह सिर्फ इस लिए है कि इन स्कूलों में गरीब के बच्चे पढ़ते हैं। और गरीब की शिक्षा हमेशा कुछ लोगों के लिए खतरा बन जाती है।
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दलीप वैरागी 
09928986983 

Wednesday, October 5, 2011

आकाश टेबलेट: लेकिन सुविधाओं को आदत है, ठीक गरीब की चौखट से मुंह मोड़ लेती हैं ।

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आज आखिर कपिल सिब्बल ने पिछले साल किए वादे को पूरा करते हुए दुनिया का सबसे सस्ता लैपटाप “आकाश टेबलेट” आज लॉंच कर दिया । राजस्थान आईआईटी आर ब्रिटेन की एक कंपनी के संयुक्त प्रयास से यह संभव हो पाया है । इस योजना को काफी महत्वकांक्षी व उम्मीद भरी दृष्टि से देखा जा रहा है। ऐसा कहा जा रहा है कि जो टेबलेट पीसी आज बाज़ार मे 10 – 11 हज़ार रुपए मे मिल रहे हैं वही सरकार को 2200 रुपए मे पड़ रहा है और सरकार इस पर सबसिडी देकर मात्र 1100 रुपए उपलब्ध करवा रही है।
इस योजना के पीछे सरकार का सोच है कि लैपटाप जैसी महंगी तकनीक महंगी होने के कारण सबसे गरीब व्यक्ति तक नहीं पहुँच पाती है। मंशा है कि कम से कम कीमत में लेटेस्ट टक्नोलोजी गरीब विद्यार्थियों के हाथ में देना ताकि वे ज्ञान की दुनिया तक पहुँच बनाने की हैसियत पा सकें। इसमे कोई दोराय नहीं कि अगर इस योजना का ईमानदारी से क्रियान्वयन होता है तो यह गरीग के साथ-साथ इस मुल्क का कायाकल्प कर सकती है । लेकिन अपने यहाँ सुविधाओं और योजनाओं को गरीब की चौखट से मुँह मोड़ कर वापस लौट आने की आदत है।
इस तरह की बातें कहने में बहुत पीड़ा होती है लेकिन क्या करें यहाँ का जमीनी यथार्थ ऐसा ही है। पिछले चार-पाँच सालों से कुछ स्कूलों मे जाना होता रहा है।   सरकारी स्कूलों में कंप्यूटरिकरण की योजनाओं को  दम तोड़ते देखा है। स्कूलों मे कंप्यूटर तो पहुँच गए हैं लेकिन आज तक किसी इन्टरनेट नेटवर्क से नहीं जुड़ पाये हैं तमाम प्रयासों के बावजूद । जबकि मॉडेम खरीदने, मासिक बिल भरने के बजट मे प्रावधान हैं तथा साथ मे एजुकेशन कमिश्नर का कनैक्शन लेने का अनुमति पत्र भी । अब बताओ एक सरकारी व्यवस्था मे और क्या चाहिए? लेकिन टीचर सालों से एक ही बात कह रहे हैं कि अप्लाई कर रखा है। यह दलील उस युग मे दी जा रही है जब तमाम कंपनियों के प्रतिनिधि दोहरे होकर कनैक्शन देने के लिए खड़े हो जाते हैं और शाम होने से पहले एक्टिवेट कर देते हैं। दरअसल सरकार की तमाम कोशिशों के बावजूद टीचर नेट कनैक्शन नहीं ले रहे हैं । उन्हें भय कि अगर नेट कनैक्शन लग गया तो स्टूडेंट्स सारी दुनिया से जुड़ जाएंगे। और जो अनियमितताएँ टीचर कर रहे हैं चाहे वह मिड डे मील मे हो या बिल्डिंग निर्माण के घपले या और कुछ । बच्चे सब कुछ देखते हैं । वे मेल कर सकते हैं एजुकेशन कमिश्नर को, शिक्षा मंत्री को , भारत के राष्ट्रपति को या पूरी दुनिया मे कहीं भी । बच्चे तो बच्चे होते हैं । सच के ज्यादा निकट होते हैं । सच बोल सकते हैं, सच खोल सकते हैं । बस उनको सुनने वाला होना चाहिए । नेट लग जाने से बच्चे मिनटों में बहुतों को बेपरदा कर सकते हैं। इस लिए जब तक नेट न लगे तो ....
ईश्वर करे “आकाश टेबलेट” सफल हो । लेकिन आशंका तो यहाँ भी व्याप्ति है कि जब मॉडेम आज तक नहीं पहुंचे तो वाई-फ़ाई कब तक होगा । ये टेबलेट पीसी भले ही गरीब बच्चों तक पहुँच जाएँ लेकिन कनेक्टिविटी के बिना तो ये महज म्यूजिक स्टोरेज डिवाइस भर बनके रह जाएंगे ।
अगर सरकार वास्तव मे ही सबसे गरीब को लाभ पहुंचाना चाहती है तो इस स्कीम की सही मॉनिटरिंग और फॉलोअप होना चाहिए ।

Wednesday, September 28, 2011

बच्चों का रंगमंच: कहीं भी, कभी भी ...

मैं जिस दृश्य का ज़िक्र यहाँ करूंगा हो सकता आपको मामूली लगे । दरअसल सुबह जब मैं ऑफिस के लिए निकला तो कॉलोनी के नुक्कड़ पर जो मुख्य सड़क से जोड़ता है । इसी नुक्कड़ पर एक फोटोग्राफर की दुकान हुआ करती थी जो अब उसने खाली कर दी है । फोटोग्राफर दीवार पर जो चित्रपट्ट छपवाते हैं ताकि शौकीन लोग उसके आगे खड़े होकर फोटो खिंचवा सकें। दुकान खाली होने पर भित्तिचित्र लगा रह गया था। जब मैं दुकान के आगे से गुजरा तो वहाँ का दृश्य देख कर ठिठका। वहाँ 7 से 10 वर्ष उम्र के दो लड़के थे । एक लड़का उस वॉलपेपर के सामने किसी अदाकार की तरह खड़ा था और दूसरा किसी प्रोफेशनल फोटोग्राफर की तरह फोटो खींचने का अभिनय कर रहा था । खिंचवाने वाला अलग-अलग अंदाज़ मे खड़ा होकर खिंचवा रहा था । मैंने थोड़ी देर तक रुक कर इस अभिनय को देखा फिर यह जान कर कि इस आयोजन में मैं निसंदेह अयाचित दर्शक हूँ । मेरी उपस्थिती इस अभिनय व्यापार को कहीं रोक न दे इसलिए मैं न चाहते हुए भी वहाँ से निकल गया ताकि यह नाटक अपनी संपूर्णता तक पहुँच कर खत्म हो सके। पूरे रास्ते मैं इसी घटना पर सोचता रहा बच्चों के बारे मे, नाटक के बारे में कि कैसे ज़रा सी फुर्सत मिलते ही बच्चे अभिनय शुरू कर देते हैं । कितनी जल्दी सब एक सुर मे आ जाते हैं । एक सुर मे आते ही नाटक के सब साजो समान भी जुट जाते हैं और शुरू हो जाता है खालिस अभिनय। यहाँ बच्चों और बड़ों के नाटक मे एक अंतर होता है कि जहां बड़ों का रंगमंच दर्शकों की बाट देखता रहता है और जब तक दो ढाई सौ दर्शक नहीं जुट जाते, रंग ही नहीं जमता लेकिन बच्चों के नाटक में एक भी दर्शक रंग में भंग डाल सकता है। दरअसल यह अंतर इस लिए है कि दोनों के उद्देश्य भिन्न-भिन्न होते हैं। बड़े जहां अपने नाटक के माध्यम से लोगों को शिक्षित कर रहे होते है जबकि बच्चों के नाटक मे वे खुद सीख रहे होते हैं(बड़े भी सीख सकते हैं)। वे नाटक के माध्यम से अपने पास-पड़ौस की दुनिया को समझ रहे होते हैं । एक अनुभव है। गाँव मे एक मेरी भतीजी है योगिता । जब वह लगभग तीन साल की थी वह शाम के समय अपनी उम्र बच्चों के साथ घर की छत पर खेल रही थी। अचानक ऊपर से रोने की आवाजें आईं । भैया छत पर गए और वहाँ का दृश्य देख कर दंग रह गए। वहाँ का दृश्य कुछ इस प्रकार था कि योगिता फर्श पर लेटी हुई थी और उस पर कपड़ा कुछ इस प्रकार डाल रखा था जैसे मरने के बाद किसी मृत शरीर को ढंका जाता है। बाकी सभी बच्चे उसे चारों तरफ से घेरे हुए रुदन-विलाप कर रहे थे। कुछ गले लग कर वैन कर रहे थे । भैया कुछ देर तो देखते रहे फिर उनके लिए असहनीय होने लगा । इतने मे ही बच्चों को बाहरी आदमी की उपस्थिती पता चल गई । खेल खत्म, सब भाग गए सिवा योगिता के, वह अब भी अपनी भूमिका से बाहर नहीं आई थी और वैसे ही पड़ी हुई थी । भैया ने झिझोड़ कर खड़ा किया और पूछा कि ये क्या ड्रामा है ? उसने बताया कि पिछले दिनों पड़ौस के घर मे वैशाली के भाई की मृत्यु हुई तब लोग ऐसे ही .... तो बच्चे पड़ौस की जो उन्होने समाज मे घटते हुए देखा उसे अपनी तरह से समझ रहे हैं। तात्कालिक घटना यह है और सब बच्चे अनायास ही मृत्यु से जुड़े अपने–अपने देखे अनुभवो को यहाँ शेयर करेंगे और नई अवधारणाएँ बनाएँगे । मृत्यु जैसे यथार्थ को उन्होने कैसे देखा समझा। मृत्यु का समाज और परिजनों पर क्या असर पड़ता है उस सच को अभिनय के माध्यम से दूसरे के स्तर पर महसूस करके देखना चाहते हैं । बच्चे बहुत से जटिल और दार्शनिक महत्व के प्रश्नों के समाधान ऐसी ही सरल प्रक्रियाओं से समझ लेते हैं। कुछ सवालो के जवाब यहाँ अपने आप साफ होने लगते हैं कि “क्या अभिनय सीखने की चीज़ है या नहीं ?” या “क्या हर इंसान को रंगमंच की कला का अहसास होना चाहिए?” यह जान लेना चाहिए की अपनी ज़िंदगी मे ज़्यादातर अभिनय 5-6 साल की उम्र तक हम कर लेते हैं । हाँ , यह अलग बात है तब उसका स्वरूप अलग होता है । बचपन का अभिनय प्रदर्शनोन्मुखी नहीं होता है। वह खुद के सीखने के लिए है। वहाँ सिर्फ दर्शक के लिए कोई गुंजाइश नहीं है। उनकी दुनिया मे सब अभिनेता है, सब दर्शक है, सब समीक्षक हैं। आप उनकी दुनिया में दर्शक बन कर शामिल नहीं हो सकते, उनकी दुनिया का हिस्सा बने बिना तो आप एक जासूस की तरह ही उनका रंगमंच देख सकते हैं । उनकी दुनिया का हिस्सा होना आसान बात नहीं है। जबकि इसके उल्टा होता है हम पहले जासूस बनके उनके रंगमंच में झाँकते हैं तो हमे उनके नाटक या तो बचकाने लगते है या असहनीय। क्योंकि कई बार बच्चों के नाटकों का विषय ऐसे होते हैं जिनके बारे मे हम मान कर चलते है कि बच्चों को ऐसे विषयों पर नहीं सोचना चाहिए। लेकिन वे सोचते हैं । वे अपने नाटको मे बड़ों कि दुनिया के उन कोनों को भी झांक जाते है जो उनके लिए बंद हैं। फिर हमारा जासूस तानाशाह मे रूपांतरित हो जाता है और हम उनके मासूम नाटकों पर सेंसरशिप लगाकर उन्हें तथाकथित रूप से सामाजिक बनाने की कवायद में लग जाते हैं। किशोर अवस्था तक पहुँचते उसके अभिनय के सहज सोते को सुखा डालते हैं। बाद मे अभिनय की शिक्षा के लिए स्कूलों और कॉलेजों मे हजारों खर्चते हैं। यदि इस कवायद में कोई निकाल के आता है तो उसके बाद तैयार कलाकार को खड़ा करने के लिए दान, अनुदान और अकादमियां लगी हुई हैं।
इसके बाद हम कोशिश करके जो रंगमंच बना पाते हैं वो होता है एक विभाजित रंगमंच; जिसके एक धडे मे अभिनेता है और उसकी टोली तथा दूसरी तरफ है दर्शक, जो लाख मनुहारों के बाद प्रेक्षागृह तक आ जाता है। दृश्य की समाप्ती पर ताली बजाता है, नाटक के आखिर मे अभिनय पर फतवा देकर चला जाता है। दर्शक और अभिनेता कभी एक सुर मे नहीं आ पाते हैं । यहाँ तक कि कोई रिश्ता ही नहीं बन पता है। यहाँ एक सुर का मतलब किसी सिंफनी के साज़ों की तरह एक नोट पर बजना या फिर एक तरह से सोचना नहीं है। यहाँ आशय सार्थक संवाद से है । यह संवाद ज़्यादातर लोक नाट्यों मे मिलता है। इस तरह के लोकनाट्यो मे दर्शक तटस्थ या स्थिति से अलगाव कायम रखने वाला दर्शक नहीं होता है। वह जहां कहानी के साथ वैचारिक रूप से जुड़ता है । नाटक के दौरान अभिनेता का उससे संवाद भी होता है और कथानक के विकास मे सहयोग भी करता है । मेरे गाँव का का अनुभव है, हम स्कूल के एक समारोह मे नौटंकी “अमरसिंह राठौड़” कर रहे थे । एक युवा कलाकार जो कि इसमे रामसिंह कि भूमिका निभा रहा था वह अपने संवाद भूल रहा था । लेकिन तभी दर्शकों मे से एक टीचर जो कि बाहर किसी गाँव से आए हुए थे सफा बांध कर मंच पर आ गए और उसकी तलवार लेकर उसे दर्शकों मे बैठ कर देखने को कहा । उन्होने नाटक के उसी बिन्दु से अपनी भूमिका को उठाया । नाटक की गति और गुणवत्ता मे जरा भी गिरावट नहीं आई । अत: यह कहा जा सकता है कि अधिकतर लोक नाट्य बच्चो के नाट्य के निकट बैठते है । जहां पर दर्शक सिर्फ दर्शक नहीं है बल्कि उसका नाटक मे एक्टिव पार्टीसिपेशन होता है।
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दलीप वैरागी 
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Wednesday, September 7, 2011

Theatre : सच को साधने का यन्त्र

यह २००६ - ०७ की बात है हम राजस्थान टोंक व धौलपुर जिले के स्कूलों में quality education project के तहत स्कूलों में educational support  का काम कर रहे थे | हर महीने हम स्कूलों का विज़िट करते | तीन दिन तक विद्यालय में पूरा समय रह कर अवलोकन करते थे |  टीचर्स बच्चों को पढाते कैसा हैं ? जो विधाएं टीचर्स शिक्षण में अपना रहे हैं वे कैसी हैं  और उनका बच्चों के प्रति व्यवहार कैसा ? कक्षा में बैठ कर देखते और जहाँ भी लगता हम टीचर को सपोर्ट करते | इस सिलसिले में एक स्कूल ऐसा था जहाँ सब चीजें दुरुस्त नज़र आतीं थी | टीचर्स समय पर विद्यालय आते , पूरा समय कक्षाओं में रहते यहाँ तक कि दो तीन शिक्षक तो विद्यालय समय के आलावा रुक कर अतिरिक्त कक्षाएँ भी लेते | एक चीज़ के बारे में कोई पक्का नहीं कर पा रहा था कि इस स्कूल में दंड की क्या स्थिति है? हालाँकि कई बार मैंने टीचर्स को गाली व डांट-फटकार जैसे असंवेदनशील व्यव्हार बच्चों से  करते देखा था लेकिन शारीरिक दंड को भौतिक रूप से नहीं देखा। हालांकि दंड के दोनों ही स्वरूप जघन्य हैं जबकि स्कूल में डंडे की उपस्थिति बराबर नज़र आती रही | मुझे लगता कि इस विद्यालय में बच्चों को दंड तो मिलता है लेकिन जिन दिनों मैं आता हूँ उन दिनों में टीचर संयम रख लेते हैं | ऐसा नहीं कि हम बच्चों से बात नहीं करते थे | स्कूल में हमारा अधिकतम समय बच्चों के साथ ही व्यतीत होता था | हम अध्यापक की उपस्थिति में और उसकी गैरमौजूदगी में भी बच्चों से बात करते  |  दंड के विषय में में हमने बच्चों से कई बार पूछा लेकिन बच्चों ने यही कहा कि उनके स्कूल में पिटाई नहीं होती है | एक दिन हमने एक युक्ति सोची | हम अक्सर क्लास में बच्चों के साथ नाटक पर काम करते थे | हमने सब बच्चों से कहा कि आज हम नाटक करेंगे | बच्चे बहुत खुश हुए | हमने बच्चों के चार समूह बना दिए और बच्चों से कहा कि आप अपने-अपने समूह में एक नाटक तैयार कर के लाएं जिसका विषय ‘क्लास रूम में में शिक्षक पढ़ा रहा है’  हो सकता है |
नाटक तैयार करने की प्रक्रिया से बच्चे पहले ही परिचित थे , बच्चे स्वतंत्र रूप से मिलकर थीम पर नाटक तैयार करते अगर जरूरत पड़े तो वे किसी की भी मदद ले सकते थे | जब सब समूहों के नाटक तैयार हो गए तो शाम को प्रार्थना स्थल पर बच्चों ने मंच तैयार कर जो नाटक improvise किये थे, वे करके दिखाए | नाटक देख कर सब दंग रह गए | नाटक के सभी दृश्यों में जो बच्चे टीचर बने थे वे लगातार पढ़ा रहे थे, सवाल पूछ रहे थे और ना बता सकने पर विद्यार्थी बने बच्चों को पीट रहे थे | नाटक के दृश्यों के साथ टीचर्स भी पूरा साधारणीकरण कर चुके थे | फुल एन्जॉय कर रहे और बच्चों के पिटाई के action देख कर टिप्पणियाँ भी कर रहे थे “अरे यह तो हैडमास्टर साहब की स्टाइल है |”  “ये तो बिलकुल रामजीलाल लग रहे हैं |  ... ”
ऐसा कैसे हो गया? शुरू में पूछने पर टीचर्स और बच्चे दोनों ही इनकार कर रहे थे कि हमारे स्कूल में पिटाई नहीं होती है जबकि नाटक में बच्चों ने जाहिर कर दिया और देखते हुए टीचर्स ने रियलाइज भी किया | दरअसल नाटक विधा में ऐसा है क्या ?  क्या यह झूठ पकड़ने की की मशीन है ?
नहीं। दरअसल यह सच को साधने का यन्त्र है। इसमें फॉयड का मनोविश्लेषण का सिद्धान्त काम करता है। नाटक हमारे अचेतन में सेंध लगता है। हमारा अचेतन वह स्टोर है जहाँ हमारी वह अतृप्त इच्छाएँ या वो भावनाएँ रहती है जो दबा दी  गयी होती हैं | जिनको प्रकट  करने पर सेंसरशिप होती है |  अभिनय की प्रक्रिया दरअसल स्वप्नों की तरह व्यवहार करती है | जिस प्रकार फॉयड सपनों की व्याख्या करते हुए कहते है कि   स्वप्नों के पीछे एक मूल विचार होता है और एक  स्वप्न की विषय वस्तु होती है | स्वप्न के पीछे का उद्दीपक विचार प्रतीकात्मक रूप से स्वप्न की विषय वस्तु के रूप में प्रकट होता है और स्वप्नों की व्याख्या करके मूल विचर या उसके पीछे की अतीत की घटना को पकड़ा जा सकता है | नाटक भी इसी तरह व्यवहार करता है जब आप दूसरे के स्तर पर जाकर अनुभव करते हैं तो सेंसरशिप ढीली पड़ती है और अचेतन में कहीं गहरे बैठा खुद का अनुभूत सच दूसरे के बहाने से फूट पड़ता है  | यहाँ बच्चे और टीचर दंड के बारे में बताना नहीं चाहते हैं क्योंकि बच्चों का जाहिर करने का अपना डर है और टीचर में कही अपराध बोध है | इस कारण दोनों प्रत्यक्ष बताना नहीं चाहते हैं लेकिन नाटक के मार्फत दोनों ही इस सच को स्वीकारते हैं |
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दलीप वैरागी 
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Tuesday, September 6, 2011

नाटक, स्कूली बच्चे और हम !

थियेटर पर मैंने ये अनुभव अलग-अलग समय में यहाँ वहाँ लिखे थे। Irom Sharmila Vimarsh ने फेसबुक पर जो बहस शुरू की है उसी बहाने से मैं अपने रंगमंच संबंधित लेखों को नेक जगह एकत्र कर रहा  हूँ । यह मैंने अपने दूसरे ब्लॉग बतकही से निकाला है। बहरहाल नया-पुराना चलता रहेगा ...
अभी हाल ही शिक्षा के क्षेत्र के आला लोग विद्यालयों का निरीक्षण करके लोटे उन्होंने वहाँ से लौट कर एक बहुत ही विश्लेष्णात्मक रिपोर्ट बनाई जिसमे अधिकतर यह लिखा था कि बच्चों को क्या नहीं आता | क्या आता है , यह नहीं देखा गया । ... इसमें एक बात प्रमुखता से यह थी कि बच्चों को नाटक करना नहीं आता | बच्चों से कहने पर उन्होंने नाटक नहीं दिखाया | यह बात उस स्कूल के लिए कही गयी जहाँ नियमित रूप से सैटरडे थियेटर होता है | फिर मामला क्या हो सकता है ? ''आप नाटक करके दिखाओ '' क्या किसी ग्रुप को नाटक करने के लिए इतना भर कह देना काफी होता है ? क्या यह केवल इतना ही है "चलो बेटा पोएम सुनाओ ..." नाटक सिर्फ इतना नहीं होता बल्कि इससे बहुत ज्यादा होता है | बच्चो के अकादमिक कौशल और कला कौशल को आंकने का एक ही टूल नहीं हो सकता कला को आंकना कक्षा में जाकर नौ का पहाड़ा या पर्यायवाची पूछने जैसा नहीं है | अगर ऐसा नहीं होता तो करिकुलम निर्धारित करते वक्त इनको सहशैक्षिक गतिविधियों में न रख कर अकादमिक में ही रखा गया होता | हर कला का अपना एक अनुशासन होता है उसी में उसको आंकने के टूल भी होते हैं | उस अनुशासन को समझे बिना आप आप कला का आकलन नहीं कर सकते | नाटक के सन्दर्भ में मोटी--मोटी दो तीन बातें निहित हैं कि यह टीम के बिना नहीं होता और प्रदर्शन से पहले टीम का एक सुर में होना भी बेहद जरूरी है | दूसरी बात यह है कि प्रदर्शन से पहले नाटक लंबे अभ्यासों को मांगता है तब जाकर मंच तक पहुंचता है | तीसरे यह कि प्रदर्शन से तुरंत पहले तयारी के लिए बहुत कुछ सामान मंच के लिए जुटाना पड़ता है | ये बाते स्कूल के बच्चों के लिए भी उतनी ही लागु होती हैं जितनी कि एक प्रोफेशनल दल के लिए होती हैं | अब सोचें कि जब आप किसी स्कूल का निरीक्षण करने जाते हैं तो क्या इतनी फुर्सत निकाल कर जाते हैं ? जब आप बच्चों से नाटक करने के लिए कह रहे होते हैं तब आप उनसे किस तरह का रिश्ता कायम करते हैं ? आपके शब्दों में आग्रह होता है या आदेश , बहुत कुछ आपकी उस वक्त कि मुख मुद्रा पर भी निर्भर करता है | हां , बच्चे नाटक कि जिस विधा के जबर्दस्त माहिर होते वह है रोल प्ले | उन्हें कोई स्थिति बताइए वे मिनटों में नाटक इम्प्रोवाइज कर के ले आते हैं | अत : जब भी आप बिना नोटिस के दो घंटे के लिए किसी स्कूल में जाएँ तो आप कक्षा में जाकर सत्रह का पहाड़ा तो जरूर पूछें लेकिन नाटक के लिए कहने से पहले बहुत बाते ध्यान रखनी पड़ेंगी | आप खुद अपने घर में ही छोटे बच्चे से पूछ कर देख लें कि जब महमान आने पर उससे कहते है कि बेटा चल अंकल-आंटी को पोएम सुना तब वह कैसा महसूस करता है ? सच जाने सबसे निरानन्द कि स्थिति में वह बच्चा ही होता है | हमारे यहाँ स्कूल- कॉलेजों में कलाएं विद्यार्थियों के लिए ऐच्छिक ही रहती आयीं हैं ताकि बच्चे अपनी रूचियों के हिसाब से जुड सकें | सांस्कृतिक समारोह में किसी बच्चे को जबरन किसी एक्टिविटी में भाग लेने के लिए नहीं कहा जाता था | लेकिन अब देखने में आया है कि शहरो के कुछ अंग्रेजी स्टाइल के स्कूलों में हर बच्चे को भाग लेना ही पड़ता है चाहे बच्चे कि रुचि है या नहीं | मै शहर के एक नामी प्राईवेट स्कूल में नाटक तैयार करवाने गया था नाटक के आलेख के बारे में पूछने से पहले उनकी दिलचस्पी इस बात में थी कि क्या मैं इस नाटक में उनके स्कूल के अस्सी बच्चों को खपा सकता हूँ या नहीं | आखिर अभिभावकों को उनका बच्चा मंच पर नज़र आना चाहिए | बच्चे का आनंद कहाँ है इसकी परवाह किसको है?
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दलीप वैरागी 
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Sunday, September 4, 2011

थियेटर, अभिनेता और दर्शक के बीच लेनदेन भर है... न कम न ज्यादा।

फेसबुक पर  थियेटर को लेकर चल रही चर्चा के सिलसिले में विकी तिवारी का लेख 'जय थियेटर' पढ़ा। इसी लेख ने रंगमंच पर अपने विचार लिखने को प्रोत्साहित किया। इस लेख में उन्होने रंगमंच के बड़े सवाल उठाए हैं। 
उनका कहना है -
भरतमुनि का नाट्यशास्त्र जिसे पंचम वेद कहा गया है, आज अपने अस्तित्व को लेकर संघर्षरत है. अपने शहर में, साल भर में ३-४ छोटे बड़े नाट्य समारोह, कुछ अन्य नाट्य मंचन आयोजित हो जाने के बाद भी, केवल नाटक देखने के शौकीनों और रंगकर्मियों के परिजनों के अलावा, और कोई नहीं दिखतावहीं सिंगल स्क्रीन सिनेमा एवं मल्टीप्लेक्स में आपको राजा से लेकर रंक तक दिख जायेंगे फिल्म देखते हुए और वो भी बाकायदा टिकेट लेकर, फिर चाहे वो टिकेट ३० रूपये की हो या ३०० की... ये रंगमंच का एक बहुत बड़ा दुर्भाग्य है।
विकी जी अनुभवी रंगकर्मी हैं। उनका 7 साल का सक्रिय रंगकर्म का अनुभव है। इस क्षेत्र में सात साल बहुत होते हैं। क्योंकि यहाँ कोई लंबा टिकता ही नहीं। दो तीन नाटक किए नहीं कि सब बॉलीवुड का रुख करते हैं। अधिकतर का क्या होता है यह सब जानते हैं। बाकी चार-छः जो ईमानदारी से थियेटर करने के लिए रुकते हैं उनके लिए यहाँ संघर्ष, चिंता, हताशा और निराशा इस कदर हैं कि जल्दी ही टूटन आ जाती  है। विकी भाई यहाँ पूरे हिंदी रंगमंच की पीड़ा को आवाज़ दे रहे हैं। 
दरअसल रंगमंच ऐसी विधा है जहां अखिल विश्व के तमाम कला – कौशल, गीत-संगीत, नृत्य, पेंटिंग, मूर्तिशिल्प तथा स्थापत्य एक अनुशासन मे मिलकर एक समग्रता का निर्माण करते हैं। कोई भी व्यक्ति अपनी रूचि और सामर्थ्य के हिसाब से इसमे जुड़ सकता है। लेकिन विडम्बना ये है कि इस मजबूती के बावजूद थियेटर की विधा आज सबसे उपेक्षित है। जबकि इसकी आनुषंगिक कलाएँ अपने ज़ुदा-ज़ुदा स्वरूप में आज ज्यादा मजबूत हैं। आज विभिन्न टीवी चैनलों पर जितने भी टैलेंट हंट के शो हैं, सब गीत व नृत्य कलाओं के आ रहे हैं। कहीं आपने अभिनय का टैलेंट हंट किसी चैनल पर देखा है? पाँच-छः साल पहले ज़ी टीवी ने करवाया था जो मुश्किल से दो सीज़न भी पार नहीं कर सका। नाटक विधा समूह का काम है। ग्रुप वर्क एक बहुत बड़ी ताकत है। यह स्वत: सिद्ध है और इसके लिए प्रमाणों की जरूरत नहीं है। नाटक के साथ विडम्बना यही है कि जहां ग्रुप वर्क इसकी मजबूती है, वहीं इसकी कमजोरी भी है । हमारे यहाँ समूह में काम करने की एक अजीब संस्कृति है कि शुरू में अपना दम लगाकर टीम वर्क करते हैं और फिर शीघ्र ही समूह में तंहाइयाँ खोजने लगते हैं। सफलता की तरफ बढ़ा हर कदम तन्हाइयों की तरफ ढकेलता है। हमारे यहाँ सफलता की अवधारणा सब जगह एक जैसी है, चाहे वह अर्थशास्त्र हो, राजनीति शास्त्र या फिर समाज शास्त्र। जिसके अनुसार सफलता की सीढ़ी का ऊपर जाकर संकरा होना लाजिमी है। अत: सीढ़ी के शिखर पर तन्हा व्यक्ति ही बैठ सकता है, समूह के लिए यहाँ स्थान नहीं होता है।
दरअसल सफलता का मूल्यबोध भी उलट कर देखने की जरूरत है। वस्तुत: नाट्य विधा की सार्थकता यही है कि वह टुकड़ा-टुकड़ा लघुताओं को रिश्तों के ताने-बाने मे पिरो कर एक भव्य, विराट समग्र की रचना करती है। रिश्तों की यह प्रक्रिया ऊष्मा देती है, दोनों को – समूह को भी और व्यक्ति(एक्टर) को भी। यही ऊष्मा कलाकार को संजीवनी प्रदान करती है। सफलता के शिखर पर पहुँच कर यही रिश्ते रास नहीं आते। तंहाइयाँ गहराने लगती हैं और ऊष्मा का सोता सूख जाता है। हमें पता तक नहीं चलता। कर्म (अभिनय) का प्रेरण भावना से उठता है और भावना का उद्दीपन अनुभवों से आता है। सफलता के शिखर पर खड़े कलाकार के पास रह जाता है गठरी भर अहंकार ! फिर ताउम्र चंद सफलताओं के जमाखर्च से ही काम चलता रहता है। नियति इतनी निर्मम है कि दोनों में से कोई नहीं बचता, न व्यक्ति, न समूह। मेरे शहर मे जितने भी थियेटर ग्रुप खड़े हुए थे सभी के साथ देर सवेर यही हुआ। विकी का उपरोक्त बयान वर्तमान के नाट्य परिदृश्य का बयान तो करता है लेकिन कोई समाधान नहीं सुझाता है। हाँ इतना जरूर है कि वे लोगों से एक भावुक अपील करते हैं –
“सभी अखबार एवं राष्ट्रीय फिल्म व समाचार पत्रिकाओं में एक नियमित कॉलम निश्चित करें जो नियमित, निरंतर, निश्चित रहे।  जिसमें, जैसे कि हर शनिवार-रविवार को शहर में नाट्य कला से जुडी गतिविधियों का उल्लेख हो। मेरा ऐसा मानना है कि इससे जनता नाट्य-कला के प्रति जागरूक एवं गंभीर होगी. जब तक रंगमंच को seriously लिया ही नहीं जायेगा, उसे अन्य कार्यों की तरह एक दैनंदिन कार्य के रूप में नहीं देखा जायेगा तब तक तो कुछ हो ही नहीं सकता ... बहरहाल, मेरा मीडिया और देश की जनता से अनुरोध है कि भविष्य में जब कभी आपके अथवा किसी अन्य शहर में कोई नाटक एवं नाट्य समारोह आयोजित हों तो उन्हें देखने अवश्य जाएँ। क्योंकि किसी भी फिल्म की तरह ही इसमें भी प्रकाश व्यवस्था, मंच निर्माण, संगीत आदि जैसी चीज़ों पर कई उनींदी रातों की तन तोड़ मेहनत रहती है, जिसे दर्शकों के सामने महज़ १-२ घंटों के लिए प्रस्तुत किया जाता है और इतना सब करने के बाद भी दर्शकों से वैसा फीडबैक नहीं मिलता, तो ऐसे में कलाकार का हतोत्साहित होना, उसका मनोबल गिरना लाज़मी है।“
इस तरह की अपील करने में कोई बुराई नहीं। यह अकसर होती रही हैं। मगर यहाँ दिक्कत यह है कि मर्ज सही जगह से पकड़ में नहीं आ पाता है। दरअसल मर्ज जब खुद में हो तो इलाज़ सामने वाले का नहीं करना होता है। हम मीडिया से कोई उम्मीद नहीं कर सकते हैं। यह पीपली लाइव वाला मीडिया है। मीडिया के चरित्र को समझना बहुत मुश्किल है । (मीडिया पर मेरे दो लेख “अखबार या इश्तिहार !” तथा “मीडिया का असली चेहरा कौनसा है?” इसी ब्लॉग पर छप चुके हैं देखें।) मीडिया से उम्मीद करना खुद को भुलावे में रखना है। मीडिया सिर्फ मुनाफा देखता है। रही दर्शकों की बात तो दर्शक नाटक देखना चाहते है। हमने 2002 में जब अपना पहला नाटक ‘आषाढ़ का एक दिन’ किया तो हम 500 लोगों के पास 30 रुपए का टिकट लेकर गए। हमे याद नहीं है कि किसी ने भी टिकट खरीदने से मना किया हो। नाटक के वक़्त हमने एक प्रश्नावली के माध्यम से दर्शकों की प्रतिक्रियाएँ भी जानी। लगभग सभी दर्शकों ने कहा कि हम प्रेक्षागृह तक आकार टिकट लेकर नाटक देखना चाहते हैं बशर्ते शहर में नियमित फ्रिक्वेंसी मे नाटक हों, और नाटक की भाषा लोगों के समझ में आने वाली हो। पहली बात से यह स्पष्ट है कि सब नाटक देखना चाहते हैं। यहाँ कोई मुफ्त पास नहीं मांगता। यह मुफ्तखोरी वहाँ होती है, जहां इसका रिवाज हो। क्या अपने किसी मल्टीफ्लैक्स के सामने फ्री पास लेकर खड़े किसी व्यक्ति को देखा है। फ्री पास इसलिए मांगे जाते हैं क्योंकि वे मिलते हैं। यह मुफ्तखोरी की संस्कृति दिल्ली में मंडी हाउस के आस-पास ही पनपी है। वहीं बड़ी अकादमियाँ और स्कूल हैं सरकारी पैसे से चलने वाली ... अगर नाटक के कार्मिकों की तनख़्वाहें और मंचन का खर्च सरकारी खजाने से आएगा तो फिर दर्शक को मुफ्त बैठाओ या टिकट से क्या फर्क पड़ता है? ऐसा नहीं यह सिर्फ सरकारी सहायता प्राप्त मंडलियों के साथ है। मैं एक बार अपने शहर के वरिष्ठ रंगकर्मी के पास गया और कहा कि हम लोगों ने सोचा है कि आगे से हम सब टिकट बेचकर ही नाटक दिखाया करेंगे। उन्होने कहा कि मैं भी टिकट से ही दिखाता हूँ। ये बात अलग है कि एक ही बड़ी टिकट बेच देता हूँ। अब आप बताएं कि किसी व्यापारिक प्रतिष्ठान से 25-50 हजार लेकर भला टिकट बेचने की जहमत क्यों उठाने लगे। मुफ्त पास की मांग वहीं के पढे-लिखे कलाकार ही करते है। आम आदमी की न तो फ्री पास की औकात न आदत। 
दरअसल नाटक कलाकार और दर्शक के बीच का लेनदेन है। जब इनके दरम्यान कोई तीसरा बिचोलिया आ फँसता है, तब मामला बिगड़ता है। अभिनेता को दर्शक के प्रति जवाबदेह होना चाहिए। जवाबदेही पैसा तय करता है और जब पैसा कोई तीसरा देगा तो भला अभिनेता अपनी कला में जनता के सरोकारों को क्यू लाएगा। वह तो अपने सेठ के नाम की बीन बजाएगा। जो दर्शक के इस रिश्ते को समझता है, वही सही मायने में प्रोफेशनल थिएटर करता है। यही प्रोफेशलिज़्म हम नुक्कड़ पर बैठ कर मजमा लगाकर खेल दिखाते मदारी से सीख सकते हैं। वह बरसों से एक ही स्क्रिप्ट दोहरा रहा है, वही संवाद बोल रहा है। आज भी वह आपको बीच रास्ते में रुकने के लिए मजबूर कर देता है। बकायदा खेल दिखाता है। दस रुपए देने के लिए कहता है और आपकी जेब का नोट फिर एक बार बाहर आने को मचल जाता है। उसके बाद वह शर्तिया मर्दानगी वाला तेल और चमत्कारी प्रभाव वाली अंगूठी बेच कर चला जाता है। यह वह दो कारणों से  ऐसा कर पाता है, एक वह जनता की नब्ज़ समझता है कि वे क्या चाहती हैं, दूसरे वह जनता के साथ जनता की भाषा मे बात करता है। उसने स्तानीस्लोवस्की और माइकल चेखव नहीं पढे हैं। बस उसने इस नुक्ते को पकड़ा है कि उसकी रोजी रोटी दर्शकों पर है। वह अपने काम के लिए अकादमियों का मुह नहीं ताकता है।
दूसरी बात जो हमें चौकने वाली थी कि ‘आषाढ़ का एक दिन’ की भाषा लोगों की समझ में नहीं आती है। यह मैं किसी दक्षिण भारतीय या उत्तर पूर्व के शहर की बात नहीं कर रहा बल्कि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र मे बसे अलवर शहर की बात कर रहा हूँ। ऐसे और कितने ही नाटक हैं जिन्हें हम महान कहते है, दरअसल वे हैं भी, लेकिन क्या आज भी उनकी भाषा दर्शकों की समझ में आती है? तब हमे लगा कि हमारा चश्मा मोटा हो गया है। अचानक उसका नंबर बढ़ गया है। इस बात ने हमें ये तो सिखा दिया कि हमें कौनसे नाटक नहीं उठाने हैं, जब तक कि आषाढ़ का एक दिन जैसे नाटकों के जनता संस्करण नहीं आ जाते।
मेरा तो मानना है और पूरी उम्मीद भी है कि थियेटर के दिन बदलेंगे लेकिन समाधान अपने अंदर ही तलाशने होंगे। बहुत सारी बाते हैं जिनको कहने की इच्छा है लेकिन लेख बड़ा होता जा रहा है। बाकी फिर कभी।
(कृपया अपनी टिप्पणी अवश्य दें। यदि यह लेख आपको पसंद आया हो तो शेयर ज़रूर करें।  इससे इन्टरनेट पर हिन्दी को बढ़ावा मिलेगा तथा  मेरी नाट्यकला व  लेखन को प्रोत्साहन मिलेगा। ) 

दलीप वैरागी 
09928986983 

Friday, September 2, 2011

मैं, मेरा गाँव, मेरे सपने

यह स्टोरी  इससे पहले " अनौपचारिका " (समकालीन शिक्षा चिंतन की मासिक पत्रिका) के मई 2011 अंक मे प्रकाशित हो चुकी है। मार्च के आखिर महीने में उरमूल सीमांत, बीकानेर मे उन वंचित वर्ग किशोरियों का सम्मेलन आयोजित किया गया जो पिछले एक दशक मे उरमूल के शिविरों मे पढ़ी हैं  या प्रेरणा केन्द्रों से जुड़ी रही हैं । यहाँ  कुछ किशोरियों की केस स्टडी लिखने के लिए उनसे साक्षात्कार किए, जिनमे यह जानने का प्रयास किया गया कि उरमूल से जुडने के बाद उनकी ज़िंदगी में क्या बदलाव आया है। अनौपचारिका में यह कुछ काट-छांट के साथ छपी थी, यहाँ पूरी दी जा रही है ।  

द्वारिका, उम्र 19 वर्ष
गाँव - डीवाईके, बीकानेर
बी ए प्रथम वर्ष की पढ़ाई स्वयंपाठी के रूप मेन पढ़ाई कर रही हैं

यह कहानी उस जगह की है जो हिंदुस्तान की पश्चिमी सीमांत पर है, जहां गाँवों के नाम नहरों के नाम पर रखे जाने का चलन है । पर अब शायद द्वारिका के नाम पर गांवों के रखे जाएँ  । 19 वर्षीय द्वारिका विश्नोई से बात करके मैंने खुद को जितना गौरवान्वित महसूस किया शायद इतना पहले कभी नहीं। किशोर उम्र के लड़के-लड़कियों के साथ काम करने का जो मेरा अनुभव रहा है उसके अनुसार जहां इस उम्र मे रूमानी कल्पनाओं के सतरंगी सपनों मे ही अधिकतर वक़्त जाता है वहीं इस लड़की से बात करके पता चला कि इस छोटी सी उम्र मे भी किशोर सामाजिक मुद्दों जेंडर, हैल्थ और लोकतन्त्र पर गहरी समझ ही नहीं रखते वरन अपने जीवन में भी उन मूल्यों को व्यवहार मेन ल रहे हैं ।

बीए प्रथम वर्ष मे पढ़ रही द्वारिका विश्नोई तीन बहनों और एक भाई  में सबसे छोटी है ।  द्वारिका से पूछा कि आप प्राइवेट क्यों पढ़ रही हैं?    "घर वाले कहते हैं कि कॉलेज मे पढ़ाई नहीं होती है । वैसे भी गाँव मे लड़कियों के लिए ' पढ़ना है  तो पढ़ो नहीं तो घर बैठो' वाला माहौल है। "

" यूं भी लड़कियों को बाहर भेजने की मनाही है। " उरमूल बज्जू से प्रेरणा मंच का प्रशिक्षण लिया है।

उसमे क्या सीखा?

उसने कहा कि प्रशिक्षण मे जेंडर, हैल्थ,पेंटिग,शिक्षा, कपड़ों की रंगाई - छपाई व सिलाई जैसे विषयों पर समझ बनाने का काम होता है।

" मुझे किताबें पढ़ना अच्छा लगता है बज्जू से अक्सर किताबें ले जाती हूँ। "

इन दिनों कौनसी किताब पढ़ी है? हमने पूछा।

' ज़िम्मेदारी की शक्ति ' आजकल यह किताब पढ़ रही हूँ। ' यह किताब  परसेनलिटि  डेवेलोपमेंट पर है।

'अखबार रोज पढ़ती हूँ । रोज भेदभाव की खबरें छपती हैं । समाज से भेदभाव समाप्त करना चाहती हूँ। समाज में लड़कियों को आगे नहीं आने देते हैं। गाँव मे मैं अकेली लड़की हूँ जो आगे आई हूँ। '

' जो आगे नहीं आ रही हैं उनके लिए क्या कर रही हो? '

' 32 हैड (गाँव का नाम ) में 2005 में उरमूल का कैंप लगा था । शिविर के शिक्षकों ने कैंप में कुछ लड़कियों को भेजने की ज़िम्मेदारी मुझे दी । तीन मुस्लिम लड़कियां थीं । एक 9-10 साल की, दूसरी 15 तथा तीसरी 17 साल की थी । दरअसल उनकी शादी हो रही थी और उनके घरवाले उनको कैंप मे भेजने से मना कर रहे थे । मैं उनके घर वालों से बात करने गई । संयोग से लड़कियों के ससुर भी वहीं मौजूद थे । मैंने उनसे बात की और उनके सामने उन्हीं के समुदाय की दो लड़कियों के उदाहरण रखे जिनका बाल विवाह हुआ था और प्रसव कि जटिलताओं के कारण उनकी मौत हो गई थी। लड़कियों के ससुर मान गए। दो लड़कियों की शादी रोक दी गई । बड़ी का विवाह हो गया । उसका गौना भी तीन साल बाद हुआ। '

' इतना सब कैसे कर पाई ?'

'सब किताबें पढ़ कर सीखा है । उरमूल कैम्पस से हर तरह की मदद मिलती है।'

वैसे भी मैं किसी से नहीं डरती हूँ। पुलिस में जाना चाहती हूँ । बीएसएफ़ का फॉर्म भर रखा है ।'

लेकिन पुलिस में जाने के लिए तो बहुत तैयारी करनी पड़ती है।

' मेरी रेस बहुत अच्छी है । मैंने 2005 मे रेस लगाई थी , पूरे बीकानेर मे पहला पुरस्कार जीता था । रोज सुबह पाँच बजे उठ कर छः किलोमीटर दौड़ती हूँ। गोला फैक का भी अभ्यास करती हूँ । अपने साथ तीन और लड़कियों को भी दौड़ती हूँ । '

आप 19 साल की हैं और अभी पंचायत के चुनाव होकर चुके हैं, क्या आपने मताधिकार का प्रयोग किया?

' हमारी पंचयत तीन गांवों को मिलकर बनी है। हर गाँव से तीन-तीन उम्मीदवार खड़े हो गए थे। '

'ऐसे में किसको वोट डालना है यह तय करना मुश्किल रहा होगा ?'

' बिलकुल नहीं, मैंने एक नौजवान को वोट डाला था। '

' वो जीता?'

' नहीं वह हार गया । '

आपने अनुभवी और पुराने लोगों को वोट क्यों नहीं दिया?'

' पुरानों की तो पुरानी ही सोच है । इनके विचारों में बदलाव की गुंजाइश कम है। इतने सालों से ये लोग पंचायत में हैं लेकिन इनकी खुद की लड़कियां अनपढ़ हैं। मेरा तो स्पष्ट विचार है कि जो खुद की लड़कियों को नहीं पढ़ा सकते वह दूसरों की बेटियों के लिए क्या करेंगे ? नौजवानों की सोच नई है, उनमें कुछ करने का जज्बा तो है। '

आपने जिसको वोट दिया, उससे कुछ अपेक्षाएँ हैं?

' हनुमान कुम्हार नाम है उसका । मकान की चिनाई का काम करता है । सोचा अगर वह एक-एक ईंट जोड़ कर मकान खड़ा कर सकता है तो वह गाँव की नींव भी मज़बूत बना सकता है। '

' जीत जाता तो सोचा था स्कूल को ठीक करेगा, टीचर अच्छे होंगे, लड़कियां पढ़ने के लिए बाहर नहीं जा  पाती हैं, इसलिए गाँव के स्कूल को 12 वी तक करवाएगा... लेकिन गाँव वाले समझ नहीं पाये... हाँ पापा की सोच अच्छी है लेकिन वे भी गाँव के हिसाब से ही देखते हैं। '

यह सारी बातचीत सुन कर मेरी आँखों के सामने मेरी उम्र के उन सारे नौजवानों के चेहरे घूम गए जो चुनावों मे कपड़े बदल-बदल कर वोट डाला करते... यह भी सोच रहा था कि जब मैं द्वारिका की उम्र में था तब क्या कर रहा था... तब हमें कहाँ इल्म था... मेरी आंखे नम हो गई।

जेंडर को लेकर द्वारिका की साफ समझ है।  वो कहती हैं –' समाज मे लड़कियों के प्रति भेदभाव है लेकिन लड़के अच्छे होते हैं। मेरे भाई को ही लो, मेरे और उसके विचार नहीं मिलते, लेकिन भाई मुझे कहीं आने-जाने से मना नहीं करता है। '

' भाई को बाहर जाने की आज़ादी है एक तरह का एक्सपोजर है। उसकी मित्रा-मंडली है। उसके पास जानकारियाँ ज्यादा हैं। मेरे पास ये सोर्सेज़ नहीं हैं। जब मैं भाई के द्वारा जानकारियाँ बढ़ाना चाहती हूँ तो वह मेरे सवालों पर खीझ जाता है। '

हमारी एक साथी ने मज़ाक में एक सवाल उछला – ' शादी वाले तो बहुत आते होंगे ?'

'बहुत !'

हँसकर " आज़ादी किसे बुरी लगती है ?

Thursday, September 1, 2011

एक्टर बनने की पहली शर्त इंसान होना है

यह पुरानी पोस्ट है इसे मैंने अपने दूसरे  ब्लॉग बतकही के आर्काइव से निकाला है ।
क्या अभिनय किसी स्कूल में सिखाया जा सकता है ? अविनाश के इस सवाल ने सोने नहीं दिया | ५ - ६ साल बाद फिर इन बातों पर सोचने के लिए विवश कर दिया | अविनाश हमारे उन थियेटर के साथियों में से हैं जो शुरू से साथ रहे हैं | हर रिहर्सल पर समय से पहुंचना | कभी छोटी बड़ी जिम्मेदारी के लिए मना नहीं किया | आज हम जो उस वक्त अगुआई कर रहे थे और ५ - ६ सालों से चुप लगाये बैठे है और अविनाश अब भी सवालों की आग धधकाए हुए है | यह बड़ी बात है | दोस्त, यह एक ऐसा सवाल है जिस पर लंबी चर्चा हो सकती है और होती भी आयी है | लेकिन यह सवाल मुर्गी और अंडे वाले सवाल की तरह अनुत्तरित ही रह जाता है | अभिनय का संस्कार हर इंसान में पैदाइशी रूप में होता है | इसके सबूत के तौर पर आप छोटे बच्चों को सूक्ष्मता से देखें जब वे अपने हमउम्रों के साथ खेल रहे होते हैं या फिर वे जब अकेले होते हैं और बैठ कर दिन भर में लोगों से हुई बातचीत को रिफ्लेक्ट करते हैं | उन संवादों को वे उन्ही चरित्रों की शैली में अभिनय पूर्ण तरीके से व्यक्त करते हैं | चाहे वह टीचर की डाँट हो या मम्मी की हिदायतें "मैगी खाना बुरी बात , दूध पीना अच्छी बात " ऐसे ही संवादों को बच्चे अकेले बैठे सैकड़ों बार दोहराते हैं | दरअसल इस सारी प्रक्रिया में वे भाषा सीख रहे होते हैं | अगर यह कहा जाये कि बचपन में नाटक भाषा सीखने का माध्यम होता है तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी | अभिनय भाषा सीखने में अपरिहार्य है | अभिनय के द्वारा ही ये बच्चे रिश्तों की परिभाषाओं को समझते हैं | उनके खेलों का विषय अकसर टीचर स्टूडेंट के रिश्ते , माता - पिता के रिश्ते या फिर शादी या मौत जैसी पास-पडौस में घटने वाली घटनाएँ होती हैं |
अब सवाल यह है कि अगर अभिनय जन्मजात है तो फिर अकादमियों और स्कूलों की क्या जरूरत है | दरअसल अपने सही माने में दोनों ही अपनी महत्व खो चुके हैं फिर चाहे वे अभिनय के स्कूल हो या औपचारिक शिक्षा देने वाले स्कूल | आज वर्तमान शिक्षा व्यवस्थ से निकलने वाला विद्यार्थी भारत - अमेरिका के सम्बन्धों पर तो विश्लेष्णात्मक सुझाव दे सकता है लेकिन उसे यह बिलकुल समझ में नहीं आता कि उसे उपने माता - पिता या पत्नी के रिश्तों को कैसे संभालना है | हर बार 95 प्रतिशत अंक लेने वाले विद्यार्थी के जब 90 प्रतिशत मार्क्स आते हैं तो वह आत्म हत्या कर लेता है | तो बताओ क्या शिक्षा हो रही है ? शिक्षा जिंदगी की यथार्थ चुनौतियों का सामना करने में कोई मदद नहीं करती है | केवल यह व्यवस्था कुछ अटकलबाजियां सिखा देती जिसके द्वारा हजारों को पीछे धकेल कर कोई जना नौकरी पा जाता है | अभिनय स्कूल भी ठीक इसी तरह विद्यार्थी को सहयोगी कलाओं और और बाहरी नजर आने वाले मंच शिल्पों से भली भांति परिचित कराते हैं जो एक तरह से जरूरी हो सकते हैं | स्कूल हमें अभी तक जो संचित ज्ञान है उससे साक्षात्कार कराते हैं | लेकिन अभिनय के सूखे को खत्म करने के लिए कोई बाह्य उपक्रम काम नहीं आता है | जैसे व्याकरण पढ़ कर कोई भाषा नहीं सीख सकता वैसे ही स्कूल में अभिनय सिद्धांत पढ़ कर कोई अच्छा अभिनेता नहीं बन सकता है | अभिनय की यात्रा अंदर की यात्रा है | यह दूसरे के सुख दुःख से स्वानुभूति के स्तर पर अपने सुख दुःख को मिला कर एकात्म होने की अवस्था है | इसमें कोई बाह्य आडम्बर काम नहीं आता | यह तो खुद के अनुभवों के जमाखर्च विश्लेषण करने से ही संभव है | जो यह कर सकता है वही सहृदय बन सकता है | सहृदय बने बिना कोई अभिनेता नहीं बन सकता है | और सहृदय बनने के लिए वही जद्दोजहद चाहिए जो एक इंसान बनने के लिए होती है |  आज नजर यह आ रहा है कि इंसान बनाना किसी भी स्कूल के एजेंडा में नहीं है | एक्टर बनने की पहली शर्त इंसान होना है चाहे वह स्कूल के बाहर बने या भीतर | जिस दिन इंसान पैदा करना हर स्कूल के एजेंडा में शामिल होगा और उस और कोशिश की जायेगी तब नसीरुद्दीन, ओम पुरी  और अनुपम सरीखे लोग एन.एस.डी. या एफ.टी.आई. से नहीं किसी आम सरकारी स्कूल से निकलेंगे |
(कृपया अपनी टिप्पणी अवश्य दें। यदि यह लेख आपको पसंद आया हो तो शेयर ज़रूर करें।  इससे इन्टरनेट पर हिन्दी को बढ़ावा मिलेगा तथा  मेरी नाट्यकला व  लेखन को प्रोत्साहन मिलेगा। ) 

दलीप वैरागी 
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Monday, August 15, 2011

एक रोडवेज कंडेक्टर की अन्नागिरी

anna hazare भ्रष्टाचार के खिलाफ एक मजबूत lokpal bill के लिए आंदोलन कर रहे है। पूरा देश अन्ना का समर्थन कर रहा है। हमारा समर्थन भी उनके साथ है। लेकिन हम ज़िंदगी भर किसी अन्ना  का इंतजार क्यो करते है। जबकि रोज़मर्रा की जिंदगी मे अन्ना बनने के मौके आते रहते हैं। वो सही समय होता है अन्नागिरी दिखाने का। जैसा उस रोडवेज के कंडक्टर ने दिखाई। यह लेख मैंने अप्रेल 11 को अपने दूसरे ब्लॉग बतकही पर लिखा था। 15 अगस्त स्वाधीनता दिवस के अवसर पर मैंने डैशबोर्ड के आर्काइव से निकाल कर फिर पोस्ट किया है।
यह सर्दियों की एक शाम थी |मैं राजस्थान रोडवेज की लो फ्लोर बस से सिंधी कैंप जा रहा था | बस लगभग भरी हुई थी | रस्ते में रामबाग सर्किल से एक पुलिस वाला बस में चढ़ा | यहाँ राजस्थान में यह आम बात है कि पुलिसवाले बिना टिकट ही यात्रा करते हैं | यह बात इतनी आम है कि कंडक्टर भी उनसे टिकट नहीं मांगते हैं | कंडक्टर गैलरी में टिकट काट रहा था और मैं सोच रहा था कि कंडेक्टर आगे बढ़ जायेगा | कंडेक्टर ने ये क्या कर दिया " टिकट प्लीज़ ' पुलिसवाले से टिकट मांग लिया ! बकायदा | पुलिस वाले ने अनदेखा कर दिया | हमने सोचा कंडेक्टर अब समझ गया होगा कि इन तिलों में तेल नहीं है | कंडेक्टर २५ साल का युवक , शायद दो महीने पहले ही नौकरी लगी हो |क्यों कि सरकार ने दो महीने पहले ही लो फ्लोर चलाई थीं | कंडेक्टर ने फिर कहा " मैं आपसे कह रहा हू साहब| " "हमारा टिकट नहीं लगता |" पुलिसवाले ने अधिकारपूर्ण लहजे में कहा | "बस में बैठे हो तो टिकट लो " कंडेक्टर ने जिद पकड़ ली | पुलिसवाला बोला ," तुम ऐसा करो कि अपने मैनेजर से कहो कि वो हमारे बड़े साब से बात करे तब हम टिकट ले लेंगे " कंडेक्टर की आवाज़ में गर्मी आ गयी ,"न मैं तम्हे जनता हू और न तुम्हारे बड़े साब को मैं तो यह जनता हूँ कि मेरी ड्यूटी क्या है ; तूम टिकट लेटे हो कि नहीं?" पुलिसवाले ने धोंस जमाई, " तम्हें नहीं पता तुम क्या कर रहे हो ?" कंडेक्टर बोला " यह.... मेरा नाम है , यह...... मेरा मोबइल नम्बर है और सांगानेर में रहता हूँ , तुम्हे जो करना है कर लेना फ़िलहाल बस से नीचे उतरो " ड्राइवर को कह कर बस रुकवा दी |शायद पुलिसवाला इस बात की उम्मीद नहीं कर रहा था | इतने में बाकी लोगों का भी कर्तव्यबोध जागा और अब कंडेक्टर की आवाज अकेली नहीं थी | बाकी का काम लोगों ने कर दिया और ठेलते हुए सिपाही को निकास द्वार के ठीक सामने ला दिया | अब उतरना लाजमी था | उस वक़्त उस कंडेक्टर के काम से मैं अपने को बहुत गौरवान्वित महसूस कर रहा था |आज जब मै भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे कि मुहीम को देख रहा हू तो उस कंडेक्टर के लिए मेरे दिल में इज्जत और बढ़ गई है | अन्ना जहाँ देश को रीढ़ से दुरुस्त करने में लगे है वही यह युवक सबसे नीचे कि कड़ी को ठीक करने में लगा है| मुझे वह अन्ना का भविष्य का संस्करण लग रहा है |

पड़ौसी की आग से बीड़ी और चूल्हा तो जल सकते हैं लेकिन लट्टू नहीं...

दुष्यंत कुमार की मशहूर लाइनें हैं -
जो उलझ कर रह गई है फाइलों के जाल में,
रोशनी वो गाँव तक पहुंचेगी कितने साल में ?
आजादी के 64 साल बाद भी 'रोशनी' बहुत सारे लोगों के लिए मरीचिका बनी हुई है।  दुष्यंत जी अपनी कविता मे रोशनी गाँव तक ही पहुँचने की  बात कर रहे हैं। क्योंकि वो जानते थे कि भारत की संस्कृति में अगर रोशनी गाँव तक पहुँच जाती है तो लोग पड़ौसी के चिराग से अपने घर का चिराग रोशन कर लेते हैं । शायद इसीलिए गुलज़ार साहब कंपकपाती सर्दी में 'पड़ौसी का लिहाफ़' मांगने की बात अपने गाने में कहते हैं ओर न बात बने तो ' पड़ौसी के चूल्हे  की आग लई ले ... ' यह बात सोलह आने दुरुस्त है कि पड़ौसी की आग से बीड़ी भी सुलगाई जा सकती है और चूल्हा भी । लेकिन पड़ौसी की बिजली से अपने घर का लट्टू नहीं टिमटिमाया जा सकता है । ऐसा करना भारतीय दंड संहिता मे जुर्म है । लट्टू जलाने के लिए घर के बाहर खंभा ओर भीतर मीटर लगाना होगा। 
मुझे लगता है कि दुष्यंत जी व गुलजार साहब अपने गीतों मे जिन गांवों का जिक्र करते हैं उनकी अवधारणा मे कहीं यूपी या हरियाणा के गाँव हैं। वो गाँव जहां 100-200 घरों की बसावट एक जगह पर होती है। दो घरों के बीच मे एक दीवार होती है । वही दीवार जिसके 'कान होते हैं', हाथ और ज़बान भी होती है।  दरअसल इस भूमिका के मध्यम से मैं देश के उन गांवो की बात करना चाहता हूँ जो न तो कविता में मे ही आ पाते है और नहीं विकास  धारा मे ही फिट बैठ पाते हैं ।  
पिछले महीने राजस्थान के जोधपुर जिले के फलोदी क्षेत्र को देखने का अवसर मिला। यहाँ किशोरों, बच्चों, बड़ों सबसे मिला। शहर, सड़क, खेत, टीले सब देखे लेकिन गाँव कहीं दिखाई नहीं दिया। यहाँ गाँव आपको कागजों सरकारी रिकॉर्ड ओर नक्शों मे तो मिल जाएगा लेकिन हक़ीक़त मे वहाँ जाएंगे तो गाँव कहीं नहीं हैं। यहाँ आपको धोरों के बीच मे एक घर मिलेगा और इस घर के चारो तरफ अंतहीन-सा क्षितिज ही दिखाई देता है । अगर आपको कोई दूसरा घर देखना है तो 3-4 किलोमीटर चलना होगा। इस तरह की बसावट के साथ आपको वहाँ 12-13 किलोमीटर रेडियस के गाँव मिलेंगे। जितनी दूरी तय करके यहाँ एक गाँव को देखा जा सकता उतनी या उससे कम दूरी तय करके हमारे यहाँ किसी भी विकास खंड कि सीमांत से चल कर विकास खंड मुख्यालय तक पहुंचा जा सकता है। इन ज़्यादातर गांवो में आज़ादी के 64 साल बाद भी बिजली नहीं है। पानी भी नहीं । क्योंकि सरकार का गाँव मे बिजली लगाने का एक तरीका है कि गाँव मे एक खंभा गाड़ो और उसके पास के 5-6 घरों मे उसी से तार डाल दो ।   10-12 खंभे लगाओ और हो गया पूरे गाँव का विद्युतीकरण । लेकिन वहाँ कैसे हो पाएगा जहां गाँव नाम की कोई अवधारणा ही नहीं है ? जहां सबसे पड़ौस का घर 2 या 3 किलोमीटर दूरी पर है । यहाँ प्रत्येक घर को बिजली देने के लिए 20-25 खंभों की ज़रूरत होगी । इन घरों को बिजली देने के लिए 25 खंभे देने की सरकार की क्या तैयारी है ? जबकि सरकार अपने बिजली महकमे को प्राइवेट लिमिटेड बना चुकी है। पानी  का नल इन घरों तक पहुंचाना तो वहाँ भागीरथ ही कर सकता है । खैर यहाँ पानी का प्रबंधन नायाब है । पानी का इस्तेमाल की यहाँ के लोगों को जबर्दस्त तमीज़ है । वर्षा के पानी को वर्ष भर कैसे चलाना है, ये लोग अच्छी तरह जानते हैं ।
अब देखिए हमारे यहाँ विकास के क्षेत्र मे कुछ वाक्य बहू प्रचलित हैं । "प्रत्येक गाँव मे एक किलोमीटर पर एक स्कूल होना चाहिए। " " प्रत्येक गाँव मे अस्पताल होना चाहिए..." "अपने गाँव की ग्राम सभा मे हर ग्रामीण को भाग लेना चाहिए..."  अब आप ही बताइए इन वाक्यों के इस क्षेत्र के संदर्भ मे क्या माने रह जाते हैं ?  वाक्य सार्थक हो सकते हैं अगर गाँव की जगह घर शब्द का प्रयोग किया जाए।
आज़ादी के बाद विकास के जिस मॉडल को अपनाया गया खामी उसी मे है । इस मॉडल मे यूनिट ऑफ परसेप्श्न गाँव है। सारी विकास की योजनाएँ गाँव को इकाई मान कर बनाई जाती हैं। जो यहाँ आकर फेल हो जाती हैं । क्योंकि नीति निर्धारक दिल्ली में बैठ कर गाँव के जिस चेहरे को देखते हैं दरअसल वो यहाँ है ही नहीं । अगर वास्तव मे विकास को इस क्षेत्र तक पहुंचाना है तो देखने की इकाई को बदलना होगा । इकाई को गाँव की जगह परिवार या व्यक्ति को करना होगा । यह कोई नई अवधारणा नहीं है । गांधी जी तो यही कहते थे कि जब भी कोई नीति बनाओ उस आखिरी आदमी के चेहरे को देख लो ।    

Wednesday, August 10, 2011

एक बातचीत

आज अपने पुराने और सीनियर साथी ओमपाल डुमोलिया से facebook पर चैट की ।  दरअसल ओमपाल जी ने मेरे पिछले ब्लॉग पोस्ट भाषा शिक्षण और विज्ञान  पर टिप्पणी करके अपनी राय दी थी। सारा वार्तालाप इसी के इर्द गिर्द है। मैं सारे वार्तालाप को यही कॉपी करके ज्यों का त्यों पेस्ट कर रहा हूँ। इस वार्तालाप से यह नया विमर्श खुल रहा है । दोस्त लोग अपनी बात से इसे आगे बढ़ा सकते हैं। ओमपाल जी की टिप्पणी इस प्रकार है -
Ompal Dumoliya lekhak shahb lekh bhut hi accha h is trah ke lekhon se pdhne walon ke chkshu kulenge.do baat khna chahta hoon - treeka koi bhi ho skta h yadi kaam kiya jaye, dusri baat bhasha to sandrbh me sekhne ki baat bhi krte h is pr bhi thoda vichar krke baat me kuch jodo bhai taaki hum jaise logon ko bhi nya anubhav mil skega
 ओमपाल डुमोलिया kya haal h bhai
 दलीप वैरागी अच्छा है आप कैसे हैं?
ओमपाल डुमोलिया fine… tu accha likhata h. hame bhi sikha de yaar
दलीप वैरागी कोशिश करता हूँ।  आप लोगों से ही सीखा है ?
ओमपाल डुमोलियाye to bekaar ki baat hai teri mehnat ne yaha tak pahuchaya hai।
दलीप वैरागी ये सब एल लंबे सिलसिले का परिणाम है जो 1994 से 2/519 अरावली विहार अलवर से शुरू हुआ था । जिसका आप सब महत्वपूर्ण हिस्सा हो ।
अभी तो मैं अजमेर हूँ।
ओमपाल डुमोलियाok jab aaye tb batana phon NO 9413688925
दलीप वैरागी मेरा नंबर 9928986983
दलीप वैरागी मैंने मेरे ब्लॉग पोस्ट पर  आपकी टिप्पणी पढ़ी है। आप भाषा को किस संदर्भ मे सीखने की बात कह रहे हैं?
ओमपाल डुमोलियाshabd pddhti vआ sandarbh pddhti me kuch fark hai ya nahi ?
दलीप वैरागी मुझे तो नहीं लगता है ।
ओमपाल डुमोलियाkahani se va shabd se seekhna samaan hai ?
दलीप वैरागी वैसे मैं पहली बार संदर्भ पद्धति के बारे सुन रहा हूँ ? इससे पहले मैंने शैक्षणिक डिसकोर्स मे यह नाम नहीं सुना।
ओमपाल डुमोलिया 'sona' ka arth kya hai ?  gold ya sleep ya kisi ka naam
 दलीप वैरागी 'सोना' के दोनों तीनों अर्थ तो बहुत contrast है । लेकिन एक  ही शब्द जिसका मतलब same सा दिखाई देता है उसके भी संदर्भ गहराई से अलग हो सकते हैं । जैसे 'भूख' शब्द का मतलब एक गरीब व्यक्ति जिसको मुश्किल से दो वक़्त का खाना मिलता  और होगा तथा   डोमिनो या पिज्जा हट मे बैठ कर पिज्जा के लिए बेकरार अमीर के लिए अलग मतलब होगा । 
 ओमपाल डुमोलियाtumne sahi samjha hai ye hi to sandrbh hai. shabd se jyada arth pure vakya me hota hai .
दलीप वैरागी  संदर्भ के बिना शब्द निरा जग का जंजाल है । शब्द अपने आप मे कुछ नहीं होता है। शब्द तिजोरी में रखे सोना या जवाहरात हैं जिंका अपना मुली भी होता है और चमक भी होती है लेकिन उसकी सार्थकता आभूषण में जड़ कर धारण करने में ही होती है।  
ओमपाल डुमोलियाsandarbh shabd hai ya vakya bas yhi mera matlab tha jo tumne kah diya .
दलीप वैरागी  वाक्य भी अधूरा है । पूर्णता तो कहने वाले के आशय को स्पष्ट कर देने वाली उक्ति मे है । वह अनुच्छेद, वाक्य, शब्द या फिर कोई संकेत भर  भी हो सकती है ।
ओमपाल डुमोलियाisliye mai khani ki baat kar raha hun.
 दलीप वैरागी आप सही कह रहे हैं। लेकिन सिर्फ कहानी कह देने से हम कहीं दूसरी विधाओं को नज़रअंदाज़ कर देते हुए लगते हैं । कई बार हमारी विषय वस्तु उनके लोक गीत, ओर उनकी तुकबंदियाँ भी होती हैं।
ओमपाल डुमोलियाyes ho skti hai. keval khani i ki baat nhi aur bhi kuch ho skta h jo tum kh rhe ho.
दलीप वैरागी 22:22 pm
सर मैं खाना खाने जा रहा हु । बाद मे बात करता हूँ।
ओमपाल डुमोलियाok bye ...  acha lga ... thanks ... gud night
दलीप वैरागी गुड नाइट

Tuesday, August 9, 2011

भाषा शिक्षण और विज्ञान


जब बच्चे को पहली बार किताब पढ़ना सिखाने की बात होती है तो हमारे यहाँ शिक्षण विमर्श में दो तरह की शिक्षण पद्धतियों का जिक्र होता है| एक वर्ण शिक्षण पद्धति ‘दूसरी शब्द शिक्षण पद्धति | पहले वाली वर्ण शिक्षण पद्धति हमारे यहाँ पुराने समय से प्रचलन में है | इस पद्धति से पढ़ना सीखने में बच्चों की अपनी मुश्किलें हैं | अर्थात इस तरीके से बच्चे आसानी से सीख नहीं पाते |इसकी जगह पर दूसरी शब्द शिक्षण पद्धति को केंद्र में लाने के प्रयास पिछले दो दशक से हो रहे हैं | इस पद्धति की भी अपनी मुश्किल है कि यह टीचर के समझ में नहीं आती है| आज स्कूल में पढ़ाने वाला हर टीचर इस पद्धति के लिए प्रशिक्षित हो चुका है | हर साल के शिक्षक प्रशिक्षण में शब्द पद्धति से पढ़ना सिखाने के तरीकों पर बात होती है| बावजूद इसके देखने में आता है कि सभी स्कूलों में नए पुराने शिक्षक बोर्ड पर पहले वर्णमाला रटाना , फिर उनकी एक –एक कि बारहखड़ी बनवाना और यदि इस सारी कवायद में बच्चा कुछ ध्वनियों को पहचान जाता है तो फिर उन ध्वनियों को मिलाकर शब्दों कि घुट्टी बनाकर पहली बार पिलाई जाती है | यह कड़वी डोज जो बच्चा आसानी से गुटक जाता है; वह पढते वक़्त हिज्जे करते, उँगलियों पर बारहखड़ी का हिसाब लगाते थोडा आगे बढ़ जाता है और ताउम्र वर्तनी की गलती करता है |यह कभी नहीं समझ पता कि यह हृस्व और दीर्घ मात्राओं का भाषा में हकीक़त से क्या लेना देना है| बाकी बहुत से बच्चे इस प्रक्रिया में पीछे छूट जाते हैं और पाँचवीं जमात तक पढ़ना नहीं सीख पाते हैं| 
कई बार यह सोच कर हैरानी होती है कि क्या कारण है कि इतनी कवायद के बाद टीचर पुरानी परिपाटी को बदलना नहीं चाहते हैं ? क्या इसके पीछे परम्परावादी सोच है? कुछ नया न कर पाने कि प्रवृति है? या अज्ञान ? अज्ञान कहना तो हिमाकत ही होगी| तो अगर इसकी रूट में अज्ञान नहीं तो क्या विज्ञान ? इंसान किसी काम को पूरी निष्ठा से तभी करता है जब वह धर्म सम्मत हो या विज्ञान सम्मत | धर्म अर्थात आस्था; विज्ञान मतलब बुद्धि ,विवेक तर्क | लब्बोलुबाव यह कि काम का प्रेरण भाव से होता है और भाव का उत्स आस्था , विश्वास या तर्क ,बुद्धि में | तो क्या भाषा शिक्षण की इस पहेली में विज्ञान और भाषा का कोई उलट फेर तो नहीं |मुझे लगता है कि इस उलट फेर को पकड़ने के लिए भाषा का स्ट्रेक्चर और विज्ञान का अप्रोच और दोनों के अंतर्संबंध के समीकरण को समझना होगा |कोई चीज़ इस जगत में है तो उसकी उत्पत्ति को समझने के दो तरीके हैं |एक उसके ऐतिहासिक क्रमिक विकास को समझना | जो कि एक क्षणिक घटना नहीं है |किसी चीज़ को धरती पर बनने में करोड़ों साल का वक्त लगा है| दूसरा तरीका है प्रयोगशाला में किसी द्रव्य का रसायन शास्त्रीय तात्विक विश्लेषण किया और निष्कर्ष निकला कि यह चीज़ अमुक –अमुक तत्वों से मिल कर बनी है |जैसे रसायन शास्त्र पानी का तात्विक विश्लेषण करके यह बताता है कि हाइड्रोजन के दो परमाणु और ऑक्सीजन का एक परमाणु मिलकर पानी बनता है |(जबकि स्थापना यह होनी चाहिए कि पानी में हाइड्रोजन के दो तथा ऑक्सीजन का एक परमाणु होते हैं ) मुश्किल तब होती है जब हम विज्ञान के इस निर्णय की स्थापना को लेकर बैठ जाते हैं| रासायनिक विश्लेषण के लिए तो इसमें कोई दिक्कत नहीं मगर इस स्थापना को लेकर चलें तो कुछ ज्यादा हाथ नहीं आएगा | अगर ऐसे पानी बनता तो क्या बात थी | धरती पर हाइड्रोजन और ऑक्सीजन तो बहुत है |लेकिन पानी के असली स्वाद के लिए तो उसी पानी की और ही देखना होगा जो कुदरत की करोड़ों वर्षों की मेहनत का प्रतिफल है | ऐसा ही कुछ भाषा के साथ है | भाषा भी उतने ही समय से धरती पर है जितना कि इंसान | भाषा भी व्यक्त संकेतों शब्द, वाक्यों, छंदों में ही रहती आयी है | लेकिन भाषा विज्ञान जब किसी भाषा का विश्लेषण करता है तो उसे इस प्रकार तोड़ कर समझता है – ध्वनि संकेत मिल कर शब्द बनते हैं और शब्द-शब्द मिलकर वाक्य तथा वाक्य दर वाक्य बात | यह भाषा के तात्विक रूप को समझने का तरीका तो है लेकिन वास्तविक सत्य नहीं | किसी भी ‘समग्र’ को समझने के लिए टुकड़ों में तोड़ कर देखना विज्ञान हो सकता है लेकिन यह समझ लेना कि ‘समग्र’ टुकड़ों से मिल कर बना है निरा अज्ञान ही कहलायेगा | विज्ञान एक प्रक्रिया है | उसे परिणति समझ लेना गडबडझाला खड़ा करता है |भाषा शिक्षण के संदर्भ में ऐसा ही कुछ गडबडझाला हमारे सामूहिक अवचेतन में चलता है और हम मान लेते हैं कि शब्द ध्वनियों से मिलकर बने हैं इसलिए सबसे पहले ध्वनि सिखाना जरूरी है, ध्वनि सीखने के बाद शब्द | जबकि भाषा कुछ अलहदा व्यवहार करती है| हमारे यहाँ शब्द ब्रह्म है उसे तोड़ कर देखा जा सकता है लेकिन तोड़ा नहीं जा सकता | वह तो अजर है, अक्षर है , अविनाशी है | सीखने के लिए उसे पूरा ही सीखना होगा , अधूरा नहीं | इस लिए वर्ण पद्धति से शिक्षण दुरूह हो जाता है| उस तरह से प्रवाहमय नहीं जैसी कि भाषा कि तबियत होती है | ऐसा दूसरी कलाओं के साथ भी होता है| शास्त्रीय संगीत और नृत्यों को ही लें इनको सीखना कितना श्रम व समय साध्य होता है | पहले बाहर से चेष्टाओं और मुद्राओं को स्वर लिपियों को रटना| शुरू में ये निष्प्रयोजन जन पड़ती हैं और काफी अभ्यास के बाद विद्यार्थी स्वयम् रस दशा तक पहुंच पता है| जबकि लोक गीत और लोक नृत्य में पहली बार में ही रसानुभूति खुद भी करता है और दूसरों को भी करवाता है | क्यों कि लोकसंगीत का संस्कार उसके अवचेतन में है | दोनों ही रास्ते एक ही जगह पर पहुँचते हैं लेकिन फर्क मार्ग कि कठिनाई और सरलता का है | यहाँ आकर लगता है कि विज्ञान सम्मत व्यवाहर करने कि जो हमारी नैसर्गिक आदत होती है उसी के फलस्वरूप शिक्षक वर्ण पद्धति को छोड़ नहीं पाता | क्योंकि ऊपर से उसे यह विज्ञान सम्मत जान पड़ता है| इसके रूट में कहीं हमारा विज्ञान को देखने का नज़रिया भी है | कुछ इसे भी ठीक करने की जरूरत है|सारांशतः यह कहा जा सकता है कि शब्द शिक्षण पद्धति एक तरह की लोक गीत कि तान सा है और वर्ण पद्धति शास्त्रीयता की सी अनवरत कवायद | मार्ग एक ही सत्य को पकड़ने के हैं | तय राहगीर को करना है|
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