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Tuesday, March 10, 2015

नाटक संभावनाओं का मंच (भाग-3) : धीरे-धीरे आइसबर्ग का बाहर आना

 पूर्व रंग
इस शृंखला में कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालयों में नाट्य कार्यशालाओं के अनुभवों व उनसे बनी समझ को सँजोने की कोशिश की गई है। कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय (केजीबीवी) सरकार द्वारा संचालित आवासीय विद्यालय हैं। केजीबीवी में समाज के गरीब व वंचित तबके की लड़कियाँ वहीं रह कर कक्षा छ: से आठ तक शिक्षा हासिल करती हैं। यहाँ उन्हें सभी आवासीय सुविधाएं व शिक्षा नि:शुल्क उपलब्ध हैं। यहाँ उन लड़कियों को प्रवेश प्राथमिकता से दिया जाता है, जिन्हें कभी स्कूल जाने का अवसर नहीं मिला है। इसके अलावा वे लड़कियाँ भी आती हैं, जो कभी स्कूल गई थीं, पर कुछ दर्ज़े पार करने के बाद ही उनकी पढ़ाई बीच में छूट गई। संधान पिछले पाँच वर्षों से राजस्थान के केजीबीवी के साथ गुणवत्ता युक्त शिक्षा के लिए कार्य कर रहा है। केजीबीवी में जिस तरह की लड़कियाँ नामांकित होती हैं, उनके साथ ऐसी प्रक्रियाएँ अपनाने की ज़रूरत होती है जिससे वे तेज़ गति से सीख सकें, शीघ्रता से पढ़ने-लिखने के बुनियादी तरीके हासिल करें जो उन्हें अपनी कक्षा की अपेक्षित दक्षताओं तक पहुँचने में मदद करें। इसके साथ उनमे न्होंसला कायम हो कि वे सीख सकती हैं। इसी सोश के तहत अजमेर व बीकानेर के केजीबीवी में थियेटर कार्यशालाएँ आयोजित की गईं। यहा उनके अनुभवों का विवरण है। इसका उद्देश्य यही है, कि इन अनुभवों से जो सीख उभर कर आती है, उसके आधार पर शिक्षिकाएँ अपने प्रयोग कर सकें। 
 धीरे-धीरे आइसबर्ग का बाहर आना
नाट्य कार्यशालाओं की शुरुआत हमने बीकानेर के  केजीबीवी (जैतासर ) से की थी। पहले ही प्रयास में हमें उत्साहित करने वाले नतीजे मिलने लगे, जिन्होंने हमें आगे इस प्रक्रिया को अन्य केजीबीवी में बेहतर ढंग से योजना बना कर ले जाने में मदद की। यों तो, हम यहाँ लगभग तीस-पैंतीस लड़कियों के  साथ काम कर रहे थे, लेकिन इस प्रक्रिया में कुछ लड़कियों की प्रतिभा अप्रत्याशित रुप से निखर कर सामने आई, जिसे पिछले दो-तीन सालों से किसी ने दर्ज नहीं किया था। कार्यशाला शुरु करने के पहले ही दिन से एक नाम हम सबके सामने था- परमेश्वरी जाट। पढ़ने में होशियार, चेहरे पर चमक, एकदम चुस्ती-फुर्ती वाली, किसी न किसी से कोई न कोई बात करते रहने वाली, अभिव्यक्ति में एकदम बेबाक है परमेश्वरी जाट। इसलिए वह शिक्षिकाओं की भी चहेती है। यह हो नहीं सकता कि आप केजीबीवी में चंद घंटांे के लिए जाएँ और परमेश्वरी के नाम से नावाकिफ़ रहें। थोड़ी ही देर में आप परमेश्वरी से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकते। यह लड़की आत्मविश्वास से कितनी लबरेज़ थी, उसका उदाहरण देखें। मेरे साथी संजय नाटक के लिए पात्रों को चुन रहे थे। लगभग सभी लड़कियाँ संजय को घेरे हुए थीं। सब अपना नाम अभिनय के लिए लिखवाना चाहती थीं। इन सबसे दूर परमेश्वरी एक तरफ़ खड़ी हुई थी। मैंने उससे पूछा ‘‘परमेश्वरी, आप नाटक में एक्टिंग नहीं करेंगी क्या?’’ उसने कहा, ‘‘करुँंगी, सर!’’ मैंने कहा, ‘‘आपने नाम क्यों नहीं लिखवाया?’’ परमेश्वरी बड़ी मजबूती से बोली, ’’मुझे लिखवाने की ज़रुरत नहीं, मेरा नाम तो आ ही जाएगा।’’ मुझे परमेश्वरी का जवाब अचंभित कर गया। मुझे पहली बार उसे लेकर हल्की सी चिंता हुई। क्या परमेश्वरी इस आत्मविश्वास को जीवन में आगे सँभाल पाएगी? क्या यह आगे चल कर दंभ या निरंकुश आत्मप्रवंचना में तो रूपांतरित नहीं हो जाएगा, जो उसे अलग-थलग खड़ा कर देगा ? फिर मुझे राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा में दिया गया वह वायदा भी याद आया कि बच्चों को ऐसी शिक्षा दी जाए जिससे वे अपने को किसी मुगालते में न रखें। लेकिन, इसका एक दूसरा सच यह भी था कि परमेश्वरी के आलोक वृत्त की परिधि ऐसी थी कि और भी लड़कियों के नाम थे जो रोशनी में नहीं आ पाते थे। उन अंधेरे पक्षों पर रोशनी डालने का काम नाट्य कार्यशाला ने किया।
इसकी शुरुआत हुई पूजा सुथार से। पूजा एकदम चुप रहने वाली लड़की है। मैं अपने काम के साथ-साथ कैमरे से तस्वीरें लेने का काम भी कर रहा था। तभी पूजा ने आकर धीरे से कहा ‘‘सर, दूसरे समूहों में जो काम चल रहा है, क्या वहाँ की कुछ तस्वीरें मैं ले कर आऊँ?‘‘ मैंने उसे कैमरा दिया, उसे मोटे-मोटे फं़क्शन समझाए। जब उसके द्वारा ली गई तस्वीरों को देखा तो हम दंग रह गए। एकदम किसी प्रोफ़ेशनल की तरह उसने तस्वीरों को क्लिक किया था। इसके बाद हमने व शिक्षिकाओं ने निर्णय लिया कि अब शेष कार्यशाला की तस्वीरें पूजा ही लेगी। उसमें ज़बर्दस्त आत्मविश्वास जागा। तीन दिन में ही। पूरे केजीबीवी में वह अब पूजा फ़ोटोग्राफ़र के नाम से जानी जाती है। इस तरह से केजीबीवी के आकाश पर एक और जुगनू रोशन हुआ।
दूसरी लड़की है कुसुम, जिसने इस अश्वमेध यज्ञ के घोडे़ की लगाम थामी। कुसुम भी अभी तक उन लड़कियों में शामिल थी, जिसके लिए हम तय नहीं कर पा रहे थे कि उसे क्या जि़म्मेदारी दी जाए। इस वक़्त हम उन लड़कियों की तलाश कर रहे थे जो कोरस के लिए सुर में गा सकें। एक-एक कर सभी लड़कियों से गाना गाकर देखने के लिए कहा जा रहा था। किसी का भी जम नहीं रहा था। परमेश्वरी बार-बार गाकर कोशिश करने की बात कह रही थी। और भी लड़कियाँ एक मौका और देने को कह रही थीं। इस बार सब लड़कियों को एक साथ गाने के लिए कहा गया। पूरा समूह जब गा रहा था, तभी एक सुर कहीं से ऐसा आता सुनाई दिया, मानो गहन अंधेरे वन में कहीं से सूरज की एक अकेली किरण अंधेरे को चीरती हुई धरती तक पहुँची हो और हमें राह दिखा गई हो। यह आवाज़ थी कुसुम की। इस बार कुसुम को अकेले गाने दिया तो वह छा गई- एकदम सुरीली व लयबद्ध कुसुम। अब वह पूरे कोरस का नेतृत्व करेगी। भूमिका में एक बदलाव और आया। अब वह सूत्रधार की भूमिका में भी होगी। अब कुसुम की पहचान गायिका कुसुम के रुप में बनने लगी है। इस सब के दरम्यान परमेश्वरी में एक बदलाव आने लगा। वह टीम का हिस्सा बन कर नज़र आने लगी। गाने के वक़्त वह कोरस का हिस्सा थी और अभिनय के वक़्त वह मंच के बीच थी। ये महज़ इक्के-दुक्के नाम नहीं हैं, जिनका यहाँ उल्लेख किया गया है। प्रत्येक कार्यशाला में ऐसी बहुत सी लड़कियाँ थीं, जिनकी संभावनाएँ आइसबर्ग यानी समुद्री हिमशैल के रूप में निकल कर आयीं।
(कृपया अपनी टिप्पणी अवश्य दें। यदि यह लेख आपको पसंद आया हो तो शेयर ज़रूर करें।  इससे इन्टरनेट पर हिन्दी को बढ़ावा मिलेगा तथा  मेरी नाट्यकला व  लेखन को प्रोत्साहन मिलेगा। ) 


दलीप वैरागी 
09928986983 

Sunday, March 8, 2015

नाटक संभावनाओं का मंच (भाग 2) : नाटक क्या करता है


 पूर्व रंग
इस शृंखला में कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालयों में नाट्य कार्यशालाओं के अनुभवों व उनसे बनी समझ को सँजोने की कोशिश की गई है। कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय (केजीबीवी) सरकार द्वारा संचालित आवासीय विद्यालय हैं। केजीबीवी में समाज के गरीब व वंचित तबके की लड़कियाँ वहीं रह कर कक्षा छ: से आठ तक शिक्षा हासिल करती हैं। यहाँ उन्हें सभी आवासीय सुविधाएं व शिक्षा नि:शुल्क उपलब्ध हैं। यहाँ उन लड़कियों को प्रवेश प्राथमिकता से दिया जाता है, जिन्हें कभी स्कूल जाने का अवसर नहीं मिला है। इसके अलावा वे लड़कियाँ भी आती हैं, जो कभी स्कूल गई थीं, पर कुछ दर्ज़े पार करने के बाद ही उनकी पढ़ाई बीच में छूट गई। संधान पिछले पाँच वर्षों से राजस्थान के केजीबीवी के साथ गुणवत्ता युक्त शिक्षा के लिए कार्य कर रहा है। केजीबीवी में जिस तरह की लड़कियाँ नामांकित होती हैं, उनके साथ ऐसी प्रक्रियाएँ अपनाने की ज़रूरत होती है जिससे वे तेज़ गति से सीख सकें, शीघ्रता से पढ़ने-लिखने के बुनियादी तरीके हासिल करें जो उन्हें अपनी कक्षा की अपेक्षित दक्षताओं तक पहुँचने में मदद करें। इसके साथ उनमे न्होंसला कायम हो कि वे सीख सकती हैं। इसी सोश के तहत अजमेर व बीकानेर के केजीबीवी में थियेटर कार्यशालाएँ आयोजित की गईं। यहा उनके अनुभवों का विवरण है। इसका उद्देश्य यही है, कि इन अनुभवों से जो सीख उभर कर आती है, उसके आधार पर शिक्षिकाएँ अपने प्रयोग कर सकें। 

नाटक क्या करता है

आज हम जिस दौर से गुजर रहे हैं, उसमें शिक्षा से बहुत अपेक्षाएँ हैं। लेकिन, वस्तुस्थिति यह है कि शिक्षा से जितनी अपेक्षाएँ की जा रही हैं, नाउम्मीदी उससे कहीं ज्यादा मिल रही है। इस नाउम्मीदी के चलते निरंतर शिक्षा व्यवस्था से असंतोष बढ़ता ही जा रहा है। सब चाहते हैं कि हमारे बच्चे को गुणवत्ता युक्त शिक्षा मिले। ऐसी शिक्षा जिससे गुज़रकर बच्चा एक बेहतर नागरिक बने। अच्छे नागरिक से बराबरी, न्याय, संवेदनशीलता, मिलकर रहना, मिलकर काम करना व सहयोग जैसे सामाजिक व संवैधानिक मूल्यों की अपेक्षा की जाती है। साथ ही उससे यह भी अपेक्षा की जाती है कि उसमे व्यक्तित्व के कुछ महत्वपूर्ण पहलू कल्पनाशीलता, सृजनशीलता, प्रभावी सम्प्रेषण व समस्या समाधान के कौशलों का भी विकास हो।
वर्तमान शिक्षा-व्यवस्था को देखने पर उपरोक्त गुणों के संदर्भ में निराशा ही हाथ लगती है। स्कूली अंत:क्रिया इतनी पाठ्यपुस्तक आश्रित है कि सारी शैक्षणिक प्रक्रियाएँ पाठ्यपुस्तक में दे गई सूचनाओं व संकल्पनाओं को रटने के इर्द-गिर्द बुनी जाती हैं। इस सारी कवायद में बच्चे का ज्ञानात्मक पक्ष भले बढ़ता हो और शायद इस दिशा में वह कुछ विशेषज्ञता व कौशल भी प्रपट कर लेता हो, लेकिन क्या इस प्रक्रिया से समाज व देश आगे बढ़ा? क्या दरअसल खुद व्यक्ति भी? एक वक़्त था, जब देश की तमाम समस्याओं को हम गरीबी व अशिक्षा से जोड़ कर देखते थे। आजा स्थिति यह है कि प्रत्येक बच्चे को हम स्कूल में दाखिल करवा चुके हैं, लेकिन, संविधान के लक्ष्य – न्याय, बराबरी व स्वतन्त्रता फिर भी एक ख्वाब ही बने हुए हैं। आज जातिवाद व सांप्रदायिकता पहले से भी घिनौने रूप में हमारे सामने है। मीडिया के लिए “बिकाऊ मीडिया” विश्लेषण चलन में है। जजों की निष्पक्षता व नैतिकता संदेह के घेरे में है। इंजीनियरिंग पढ़ने वाले विद्यार्थी अपराध का रास्ता चुन रहे हैं। डॉक्टर का इलाज़ एक नया मर्ज़ दे जाता है। पुलिस पर किसी को यकीन नहीं है। नेताओं से उम्मीद नहीं है। भ्रष्टाचार आज अपने चरम पर है।
लब्बोलुआब यह है कि शिक्षा के नाम पर भले ही हम सभी बच्चों को स्कूल तक ले आए हों, लेकिन आज भी शिक्षा में उन संवैधानिक मूल्यों को स्थापित नहीं कर पाए हैं जो किसी इंसान को एक बेहतर नागरिक बनाते हैं। इन जीवन-मूल्यों का शिक्षा में न आने का सबसे बड़ा कारण है, शिक्षा में ज़िंदगी व जीवंत अनुभवों का न आ पाना। सच्चाई, ईमानदारी, बराबरी, संवेदनशीलता व सहभागिता, ये ज़िंदगी के जीवंत मसले हैं। ये अभ्यास से ही ज़िंदगी में साधे जा सकते हैं। लेकिन, इन्हें साधने का अभ्यास हमारी कक्षा में दिखाई नहीं देता है, वहाँ सिर्फ़ है – इन्हें ग्रहण करने की अनंत उपदेश शृंखला या फिर दीवारों पर लिखे सुभाषित वाक्य, जो दीवार का चूना छूटने के साथ ज़िंदगी में भी पपड़ाए से लाग्ने लगे हैं।  जीवन-मूल्यों का अभ्यास जिंदगी में ही हो सकता है। ऐसा हमारे पास क्या है जो जिंदगी को कक्षा में अभ्यास के लिए हाज़िर कर सके या फिर उसका वहाँ सृजन कर सके। जब भी किसी ऐसे माध्यम को तलाशते हैं जो जीवन को कक्षा में उतार सके, तो एक ही माध्यम नज़र आता है – नाटक। नाटक ही वह ज़रिया जो ज़िंदगी को हूबहू कक्षा में थोड़ी देर के लिए सर्जित करता है। यहाँ नाटक के उन मजबूत पहलुओं पर बात करते हैं जो हमारी शिक्षण प्रक्रियाओं को जीवंत बनाते है।
संवेदनशीलता
जब किसी नाटक में हम कोई भूमिका कर रहे होते हैं तो थोड़े वक़्त के लिए ही सही, हम खुद से हट कर किसी और ज़िंदगी को जी रहे होते हैं। इसके दो पहलू है। एक तो इस प्रक्रिया में खुद से बाहर होकर स्वयं को तटस्थ भाव से देखते हैं। जब खुद को बाहर से देखते है तो फिर मैं कहाँ रह जाता है? मैं की गैरहाज़री अहम को अपदस्त करती है। दूसरे हम जब खुद को दूसरे की जगह रख कर देख रहे होते हैं, तो हमें अपनी स्थिति पता चलती है। मसलन, हम किसी नाटक में हिटलर की भूमिका कर रहे होते हैं तो यह ज़रूरी नहीं कि हम हिटलर के विचारों से सहमत हों, लेकिन हम भूमिका निभाते हुए समस्या को हिटलर के नज़रिये से देखते ज़रूर है। समस्या समाधान के लिए नेगोसिएशन यानी बातचीत तभी संभव है जब हम समस्या को दूसरे के नज़रिये से देखना शुरू करते हैं। किशोरावस्था में रिश्तों के दरम्यान जो टकराहट सामने आती है, उसका प्रमुख कारण ही एक दूसरे के नज़रिये को नहीं समझ पाना ही है। एक लड़की घर से बाहर सहेली के साथ बाज़ार जाना चाहती है और उसके पिता, माँ या कोई बड़ा, सख्ती से माना कर देते हैं। अब, समाधान कि ओर तभी बढ़ा जा सकता है जब समस्या को उसके परिवारजनों के नज़रिये से भी देखा जाए।
सहभागिता
नाटक की प्रक्रिया में टीम वर्क बहुत ज़रूरी है। किसी भी नाटक के बनने की शुरुआत ही समूह-कार्य से होती है। बच्चों से नाटक करने को कहते ही वे एक से दो व दो से तीन होने शुरू हो जाते हैं। नाटक के साथ-साथ ही समूह बनना शुरू हो जाता है। नाटक में यह ज़बरदस्त ताकत कि यह एक छाते की तरह काम करता है, जिसके नीचे नृत्य, गीत-संगीत, चित्रकला, मूर्तिकला इत्यादि कलाएं आ जाती हैं। फलत:, नाटक इस वजह से अपने में विभिन्न रुचियों व आयामों वाले लोगों को जोड़ लेता है।
अभिव्यक्ति
नाटक बच्चों को मंच प्रदान करता है ताकि वे खुद को अभिव्यक्त कर सकें। नाटक के माध्यम से वे अपनी भावनाएँ, विचार व अपने सपने लोगों के सामने रख सकते हैं, जो वे सामन्यात: नहीं कर पाते। इसी श्रंखला में आगे लिखा है कि कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय, तबीजी में लड़कियों ने अपना नाटक इसी विषय पर तैयार किया कि वे क्या चाहती हैं? उन्हें क्या अच्छा लगता है? वे क्या बनना चाहती हैं या इसके अलावा उनके माँ में किस प्रकार के भय हैं। इन बातों को कहने का मौका हमारे घर व समाज में कहाँ मिलता है! अपने सपनों को दूसरों के सामने रखना, अपने दिलों की गाँठ खोलना व अपने ज़ख़्मों को हवा दिखने का काम नाटक बखूबी करता है। जब हम इसके अभ्यास नाटक में करते हैं तभी असल ज़िंदगी में कहने का हौसला बन पाता है।
सम्प्रेषण
 नाटक क्या-क्या कर सकता है, इसकी असीम संभावनाएं है। लेकिन नाटक का एक प्रमुख पहलू है कि यह विद्यार्थियों सम्प्रेषण कौशल को माँजता है। नाटक की हर कड़ी में सम्प्रेषण के अनगिनत अभ्यास है। अपनी बात को कहने के अलग-अलग आयाम, आवाज़ को ठीक करने के लिए वाक् – यंत्र को साधना, दूसरे के नज़रिए   से सामने वाले को सुनना – इन सभी के नाटक में बहुत से अभ्यास मिलते है। सम्प्रेषण में दूसरे को सुनने का बड़ा महत्त्व है। आज के दौर में जिस तरह अपनी ही बात को कहने और विरोधी विचार को बर्दाश्त न करने की प्रवृत्ति बढ़ रही है, उसे नाटक व्यवस्थित रूप से तोड़ता है। नाटक में कथोपकथन का अनुशासित तानाबाना होता है। उसमे दूसरे की पंक्तियों को सुने बगैर हम अपना संवाद नहीं बोल सकते हैं। संवादों के इसी अनुशासित विधान में दूसरे को व विरोधी विचार को सुनने के इतने व्यवस्थित अभ्यास मिलते हैं कि यह एक मूल्य के रूप में अवचेतन पर अंकित होता है। वहीं यह एक कौशल के रूप में भी सामने आता है।
समस्या- समाधान

नाटक तैयार करने की प्रक्रिया विद्यार्थियों को अपने जीवन की वास्तविक समस्याओं के समाधान का अभ्यास एक सुरक्षित वातावरण में प्रदान करती है। यहाँ वे उस समस्या के परिणामों को भोगने के भय से मुक्त होते हैं। नाटक में जब हम दूसरे की भूमिका कर रहे होते हैं, तब उस चरित्र के सामने आने वाली दुविधाएँ व द्वंद्व अपने जीवन की समस्याओं का विश्लेषण करने के अभ्यास देते है। मुझे याद है, बचपन में जब घर के बड़े लोग खेत में काम करते थे तो हम भी पास में ही अपनी छोटी सीए क्यारी बना लेते थे और फिर उसमें हल चलना, बीज बोना, सिंचाई करना, फसल काटना इत्यादि, अभिनय खूब करते थे। दूसरे के खेत में पशु चराना, खेत की मेड़ तोड़ना, बंटवारा, पानी की बारी को लेकर झगड़ा – इन सभी का अभिनय हम किया करते थे। मुख्य बात यह थी कि इस अभिनय में भविष्य में आने वाली समस्याओं को सुलझाने की हम तैयारी कर रहे थे, वहीं पर अभी उनके जोखिमों से हम मुक्त थे। 
इन अनुभवों का प्रकाशन संधान द्वारा प्रकाशित किया जा चुका हैजिसे पीडीएफ़ में पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक कर सकते हैं - नाटक : संभावनाओं का मंच   
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दलीप वैरागी 
09928986983 

Saturday, March 7, 2015

नाटक, संभावनाओं का मंच (भाग - 1) : खामोश नाटक जारी है

पूर्व रंग
इस शृंखला में कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालयों में नाट्य कार्यशालाओं के अनुभवों व उनसे बनी समझ को सँजोने की कोशिश की गई है। कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय (केजीबीवी) सरकार द्वारा संचालित आवासीय विद्यालय हैं। केजीबीवी में समाज के गरीब व वंचित तबके की लड़कियाँ वहीं रह कर कक्षा छ: से आठ तक शिक्षा हासिल करती हैं। यहाँ उन्हें सभी आवासीय सुविधाएं व शिक्षा नि:शुल्क उपलब्ध हैं। यहाँ उन लड़कियों को प्रवेश प्राथमिकता से दिया जाता है, जिन्हें कभी स्कूल जाने का अवसर नहीं मिला है। इसके अलावा वे लड़कियाँ भी आती हैं, जो कभी स्कूल गई थीं, पर कुछ दर्ज़े पार करने के बाद ही उनकी पढ़ाई बीच में छूट गई। संधान पिछले पाँच वर्षों से राजस्थान के केजीबीवी के साथ गुणवत्ता युक्त शिक्षा के लिए कार्य कर रहा है। केजीबीवी में जिस तरह की लड़कियाँ नामांकित होती हैं, उनके साथ ऐसी प्रक्रियाएँ अपनाने की ज़रूरत होती है जिससे वे तेज़ गति से सीख सकें, शीघ्रता से पढ़ने-लिखने के बुनियादी तरीके हासिल करें जो उन्हें अपनी कक्षा की अपेक्षित दक्षताओं तक पहुँचने में मदद करें। इसके साथ उनमे न्होंसला कायम हो कि वे सीख सकती हैं। इसी सोश के तहत अजमेर व बीकानेर के केजीबीवी में थियेटर कार्यशालाएँ आयोजित की गईं। यहा उनके अनुभवों का विवरण है। इसका उद्देश्य यही है, कि इन अनुभवों से जो सीख उभर कर आती है, उसके आधार पर शिक्षिकाएँ अपने प्रयोग कर सकें। 

 खामोश, नाटक जारी है।

“अभी आपने हमारा नाटक कहानी किससे काही जाए देखा।” केजीबीवी तबीजी में नाट्य कार्यश्याला के अंतिम दिन का यह दृश्य है। ये शब्द नाटक खत्म होने के बाद नाट्य दल की बालिका अर्चना खरोल के थे। अर्चना यहाँ नाटक खत्म होने  का संदेश देने के लिए मंच पर उपस्थित हुई थी। उसके मजबूती से खड़े होने के अंदाज़, आत्मविश्वास व आँखों की चमक से ऐसा लग नहीं रहा था कि अभी यहाँ कुछ खत्म करने का इरादा है, बल्कि यह कि कोई सिलसिला शुरू होने जा रहा है। अर्चना ने इसी बात को साबित करते हुए दर्शकों, जिनमें बाकी लड़कियाँ, शिक्षिकाएँ व इस प्रदर्शन के लिए विशेष रूप से आमंत्रित बीईओ साहब थे, से कहा –
“इन तीन दिनों में हमारे केजीबीवी में जो नाटक सिखाया गया, वह हमने आपके सामने प्रस्तुत किया। आपको हमारा नाटक कैसा लगा? आप कोई सवाल पूछना चाहते हैं या कोई सुझाव देना चाहते हैं?
सवाल के जवाब में थोड़ी देर सन्नता पसरा रहा। शायद नाटक के बाद इस तरह का सवाल अनपेक्षित था। अचानक एक हाथ हवा में उभरा, जुगनू की तरह, फिर एक और... एक और... एक-एक करके कई हाथ खड़े हो गए। इन जुगनुओं से कोई एक कौना रौशन नहीं था, बल्कि पूरा मंच जगमगा उठा। इन जुगनुओं से हाथ मिला एक चिराग भी प्रज्ज्वलित हुआ। बीईओ साहब कि भी सवाल-जवाब में दिलचस्पी जागी। लड़कियों के सवाल जहां एक ओर नाटक के द्वारा पैदा की गई सहज जिज्ञासा के प्रतिफल थे, वहीं वे उस कौतूहल का नतीजा भी थे कि  पता तो करें कि तीन दिन से क्या हो रहा है ?’ हालांकि उन्हें बताया तो गया था कि नाट्य कार्यशाला चल रही है, लेकिन दरअसल क्या-क्या सिखाया गया, उन्हें नहीं पता था।
लड़कियों ने सवाल पूछने शुरू किए –
“मुखौटे क्यों लगाए जाते हैं?
“नाटक में आधी लड़कियों ने ही मुखौटे क्यों लगा रखे थे?
“पर्दा क्यों लगाया गया था?
“नाटक के अंदर गाना क्यों जोड़ा गया?
“कोरस क्यों बनाया गया ?
“चार लड़कियों ने चार अलग-अलग बातें क्यों कहीं?
“नाटक सभी लड़कियों को क्यों नहीं सिखाया गया? आधे समूह को ही क्यों सिखाया गया?
सवालों को सुन कर थोड़ी देर के लिए हमारे भी होश फ़ाख्ता हुए। फिर हमारे अंदर एक नाट्य-निर्देशक जागा। सवालों का जूआ अपने कंधों पर लादने का मन बना लिया, यह सोच कर कि ये नाट्यशास्त्रीय अवधारणाओं के बुनियादी सवाल हैं, शायद लड़कियाँ जवाब न दे पाएँ। लेकिन, हमने अपने को रोका और फ़ैसला किया कि सवालों के जवाब जिनसे पूछे गए हैं, उन्हें ही देने चाहिए। जिस प्रकार नाटक में हम अभिनेता पर भरोसा करते हैं कि वह अभीष्ट विचार को दर्शकों तक पहुंचाएगा, इस नाटक में भी लड़कियों पर ज्वलंत सामाजिक प्रश्न खड़ा करने का भरोसा किया है। जब उस भरोसे को परखने का वक्त आया है कि क्या लड़कियाँ इन सामाजिक सवालों को खड़ा करने की प्रक्रिया में खुद खड़ी हो पाई हैं या नहीं, तो फिर उस मौके को हाथ से क्यों जानें दें! दूसरी बात श्रेय लेने की भी है। सारा श्रेय उन लड़कियों को ही लेना चाहिए, अच्छा या बुरा। यहाँ मुद्दा हमारी प्रक्रिया के मूल्यांकन का भी है कि नाटक बनाने की प्रक्रिया में क्या लड़कियाँ लाइनें ही रट रही थीं या फिर उन्होने प्रक्रिया का विश्लेषण कर उसे समझा है। बहरहाल, हमें बीच में से हट जाना चाहिए। ऐसा हुआ भी... और बाद में हमें खड़े होने की ज़रूरत पड़ी भी नहीं, सिवाय इसके कि जब उत्साह कुछ ज्यादा ही बढ़ जाता तो ज़रा सा हस्तक्षेप लोकसभा स्पीकर सरीखा... लड़कियों ने बहुत ही व्यवस्थित तरीके से मंच को संभाला। सवाल दर जवाब और जवाब दर सवाल लड़कियाँ आगे बढ़ती रहीं और बहस को चलती रहीं। जैसे उनका सवाल पूछने का तरीका लोकतान्त्रिक था वैसे ही जवाब भी लोकतान्त्रिक तरीके से आ रहे थे। जैसे ही सवाल पूछा जाता तो मंच पर बैठी कोई भी लड़की कहती, “मैं इस सवाल का जवाब देना चाहती हूँ।” वह हाथ खड़ा करती और सवाल का जवाब देती। लड़कियों के वही चंद सवाल यहाँ दिए गए हैं जिन्हें दस्तावेज़ तैयार कर रही लड़की नूरी खातून ने लिख लिया था। आप पूछेंगे सवालों के जवाब कहाँ हैं? जवाब लड़कियों को मिल चुके हैं, लड़कियों ई मार्फ़त। हमारे लिए सवाल महत्वपूर्ण हैं। सवाल शाश्वत होटेन हैं। उनके जवाब सार्वभौमिक नहीं होते। उन्हें अपने संदर्भों से ही समझना पड़ता है। लड़कियों ने उन्हें अपने संदर्भ में देखा। आप भी सवाल से सवाल की तरह ही पेश आएँ।
जब सवाल-जवाब का सिलसिला थमा तो नाटक करने वाली लड़कियाँ हमारी खामोशी बर्दाश्त नहीं कर पाईं। उन्होने पूछ ही लिया –
“आपको हमारा नाटक कैसा लगा?
“आपको नाटक कराते समय कोई कठिनाई तो नहीं आई?
“आप दोबारा कब आएंगे?
जवाब की शक्ल में कुछ भावुकता भरे शब्द ही व्यक्त होने वाले थे, जो अक्सर सार्वभौमिक से होते हैं। आखिरकार मंचन इस सूचना के साथ खत्म हुआ कि शाम को दौसा ज़िले की एक केजीबीवी की लड़कियाँ एक्सपोजर विजिट के लिए अजमेर आई हुई है, जो शाम को यहीं रुकेंगी। फिर क्या था, लड़कियों ने तुरंत निर्णय किया कि क्यों न यह नाटक उन लड़कियों को भी दिखाया जाए। आनन-फ़ानन में वे लड़कियाँ तैयारियों में जुट गईं। इस बार यह जानने के लिए कि लड़कियों का क्या रिफ्लैक्शन है यानि वे उसके बारे में क्या सोचती हैं, शिक्षिकाओं ने उस प्रक्रिया को थोड़ा और व्यवस्थित किया, ताकि आने वाली प्रत्येक लड़की अपनी प्रतिकृया जाहीर कर सके।
इसके लिए चौथाई कागज़ की लगभग सौ पर्चियाँ काटी गईं, जो मंचन के पश्चात लड़कियों को अपनी राय ज़ाहिर करने के लिए दी गईं। तैयारियां पूरी करके लड़कियाँ इंतज़ार करने में लगी। हमें लगा कि नाटक खत्म नहीं हुआ है। वह अभी भी चल रहा है, खामोशी के साथ लड़कियों व शिक्षिकाओं के ज़हन में। हमें लगा हमारा काम पूरा हो गया, थैला उठाया, इजाज़त ली और निकल गए।

बातों से बात निकलती गई

 प्रशिक्षण का दूसरा दिन हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण था। पहले दिन के अप्रत्याशित नतीज़े सामने आने लगे। लड़कियों को मिलकर एक कहानी रचने का काम दिया था, जिसे उन्होंने बखूबी किया। दूसरा, लड़कियों ने पहले दिन का दस्तावेजीकरण भी स्वप्रेरणा से किया था, जिसके वचन से उन्होंने दूसरे दिन की शुरुआत कि। अब उनके प्रतिवेदन के अनुसार ही हम पहले दिन को समझने की कोशिश करते हैं-
“हमारे यहाँ पर संधान से दलीप सर व संजय विद्रोही सर आए। हम सभी लड़कियों को बहुत खुशी हुई। फिर हम सभी लड़कियों में से छत्तीस लड़कियों का चयन किया और हॉल में लेकर गए। हम सभी ने भी परिचय दिया। फिर उन्होंने बताया कि हम तुम्हें नाटक सिखाएँगे, मुकुट (मुखौटे) बनाना सिखाएँगे। हमें बहुत खुशी हुई। फिर उन्होंने पूछा कि हम किस टॉपिक पर नाटक बनाएँगे?
यहाँ उद्देश्य था कि किसी पहले से लिखी गई स्क्रिप्ट पर काम न कर, लड़कियों के खुद के अनुभवों पर आधारित कोई विषय तय किया जाए। ताकि, उन्हें पता चले कि किस प्रकार एक विचार के इर्द-गिर्द कहानी बनाई जाती है, फिर संवाद लिखे जाते हैं तथा उन संवादों के आधार पर पूरे नाटक का ताना-बना कैसे बुना जाता है।
“उन्होंने पहले हमारे सपनों के बारे में पूछा। किसी ने कहा, मैं टीचर बनना चाहती हूँ। किसी ने कहा मेरे पास बड़ा सा मकान हो।एक लड़की ने कहा, पापा मुझे आगे नहीं पदाएंगे, मुझे इस बात का डर है। इस प्रकार हमने डर टॉपिक चुना। खाना खाकर दो बजे हॉल में बैठ गए और गाना गया। सर ने हमें डर टॉपिक पर कहानी बनाने को कहा। हमसे पूछा कि हमे किस-किस से डर लगता है? हमने लड़कियों की सहायता से उसे नोट किया और अब इसी की सहायत से हमें कहानी बनानी है। कहानी किस प्रकार बनाते हैं, छोटा सा गेम खिलाया गया ताकि पता चले लड़कियों की कल्पना शक्ति कितनी तेज़ है। इस प्रकार डर पर ही गाना बनाने के लिए कहा गया।”
यहा विशेष रूप से उल्लेखनीय बात यह है कि लड़कियाँ पूरी प्रक्रिया में सक्रिय रूप से जुड़ रही थीं, शुरू से आखिर तक जिस भी रूप में काम आगे बढ़ रहा था उसे अपनी कॉपी में लिखती जा रही थीं ताकि कोई चरण  छूट न जाए। कौन क्या बनाना चाहती है, किसके क्या सपने हैं, किस-किससे डर लगता है। कहानी-निर्माण की प्रक्रिया में जब कोई लड़की वाक्य जोड़ कर आगे बढ़ती तो दूसरी लड़की झट से उसे लिख लेती। धीरे-धीरे टीम में सहयोग का ताना-बाना अपने आप खिंचने लग गया। इस प्रकार कहानी के संवाद व गीत पंक्ति दर पंक्ति बनते गए। अर्चना खारोल व नूरी खातून कहानी के पूरा होने पर आखिरी तय स्वरूप अपनी कॉपी में दर्ज़ कर लेतीं।
“बाद में हमने मुखौटे बनाने शुरू किए। सर ने बताया कि मुखौटे किस प्रकार बनाए जाते हैं। उखौटे जिस चीज़ से बनाए जाते हैं, उसे जिप्सोमा कहते हैं। सर ने एक लड़की के चेहरे पर मुखौटा बनाकर दिखाया। सबसे पहले जिप्सोमा की पट्टी को थोड़ा-थोड़ा व छोटा काट दिया। फिर एक कटोरी में पानी भर लिया। पहले लड़की के चेहरे पर आँवले का तेल लगाया ताकि मुखौटा चिपके नहीं। फिर जिप्सोमा को जल्दी से भिगोकर चेहरे पर लगा दिया। इस प्रकार आँख, होंठ आदि को ध्यान में रखते हुए मुखौटे बनाए। फिर ये लड़कियों ने एक दूसरे पर बना कर देखे।इस प्रकार सात मुखौटे बना लिए।”
मुखौटे बनाने की शुरुआत में मैं जिप्सोमा की पट्टियाँ काट रहा था और संजय उसे एक लड़की के चेहरे पर लगा कर लड़कियों को दिखा रहे थे। इस दौरान समझ में आ रहा था कि लड़कियाँ किस कदर यह काम अपने हात में लेने को आतुर हैं। अभी मैंने कोई दस पट्टियाँ ही काटी होंगी कि एक लड़की ने कैंची मुझसे ले ली, “लाओ, यह तो मैं कर लूँगी।” संजय ने एक मुखौटा अभी पूरा ही किया था। उससे पहले ही छ:-सात लड़कियाँ अपने चेहरे पर तेल मल कर तैयार थीं और इतनी ही लड़कियाँ उनके चेहरे पर मुखौटे बनाने के लिए तैनात हो गईं। सब अपनी-अपनी कल्पना के हिसाब से मुखौटों को उभारने में जुट गईं। एक लड़की ने कहा, सर, मैं भौंहे बना दूँ। एक लड़की ने माथे पर तिलक भी उकेर दिया। उतार कर मुखौटे सूखने के लिए रख दिए। सूखने के बाद रंग करने की बारी थी। सब अपनी-अपनी कल्पना के रंग भर रही थीं। अचानक एक लड़की ने कहा, “अरे, यह कैसे पता चलेगा कि कौनसा मुखौटा आदमी का है और कौनसा औरत का?” तभी, एक लड़की ने मुखौटे पर काली स्याही से घुमावदार मूंछें लगा दीं और मुखौटे को हवा में लहराते हुए कहा, “अब बन गया आदमी!”
लड़कियों के प्रतिवेदन से यह बात साफ़ है कि वे जहां एक ओर गतिविधियों में सक्रिय रूप से शामिल थीं, वहीं दूसरी तरफ तटस्थ रूप से प्रक्रिया को देख कर विश्लेषण कर रही थीं। साथ में, वे यह कयास भी लगा रही थीं कि कौनसी गतिविधि किस उद्देश्य के लिए कारवाई गई थी। 
इन अनुभवों का प्रकाशन संधान द्वारा प्रकाशित किया जा चुका हैजिसे पीडीएफ़ में पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक कर सकते हैं - नाटक : संभावनाओं का मंच   
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दलीप वैरागी 
09928986983 

Thursday, October 2, 2014

स्वच्छ भारत अभियान: नेपथ्य की तस्वीरें

दो अक्टूबर गांधी जयंती को “स्वच्छ भारत” अभियान के रूप में मनाया जा रहा है। सरकार का स्पष्ट आदेश है कि 2 अक्तूबर को गाँधी जयंती के अवसर छुट्टी नहीं रहेगी, बल्कि सरकारी दफ्तर खुलेंगे और अधिकारी व कर्मचारी अपने कार्यालय परिसर की सफाई करेंगे। इसका पालन जैसा भी हो लेकिन इससे थोड़ी ख़ुशी हुई  कि सफाई का मुद्दा सरकार के एजेंडा में शामिल तो है।
सुबह से इसका पालन भी होता दिख रहा है। फेसबुक व वाट्सअप पर सुबह से ही तस्वीरे शाया  होने लग पड़ी थीं सरकारी स्कूलों में मास्टर जी  झाड़ू लेकर आँगन बुहारते हुए दिखाई दे रहे हैं। बच्चे भी साथ ही दिखाई दे रहे हैं, मय झाड़ू। मास्टर जी के चेहरे पर एक विजेता भाव है कि उसने सरकार के फरमान को निभा दिया और फोटो इसका प्रमाण है। बच्चों के चेहरे पर एक अजीब मुस्कान है, ख़ुशी व अचरज मिश्रित। उन्हें शायद मोदी जी के अच्छे दिन का मतलब आज सबसे पहले समझ में आया है। बच्चे यह भी जानते हैं की यह अच्छा दिन आज के लिए ही है जो कलेंडर की तिथि के साथ कल बदल जाना है। 
मेरी दिलचस्पी चूँकि स्कूलों में ज्यादा है, इसलिए आँखों के सामने स्कूलों के दृश्य तैर जाते हैं। मेरी आँखे वह देखने की कोशिश कर रही हैं जो तस्वीरों में नहीं आ पा रहा है। तस्वीरों में वही प्रेयर का मैदान व क्लासरूम आ रहे हैं, जो रोज़ बुहारे जाते हैं। चूँकि मैं रंगमंच से भी वास्ता रखता हूँ इसलिए ऑन स्टेज गतिविधि से थोड़ा अंदाजा ऑफ़ स्टेज का भी लगाने की आदत सी है। इस लिए मेरी आँखें इस प्रस्तुति का नेपथ्य विधान  चाह रही है, जो शायद किसी न किसी स्कूल में यूं भी रहा हो-  चलो अपने कैमरे को थोडा पैन करते हैं
दृश्य 1
मैदान में झाड़ू लग जाने के बाद गुरूजी ने एक बार पूरे स्कूल का जायजा लिया होगा। अरे यह क्या! स्कूल का शौचालय तो साफ हुआ ही नहीं। इसे कौन साफ करेगा? फिर मास्टर जी ने इस स्थिति को देख कर ज्ञान का निर्माण किया होगा कि झाड़ू सभी तरह की सफाई का प्रतीक नहीं हो सकता। झाड़ू का प्रतीक वैसे भी अब राजनैतिक चिह्न हो गया है। मास्टर जी ने तुरंत झाड़ू के प्रतीक को विस्तार देते हुए इसमें टॉयलेट ब्रश, बाल्टी मग्गे को भी जोड़ दिया होगा। जब झाड़ू के प्रयोग में मास्टर जी ने अगुआई की है, तो इस नए का श्रेय भी उन्हें ही लेना चाहिए। अत: गुरूजी ने ब्रश उठाया साथ में बच्चों ने भी बाल्टी वगैरह उठा लिए हैं। मास्टर जी टॉयलेट साफ कर रहे है, साथ में यह भी बता रहे हैं कि इस टॉयलेट को रोज़ कैसे साफ रखा जाता है। अफ़सोस इस वक्त कोई तस्वीर लेने वाला नहीं है। भला इस तरह की तस्वीरे फेसबुक पर डाली जा सकती हैं !

दृश्य 2  
गुरूजी ने जब झाड़ू रख कर पसीना पोंछा होगा, साफ आँगन को निहार रहे होंगे और बैठने की इच्छा जाहिर की होगी, तब गुरूजी के लिए कुर्सी लेने भागे चार-पांच लड़कों को रोक दिया होगा और खुद ही कुर्सी उठाकर बैठ गए होंगे साथ ही खुद ही उन्होंने दरी पट्टी को तह लगाकर कुर्सी पर रखा होगा। 

दृश्य 3
गुरूजी विद्यालय के दफ्तर में बैठे होंगे, साथ में स्टाफ के साथी। बच्चे कपों में चाय डालते हैं। चाय की चुस्कियों के साथ ही अभियान की सफलता की चर्चा हो रही होगी। गुरुजी ने चाय के प्याले में बचे दो घूंट को एक लम्बे घूंट में समाप्त करके कप को जमीन पर रखना चाहा। इससे पहले कप जमीन को स्पर्श करे, किसी क्रिकेट खिलाडी की सी फुर्ती दिखाते हुए एक विद्यार्थी ने कप को लपक लिया। जैसे स्लिप पे कैच पकड़ा हो। और सरपट दौड़ पड़ा उसे धोकर लाने के लिए। लेकिन आज गुरूजी ने उसे एक जोर की आवाज़ देकर रोक लिया होगा। बेवकूफ, इधर आओ, हम अपना कप खुद धोकर लाएँगे। सबको अपने कप की सफाई खुद करनी चाहिए। ये क्या ! गुरूजी अपना कप लेकर धोने निकल पड़ते हैं। उनके पीछे पूरा स्टाफ कदमताल करते हुए चल पड़ता होगा। बच्चे इस पहेली के कई मायने निकाल सकते हैं

दृश्य 4
मिड दे मील बन कर तैयार है। बच्चे खा रहे हैं। कुछ बच्चे परोस रहे है। परोसने वाले बच्चे टीचर के सामने भी तस्तरी रखते हैं। गुरूजी जैसे ही तस्तरी में हाथ डालते हैं गर्म भात से उनकी ऊँगली जल जाती। गुरूजी को आज यह ज्ञान हुआ कि अगर गर्म भात में हाथ डालो तो ऊँगली जल जाती है। तुरंत गुरूजी ने इस ज्ञान का जनरलाईजेशन किया कि अगर उनकी ऊँगली जलती है तो बच्चों की भी जलती है। गुरूजी ने अपने अगले दिन की टू डू लिस्ट में यह काम जोड़ा कि बच्चों के लिए चम्मच खरीद कर लाने हैं।

दृश्य 5
गुरूजी लगभग खाना समाप्त करने वाले है। बच्चों की फील्डिंग तैनात है कि कौन सबसे पहले भाग कर तस्तरी धो लाने का सौभाग्य प्राप्त करता है। पर गुरूजी को ज्ञान प्राप्ति हो चुकी है, उन्होने कप वाले ज्ञान के साथ इसे भी जोड़ कर देख लिया है। इन्होने बच्चों की आशा के विपरीत अपनी तस्तरी धोने के लिए नल की और चले गए। गुरुजी को तस्तरी धोने के वक़्त, धोने में काम आने वाली अपरिहार्य चीज़ें याद आई। हालांकि उन्हें मिट्टी में अपने प्लेट रगड़ते बच्चे दिखाई दे रहे थे। लेकिन गुरुजी के मुंह से अचानक निकला कि धोने का साबुन कहाँ है? पोषाहार वाली बाई ने तुरंत बताया कि गुरुजी आप ही याद करके बताइये कि आखिरी बार साबुन किस तारीख को लाए थे। गुरुजी स्मृतियों में जाने को उत्सुक नहीं थे। उन्होंने अपनी टु डू लिस्ट को विस्तार देते हुए उसमे साबुन भी जोड़ दिया। गुरुजी आगे बढ़ जाते हैं। नल के नीचे प्लेटें धो रहा बच्चों का झुंड पीछे हट जाता है। गुरुजी सर्र सर्र बहते नल की धार के नीचे अपनी तस्तरी धो रहे हैं। तस्तरी से टकरा कर सारा पानी जमीन पर नहीं गिरता है कुछ पानी गुरुजी की पतलून को सराबोर कर लेता है। यहाँ गुरुजी को एक और ज्ञान की प्राप्ति होती है जो न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण के नियम के विरोधी-सा  जान पड़ता है। इस नियम के मुताबिक सारा पानी जमीन पर ही गिरना चाहिए था, फिर पतलून पे कैसे गिरा। न्यूटन की  हाइपोथीसिस को पलटने के लिए उनके पास पर्याप्त सबूत है, और वो सबूत है गीली पतलून के साथ खड़े उनके जैसे लगभग सौ सवा सौ बच्चे। जो भी हो गुरुजी ने नवीन ज्ञान ने भावनात्मक परिष्कार किया और उसे कर्म में तब्दील करने के लिए अपनी टु डू लिस्ट को एक और आयाम दिया। मेंटीनेंस की मद से गुरुजी बर्तन धोने के लिए सिंक बनवाने के ख्यालों के साथ अपनी धुली सी तस्तरी बच्चों को सोंप देते हैं।

दोस्तो ये वे दृश्य हैं जो आज के दिन हर स्कूल में घटित होने चाहिए। गांधी जी सफाई को इसी रूप में देखते थे और शुरुआत स्वयं से करते थे। लेकिन, अफसोस है कि इन दृश्यों की एक भी तस्वीर न फेसबूक पर  है न वाट्स अप पर। कल के अखबार का बेसबरी से इंतज़ार है। शायद उसमे इन दृश्यों की कोई झलक दिख जाए। अगर एक भी तस्वीर ऐसी मिल जाए तो समझेंगे कि सबके अच्छे दिन आ गए। 
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दलीप वैरागी 
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Saturday, May 18, 2013

मेरी डायरी का एक पन्ना : योगी चौराहे

मैं कल अपने पाँच साल के बेटे काव्य को टीका लगवाने के लिए डॉक्टर के यहाँ जा रहा था। हम दोनों बाइक पे थे। आदतन वह पूरे रास्ते सवाल पूछता रहता है। आज वह सवाल नहीं पूछ रहा था। क्योंकि जाने कैसे उसे यह भान हो गया था कि जो रास्ता हमने चुना है वह डॉक्टर की तरफ जाता है। डॉक्टर के यहा जाने का मतलब उसके लिए टीका लगना ही होता है। इसलिए वह अपनी सहज जिज्ञासाओं को दबा या स्थगित कर के उन युक्तियों को सोच रहा था और एक-एक करके आजमा भी रहा था, जिससे डॉक्टर से छुटकारा मिल जाए। हम भी बाप ठहरे और लगातार आश्वासन दिए जा रहे थे कि आपको टीका तो बिलकुल नहीं लगेगा। हमने अपनी मुश्किल डॉक्टर पे डाल दी।
खैर, डॉक्टर के गए, टीका भी लगा, रोना – चिल्लाना, प्यारना – पुचकारना भी हुआ। बहरहाल हम वापस लौट रहे थे। चौराहे की बत्ती जो दूर से उल्टी गिनती गिनते हुए दिखाई दे रही थी, 3... 2... 1... तक पहुँचते - पहुँचते लाल हुई। हमने ब्रेक दबाए और रुक गए। बत्ती का दुबारा से हरे होने का इंतज़ार करने लगे, फिर से एक उल्टी गिनती के साथ। दूसरी तरफ के यतायात का हाल कुछ ऐसा था - मानो किसी ने सांस को प्राणायाम की तरह प्रयास से रोक रखा था और अगर अब न भी छोड़ते तो अपने आप छूट जाता। लगभग कपालभांति की तरह झटके से चौराहे ने ट्राफिक को फूँक दिया। कई बार ये चौराहे मुझे किसी योगी की तरह लगते हैं जो एक नाक से सांस को भर कर रोक रहे हैं और दूसरी तरफ से छोड़ रहे हैं। लेकिन लाख प्रयास से योग साधता नहीं।
टीके से उपजी नाराजगी की वजह से बाप बेटे में अभी तक अस्थाई रूप से बातचीत बंद थी। आखिर जिज्ञासा ने अबोले को तोड़ा और उसने सवाल किया, “पापा, हम यहाँ रुक क्यो गए हैं?”
इस सावल ने अब पिता के अंदर एक शिक्षक को जागा दिया। और शिक्षक ने मौका ताड़ लिया ट्राफिक रूल सिखाने का। मैंने कहा, “जब सिग्नल लाल होता है तो हम रुक जाते हैं”
“हम क्यों रुक जाते हैं?”
“ताकि दूसरी तरफ के लोग आसानी से निकाल सकें।”
“अब हम कब चलेंगे?”
“जब सिग्नल ग्रीन होगा तब...”
“ग्रीन कब होगा?”
“जब बैकवर्ड काउंटिंग खत्म होगी।”
मेरी ज्ञान - गीता चल रही थी। उल्टी घड़ी ने लगभग आधा ही फासला तय किया होगा। पीछे से एक फर्राटा बाइक आकर थोड़ी धीमी हुई। हॉर्न से पार निकल जाने के इरादे साफ जाहिर किए। हॉर्न की आवृति और उतार चढ़ाव की तत्परता में देश की तरक्की के ग्राफ के साथ आगे बढ़ जाने के इरादे साफ दिखाई दे रहे थे। आगे आकार बाइक पर आरूढ़ नौजवान ने दाएँ देखा यह इतमीनान करने के लिए कि कोई पुलिस वाला तो नहीं खड़ा है। दायीं ओर से तसल्ली हो गई कि इधर तरक्की में रुकावट नहीं खड़ी है। फिर बायीं ओर देखना जरूरी था, तरक्की में बाधाएँ दूसरी तरफ भी हो सकती हैं। बाईं और एक स्कूटी खड़ी थी और स्कूटी पर दो लड़कियां। बाइक सवार ने विकास के पहले मॉडल में तुरंत अपना अविश्वास सा प्रकट करते हुए अपनी बाइक को एक तरफ विराम दिया। देश की तरक्की की नई परिभाषा गढ़ी। इंजन को बंद करके नियम पालन में आस्था प्रकट की और अपनी बाइक के मिरर को स्कूटी पर फोकस करके संवैधानिक तौर तरीकों को अपनाना उचित समझा।
तरक्कीपसंदों की कमी कहीं भी नहीं होती है। पीछे से ‘धूम’ टाइप की दो – चार फटफटिया और आईं, आते ही सर्र से निकल गईं। निकलते ही लोगों को जागा गई कि कुछ भी हो तरक्की की असली पहचान जल्दी से आगे निकल जाना ही है। बाकी के वाहनों ने भी तरक्की के इसी मॉडल में ही अपनी बेहतरी समझी, उनमें जुंबिश हुई। काफिला आगे निकाल पड़ा। लाल बत्ती अभी भी सांस थामे हुए खड़ी थी। तभी बेटे सवाल किया –
“अभी तो ग्रीन लाइट भी नहीं हुई फिर सब क्यूँ जा रहे हैं।”
मेरे ज्ञान की गठरी में छेड़ हो चुका था। चौराहे पे जो मैंने पाठशाला खड़ी की थी वह ताश के पत्तों की मानिंद ढह गई थी। मेरे भीतर का अध्यापक छुट्टी ले चुका था। पिता का अक्स फिर उभर आया था। वाहनों के समुंदर का हिस्सा बनना ही बुद्धिमानी समझ पिता आगे बढ़ा। बेटा इस बार लगभग चिल्ला के बोला-
“हम आगे क्यूँ जा रहे है, सिग्नल अभी ग्रीन नहीं हुआ है?”
कुछ कहने सुनने को बाकी नहीं था। कहता भी क्या, कोई भी शब्द अब असरदार नहीं लग रहा था, वजनदार नहीं लग रहा था। जो मैंने सिखाना चाहा वह तो मालूम नहीं लेकिन इतना तो जरूर है कि कुछ न कुछ सीखना तो जरूर हुआ है। क्योंकि हर घटना से बच्चे कोई सीख तो गढ़ ही लेते हैं। वह क्या है – नियम पालन के लिए नागरिकता का कोरा किताबी पाठ, तेज़ रफ्तार का पागलपन, एक पिता की कथनी और करनी का दोहरापन? या कुछ और ?
इन ट्राफिक सिगनल्स पर यूं तो मिनट आधा-एक मिनट का विराम होता है लेकिन इन वकफ़ों में ही बहुत से मासूमों के मन में बहुत सारी अवधारणाएँ बनती मिटती हैं। और कुछ पत्थर पे स्थायी इबारत की तरह भी लिख जाती हैं।
(कृपया अपनी टिप्पणी अवश्य दें। यदि यह लेख आपको पसंद आया हो तो शेयर ज़रूर करें।  इससे इन्टरनेट पर हिन्दी को बढ़ावा मिलेगा तथा  मेरे लेखन  को प्रोत्साहन मिलेगा। ) 

दलीप वैरागी 
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अलवर में 'पार्क' का मंचन : समानुभूति के स्तर पर दर्शकों को छूता एक नाट्यनुभाव

  रविवार, 13 अगस्त 2023 को हरुमल तोलानी ऑडीटोरियम, अलवर में मानव कौल लिखित तथा युवा रंगकर्मी हितेश जैमन द्वारा निर्देशित नाटक ‘पार्क’ का मंच...