Monday, November 14, 2011

कहीं यह जनश्रुति न बन जाए ....

 

यह अनुबाव मैंने अपने दूसरे ब्लॉग बतकही शेयर किया था लेकिन आज मैंने एक शिक्षिका प्रशिक्षण में मैंने इस अनुभव को फिर सुनाया तो मेरी इच्छा हुई कि इसे 'कथोपकथन पर फिर से शेयर किया जाए ।

के जी बी वी पीपलू की लड़कियों की शैक्षणिक स्तिथि का ग्रोथ चार्ट मैंने शिक्षिकाओं से बात की कि जो लड़किया ए समूह में पहले से हैं वो तो हैं , लेजिन जो पिछले महीने बी या सी में थीं उन्हें ठीक से पता करो कि वो कहाँ पहुंची हैं. इस कम को करने के बाद शिक्षिकाओं ने जो रिपोर्ट बनाई उसे देख कर मैं चोंक गया . सब लड़कियां ए में थीं. यह उम्मीद से कहीं ज्यादा था. मैंने कहा अगर ऐसा है तो यह बड़ी बात है. उन्होंने कहा मौसमी और पाना को छोड़ कर सब लड़कियां किताब पढ़ने लग गयी हैं और गणित कि संक्रियाओं को कर रहियो है. मैंने उन सभी लड़कियों से किताब पढवा कर देखी .सब धाराप्रवाह पढ़ रहीं थीं . हाँ अभी उन लड़कियों को तीन संख्याओं का भाग करने में दिक्कत है. लेकिन उनके साथ कक्षा के अनुरूप पाठ्यपुस्तक के साथ काम शुरू कर दिया है . अतिरिक्त समय में बुनियादी चीज़ों को मजबूत करने पर काम हो रहा है.
यहाँ बात रह जाती है मौसमी और पाना की . ये दोनों आठवीं जमात की लड़कियां हैं. एक बात पूरे के जी बी वी में जनश्रुति कि तरह फैली है कि “ मौसमी और पाना पढ़ नहीं सकती “ ये तीन साल से के जी बी वी में हैं.
मैंने टीचर्स से पूछा कि क्या बात है इन लड़कियों की दिमागी सेहत तो ठीक है? वे बोलीं हाँ एकदम ठीक है . बस इनका मन पढ़ने में नहीं लगता . मैंने सोचा, ‘ मौसमी पढ़ नहीं सकती वाला मिथक अब टूटना चाहिय.’ मैं कक्षा कक्ष में गया . हैड टीचर तारा नामा भी मेरे साथ थीं. मैंने पाना को पढ़ने के लिए कहा तो वह वाक्यों और शब्दों को तोड़ तोड़ कर पढ़ रही थी . इसके बाद पाठ्य पुस्तक मौसमी के हाथ में दी. मौसमी पुस्तक खोले कड़ी रही लेकिन पढ़ने के लिए लैब तक नहीं हिलाया. हम दोनों ने उसे खूब प्रोत्साहित किया . वह किताब देखते हुए भी किताब से अलगाव बनाए हुए थी . मौसमी में कोई जुम्बिश नहीं हुई. मैं सोच रहा था कि अब क्या किय जाए. तभी मुझे ध्यान आया कि मेरे हाथ में के जी बी वी कि लड़कियों के नामों कि लिस्ट है . मैंने मौसमी से कहा कि यह तुम्हारे स्कूल कि लड़कियों के नामों कि लिस्ट है, ‘इन्हें पढ़ो तो जरा.’ मौसमी पूरी लिस्ट धारा प्रवाह पढ़ गयी . यह क्या हुआ! हम चकित थे . मैं के जी बी वी से लौट कर होटल में देर तक सो नहीं पाया . सोचता रहा कि तीन साल तक इस लड़की को कुछ भी सुपाठ्य नहीं मिला जिसे पढ़ कर मौसमी सफलता का अहसास कर सके. उसके सामने तो हमेशा (कु) पाठ्य पुस्तक ही रही. जिसके अर्थों के तिलस्मी द्वार वह खोल नहीं पाती. तहरीरों में उसे कही. तक़रीर जज़र नहीं आती. उसे पता नहीं इन किताबों से कहाँ पहुंचा जाता है. फलस्वरूप यह फतवा “मौसमी पढ़ नहीं सकती.” उसकी नियति से जुड़ जाता है. होना यह चाहिए कि उसके बस्ते से सारी पाठ्य पुस्तकें निकाल कर उतनी ही संख्या में कहानियों कि किताबें रख देनी चाहिए और फिर देखा जाए कि “मौसमी पढ़ सकती ....”
अगले दिन ताराजी से मैंने बात की. उनहोंने दोनों लड़कियों को बुलाकर कहा कि कंप्यूटर रूम में लाईब्रेरी कि किताबें राखी हैं , जो भी , जितनी भी पसंद आए ले लो. दोनों लड़कियां किताबों कि तरफ दौड़ चलीं . ईश्वर करें ये कभी न रुकें .

1 comment:

  1. शिक्षा व्यवस्था और बालमन की सोच को बयां करती पोस्ट......

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