Wednesday, September 28, 2011

बच्चों का रंगमंच: कहीं भी, कभी भी ...

मैं जिस दृश्य का ज़िक्र यहाँ करूंगा हो सकता आपको मामूली लगे । दरअसल सुबह जब मैं ऑफिस के लिए निकला तो कॉलोनी के नुक्कड़ पर जो मुख्य सड़क से जोड़ता है । इसी नुक्कड़ पर एक फोटोग्राफर की दुकान हुआ करती थी जो अब उसने खाली कर दी है । फोटोग्राफर दीवार पर जो चित्रपट्ट छपवाते हैं ताकि शौकीन लोग उसके आगे खड़े होकर फोटो खिंचवा सकें। दुकान खाली होने पर भित्तिचित्र लगा रह गया था। जब मैं दुकान के आगे से गुजरा तो वहाँ का दृश्य देख कर ठिठका। वहाँ 7 से 10 वर्ष उम्र के दो लड़के थे । एक लड़का उस वॉलपेपर के सामने किसी अदाकार की तरह खड़ा था और दूसरा किसी प्रोफेशनल फोटोग्राफर की तरह फोटो खींचने का अभिनय कर रहा था । खिंचवाने वाला अलग-अलग अंदाज़ मे खड़ा होकर खिंचवा रहा था । मैंने थोड़ी देर तक रुक कर इस अभिनय को देखा फिर यह जान कर कि इस आयोजन में मैं निसंदेह अयाचित दर्शक हूँ । मेरी उपस्थिती इस अभिनय व्यापार को कहीं रोक न दे इसलिए मैं न चाहते हुए भी वहाँ से निकल गया ताकि यह नाटक अपनी संपूर्णता तक पहुँच कर खत्म हो सके। पूरे रास्ते मैं इसी घटना पर सोचता रहा बच्चों के बारे मे, नाटक के बारे में कि कैसे ज़रा सी फुर्सत मिलते ही बच्चे अभिनय शुरू कर देते हैं । कितनी जल्दी सब एक सुर मे आ जाते हैं । एक सुर मे आते ही नाटक के सब साजो समान भी जुट जाते हैं और शुरू हो जाता है खालिस अभिनय। यहाँ बच्चों और बड़ों के नाटक मे एक अंतर होता है कि जहां बड़ों का रंगमंच दर्शकों की बाट देखता रहता है और जब तक दो ढाई सौ दर्शक नहीं जुट जाते, रंग ही नहीं जमता लेकिन बच्चों के नाटक में एक भी दर्शक रंग में भंग डाल सकता है। दरअसल यह अंतर इस लिए है कि दोनों के उद्देश्य भिन्न-भिन्न होते हैं। बड़े जहां अपने नाटक के माध्यम से लोगों को शिक्षित कर रहे होते है जबकि बच्चों के नाटक मे वे खुद सीख रहे होते हैं(बड़े भी सीख सकते हैं)। वे नाटक के माध्यम से अपने पास-पड़ौस की दुनिया को समझ रहे होते हैं । एक अनुभव है। गाँव मे एक मेरी भतीजी है योगिता । जब वह लगभग तीन साल की थी वह शाम के समय अपनी उम्र बच्चों के साथ घर की छत पर खेल रही थी। अचानक ऊपर से रोने की आवाजें आईं । भैया छत पर गए और वहाँ का दृश्य देख कर दंग रह गए। वहाँ का दृश्य कुछ इस प्रकार था कि योगिता फर्श पर लेटी हुई थी और उस पर कपड़ा कुछ इस प्रकार डाल रखा था जैसे मरने के बाद किसी मृत शरीर को ढंका जाता है। बाकी सभी बच्चे उसे चारों तरफ से घेरे हुए रुदन-विलाप कर रहे थे। कुछ गले लग कर वैन कर रहे थे । भैया कुछ देर तो देखते रहे फिर उनके लिए असहनीय होने लगा । इतने मे ही बच्चों को बाहरी आदमी की उपस्थिती पता चल गई । खेल खत्म, सब भाग गए सिवा योगिता के, वह अब भी अपनी भूमिका से बाहर नहीं आई थी और वैसे ही पड़ी हुई थी । भैया ने झिझोड़ कर खड़ा किया और पूछा कि ये क्या ड्रामा है ? उसने बताया कि पिछले दिनों पड़ौस के घर मे वैशाली के भाई की मृत्यु हुई तब लोग ऐसे ही .... तो बच्चे पड़ौस की जो उन्होने समाज मे घटते हुए देखा उसे अपनी तरह से समझ रहे हैं। तात्कालिक घटना यह है और सब बच्चे अनायास ही मृत्यु से जुड़े अपने–अपने देखे अनुभवो को यहाँ शेयर करेंगे और नई अवधारणाएँ बनाएँगे । मृत्यु जैसे यथार्थ को उन्होने कैसे देखा समझा। मृत्यु का समाज और परिजनों पर क्या असर पड़ता है उस सच को अभिनय के माध्यम से दूसरे के स्तर पर महसूस करके देखना चाहते हैं । बच्चे बहुत से जटिल और दार्शनिक महत्व के प्रश्नों के समाधान ऐसी ही सरल प्रक्रियाओं से समझ लेते हैं। कुछ सवालो के जवाब यहाँ अपने आप साफ होने लगते हैं कि “क्या अभिनय सीखने की चीज़ है या नहीं ?” या “क्या हर इंसान को रंगमंच की कला का अहसास होना चाहिए?” यह जान लेना चाहिए की अपनी ज़िंदगी मे ज़्यादातर अभिनय 5-6 साल की उम्र तक हम कर लेते हैं । हाँ , यह अलग बात है तब उसका स्वरूप अलग होता है । बचपन का अभिनय प्रदर्शनोन्मुखी नहीं होता है। वह खुद के सीखने के लिए है। वहाँ सिर्फ दर्शक के लिए कोई गुंजाइश नहीं है। उनकी दुनिया मे सब अभिनेता है, सब दर्शक है, सब समीक्षक हैं। आप उनकी दुनिया में दर्शक बन कर शामिल नहीं हो सकते, उनकी दुनिया का हिस्सा बने बिना तो आप एक जासूस की तरह ही उनका रंगमंच देख सकते हैं । उनकी दुनिया का हिस्सा होना आसान बात नहीं है। जबकि इसके उल्टा होता है हम पहले जासूस बनके उनके रंगमंच में झाँकते हैं तो हमे उनके नाटक या तो बचकाने लगते है या असहनीय। क्योंकि कई बार बच्चों के नाटकों का विषय ऐसे होते हैं जिनके बारे मे हम मान कर चलते है कि बच्चों को ऐसे विषयों पर नहीं सोचना चाहिए। लेकिन वे सोचते हैं । वे अपने नाटको मे बड़ों कि दुनिया के उन कोनों को भी झांक जाते है जो उनके लिए बंद हैं। फिर हमारा जासूस तानाशाह मे रूपांतरित हो जाता है और हम उनके मासूम नाटकों पर सेंसरशिप लगाकर उन्हें तथाकथित रूप से सामाजिक बनाने की कवायद में लग जाते हैं। किशोर अवस्था तक पहुँचते उसके अभिनय के सहज सोते को सुखा डालते हैं। बाद मे अभिनय की शिक्षा के लिए स्कूलों और कॉलेजों मे हजारों खर्चते हैं। यदि इस कवायद में कोई निकाल के आता है तो उसके बाद तैयार कलाकार को खड़ा करने के लिए दान, अनुदान और अकादमियां लगी हुई हैं।
इसके बाद हम कोशिश करके जो रंगमंच बना पाते हैं वो होता है एक विभाजित रंगमंच; जिसके एक धडे मे अभिनेता है और उसकी टोली तथा दूसरी तरफ है दर्शक, जो लाख मनुहारों के बाद प्रेक्षागृह तक आ जाता है। दृश्य की समाप्ती पर ताली बजाता है, नाटक के आखिर मे अभिनय पर फतवा देकर चला जाता है। दर्शक और अभिनेता कभी एक सुर मे नहीं आ पाते हैं । यहाँ तक कि कोई रिश्ता ही नहीं बन पता है। यहाँ एक सुर का मतलब किसी सिंफनी के साज़ों की तरह एक नोट पर बजना या फिर एक तरह से सोचना नहीं है। यहाँ आशय सार्थक संवाद से है । यह संवाद ज़्यादातर लोक नाट्यों मे मिलता है। इस तरह के लोकनाट्यो मे दर्शक तटस्थ या स्थिति से अलगाव कायम रखने वाला दर्शक नहीं होता है। वह जहां कहानी के साथ वैचारिक रूप से जुड़ता है । नाटक के दौरान अभिनेता का उससे संवाद भी होता है और कथानक के विकास मे सहयोग भी करता है । मेरे गाँव का का अनुभव है, हम स्कूल के एक समारोह मे नौटंकी “अमरसिंह राठौड़” कर रहे थे । एक युवा कलाकार जो कि इसमे रामसिंह कि भूमिका निभा रहा था वह अपने संवाद भूल रहा था । लेकिन तभी दर्शकों मे से एक टीचर जो कि बाहर किसी गाँव से आए हुए थे सफा बांध कर मंच पर आ गए और उसकी तलवार लेकर उसे दर्शकों मे बैठ कर देखने को कहा । उन्होने नाटक के उसी बिन्दु से अपनी भूमिका को उठाया । नाटक की गति और गुणवत्ता मे जरा भी गिरावट नहीं आई । अत: यह कहा जा सकता है कि अधिकतर लोक नाट्य बच्चो के नाट्य के निकट बैठते है । जहां पर दर्शक सिर्फ दर्शक नहीं है बल्कि उसका नाटक मे एक्टिव पार्टीसिपेशन होता है।
(कृपया अपनी टिप्पणी अवश्य दें। यदि यह लेख आपको पसंद आया हो तो शेयर ज़रूर करें।  इससे इन्टरनेट पर हिन्दी को बढ़ावा मिलेगा तथा  मेरी नाट्यकला व  लेखन को प्रोत्साहन मिलेगा। ) 

दलीप वैरागी 
09928986983 

5 comments:

  1. देखा जाये तो बचपन सीखने और सिखाने दोनों का नाम है आपकी यह प्रस्तुति बहुत अच्छी लगी बहुत दिनों बाद कुछ हट कर पढ़ने को मिला शायद इसलिए कहा गया है बच्चे मन के सच्चे॥वो जो जैसा देखते हैं बिना किसी मन मुटाव और दिखावे के अपने बाल मंच के बाल नाटक में प्रस्तुत कर देते हैं अब यह आप पर निर्भर करता है की उस खेल रूपी नाटक को देखने का आपका नज़रिया क्या है।
    समय मिले तो आयेगा मेरी पोस्ट पर आपका स्वागत है हम सभी की और से आपको एवं आपके सम्पूर्ण परिवार को नवरात्र की शुभकामनायें
    http://mhare-anubhav.blogspot.com/

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  2. बेहतरीन विश्लेषण ने साबित कर दिया है कि आपकी पारखी नज़र रखते हैं । एक आग्रह है , पोस्ट को बीच बीच में पैराग्राफ़ में बांटें तो पढने में सुविधा होगी , और हां एक चित्र लगाने से थंबनेल दिखेगा तो पोस्ट अधिक आकर्षित करेगी । शुक्रिया

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  3. बच्चे बहुत से जटिल और दार्शनिक महत्व के प्रश्नों के समाधान ऐसी ही सरल प्रक्रियाओं से समझ लेते हैं... bahut khoob bhai

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  4. @अजय कुमार झा, अजय जी आपके सुझाव पर मैंने ग़ौर किया है। आगे से मैं अपनी पोस्ट मे इस बात का ध्यान रखूँगा। इसके अलावा मैंने आपके दूसरे सुझाव पर अमल करते हुए कुछ पुरानी पोस्ट पर चित्र लगाने की कोशिश की है। सुझाव देने के लिए शुक्रिया ... मार्गदर्शन करते रहिए।

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