Sunday, September 4, 2011

थियेटर, अभिनेता और दर्शक के बीच लेनदेन भर है... न कम न ज्यादा।

फेसबुक पर  थियेटर को लेकर चल रही चर्चा के सिलसिले में विकी तिवारी का लेख 'जय थियेटर' पढ़ा। इसी लेख ने रंगमंच पर अपने विचार लिखने को प्रोत्साहित किया। इस लेख में उन्होने रंगमंच के बड़े सवाल उठाए हैं। 
उनका कहना है -
भरतमुनि का नाट्यशास्त्र जिसे पंचम वेद कहा गया है, आज अपने अस्तित्व को लेकर संघर्षरत है. अपने शहर में, साल भर में ३-४ छोटे बड़े नाट्य समारोह, कुछ अन्य नाट्य मंचन आयोजित हो जाने के बाद भी, केवल नाटक देखने के शौकीनों और रंगकर्मियों के परिजनों के अलावा, और कोई नहीं दिखतावहीं सिंगल स्क्रीन सिनेमा एवं मल्टीप्लेक्स में आपको राजा से लेकर रंक तक दिख जायेंगे फिल्म देखते हुए और वो भी बाकायदा टिकेट लेकर, फिर चाहे वो टिकेट ३० रूपये की हो या ३०० की... ये रंगमंच का एक बहुत बड़ा दुर्भाग्य है।
विकी जी अनुभवी रंगकर्मी हैं। उनका 7 साल का सक्रिय रंगकर्म का अनुभव है। इस क्षेत्र में सात साल बहुत होते हैं। क्योंकि यहाँ कोई लंबा टिकता ही नहीं। दो तीन नाटक किए नहीं कि सब बॉलीवुड का रुख करते हैं। अधिकतर का क्या होता है यह सब जानते हैं। बाकी चार-छः जो ईमानदारी से थियेटर करने के लिए रुकते हैं उनके लिए यहाँ संघर्ष, चिंता, हताशा और निराशा इस कदर हैं कि जल्दी ही टूटन आ जाती  है। विकी भाई यहाँ पूरे हिंदी रंगमंच की पीड़ा को आवाज़ दे रहे हैं। 
दरअसल रंगमंच ऐसी विधा है जहां अखिल विश्व के तमाम कला – कौशल, गीत-संगीत, नृत्य, पेंटिंग, मूर्तिशिल्प तथा स्थापत्य एक अनुशासन मे मिलकर एक समग्रता का निर्माण करते हैं। कोई भी व्यक्ति अपनी रूचि और सामर्थ्य के हिसाब से इसमे जुड़ सकता है। लेकिन विडम्बना ये है कि इस मजबूती के बावजूद थियेटर की विधा आज सबसे उपेक्षित है। जबकि इसकी आनुषंगिक कलाएँ अपने ज़ुदा-ज़ुदा स्वरूप में आज ज्यादा मजबूत हैं। आज विभिन्न टीवी चैनलों पर जितने भी टैलेंट हंट के शो हैं, सब गीत व नृत्य कलाओं के आ रहे हैं। कहीं आपने अभिनय का टैलेंट हंट किसी चैनल पर देखा है? पाँच-छः साल पहले ज़ी टीवी ने करवाया था जो मुश्किल से दो सीज़न भी पार नहीं कर सका। नाटक विधा समूह का काम है। ग्रुप वर्क एक बहुत बड़ी ताकत है। यह स्वत: सिद्ध है और इसके लिए प्रमाणों की जरूरत नहीं है। नाटक के साथ विडम्बना यही है कि जहां ग्रुप वर्क इसकी मजबूती है, वहीं इसकी कमजोरी भी है । हमारे यहाँ समूह में काम करने की एक अजीब संस्कृति है कि शुरू में अपना दम लगाकर टीम वर्क करते हैं और फिर शीघ्र ही समूह में तंहाइयाँ खोजने लगते हैं। सफलता की तरफ बढ़ा हर कदम तन्हाइयों की तरफ ढकेलता है। हमारे यहाँ सफलता की अवधारणा सब जगह एक जैसी है, चाहे वह अर्थशास्त्र हो, राजनीति शास्त्र या फिर समाज शास्त्र। जिसके अनुसार सफलता की सीढ़ी का ऊपर जाकर संकरा होना लाजिमी है। अत: सीढ़ी के शिखर पर तन्हा व्यक्ति ही बैठ सकता है, समूह के लिए यहाँ स्थान नहीं होता है।
दरअसल सफलता का मूल्यबोध भी उलट कर देखने की जरूरत है। वस्तुत: नाट्य विधा की सार्थकता यही है कि वह टुकड़ा-टुकड़ा लघुताओं को रिश्तों के ताने-बाने मे पिरो कर एक भव्य, विराट समग्र की रचना करती है। रिश्तों की यह प्रक्रिया ऊष्मा देती है, दोनों को – समूह को भी और व्यक्ति(एक्टर) को भी। यही ऊष्मा कलाकार को संजीवनी प्रदान करती है। सफलता के शिखर पर पहुँच कर यही रिश्ते रास नहीं आते। तंहाइयाँ गहराने लगती हैं और ऊष्मा का सोता सूख जाता है। हमें पता तक नहीं चलता। कर्म (अभिनय) का प्रेरण भावना से उठता है और भावना का उद्दीपन अनुभवों से आता है। सफलता के शिखर पर खड़े कलाकार के पास रह जाता है गठरी भर अहंकार ! फिर ताउम्र चंद सफलताओं के जमाखर्च से ही काम चलता रहता है। नियति इतनी निर्मम है कि दोनों में से कोई नहीं बचता, न व्यक्ति, न समूह। मेरे शहर मे जितने भी थियेटर ग्रुप खड़े हुए थे सभी के साथ देर सवेर यही हुआ। विकी का उपरोक्त बयान वर्तमान के नाट्य परिदृश्य का बयान तो करता है लेकिन कोई समाधान नहीं सुझाता है। हाँ इतना जरूर है कि वे लोगों से एक भावुक अपील करते हैं –
“सभी अखबार एवं राष्ट्रीय फिल्म व समाचार पत्रिकाओं में एक नियमित कॉलम निश्चित करें जो नियमित, निरंतर, निश्चित रहे।  जिसमें, जैसे कि हर शनिवार-रविवार को शहर में नाट्य कला से जुडी गतिविधियों का उल्लेख हो। मेरा ऐसा मानना है कि इससे जनता नाट्य-कला के प्रति जागरूक एवं गंभीर होगी. जब तक रंगमंच को seriously लिया ही नहीं जायेगा, उसे अन्य कार्यों की तरह एक दैनंदिन कार्य के रूप में नहीं देखा जायेगा तब तक तो कुछ हो ही नहीं सकता ... बहरहाल, मेरा मीडिया और देश की जनता से अनुरोध है कि भविष्य में जब कभी आपके अथवा किसी अन्य शहर में कोई नाटक एवं नाट्य समारोह आयोजित हों तो उन्हें देखने अवश्य जाएँ। क्योंकि किसी भी फिल्म की तरह ही इसमें भी प्रकाश व्यवस्था, मंच निर्माण, संगीत आदि जैसी चीज़ों पर कई उनींदी रातों की तन तोड़ मेहनत रहती है, जिसे दर्शकों के सामने महज़ १-२ घंटों के लिए प्रस्तुत किया जाता है और इतना सब करने के बाद भी दर्शकों से वैसा फीडबैक नहीं मिलता, तो ऐसे में कलाकार का हतोत्साहित होना, उसका मनोबल गिरना लाज़मी है।“
इस तरह की अपील करने में कोई बुराई नहीं। यह अकसर होती रही हैं। मगर यहाँ दिक्कत यह है कि मर्ज सही जगह से पकड़ में नहीं आ पाता है। दरअसल मर्ज जब खुद में हो तो इलाज़ सामने वाले का नहीं करना होता है। हम मीडिया से कोई उम्मीद नहीं कर सकते हैं। यह पीपली लाइव वाला मीडिया है। मीडिया के चरित्र को समझना बहुत मुश्किल है । (मीडिया पर मेरे दो लेख “अखबार या इश्तिहार !” तथा “मीडिया का असली चेहरा कौनसा है?” इसी ब्लॉग पर छप चुके हैं देखें।) मीडिया से उम्मीद करना खुद को भुलावे में रखना है। मीडिया सिर्फ मुनाफा देखता है। रही दर्शकों की बात तो दर्शक नाटक देखना चाहते है। हमने 2002 में जब अपना पहला नाटक ‘आषाढ़ का एक दिन’ किया तो हम 500 लोगों के पास 30 रुपए का टिकट लेकर गए। हमे याद नहीं है कि किसी ने भी टिकट खरीदने से मना किया हो। नाटक के वक़्त हमने एक प्रश्नावली के माध्यम से दर्शकों की प्रतिक्रियाएँ भी जानी। लगभग सभी दर्शकों ने कहा कि हम प्रेक्षागृह तक आकार टिकट लेकर नाटक देखना चाहते हैं बशर्ते शहर में नियमित फ्रिक्वेंसी मे नाटक हों, और नाटक की भाषा लोगों के समझ में आने वाली हो। पहली बात से यह स्पष्ट है कि सब नाटक देखना चाहते हैं। यहाँ कोई मुफ्त पास नहीं मांगता। यह मुफ्तखोरी वहाँ होती है, जहां इसका रिवाज हो। क्या अपने किसी मल्टीफ्लैक्स के सामने फ्री पास लेकर खड़े किसी व्यक्ति को देखा है। फ्री पास इसलिए मांगे जाते हैं क्योंकि वे मिलते हैं। यह मुफ्तखोरी की संस्कृति दिल्ली में मंडी हाउस के आस-पास ही पनपी है। वहीं बड़ी अकादमियाँ और स्कूल हैं सरकारी पैसे से चलने वाली ... अगर नाटक के कार्मिकों की तनख़्वाहें और मंचन का खर्च सरकारी खजाने से आएगा तो फिर दर्शक को मुफ्त बैठाओ या टिकट से क्या फर्क पड़ता है? ऐसा नहीं यह सिर्फ सरकारी सहायता प्राप्त मंडलियों के साथ है। मैं एक बार अपने शहर के वरिष्ठ रंगकर्मी के पास गया और कहा कि हम लोगों ने सोचा है कि आगे से हम सब टिकट बेचकर ही नाटक दिखाया करेंगे। उन्होने कहा कि मैं भी टिकट से ही दिखाता हूँ। ये बात अलग है कि एक ही बड़ी टिकट बेच देता हूँ। अब आप बताएं कि किसी व्यापारिक प्रतिष्ठान से 25-50 हजार लेकर भला टिकट बेचने की जहमत क्यों उठाने लगे। मुफ्त पास की मांग वहीं के पढे-लिखे कलाकार ही करते है। आम आदमी की न तो फ्री पास की औकात न आदत। 
दरअसल नाटक कलाकार और दर्शक के बीच का लेनदेन है। जब इनके दरम्यान कोई तीसरा बिचोलिया आ फँसता है, तब मामला बिगड़ता है। अभिनेता को दर्शक के प्रति जवाबदेह होना चाहिए। जवाबदेही पैसा तय करता है और जब पैसा कोई तीसरा देगा तो भला अभिनेता अपनी कला में जनता के सरोकारों को क्यू लाएगा। वह तो अपने सेठ के नाम की बीन बजाएगा। जो दर्शक के इस रिश्ते को समझता है, वही सही मायने में प्रोफेशनल थिएटर करता है। यही प्रोफेशलिज़्म हम नुक्कड़ पर बैठ कर मजमा लगाकर खेल दिखाते मदारी से सीख सकते हैं। वह बरसों से एक ही स्क्रिप्ट दोहरा रहा है, वही संवाद बोल रहा है। आज भी वह आपको बीच रास्ते में रुकने के लिए मजबूर कर देता है। बकायदा खेल दिखाता है। दस रुपए देने के लिए कहता है और आपकी जेब का नोट फिर एक बार बाहर आने को मचल जाता है। उसके बाद वह शर्तिया मर्दानगी वाला तेल और चमत्कारी प्रभाव वाली अंगूठी बेच कर चला जाता है। यह वह दो कारणों से  ऐसा कर पाता है, एक वह जनता की नब्ज़ समझता है कि वे क्या चाहती हैं, दूसरे वह जनता के साथ जनता की भाषा मे बात करता है। उसने स्तानीस्लोवस्की और माइकल चेखव नहीं पढे हैं। बस उसने इस नुक्ते को पकड़ा है कि उसकी रोजी रोटी दर्शकों पर है। वह अपने काम के लिए अकादमियों का मुह नहीं ताकता है।
दूसरी बात जो हमें चौकने वाली थी कि ‘आषाढ़ का एक दिन’ की भाषा लोगों की समझ में नहीं आती है। यह मैं किसी दक्षिण भारतीय या उत्तर पूर्व के शहर की बात नहीं कर रहा बल्कि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र मे बसे अलवर शहर की बात कर रहा हूँ। ऐसे और कितने ही नाटक हैं जिन्हें हम महान कहते है, दरअसल वे हैं भी, लेकिन क्या आज भी उनकी भाषा दर्शकों की समझ में आती है? तब हमे लगा कि हमारा चश्मा मोटा हो गया है। अचानक उसका नंबर बढ़ गया है। इस बात ने हमें ये तो सिखा दिया कि हमें कौनसे नाटक नहीं उठाने हैं, जब तक कि आषाढ़ का एक दिन जैसे नाटकों के जनता संस्करण नहीं आ जाते।
मेरा तो मानना है और पूरी उम्मीद भी है कि थियेटर के दिन बदलेंगे लेकिन समाधान अपने अंदर ही तलाशने होंगे। बहुत सारी बाते हैं जिनको कहने की इच्छा है लेकिन लेख बड़ा होता जा रहा है। बाकी फिर कभी।
(कृपया अपनी टिप्पणी अवश्य दें। यदि यह लेख आपको पसंद आया हो तो शेयर ज़रूर करें।  इससे इन्टरनेट पर हिन्दी को बढ़ावा मिलेगा तथा  मेरी नाट्यकला व  लेखन को प्रोत्साहन मिलेगा। ) 

दलीप वैरागी 
09928986983 

2 comments:

  1. अच्छा है भई .....खूब लिख रहे हो आज कल , थियेटर को लेकर .लिखते रहो अच्छी बात है
    प्रदीप प्रसन्न ,अलवर

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    1. भाई फ़िलहाल लिख ही पा रहा हूँ, करना छूटा हुआ है... लेकिन एक बात पक्की है कि बिना कुछ करे ज्यादा दिन लिखा नहीं जा सकता। देखो जमाखर्च कब तक चला पाता हूँ।

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