Monday, August 15, 2011

एक रोडवेज कंडेक्टर की अन्नागिरी

anna hazare भ्रष्टाचार के खिलाफ एक मजबूत lokpal bill के लिए आंदोलन कर रहे है। पूरा देश अन्ना का समर्थन कर रहा है। हमारा समर्थन भी उनके साथ है। लेकिन हम ज़िंदगी भर किसी अन्ना  का इंतजार क्यो करते है। जबकि रोज़मर्रा की जिंदगी मे अन्ना बनने के मौके आते रहते हैं। वो सही समय होता है अन्नागिरी दिखाने का। जैसा उस रोडवेज के कंडक्टर ने दिखाई। यह लेख मैंने अप्रेल 11 को अपने दूसरे ब्लॉग बतकही पर लिखा था। 15 अगस्त स्वाधीनता दिवस के अवसर पर मैंने डैशबोर्ड के आर्काइव से निकाल कर फिर पोस्ट किया है।
यह सर्दियों की एक शाम थी |मैं राजस्थान रोडवेज की लो फ्लोर बस से सिंधी कैंप जा रहा था | बस लगभग भरी हुई थी | रस्ते में रामबाग सर्किल से एक पुलिस वाला बस में चढ़ा | यहाँ राजस्थान में यह आम बात है कि पुलिसवाले बिना टिकट ही यात्रा करते हैं | यह बात इतनी आम है कि कंडक्टर भी उनसे टिकट नहीं मांगते हैं | कंडक्टर गैलरी में टिकट काट रहा था और मैं सोच रहा था कि कंडेक्टर आगे बढ़ जायेगा | कंडेक्टर ने ये क्या कर दिया " टिकट प्लीज़ ' पुलिसवाले से टिकट मांग लिया ! बकायदा | पुलिस वाले ने अनदेखा कर दिया | हमने सोचा कंडेक्टर अब समझ गया होगा कि इन तिलों में तेल नहीं है | कंडेक्टर २५ साल का युवक , शायद दो महीने पहले ही नौकरी लगी हो |क्यों कि सरकार ने दो महीने पहले ही लो फ्लोर चलाई थीं | कंडेक्टर ने फिर कहा " मैं आपसे कह रहा हू साहब| " "हमारा टिकट नहीं लगता |" पुलिसवाले ने अधिकारपूर्ण लहजे में कहा | "बस में बैठे हो तो टिकट लो " कंडेक्टर ने जिद पकड़ ली | पुलिसवाला बोला ," तुम ऐसा करो कि अपने मैनेजर से कहो कि वो हमारे बड़े साब से बात करे तब हम टिकट ले लेंगे " कंडेक्टर की आवाज़ में गर्मी आ गयी ,"न मैं तम्हे जनता हू और न तुम्हारे बड़े साब को मैं तो यह जनता हूँ कि मेरी ड्यूटी क्या है ; तूम टिकट लेटे हो कि नहीं?" पुलिसवाले ने धोंस जमाई, " तम्हें नहीं पता तुम क्या कर रहे हो ?" कंडेक्टर बोला " यह.... मेरा नाम है , यह...... मेरा मोबइल नम्बर है और सांगानेर में रहता हूँ , तुम्हे जो करना है कर लेना फ़िलहाल बस से नीचे उतरो " ड्राइवर को कह कर बस रुकवा दी |शायद पुलिसवाला इस बात की उम्मीद नहीं कर रहा था | इतने में बाकी लोगों का भी कर्तव्यबोध जागा और अब कंडेक्टर की आवाज अकेली नहीं थी | बाकी का काम लोगों ने कर दिया और ठेलते हुए सिपाही को निकास द्वार के ठीक सामने ला दिया | अब उतरना लाजमी था | उस वक़्त उस कंडेक्टर के काम से मैं अपने को बहुत गौरवान्वित महसूस कर रहा था |आज जब मै भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे कि मुहीम को देख रहा हू तो उस कंडेक्टर के लिए मेरे दिल में इज्जत और बढ़ गई है | अन्ना जहाँ देश को रीढ़ से दुरुस्त करने में लगे है वही यह युवक सबसे नीचे कि कड़ी को ठीक करने में लगा है| मुझे वह अन्ना का भविष्य का संस्करण लग रहा है |

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