Friday, June 24, 2011

“जूनियर बच्चन आने वाला …” उर्फ़ शर्म मीडिया को मगर आती नहीं !

अमिताभ बच्चन ने ट्वीट करके यह घोषणा की है कि वे दादा बनने  वाले हैं | जैसा कि ऐसी ट्वीट के साथ होता है इसे न्यूज चैनल वाले तुरंत ले उड़े और जोर शोर से प्रसारित किया | एक प्रमुख न्यूज चैनल की खबर कुछ इस तरह थी, “ जूनियर बच्चन आने वाला वाला है |”  यह समाचार प्राइम टाइम में मौखिक एवं लिखित दोनों रूपों में चैनल पर दिखाई देता रहा | चैनल वालो की नज़रें क्या अब इतनी रेडियोधर्मी हों गयी हैं कि वो गर्भ में ही जान लेती हैं कि लड़का आने वाला है | क्यों क्या यह वाक्य ऐसा नहीं हो सकता , “ जूनियर बच्चन आने वाली है |” या यहाँ कोई और भाषाई विकल्प हो सकता है जिसमे जेंडर को लेकर पूर्वाग्रह नहीं हों | क्या न्यूज चैनल वालों के पास कायदे के पढ़े लिखे लोग नहीं बचे हैं जो भाषा का सतर्कता से इस्तेमाल कर सकें ? मुझे अच्छी तरह याद है कि अभिषेक – ऐश्वर्या  की शादी के बाद किसी मंच से अमिताभ ने कहा था की ‘ मुझे जल्दी से एक पौता दे दो …’ उस वक्त इन्हीं चैनल वालों ने जमकर अमिताभ की खिंचाई की थी कि इस देश का सुपर स्टार लड़के की कामना कर रहा है ना की लड़की की | अमिताभ बहुत विचक्षण व्यक्ति हैं वे एक गलती को दुबारा नहीं दोहराते इस बार उन्होंने बहुत सोच समझ कर वक्तव्य दिया है भले ही वे चाहते कुछ भी हों |  लेकिन एक बात जरूर है कि इस बार मिडिया वालों की वैचारिक गरीबी पर हँस जरूर रहे होंगे | बहुत दिनों बाद कुछ मसाला मिला था चैनल वालों को इसलिए वे इस खबर को खूब खींचना  चाह  रहे थे | फील्ड से लाइव रिपोर्टिंग भी शुरू हों गई; रिपोर्टर पूछता है ‘ बिग बी के घर किलकारी गूंजेगी इस बारे में आपको क्या कहना है |’ जनता भी आखिर जनता है … लोग कह रहे थे ‘ बच्चन साब के पौता आ रहा है हमें इस बात की बहुत खुशी है …|’  सुपर स्टार, जनता, मिडिया इनमे और चाहे हजारों विविधताएं हों लेकिन इस दिमागी कंगाली में सब बराबर हैं | सारी तथाकथित तरक्की के बावजूद आज भी हमारे घरों में लड़की की पैदाइश अयाचित है | दरअसल जेंडर विभेद की जड़ें हमारे सामूहिक अवचेतन में इतनी गहरी है कि हमारा एक नजरिया बन गया है | खासकर हिंदी भाषा में तो यह कई स्तर पर है | जहाँ हमारी परवरिश में तो यह घुट्टी की तरह तो आता ही है इसके अलावा भाषा में हर चीज़ के लिए जेंडर है संज्ञा में जेंडर, क्रिया में जेंडर विशेषण में भी जेंडर… यहाँ सब वाक्य ता या ती पर खत्म होते हैं | आपको हर स्टेटमेंट को किसी पाले में रखना ही होगा | न्यूट्रल जेंडर स्टेटमेंट बनाने के लिए बहुत जोर आता है | भाषा सोचने का टूल होती है और जब टूल ही ऐसा हों तो सोच में एक बेचारगी तो दिखाई देगी ही | इसी लिए जब हम किसी भूमिका या काम का नाम लेते हैं तो उनके लिए हमने शक्ले पहले ही सोच  रखी है | किसान का नाम लेते ही कोई लंगोटी वाला पुरुष दिमाग में क्यों आ खड़ा होता है कोई महिला क्यों नहीं ? नर्स के नाम पर महिला का ही पोर्ट्रेट क्यों उभरता है | क्यूँ आज भी हमने भूमिकाएं महिला पुरुष के नाम पर फिक्स कर रखी हैं | जबकि महिलाऐं हिमालय चढ़ चुकी हैं, समन्दर लाँघ चुकी हैं | दरअसल इस जहालत से निकलने की जद्दोजहद कई तरह की होगी -विचार भाषा और व्यवहार | तब जाकर हम एक समता मुल्क समाज की स्थपना कर सकते हैं |

3 comments:

  1. so aana sahi kaha aapne samaj aata hai hamara edu...kis kadar khokhala hota ja raha h

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  2. लेखक महोदय,आपने मिडियावालों की अच्छी नस पकड़ी है | मिडिया कभी कोई गलत शब्द छाप देता है तो दूसरे दिन माफ़ी मांगते हुए अपने शब्द वापस ले लेता है लेकिन इस बार लगता है उन्हें अपनी कही बातों का अहसास ही नहीं है या इस तरह के संदेश उन तक पहुचें ही नहीं है |जब अमिताभ जी ने अपने पोते होने की चाहत प्रकट कि थी तब शायद महिला संगठनो ने भी इस तरह की कामना पसंद नही की थी | महिला संगठन ने जोरदार हल्ला मचाया था | लगता है ये व्यक्ति विशेष पर ही हल्ला मचाती है |मिडिया को ध्यान से नही सुना | मुझे लगता है आपको अपनी बात उस मिडिया को भी पोस्ट कर देनी चाहिए जो जूनियर बच्चन कि खुशी मना रहे है |

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  3. @ suman pareek वो जमाना गया जब मीडिया वाले कभी कुछ गलत छाप देते थे तो अगले दिन माफीनामा छाप देते थे लेकिन अब बात और है , ग़लतियाँ इतनी होती हैं कि अगले दिन सामग्री की जगह माफीनामें ही होंगे . दरअसल वक्त के साथ मीडिया अपनी यह बुनियादी तमीज़ भी भुला चुका है .

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