Monday, August 15, 2011

पड़ौसी की आग से बीड़ी और चूल्हा तो जल सकते हैं लेकिन लट्टू नहीं...

दुष्यंत कुमार की मशहूर लाइनें हैं -
जो उलझ कर रह गई है फाइलों के जाल में,
रोशनी वो गाँव तक पहुंचेगी कितने साल में ?
आजादी के 64 साल बाद भी 'रोशनी' बहुत सारे लोगों के लिए मरीचिका बनी हुई है।  दुष्यंत जी अपनी कविता मे रोशनी गाँव तक ही पहुँचने की  बात कर रहे हैं। क्योंकि वो जानते थे कि भारत की संस्कृति में अगर रोशनी गाँव तक पहुँच जाती है तो लोग पड़ौसी के चिराग से अपने घर का चिराग रोशन कर लेते हैं । शायद इसीलिए गुलज़ार साहब कंपकपाती सर्दी में 'पड़ौसी का लिहाफ़' मांगने की बात अपने गाने में कहते हैं ओर न बात बने तो ' पड़ौसी के चूल्हे  की आग लई ले ... ' यह बात सोलह आने दुरुस्त है कि पड़ौसी की आग से बीड़ी भी सुलगाई जा सकती है और चूल्हा भी । लेकिन पड़ौसी की बिजली से अपने घर का लट्टू नहीं टिमटिमाया जा सकता है । ऐसा करना भारतीय दंड संहिता मे जुर्म है । लट्टू जलाने के लिए घर के बाहर खंभा ओर भीतर मीटर लगाना होगा। 
मुझे लगता है कि दुष्यंत जी व गुलजार साहब अपने गीतों मे जिन गांवों का जिक्र करते हैं उनकी अवधारणा मे कहीं यूपी या हरियाणा के गाँव हैं। वो गाँव जहां 100-200 घरों की बसावट एक जगह पर होती है। दो घरों के बीच मे एक दीवार होती है । वही दीवार जिसके 'कान होते हैं', हाथ और ज़बान भी होती है।  दरअसल इस भूमिका के मध्यम से मैं देश के उन गांवो की बात करना चाहता हूँ जो न तो कविता में मे ही आ पाते है और नहीं विकास  धारा मे ही फिट बैठ पाते हैं ।  
पिछले महीने राजस्थान के जोधपुर जिले के फलोदी क्षेत्र को देखने का अवसर मिला। यहाँ किशोरों, बच्चों, बड़ों सबसे मिला। शहर, सड़क, खेत, टीले सब देखे लेकिन गाँव कहीं दिखाई नहीं दिया। यहाँ गाँव आपको कागजों सरकारी रिकॉर्ड ओर नक्शों मे तो मिल जाएगा लेकिन हक़ीक़त मे वहाँ जाएंगे तो गाँव कहीं नहीं हैं। यहाँ आपको धोरों के बीच मे एक घर मिलेगा और इस घर के चारो तरफ अंतहीन-सा क्षितिज ही दिखाई देता है । अगर आपको कोई दूसरा घर देखना है तो 3-4 किलोमीटर चलना होगा। इस तरह की बसावट के साथ आपको वहाँ 12-13 किलोमीटर रेडियस के गाँव मिलेंगे। जितनी दूरी तय करके यहाँ एक गाँव को देखा जा सकता उतनी या उससे कम दूरी तय करके हमारे यहाँ किसी भी विकास खंड कि सीमांत से चल कर विकास खंड मुख्यालय तक पहुंचा जा सकता है। इन ज़्यादातर गांवो में आज़ादी के 64 साल बाद भी बिजली नहीं है। पानी भी नहीं । क्योंकि सरकार का गाँव मे बिजली लगाने का एक तरीका है कि गाँव मे एक खंभा गाड़ो और उसके पास के 5-6 घरों मे उसी से तार डाल दो ।   10-12 खंभे लगाओ और हो गया पूरे गाँव का विद्युतीकरण । लेकिन वहाँ कैसे हो पाएगा जहां गाँव नाम की कोई अवधारणा ही नहीं है ? जहां सबसे पड़ौस का घर 2 या 3 किलोमीटर दूरी पर है । यहाँ प्रत्येक घर को बिजली देने के लिए 20-25 खंभों की ज़रूरत होगी । इन घरों को बिजली देने के लिए 25 खंभे देने की सरकार की क्या तैयारी है ? जबकि सरकार अपने बिजली महकमे को प्राइवेट लिमिटेड बना चुकी है। पानी  का नल इन घरों तक पहुंचाना तो वहाँ भागीरथ ही कर सकता है । खैर यहाँ पानी का प्रबंधन नायाब है । पानी का इस्तेमाल की यहाँ के लोगों को जबर्दस्त तमीज़ है । वर्षा के पानी को वर्ष भर कैसे चलाना है, ये लोग अच्छी तरह जानते हैं ।
अब देखिए हमारे यहाँ विकास के क्षेत्र मे कुछ वाक्य बहू प्रचलित हैं । "प्रत्येक गाँव मे एक किलोमीटर पर एक स्कूल होना चाहिए। " " प्रत्येक गाँव मे अस्पताल होना चाहिए..." "अपने गाँव की ग्राम सभा मे हर ग्रामीण को भाग लेना चाहिए..."  अब आप ही बताइए इन वाक्यों के इस क्षेत्र के संदर्भ मे क्या माने रह जाते हैं ?  वाक्य सार्थक हो सकते हैं अगर गाँव की जगह घर शब्द का प्रयोग किया जाए।
आज़ादी के बाद विकास के जिस मॉडल को अपनाया गया खामी उसी मे है । इस मॉडल मे यूनिट ऑफ परसेप्श्न गाँव है। सारी विकास की योजनाएँ गाँव को इकाई मान कर बनाई जाती हैं। जो यहाँ आकर फेल हो जाती हैं । क्योंकि नीति निर्धारक दिल्ली में बैठ कर गाँव के जिस चेहरे को देखते हैं दरअसल वो यहाँ है ही नहीं । अगर वास्तव मे विकास को इस क्षेत्र तक पहुंचाना है तो देखने की इकाई को बदलना होगा । इकाई को गाँव की जगह परिवार या व्यक्ति को करना होगा । यह कोई नई अवधारणा नहीं है । गांधी जी तो यही कहते थे कि जब भी कोई नीति बनाओ उस आखिरी आदमी के चेहरे को देख लो ।    

2 comments:

  1. dalip ji darasal samsya ye hai ki hamare yaha sari yojanaye aabadi ko dhyan me rakhkar banai jati hai... jabki shayad yojana nirman me area ko bhi utni hi importance milani chahiye... khas kar narega ya gramin vikas ki anya yojanao me...

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  2. aise hi prayaso se ek din to vo subsh aa hi jayegi jab sabhi desh mai rahne ke adhikar se ji payenge.

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