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Friday, January 1, 2016

नए साल में तुकबंदी

गए का गीत छोड़ कर नए की तलाश कर।
सुर्ख पलाश महकेंगे वसंत की तलाश कर ।
माज़ी तेरा श्वेत है तो श्याम भी होगा कहीं,
व्यतीत के व्यामोह में न मुस्तकबिल की तलाश कर। 
चूल्हा जले हर सिम्त उठे रोटी की महक,
बुझी हुई राख में चिंगारियां तलाश कर।
कारवां में रहजनी हुक्काम ही कर जाते हैं,
प्रजातंत्र में सोच कर रहबर की तलाश कर।
चंचल, लोभी, आशिक औ बावला 'बैरागी' मन
इस नए साल में किसी रहगुज़र की तलाश कर।
नए साल की शुभकामनाओं के साथ
दलीप वैरागी

अलवर में 'पार्क' का मंचन : समानुभूति के स्तर पर दर्शकों को छूता एक नाट्यनुभाव

  रविवार, 13 अगस्त 2023 को हरुमल तोलानी ऑडीटोरियम, अलवर में मानव कौल लिखित तथा युवा रंगकर्मी हितेश जैमन द्वारा निर्देशित नाटक ‘पार्क’ का मंच...