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Thursday, September 24, 2020

रसोड़े में कौन था : कविता

#Rasode_Mein_Kaun_Tha

रसोड़े में कौन था?

इस सवाल का जवाब इंसानियत की पीठ में 

धंसा हुआ है बेशर्म इतिहास -सा। 

वर्तमान की छाती पर है किसी अतार्किक चट्टान-सा। 

देख सको तो भविष्य की पेशानी पर भी 

उभर आता है कभी - कभी

भयानक सपने की तरह।  


रसोड़े में कौन था ?

रसोड़े में "था" कभी कोई न था 

वहाँ केवल "थी" थी 

वहाँ केवल "थी" है आज भी 

वह हमेशा से है 

दुनिया के  पहले कैलेंडर की पहली तारीख से भी पहले 

शायद सभ्यता के पहले बिंदु से 

रसोड़े में केवल वही 'थी'

उसने चूल्हे पर 'खाली कूकर' चढ़ा रखा है 

जिसमे वह खौला रही है - 

अपने सपने 

अपनी अपनी इच्छाएँ 

अपनी आकांक्षाएँ 

अपने सुख 

इससे जब भी फुर्सत मिलती है  वह प्रसव करती हैं -

संततियाँ  

आगे बढ़ाती  हैं वंशबेलें 

सेती हैं उनके  सपने 

सींचती हैं उनकी की इच्छाएँ 

उनकी  महत्वकांक्षाएँ  

पालती-पोसती है निरंकुश तानाशाह भी

अपने पूजक 

अपने भंजक 

अपने प्रवंचक 

रसोड़े में आत्म प्रवंचना का विधान है।   


रसोड़े में कौन है ?

रसोड़े में एक अर्थशास्त्र है 

जो चुराता आ रहा है 

आधी आबादी का श्रम

अर्थशास्त्र का कोई भी शब्द -

बंधुआ मजदूरी, बेगारी, बेकारी बेरोजगारी .... 

नाकाफी हैं इस लूट को व्यक्त करने के लिए 

श्रम की इस लूट से

गिरता उठता नहीं है 'सकल घरेलू उत्पाद' 

इस लूट पर  नहीं है किसी भी राष्ट्रीय मीडिया पर  वाद-विवाद 

रसोड़े में श्रम की चोरी का अर्थशास्त्र है। 


रसोड़े में कौन है ? 

रसोड़े में एक पाँच - छः साल की छोटी महिला है 

उसके हाथ में किचन-सेट के छोटे खिलौना बर्तन हैं

खेलते- खेलते वह बड़ी हो रही है 

उसके किचन सेट भी उसके साथ बड़े हो गए हैं 

जो  बाहर  की ओर जाने वाली राह में खड़े हो गए है।

अब उसके लिए दो दुनिया हैं 

एक रसोड़े के अंदर और दूसरी उससे बाहर 

रसोड़े में दुनिया का विभाजन है।  

 

रसोड़े में कौन है ?

देगची में छोंक की मधुर झंकार है 

रोटी से उठती   महक  का अम्बार है

इन दोनों से निर्लिप्त दो आंखे दीवार पर टंगे कैलेंडर पर टिकी हैं

जिसमे रचे गए हैं उसके लिए - 

अमावस पूनम 

तीज,  चौथ, 

ग्यारस बारस 

सोमवार , शनिवार... 

सप्ताह में तीन बार, चार बार  

निराहार, अल्पाहार 

निर्जला व्रत और त्योहार 

दरअसल रसोड़े में आधी आबादी को भूखा रखने का 

एक समाज शास्त्र है।  

लेखन : दलीप वैरागी 

मोबाइल 9928986983 

 




 


 

Friday, September 18, 2015

कहानी कोई भी मोड़ ले सकती है

यह नाटक कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय तबीजी, अजमेर की लड़कियों के साथ नाट्य कार्यशाला के दौरान तैयार किया गया।
-      (मंच पर टोली आकार गाना शुरू करती है। दो गायक पहले गाते हैं बाकी समूह उन पंक्तियों को दोहराता है।)
गायक     : आइए करें तमाशा जी,
आइए करें तमाशा जी।
सुनिए अपनी भाषा जी,
सुनिए अपनी भाषा जी।
ओ रे ओ मेरे देश के वासी
ओ रे ओ मेरे गाँव के वासी
गाँव के वासी, शहर के वासी
घर के वासी गली वासी
कोरस     : आइए करें तमाशा जी ....
गायक    : चाचा आओ, चाची आओ,
काका – काकी आप भी आओ
चिंटू मोनू का साथ में लाओ,
गोलु को तुम गोद खिलाओ
खाते आओ, गाते आओ  
आइए मम्मी पापा जी .....
एक          : लो भाई आगे, अब बोलो
गायक 1,2  : ( उसे आदर से दर्शकों में बैठते है। )
आओ बैठो नाटक देखो
नाक के खोल के फाटक देखो
कोरस           : नहीं
गायक           : दांत के खोल के फाटक देखो
कोरस           : नहीं जी 
गायक           : आँख के खोल के फाटक देखो
कोरस           : अरे नहीं भाई
सब             : कान के खोल के फाटक देखो
                 आइए करें तमाशा जी ....
दो               : अरे भाई क्या है आपके नाटक में?
गायक          : इस नाटक में बड़े-बड़े हैं
पेड़ों जैसे अड़े खड़े हैं
रीत रिवाज गले सड़े है 
माल दबाए चोर खड़े हैं
तीर तमंचा तान खड़े है
तीन व चार    : ( दोनों गायकों के कनपटी पर पिस्टल तानने का अभिनय)
                 ठाँय – ठाँय
गायक           : कहीं नहीं होती सुनवाई
                 कितना ही चिल्ला लो भाई
                 ऐसा क्यों होता है भाई...
(कलाकारों की मंडली भाग कर मंच पर आती है।)
गायक           : अरे भाई कौन हो? क्यों घुसे चले आ रहे हो?
अभिनेता       : हो गया आपका तमाशा... अब अपना पेटी-बाजा उठाये और प्रस्थान कीजिए
गायक           : क्यों ?
अभिनेता       : अब हमारा रोल है।
(गाते हुए निकाल जाते हैं। )
                 आइए करें तमाशा जी ...
सूत्रधार         : नमस्कार ... हमारे नाटक में एक कहानी है...
पाँच            : डायरेक्टर साब आप भूल रहे हैं
सूत्रधार         : क्या ?
पाँच            : इस नाटक में एक नहीं दो कहानियाँ हैं।
सूत्रधार         : हाँ तो भाई ... मैं कह रहा था कि ... इस नाटक में एक नहीं दो कहानियाँ है...
कोरस           : बहुत खूब ... एक टिकट में दो फिल्में
छ:              : डायरेक्टर साब आप फिर भूल रहे हैं
सात            : अब क्या है भाई ...
सात            : इस नाटक में दो नहीं तीन कहानियाँ है।
कोरस           : क्या बात है...
सूत्रधार         : बिलकुल इस नाटक में दो नहीं तीन-तीन कहानियाँ हैं। 
आठ             : आप बिलकुल भुलक्कड़ हैं डायरेक्टर साब... इस नाटक में चार – चार कहानियाँ                  है।
एक             : ये नाटक तो कहानियों की किताब है...
कोरस           : जिसमें कहिनियाँ बेहिसाब हैं...
                 आइए करें तमाशा जी... (गाते हुए मंच का चक्कर लगते हैं)
एक             : यह कहानी सीता की है... 
दो               : जिसके कुछ सपने हैं ।
तीन             : यह कहानी गीता की है...
चार             : जिसके सपनों पर समाज का पहरा है।
पाँच            : यह कहानी अंजली की है...
छ:              :  जिसका दुख और भी गहरा है।
सात            :  यह कहानी रीना की है...
आठ             : जो सपनों को सच करना चाहती है।
कोरस           : ये कहानी हम सब की है....
                 आइए करें तमाशा जी ...
( अस्पताल का दृश्य सीता के पिता बेड पर लेटे हैं। दृश्य में सीता के चाचा, चाची व सीता हैं। )
चाची           : (सीता को दुलारते हुए) हाय मेरी प्यारी भतीजी... माँ तो पहले ही मर गई...                  अब पिता भी बहुत बीमार हैं। तुम चिंता मत करो... तुम मेरे पास रहना ... मैं                  तुझे अपनी बेटी की तरह रखूंगी।
(चाचा बाहर आता है। )
चाचा           : बेटी तू अपने पिता के पास बैठ जरा...
चाची           : अजी क्या हुआ ?
चाचा           : ज्यादा देर नहीं अब
चाची           : इतनी देर मत करो जमीन के कागज़ का काम पहले...
चाचा           : हो गया...
(अंदर से सीता के रोने की आवाज़ आती है। सब रोते हुए सीता के पापा के चारों और घेरा बनाते है। दृश्य बदलता है। )
गायक           : सीता की अब ये कहानी हुई
                 चाचा-चाची के मन में बेईमानी हुई...
                 फंस गई देखो उनके जाल में
                 सीता कि अब ये कहानी हुई ...
सूत्रधार         : लाइट... साउंड... कैमरा... सीन वन... टेक वन ... एक्शन
चाचा           : सीता मेरे कपड़े प्रेस हो गए?
सीता            : हाँ, ये रहे
चाचा           : ये क्या ! शर्ट जला दी...
चाची           : सीता बर्तन माँज दिए ...
सीता            : जी चाची ... ये रहे 
चाची           : ये बर्तन माँजे है? कितने गंदे हैं... (बर्तन फेंकती है। )
चाचा           : मेरे जूते पोलिश हो गए क्या
सीता            : जी, ये लो ॥
चाचा           : देखो कितने गंदे हैं ... ये पोलिश की है?
(थप्पड़ मार कर गिरा देता है।)
चाची           : इससे कुछ नहीं होता ... मैं कहती हूँ इसे घर से निकाल बाहर करो ...
(दोनों उसे खींच कर घर से बाहर निकाल देते हैं।)
सूत्रधार         : कट ... कट ...कट ... माफ कीजिएगा, हम इस कहानी को यहीं रोक रहे हैं।
कोरस           : क्यों ? क्यों भाई क्यों ??
सूत्रधार         : क्यों कि इससे आगे कहानी कोई भी मोड़ ले सकती है...
कोरस           : जैसे ?
सूत्रधार         : सीता के साथ अब कुछ भी हो सकता है।
एक             : सीता का अपहरण हो सकता है।
दो               : सीता किसी गिरोह के चंगुल में फंस सकती है।
तीन             : उससे भीख मँगवाई जा सकती है।
चार             : इसके लिए उसे अपाहिज बनाया जा सकता है।
पाँच            : उससे बाल मजदूरी कारवाई जा सकती है
छ:              : उसका बलात्कार किया जा सकता है।
सात            : उसे मारा जा सकता है।
कोरस           : उसके साथ कुछ भी हो सकता है...
सूत्रधार         : ऐसी सीता एक नहीं सैकड़ों हैं...
कोरस           : लाखों हैं...
सूत्रधार         : करोड़ों हैं...
कोरस           : हम सब के आस-पास हैं।
(कोरस धीरे- धीरे गाता है। )
कोरस           : सुनिए अपनी भाषा जी...
                 आइए करें तमाशा जी...
सूत्रधार         : लाइट... साउंड... कैमरा ... सीन टू , टेक वन ... एक्शन
(मंच के दोनों कोनों पर सामांतर दो दृश्य बनते हैं। एक में बच्चे खेल रहे हैं दूसरे में बड़े बात कर रहे हैं। )
बच्चे             : कोड़ा ए जमालशाही ... पीछे देखे मार खाई ...
बच्चा एक       : चलो गुड्डा-गुड्डी का खेल खेलते हैं।
बच्चा दो         : हाँ... हाँ... खेलते हैं ...
व्यक्ति एक      : और रामलाल जी क्या हाल है
व्यक्ति दो       : बहुत अच्छा... आप... आप कैसे हैं?
बच्चा तीन       : अरे तेरी गुड़िया तो बहुत सुंदर है...
बच्चा चार       : तेरा गुड्डा भी बहुत खूबसूरत है...
व्यक्ति एक      : तुम्हारी लड़की बहुत सुंदर है...
व्यक्ति दो       : आपका लड़का भी बहुत खूबसूरत है...
बच्चा तीन       : तुम्हारी गुड़िया क्या करती है?
बच्चा चार       : मेरी गुड़िया तो स्कूल जाती है। तुम्हारा गुड्डा क्या करता है?
बच्चा तीन       : मेरा गुड्डा भी स्कूल जाता है।
व्यक्ति एक      : आपकी लड़की क्या करती है?
व्यक्ति दो       : मेरी लड़की तो स्कूल जाती है... और आपका लड़का क्या करता है?
व्यक्ति एक      : मेरा गुड्डा भी स्कूल जाता है।
बच्चा तीन       : मुझे तुम्हारी गुड़िया पसंद आई
बच्चा चार       : मुझे भी आपका गुड्डा पसंद है।
व्यक्ति एक      : भाई मुझे आपकी लड़की पसंद है
व्यक्ति दो       : मुझे भी आपका लड़का पसंद है।
बच्चा तीन       : चलो गुड्डे – गुड्डी की शादी कर देते हैं
व्यक्ति एक      : भाई रिश्ता पक्का !
व्यक्ति दो       : समझो पक्का बिलकुल पक्का।
व्यक्ति तीन     : चलो मुँह मीठा करो।
(शहनाई व बाजे की आवाज के साथ कलाकार बच्चों के चारों और घूमते हैं। संगीत अब मंत्रोचार में बदल जाता है। कोरस बच्चों के चारों और घेरे में आ जाता है। )
सूत्रधार         : कट... कट... कट...  माफ कीजिएगा इस कहानी को हम यही रोक रहे हैं।
कोरस           : क्यों (कोरस का प्रत्येक व्यक्ति बारी-बारी से “क्यों” बोलते हुए पीछे अर्धवृत्त मे            खड़े हो जाते हैं। )
चार             :  सर, हमने मेहनत की है...
पाँच            : जम कर रिहर्सल की है...
कोरस           : आखिर क्यों रोक रहे हैं ?
सूत्रधार         : क्योंकि इससे आगे यह कहानी कोई भी मोड़ ले सकती है।
कोरस           : जैसे ?
सूत्रधार         : गीता के साथ अब कुछ भी हो सकता है...
एक             : उससे दहेज मांगा जा सकता है...  
दो               : दहेज के लिए पीटा जा सकता है...  
तीन             : घर से निकाला जा सकता है...
चार             : जलाया जा सकता है...
पाँच            : उसकी पढ़ाई छुड़वाई जा सकती है...
छ:              : वह कम उम्र में माँ बन सकती है...
सात            : इस वजह से उसकी मौत भी हो सकती है...
आठ             : वह बल विधवा बन सकती है...
नौ              : उसकी सारी जिंदगी तबाह हो सकती है...
कोरस           : उसके साथ कुछ भी हो सकता है...
सूत्रधार         : ऐसी गीता एक नहीं सैकड़ों हैं...
कोरस           : लाखों हैं...
सूत्रधार         : करोड़ों हैं...
कोरस           : हम सब के आस-पास हैं।
(कोरस धीरे- धीरे गाता है। )
कोरस           : सुनिए अपनी भाषा जी...
                 आइए करें तमाशा जी...
(मंच के दोनों छोर पर बारी बारी से सीन बनेंगे पहला सीन पूरा हो जाने पर फ्रीज़ हो जाएगा, दूसरी साइड में दूसरा बनेगा। )
सूत्रधार         :  लाइट... साउंड... कैमरा ... सीन थ्री, टेक वन ... एक्शन
(एक लड़की रास्ते से जा रही है। दो लड़के अपनी बाइक पर आते हैं और चारों ओर बाइक से चक्कर लगाकर उसे छेड़ते हैं। )
लड़का 1        : अरे यार क्या लड़की है।
लड़का 2        : आजा, चलती है क्या ...
लड़की          : बत्तमीज...
सूत्रधार         : कट... कट... कट... लाइट... साउंड... कैमरा... सीन थ्री... टेक टू... एक्शन...
(बस आती है। कंडक्टर आवाज़ लगा रहा है। बस पर लोग चढ़ते हैं। दो लड़कियां चढ़ती है। उनके पीछे दो लड़के भी चढ़ जाते है। )
लड़का 3        : अरे देख तेरे आगे वाली को
लड़का 4        : क्या बाल हैं इसके (हाथ पकड़ता है। लड़की वहाँ से हट जाती है। )
लड़का 3        : आगे वाली को भी देख ( लड़का 4 झटके से उसके ऊपर झुकता है।)
लड़की 2        : डोंट टच मी...
लड़का 4        : कसम से पूरी अंग्रेज़ है...
सूत्रधार         : कट... कट... कट... माफ करना, हम इस नाटक को...
कोरस           : हम यहीं समाप्त कर रहे हैं ...
सूत्रधार         : नहीं, हम इस नाटक को समाप्त नहीं करेंगे...
कोरस           : तो फिर कौन करेगा?
सूत्रधार         : (सामने दर्शकों से ) आप करेंगे...
सूत्रधार         : (किसी दर्शक विशेष को टार्गेट करते हुए) जी हाँ, आप करेंगे... क्यों करेंगे न...            आइए जी ... अब मंच आपके हवाले है। इस दृश्य को यही खत्म करना चाहें तो                  यहीं खत्म करें। आगे बढ़ाना चाहें तो आगे बढ़ाएँ। सुखांत बनाना चाहें सुखांत                    बनाएँ... दुखांत बनाना चाहें तो दुखांत बनाएँ... आइए .... ( इसी प्रकार दो तीन           दर्शकों को मंच पर फ्रीज़ हुए सीन को परिवर्तित करने को कहें। कोशिश यह हो कि         मुद्दे पर जम कर चर्चा भी हो सके। )


(कृपया अपनी टिप्पणी अवश्य दें। यदि यह लेख आपको पसंद आया हो तो शेयर ज़रूर करें।  इससे इन्टरनेट पर हिन्दी को बढ़ावा मिलेगा तथा  मेरी नाट्यकला व  लेखन को प्रोत्साहन मिलेगा। ) 

दलीप वैरागी 
09928986983 




 
  


Wednesday, August 19, 2015

नाम में मिला होता है अपमान का घूंट


लड़कियां स्टेज पर आती हैं। एक लड़की सामने बैठे दर्शकों जिनमें उनके अभिभावक व शिक्षिकाएं बैठे है, से मुखातिब होकर नाटक शुरू करती हैं।
एक लड़की       : मैं एक लड़की हूँ और मेरा नाम है...
कोरस
(सब एक साथ)   : आचुकी
लड़की एक       : क्या?
कोरस             : हाँ-हाँ आचुकी
लड़की एक       : आचुकी?
कोरस             : अब तक बहुत आचुकी।
लड़की दो         : मैं भी एक लड़की हूँ, मेरा नाम है...
कोरस             : रामघणी
लड़की दो         : क्या?
कोरस             : हाँ-हाँ रामघणी
लड़की दो         : रामघणी?
कोरस             : हे राम! अब घणी
लड़की तीन       : मैं भी एक लड़की हूँ, मेरा नाम है...
कोरस             : आशा
लड़की तीन       : क्या?

कोरस             : हाँ-हाँ आशा
लड़की तीन       : आशा?
(कोरस में से कोई आगे आकर ये फ़िल्मी गीत गाती है।)
दिल है छोटा सा
छोटी सी आशा
मस्ती भरे मन में
भोली सी आशा
चाँद- तारों को छूने की आशा
आसमानों में उड़ने की आशा...
कोरस             : नहीं-नहीं, बिलकुल नहीं।
लड़की तीन       : तो फिर कैसी आशा?
कोरस             : एक लड़का पैदा हो जाए, यही है आशा।
लड़की चार       : मैं भी एक लड़की हूँ, मेरा नाम है...
कोरस             : नेराज
लड़की चार       : क्या?
कोरस             : हाँ-हाँ नेराज
लड़की चार       : नेराज?
कोरस             : तेरे पैदा होने से सब हैं नाराज
लड़की पाँच      : मैं भी एक लड़की हूँ, मेरा नाम है...
कोरस             : अन्तिमा
लड़की पाँच      : क्या?
कोरस             : हाँ-हाँ, अन्तिमा
लड़की पांच      : अन्तिमा?
कोरस             : हमारे धीरज की सीमा।
और नहीं, अब और नहीं,
अब लड़की चाहिए और नहीं...
(इस बात को नारों की तरह दोहराते हुए कोरस मंच का चक्कर काटता है।)
पाँचों एक साथ : हाँ-हाँ हम सब लड़कियाँ है।
लड़की एक       : जिनके पास अपना कुछ नहीं।
लड़की दो         : अपना नाम तक नहीं।
लड़की तीन       : वो नाम जो मेरे महत्त्व को बयां कर सके।
लड़की चार       : वो नाम जो मेरी पहचान बन सके।
लड़की पाँच      : वो नाम जो मेरा सम्मान बन सके।
कोरस             : तो क्या है तुम्हारे पास?
लड़की एक       : हमारे पास हैं हमारे दुःख
लड़की दो         : हमारी पीड़ा
लड़की तीन       : हमारे अनुभव
लड़की चार       : हमारे संघर्ष
लड़की पांच      : हमारी कहानी

यह नाटक कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय, तस्वारिया की लड़कियों के साथ की गई थियेटर कार्यशाला में तैयार हुआ था। कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय में वो लड़कियां आवासीय रूप से शिक्षा प्राप्त करती हैं जो लड़की होने की वजह से या आर्थिक सामाजिक कारणों से कभी स्कूल नहीं जा पति है या स्कूल छोड़ चुकी होती हैं। यहाँ ये कक्षा 6 – 8 तक की पढ़ाई करती हैं।
 नाटक किस विषय पर तैयार किया जाए इस मुद्दे पर काम करने के लिए जब लड़कियों को छोटे समूहों में काम करने के लिए कहा। मैं समूहों का काम देख रहा था। एक समूह की लड़कियां अपनी कॉपी में चंद नाम लिख कर ले आईं। मैंने उनसे कहा कि आपने अपने ग्रुप के सदस्यों के नाम तो लिख लिए लेकिन ग्रुप में क्या काम हुआ वह तो लिखा ही नहीं। लड़कियों ने कहा, "ये नाम ही तो हमारे ग्रुप का काम है।" जब मैंने और बात की तो मामला स्पष्ट हुआ। लड़कियों ने कहा कि ये जो नाम हैं इनमें हमारा अपमान व गैरबराबरी गहरे तक जुडी हुई है। लड़कियों ने कहा, "हम चाहती हैं कि आप इसी मुद्दे पर नाटक बनवाएँ।" हमें नाटक का केंद्रीय विषय मिल गया था। मुझे यह ताज्जुब हुआ कि लड़कियों ने नामों की सूची में ऐसे नाम भी डाल रखे थे जिन्हें हम आमतौर पर अच्छे नामों में गिनते हैं। एक नाम था - रामप्यारी। मैंने लड़कियों से पूछा, इस नाम में क्या गड़बड़ है?” लड़कियों ने कहा, " लड़की के जन्म होते ही लोग सोचते हैं कि तू जल्दी से राम को प्यारी हो जा, मतलब मर जा।" अब लड़कियों की व्याख्या कितनी सही थी राम ही जाने लेकिन लड़कियों ने अपना एक दृष्टिकोण रखा यह बात मायने रखती है। चीजों को विश्लेषण करके समझने की शुरुआत हो गई थी। नाटक की प्रक्रिया ने अपना काम शुरू कर दिया था।
नाटक वहीं पर खत्म नहीं हुआ। इसके बाद तो लड़कियों की कहानी शुरू होती है। वे एक-एक करके अपनी तकलीफें सबके सामने रखने लगीं। अभिभावकों की आँखों में ऊँगली डाल कर बताने लगीं कि कब-कब वे उनके साथ जेंडर के आधार पर नाइंसाफियाँ करते हैं। शायद अभिभावकों ने अपने बच्चों का इस रूप में पहली बार सामना किया होगा। आज अभिभावक उनकी तल्ख़ बातों को सुनकर रोष में नहीं थे। क्योंकि नाटक एक ऐसा अंदाजे बयां है जो भावनात्मक व वैचारिक दोनों रूप से छूता है। यक़ीनन लड़कियों ने यही सवाल उनसे सीधे घर-परिवार में रखे होते तो अभिभावको की प्रतिक्रिया अलग होती। अगर हिंसक न भी होती तो प्रतिरोधात्मक तो जरूर होती। निसंदेह यह नाटक की ताकत थी जिसे इन लड़कियों ने व शिक्षिकाओं ने जरूर समझा होगा। नाटक के माध्यम से लड़कियों ने ठहरी हुई झील में पत्थर मार दिया था। अभिभावकों में एक चर्चा शुरू हो गई। उन्होंने माना कि परम्परा व अपनी मानसिकता की वजह से वे अपनी लड़कियों के ऐसे नाम रखते आए हैं। आज तक इस विषय पर सोचा भी नहीं था। सब ने माना कि अब ऐसे नाम रखने का सिलसिला बंद होना चाहिए। ऐसी कोई मज़बूरी नहीं कि ऐसे नाम रखे जाएं। अभिभावकों ने प्रस्ताव लिया कि अब जब भी कोई नई लड़की विद्यालय में प्रवेश ले जिसके नाम के साथ इस तरह की विडम्बना हो, तो शिक्षिकाओं को एक प्रक्रिया अपनाकर उनके नाम बदलने चाहिए। क्यों कोई लड़की जीवनभर ऐसे नामों को ढोए जो उसे पसंद नहीं और जिसे सुनकर वे अपमानित हों।
विद्यालय की वार्डन सौभाग्य नंदिनी ने बताया कि इस सत्र में भी तीन-चार लड़कियां ऐसी हैं जिनके नाम बदलने की जरूरत है। प्रक्रिया तो चल रही है, अभिभावकों ने हलफनामे भी दे दिये हैं लेकिन  फिर भी बहुत कानूनी पेचीदगियाँ हैं जिनसे गुजरना बहुत मुश्किल है लेकिन प्रक्रिया जारी है। नाटक जारी है, उसका काम करना जारी है।
(कृपया अपनी टिप्पणी अवश्य दें। यदि यह लेख आपको पसंद आया हो तो शेयर ज़रूर करें।  इससे इन्टरनेट पर हिन्दी को बढ़ावा मिलेगा तथा  मेरी नाट्यकला व  लेखन को प्रोत्साहन मिलेगा। ) 

दलीप वैरागी 
09928986983 

Tuesday, March 10, 2015

नाटक संभावनाओं का मंच (भाग-3) : धीरे-धीरे आइसबर्ग का बाहर आना

 पूर्व रंग
इस शृंखला में कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालयों में नाट्य कार्यशालाओं के अनुभवों व उनसे बनी समझ को सँजोने की कोशिश की गई है। कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय (केजीबीवी) सरकार द्वारा संचालित आवासीय विद्यालय हैं। केजीबीवी में समाज के गरीब व वंचित तबके की लड़कियाँ वहीं रह कर कक्षा छ: से आठ तक शिक्षा हासिल करती हैं। यहाँ उन्हें सभी आवासीय सुविधाएं व शिक्षा नि:शुल्क उपलब्ध हैं। यहाँ उन लड़कियों को प्रवेश प्राथमिकता से दिया जाता है, जिन्हें कभी स्कूल जाने का अवसर नहीं मिला है। इसके अलावा वे लड़कियाँ भी आती हैं, जो कभी स्कूल गई थीं, पर कुछ दर्ज़े पार करने के बाद ही उनकी पढ़ाई बीच में छूट गई। संधान पिछले पाँच वर्षों से राजस्थान के केजीबीवी के साथ गुणवत्ता युक्त शिक्षा के लिए कार्य कर रहा है। केजीबीवी में जिस तरह की लड़कियाँ नामांकित होती हैं, उनके साथ ऐसी प्रक्रियाएँ अपनाने की ज़रूरत होती है जिससे वे तेज़ गति से सीख सकें, शीघ्रता से पढ़ने-लिखने के बुनियादी तरीके हासिल करें जो उन्हें अपनी कक्षा की अपेक्षित दक्षताओं तक पहुँचने में मदद करें। इसके साथ उनमे न्होंसला कायम हो कि वे सीख सकती हैं। इसी सोश के तहत अजमेर व बीकानेर के केजीबीवी में थियेटर कार्यशालाएँ आयोजित की गईं। यहा उनके अनुभवों का विवरण है। इसका उद्देश्य यही है, कि इन अनुभवों से जो सीख उभर कर आती है, उसके आधार पर शिक्षिकाएँ अपने प्रयोग कर सकें। 
 धीरे-धीरे आइसबर्ग का बाहर आना
नाट्य कार्यशालाओं की शुरुआत हमने बीकानेर के  केजीबीवी (जैतासर ) से की थी। पहले ही प्रयास में हमें उत्साहित करने वाले नतीजे मिलने लगे, जिन्होंने हमें आगे इस प्रक्रिया को अन्य केजीबीवी में बेहतर ढंग से योजना बना कर ले जाने में मदद की। यों तो, हम यहाँ लगभग तीस-पैंतीस लड़कियों के  साथ काम कर रहे थे, लेकिन इस प्रक्रिया में कुछ लड़कियों की प्रतिभा अप्रत्याशित रुप से निखर कर सामने आई, जिसे पिछले दो-तीन सालों से किसी ने दर्ज नहीं किया था। कार्यशाला शुरु करने के पहले ही दिन से एक नाम हम सबके सामने था- परमेश्वरी जाट। पढ़ने में होशियार, चेहरे पर चमक, एकदम चुस्ती-फुर्ती वाली, किसी न किसी से कोई न कोई बात करते रहने वाली, अभिव्यक्ति में एकदम बेबाक है परमेश्वरी जाट। इसलिए वह शिक्षिकाओं की भी चहेती है। यह हो नहीं सकता कि आप केजीबीवी में चंद घंटांे के लिए जाएँ और परमेश्वरी के नाम से नावाकिफ़ रहें। थोड़ी ही देर में आप परमेश्वरी से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकते। यह लड़की आत्मविश्वास से कितनी लबरेज़ थी, उसका उदाहरण देखें। मेरे साथी संजय नाटक के लिए पात्रों को चुन रहे थे। लगभग सभी लड़कियाँ संजय को घेरे हुए थीं। सब अपना नाम अभिनय के लिए लिखवाना चाहती थीं। इन सबसे दूर परमेश्वरी एक तरफ़ खड़ी हुई थी। मैंने उससे पूछा ‘‘परमेश्वरी, आप नाटक में एक्टिंग नहीं करेंगी क्या?’’ उसने कहा, ‘‘करुँंगी, सर!’’ मैंने कहा, ‘‘आपने नाम क्यों नहीं लिखवाया?’’ परमेश्वरी बड़ी मजबूती से बोली, ’’मुझे लिखवाने की ज़रुरत नहीं, मेरा नाम तो आ ही जाएगा।’’ मुझे परमेश्वरी का जवाब अचंभित कर गया। मुझे पहली बार उसे लेकर हल्की सी चिंता हुई। क्या परमेश्वरी इस आत्मविश्वास को जीवन में आगे सँभाल पाएगी? क्या यह आगे चल कर दंभ या निरंकुश आत्मप्रवंचना में तो रूपांतरित नहीं हो जाएगा, जो उसे अलग-थलग खड़ा कर देगा ? फिर मुझे राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा में दिया गया वह वायदा भी याद आया कि बच्चों को ऐसी शिक्षा दी जाए जिससे वे अपने को किसी मुगालते में न रखें। लेकिन, इसका एक दूसरा सच यह भी था कि परमेश्वरी के आलोक वृत्त की परिधि ऐसी थी कि और भी लड़कियों के नाम थे जो रोशनी में नहीं आ पाते थे। उन अंधेरे पक्षों पर रोशनी डालने का काम नाट्य कार्यशाला ने किया।
इसकी शुरुआत हुई पूजा सुथार से। पूजा एकदम चुप रहने वाली लड़की है। मैं अपने काम के साथ-साथ कैमरे से तस्वीरें लेने का काम भी कर रहा था। तभी पूजा ने आकर धीरे से कहा ‘‘सर, दूसरे समूहों में जो काम चल रहा है, क्या वहाँ की कुछ तस्वीरें मैं ले कर आऊँ?‘‘ मैंने उसे कैमरा दिया, उसे मोटे-मोटे फं़क्शन समझाए। जब उसके द्वारा ली गई तस्वीरों को देखा तो हम दंग रह गए। एकदम किसी प्रोफ़ेशनल की तरह उसने तस्वीरों को क्लिक किया था। इसके बाद हमने व शिक्षिकाओं ने निर्णय लिया कि अब शेष कार्यशाला की तस्वीरें पूजा ही लेगी। उसमें ज़बर्दस्त आत्मविश्वास जागा। तीन दिन में ही। पूरे केजीबीवी में वह अब पूजा फ़ोटोग्राफ़र के नाम से जानी जाती है। इस तरह से केजीबीवी के आकाश पर एक और जुगनू रोशन हुआ।
दूसरी लड़की है कुसुम, जिसने इस अश्वमेध यज्ञ के घोडे़ की लगाम थामी। कुसुम भी अभी तक उन लड़कियों में शामिल थी, जिसके लिए हम तय नहीं कर पा रहे थे कि उसे क्या जि़म्मेदारी दी जाए। इस वक़्त हम उन लड़कियों की तलाश कर रहे थे जो कोरस के लिए सुर में गा सकें। एक-एक कर सभी लड़कियों से गाना गाकर देखने के लिए कहा जा रहा था। किसी का भी जम नहीं रहा था। परमेश्वरी बार-बार गाकर कोशिश करने की बात कह रही थी। और भी लड़कियाँ एक मौका और देने को कह रही थीं। इस बार सब लड़कियों को एक साथ गाने के लिए कहा गया। पूरा समूह जब गा रहा था, तभी एक सुर कहीं से ऐसा आता सुनाई दिया, मानो गहन अंधेरे वन में कहीं से सूरज की एक अकेली किरण अंधेरे को चीरती हुई धरती तक पहुँची हो और हमें राह दिखा गई हो। यह आवाज़ थी कुसुम की। इस बार कुसुम को अकेले गाने दिया तो वह छा गई- एकदम सुरीली व लयबद्ध कुसुम। अब वह पूरे कोरस का नेतृत्व करेगी। भूमिका में एक बदलाव और आया। अब वह सूत्रधार की भूमिका में भी होगी। अब कुसुम की पहचान गायिका कुसुम के रुप में बनने लगी है। इस सब के दरम्यान परमेश्वरी में एक बदलाव आने लगा। वह टीम का हिस्सा बन कर नज़र आने लगी। गाने के वक़्त वह कोरस का हिस्सा थी और अभिनय के वक़्त वह मंच के बीच थी। ये महज़ इक्के-दुक्के नाम नहीं हैं, जिनका यहाँ उल्लेख किया गया है। प्रत्येक कार्यशाला में ऐसी बहुत सी लड़कियाँ थीं, जिनकी संभावनाएँ आइसबर्ग यानी समुद्री हिमशैल के रूप में निकल कर आयीं।
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दलीप वैरागी 
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