Tuesday, March 10, 2015

नाटक संभावनाओं का मंच (भाग-3) : धीरे-धीरे आइसबर्ग का बाहर आना

 पूर्व रंग
इस शृंखला में कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालयों में नाट्य कार्यशालाओं के अनुभवों व उनसे बनी समझ को सँजोने की कोशिश की गई है। कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय (केजीबीवी) सरकार द्वारा संचालित आवासीय विद्यालय हैं। केजीबीवी में समाज के गरीब व वंचित तबके की लड़कियाँ वहीं रह कर कक्षा छ: से आठ तक शिक्षा हासिल करती हैं। यहाँ उन्हें सभी आवासीय सुविधाएं व शिक्षा नि:शुल्क उपलब्ध हैं। यहाँ उन लड़कियों को प्रवेश प्राथमिकता से दिया जाता है, जिन्हें कभी स्कूल जाने का अवसर नहीं मिला है। इसके अलावा वे लड़कियाँ भी आती हैं, जो कभी स्कूल गई थीं, पर कुछ दर्ज़े पार करने के बाद ही उनकी पढ़ाई बीच में छूट गई। संधान पिछले पाँच वर्षों से राजस्थान के केजीबीवी के साथ गुणवत्ता युक्त शिक्षा के लिए कार्य कर रहा है। केजीबीवी में जिस तरह की लड़कियाँ नामांकित होती हैं, उनके साथ ऐसी प्रक्रियाएँ अपनाने की ज़रूरत होती है जिससे वे तेज़ गति से सीख सकें, शीघ्रता से पढ़ने-लिखने के बुनियादी तरीके हासिल करें जो उन्हें अपनी कक्षा की अपेक्षित दक्षताओं तक पहुँचने में मदद करें। इसके साथ उनमे न्होंसला कायम हो कि वे सीख सकती हैं। इसी सोश के तहत अजमेर व बीकानेर के केजीबीवी में थियेटर कार्यशालाएँ आयोजित की गईं। यहा उनके अनुभवों का विवरण है। इसका उद्देश्य यही है, कि इन अनुभवों से जो सीख उभर कर आती है, उसके आधार पर शिक्षिकाएँ अपने प्रयोग कर सकें। 
 धीरे-धीरे आइसबर्ग का बाहर आना
नाट्य कार्यशालाओं की शुरुआत हमने बीकानेर के  केजीबीवी (जैतासर ) से की थी। पहले ही प्रयास में हमें उत्साहित करने वाले नतीजे मिलने लगे, जिन्होंने हमें आगे इस प्रक्रिया को अन्य केजीबीवी में बेहतर ढंग से योजना बना कर ले जाने में मदद की। यों तो, हम यहाँ लगभग तीस-पैंतीस लड़कियों के  साथ काम कर रहे थे, लेकिन इस प्रक्रिया में कुछ लड़कियों की प्रतिभा अप्रत्याशित रुप से निखर कर सामने आई, जिसे पिछले दो-तीन सालों से किसी ने दर्ज नहीं किया था। कार्यशाला शुरु करने के पहले ही दिन से एक नाम हम सबके सामने था- परमेश्वरी जाट। पढ़ने में होशियार, चेहरे पर चमक, एकदम चुस्ती-फुर्ती वाली, किसी न किसी से कोई न कोई बात करते रहने वाली, अभिव्यक्ति में एकदम बेबाक है परमेश्वरी जाट। इसलिए वह शिक्षिकाओं की भी चहेती है। यह हो नहीं सकता कि आप केजीबीवी में चंद घंटांे के लिए जाएँ और परमेश्वरी के नाम से नावाकिफ़ रहें। थोड़ी ही देर में आप परमेश्वरी से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकते। यह लड़की आत्मविश्वास से कितनी लबरेज़ थी, उसका उदाहरण देखें। मेरे साथी संजय नाटक के लिए पात्रों को चुन रहे थे। लगभग सभी लड़कियाँ संजय को घेरे हुए थीं। सब अपना नाम अभिनय के लिए लिखवाना चाहती थीं। इन सबसे दूर परमेश्वरी एक तरफ़ खड़ी हुई थी। मैंने उससे पूछा ‘‘परमेश्वरी, आप नाटक में एक्टिंग नहीं करेंगी क्या?’’ उसने कहा, ‘‘करुँंगी, सर!’’ मैंने कहा, ‘‘आपने नाम क्यों नहीं लिखवाया?’’ परमेश्वरी बड़ी मजबूती से बोली, ’’मुझे लिखवाने की ज़रुरत नहीं, मेरा नाम तो आ ही जाएगा।’’ मुझे परमेश्वरी का जवाब अचंभित कर गया। मुझे पहली बार उसे लेकर हल्की सी चिंता हुई। क्या परमेश्वरी इस आत्मविश्वास को जीवन में आगे सँभाल पाएगी? क्या यह आगे चल कर दंभ या निरंकुश आत्मप्रवंचना में तो रूपांतरित नहीं हो जाएगा, जो उसे अलग-थलग खड़ा कर देगा ? फिर मुझे राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा में दिया गया वह वायदा भी याद आया कि बच्चों को ऐसी शिक्षा दी जाए जिससे वे अपने को किसी मुगालते में न रखें। लेकिन, इसका एक दूसरा सच यह भी था कि परमेश्वरी के आलोक वृत्त की परिधि ऐसी थी कि और भी लड़कियों के नाम थे जो रोशनी में नहीं आ पाते थे। उन अंधेरे पक्षों पर रोशनी डालने का काम नाट्य कार्यशाला ने किया।
इसकी शुरुआत हुई पूजा सुथार से। पूजा एकदम चुप रहने वाली लड़की है। मैं अपने काम के साथ-साथ कैमरे से तस्वीरें लेने का काम भी कर रहा था। तभी पूजा ने आकर धीरे से कहा ‘‘सर, दूसरे समूहों में जो काम चल रहा है, क्या वहाँ की कुछ तस्वीरें मैं ले कर आऊँ?‘‘ मैंने उसे कैमरा दिया, उसे मोटे-मोटे फं़क्शन समझाए। जब उसके द्वारा ली गई तस्वीरों को देखा तो हम दंग रह गए। एकदम किसी प्रोफ़ेशनल की तरह उसने तस्वीरों को क्लिक किया था। इसके बाद हमने व शिक्षिकाओं ने निर्णय लिया कि अब शेष कार्यशाला की तस्वीरें पूजा ही लेगी। उसमें ज़बर्दस्त आत्मविश्वास जागा। तीन दिन में ही। पूरे केजीबीवी में वह अब पूजा फ़ोटोग्राफ़र के नाम से जानी जाती है। इस तरह से केजीबीवी के आकाश पर एक और जुगनू रोशन हुआ।
दूसरी लड़की है कुसुम, जिसने इस अश्वमेध यज्ञ के घोडे़ की लगाम थामी। कुसुम भी अभी तक उन लड़कियों में शामिल थी, जिसके लिए हम तय नहीं कर पा रहे थे कि उसे क्या जि़म्मेदारी दी जाए। इस वक़्त हम उन लड़कियों की तलाश कर रहे थे जो कोरस के लिए सुर में गा सकें। एक-एक कर सभी लड़कियों से गाना गाकर देखने के लिए कहा जा रहा था। किसी का भी जम नहीं रहा था। परमेश्वरी बार-बार गाकर कोशिश करने की बात कह रही थी। और भी लड़कियाँ एक मौका और देने को कह रही थीं। इस बार सब लड़कियों को एक साथ गाने के लिए कहा गया। पूरा समूह जब गा रहा था, तभी एक सुर कहीं से ऐसा आता सुनाई दिया, मानो गहन अंधेरे वन में कहीं से सूरज की एक अकेली किरण अंधेरे को चीरती हुई धरती तक पहुँची हो और हमें राह दिखा गई हो। यह आवाज़ थी कुसुम की। इस बार कुसुम को अकेले गाने दिया तो वह छा गई- एकदम सुरीली व लयबद्ध कुसुम। अब वह पूरे कोरस का नेतृत्व करेगी। भूमिका में एक बदलाव और आया। अब वह सूत्रधार की भूमिका में भी होगी। अब कुसुम की पहचान गायिका कुसुम के रुप में बनने लगी है। इस सब के दरम्यान परमेश्वरी में एक बदलाव आने लगा। वह टीम का हिस्सा बन कर नज़र आने लगी। गाने के वक़्त वह कोरस का हिस्सा थी और अभिनय के वक़्त वह मंच के बीच थी। ये महज़ इक्के-दुक्के नाम नहीं हैं, जिनका यहाँ उल्लेख किया गया है। प्रत्येक कार्यशाला में ऐसी बहुत सी लड़कियाँ थीं, जिनकी संभावनाएँ आइसबर्ग यानी समुद्री हिमशैल के रूप में निकल कर आयीं।
(कृपया अपनी टिप्पणी अवश्य दें। यदि यह लेख आपको पसंद आया हो तो शेयर ज़रूर करें।  इससे इन्टरनेट पर हिन्दी को बढ़ावा मिलेगा तथा  मेरी नाट्यकला व  लेखन को प्रोत्साहन मिलेगा। ) 


दलीप वैरागी 
09928986983 

1 comment:

  1. Kyaa baat h sirrji....telent want a occasion...asi kai puja permeshwary y or kusum hogy jinhe talaash h platform ki...agerhme de mouka to hum bhi de chaukan...its fact....its depend on her teachers

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