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Thursday, January 28, 2016

अलवर रंग महोत्सव: एक खूबसूरत नाट्यानुभव

यह समीक्षा देर से आ रही है। इसके लिए पूर्णतः मैं स्वयं जिम्मेदार हूँ। इसके पीछे की वजह व्यस्तताएं ही हैं, जिन्हें चाहते हुए भी दूसरी प्राथमिकता पर नहीं डाला जा सका था। अभी दो दिन पहले एक मित्र ने मुझे याद दिलाया कि इस कार्यक्रम की समीक्षा अभी तक क्यों नहीं की गयी है। कार्यक्रम के दौरान भी अलवर व बाहर के कुछ अभिनेताओं ने ऐसी ही अपेक्षा की थी।
इस बात ने एक विस्मय मिश्रित आनंद की अनुभूति दी। खैर, समीक्षक होने का मुगालता तो नहीं पाला है, मगर आश्चर्य यह हुआ कि  सहसा यह अपेक्षा यदा कदा ब्लॉगिंग से ही उपज आई है, और इसने एक विस्मृत अभिनेता व निर्देशक को नयी भूमिका में रूपांतरण के साथ जीवित कर दिया।
अलवर रंग महोत्सव के बारे में अगर एक वाक्य में कहा जाए, तो यह अलवर के मेरे ज्ञात इतिहास में भव्य व सफलतम् नाट्यानुभूति है। आगे के पूरे लेख में इस वाक्य का पल्लवन भर है। अलवर के दर्शक लम्बे समय तक इसे याद रखेंगे,इसमें कोई दोराय नहीं है।
निःसंदेह यह अनुभव रचने में रंग संस्कार थियेटर ग्रुप व कारवां फाउंडेशन ने अथक परिश्रम किया है। किन्तु इसका प्रस्थान बिंदु देशराज मीणा ही है। देशराज मीणा की प्रशंसा इसलिए की जानी चाहिए कि उन्होंने  पिछले साल नवम्बर में आयोजित “हास्य नाट्य” उत्सव की प्रतिध्वनि के विलीन होने से पहले रंगमंच के दूसरे तार को झंकृत कर दिया। रंगमंच को लेकर देशराज के जूनून व जज़्बे को पहले हम रंगकर्मी तो जानते थे किन्तु आज पूरा शहर उसका साक्षी है।  
बात उस समय की है, जब देशराज और हम साथ में रंगकर्म कर रहे थे, तब हम यह अक्सर चर्चा किया करते थे कि रंगकर्मी नाटक के कला पक्ष के लिए तो असीम ऊर्जा लगाकर काम कर लेते हैं लेकिन इसे पेशेवराना रूप देने की तमीज नहीं है। इसलिए रंगकर्मी थियेटर के स्कूल में चाहे न जाए लेकिन उसे एमबीए जरूर करना चाहिए। तब हमें इस बात का इल्म भी नहीं था कि देशराज ने एक नहीं दोनों काम किए। पहले राजस्थान विश्विद्यालय से नाट्यकला में डिप्लोमा, फिर नाट्यकला में एमए तथा उसके बाद अजमेर से एमबीए किया।
इसलिए इस बार देशराज ने नब्ज को दोनों तरफ से पकड़ा, और परिणाम सबके सामने है।
...और कारवां बनता गया

कारवाँ 
सही मददगार तलाशना बेशक एक बुनियादी जीवन कौशल है। देशराज के विचार को सतरंगी स्वरूप देना कारवां फाउंडेशन के बिना असंभव था। यूँ तो कारवां में अलग-अलग फील्ड के विशेषज्ञ लोगों की एक फेहरिश्त है, किन्तु प्रमुख सूत्रधार के रूप में अमित गोयल व जुगल गांधी नज़र आ रहे थे। जुगल गांधी का सुचित्रा फ़ोटो स्टूडियो से एस-टीवी चैनल तक का शानदार सफ़र हम सबके सामने है। जुगल जी, एक वक्त था जब हम उनसे अपना फोटो खिंचवाने जाते थे, तो वे अपने जबरदस्त हुनर से हमारे मन के कोनो में दबे छिपे भावों को चेहरे लाकर साकार कर देते थे। शायद ऐसा कोई व्यक्ति ही नव निर्मित प्रताप ऑडिटोरियम की लबालब भरी हुई बालकनी की कल्पना कर सकता  था।
अमित गोयल का रंगकर्म, साहित्य व संस्कृति के माहौल से गहरा रिश्ता है। साहित्य व संस्कृति से उनकी निकटता उन्हें अपने पिता श्री हरिशंकर गोयल से जेबख़र्ची सरीखा मिलती रही है। अमित गोयल के प्रकाशन व प्रिंटिंग के काम से आज कौन परिचित नहीं है। उनकासनप्रिंट्सजब चर्चरोड पर नया-नया आज से लगभग 15 साल पहले खुला था। तब हमने भी शिवरंजनी थियेटर ग्रुप की शुरुआत की थी। मुझे अच्छी तरह याद है कि अमित गोयल के साथ बैठ कर ही वहाँ हमारे नाटकों के कार्ड, ब्रोशर, पोस्टर व लोगो डिजाइन होते थे। शुरूआती तीन-चार नाटकों की सामग्री उन्होंने ने बिना कोई पैसा लिए छापी थी। रंग महोत्सव में भी सनप्रिन्ट द्वारा प्रकाशित कलात्मक प्रचार सामग्री का अहम् योगदान है।
यह देशराज की बुद्धिमानी है कि उसने पुरानी इन कड़ियों को मिलाकर कारवां के लिए भूमि तैयार कर दी और साथ हीअलवर रंग महोत्सवकी सफलता की बुनियाद भी रख दी। इसके बाद कारवां के अलग अलग क्षमताओ के लोग जुडने लगे जिनमें, डॉ जीडी मेहंदीरत्ता, अनिल कौशिक, अमित छाबड़ा, नीरज जैन, देवेंद्र विजय, अनिल खंडेलवाल,दिनेश शर्मा, अभिषेक तनेजा व अरुण जैन प्रमुख हैं। इनके जुड़ने से कार्यक्रम में प्रशासनिक अधिकारी, राजनेता, समाजसेवी व साहित्य के लोगों के जुड़ने का मार्ग प्रशस्त हो सका।
शुरुआत सेलिब्रिटीज़ से
दिनांक 14 जनवरी 2016 को अलवर रंगमहोत्सव का पहला दिन था। इस दिन राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के दो स्नातकों के नाटक खेले गए। मशहूर फ़िल्म अभिनेत्री सीमा बिस्वास अभिनीत एकल नाटकस्त्रीर पत्र का मंचन हुआ। पहले दिन ही हॉल खचाखच भरा हुआ था। बालकोनी की सीटें भी भरी हुई थीं। सीमा बिस्वास ने अपने जबरदस्त अभिनय से लोगों को पलक तक झपकने नहीं दी। जैसा उनका अभिनय है,  उसी के अनुरूप उन्होंने विषय उठाया, जो कि ज्वलंत मुद्दा है, और स्त्री की जेंडर आधारित भूमिकाओं पर सवाल उठता है। इस नाटक में महिला की दोहरी वंचितता को बखूबी उठाया है। एक तो वह समाज में स्त्री होने की वजह से वंचित है चाहे वह किसी संपन्न घर कीमझली बहु हो या फिर कोई और। एक स्त्री के लिए  यह वंचितता और भी नारकीय तब हो जाती है जब वह सुंदरता व रंगरूप के परंपरागत मापदंडों में फिट नहीं होती है। सीमा बिस्वास एक छोटी लड़की की त्रासद कहानी से पूरे प्रेक्षागृह को झकझोर के रख देतीं हैं।
दूसरा नाटक दौलत वैद्य द्वारा निर्देशितदिवाकर की गाथा शिल्प व कथ्य के स्तर पर नवीनता लिए हुए था। एक मछुआरे की कहानी है, जो प्यार करता है - नदी से, लोगों से भी... परिस्थितियाँ किस प्रकार उसे जल्लाद बनने पर मजबूर कर देती हैं। दो अभिनेताओं की जुगलबंदी ने क्षीण कथा को भी प्रभावी तरीके से रखा। असमियां खुशबू में डूबा हुआ संगीत इस नाटक के प्राण हैं। दौलत वैद्य ने प्रकाश व प्रोजेक्टर तकनीक के ताने-बाने में बुना अभिनव प्रयोग करके मंच पर त्रिआयामी चाक्षुस बिम्ब रच कर नदी की प्रचंडता का जीवंत अनुभव दर्शकों को करवाया। हालाँकि कभी-कभी पूरी स्क्रीन पर कंप्यूटर की कमांड्स भी नज़र आ जाती तो रसास्वादन में कंकड़ स्वरूप भी लगतीं। लेकिन इस तरीके की तकनीक में कलाकारों को कई बार स्थानीय उपकरणों पर भी निर्भर रहना पड़ता है। एक वजह यह भी हो सकती है।
गोष्ठियों जैसी एक और गोष्ठी
रंग महोत्सव के दूसरे दिन, यानी 15 जनवरी को गतिविधियों का सिलसिला सुबह से ही प्रारम्भ हो गया था। इसकी पहली कड़ी में एक संवाद का आयोजन किया गया, जिसका विषय था- अलवर रंगमंच की वर्तमान चुनौतियां। इस गोष्टी में दलीप वैरागी ने विषय प्रवेश किया। मुख्य वक्ता के रूप में डॉ वीरेंद्र विद्रोही ने रंगमंच की समस्याओं के हल के एक विकल्प के रूप में सुझाया कि इसे शिक्षा का अभिन्न हिस्सा बनाकर पाठ्यक्रम में शामिल करना होगा। इतिहासकार हरिशंकर गोयल ने इसे गांवों तक पहुँचाने की जरुरत पर बात की। दूसरी और युवा रंगकर्मियों का आक्रोश भी दिखाई दिया। युवा रंगकर्मी अविनाश ने ऑडिटोरियम की अतार्किक ऊँची दरों पर व संस्थाओं के मध्य मतभेदों पर गुस्से का इज़हार किया। गोष्ठी की अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार जीवन सिंह मानवी ने की। अधिकतर होने वाली गोष्ठियों की तरह यह गोष्ठी भी ज्यादा लोगों को नहीं जुटा पाई। दूसरा जल्दी समाप्त करने के आग्रह के कारण  सभी रंगकर्मी खुल कर बात नहीं रख पाए।
नए दर्शकों की तलाश में
गोष्ठी के तुरंत पश्चात् जबलपुर के नाट्यदल ने नाटक एक और दुर्घटना का मंचन किया। इस नाटक को देखने के लिए नए दर्शकों की तलाश की गयी, जो इस आयोजन को एक नया आयाम देती है। दर्शक स्वरुप स्थानीय बीएड कॉलेज की छात्राओं व एक सैनिक टुकड़ी को नाटक देखने के लिए आमंत्रित किया गया था। निःसंदेह शिक्षक प्रशिक्षुओं के लिए इस नाटक से बेहतर एक्सपोजर नहीं हो सकता था। आद्यंत कसावट में बुने हुए इस नाटक को युवा अभिनेताओं ने पूरी ऊर्जा के साथ अभिनीत किया। एक सनकी द्वारा जांच अधिकारी बनकर पुलिस द्वारा आम आदमी को अपराधी साबित करने की थ्योरियों पर से प्याज के छिलकों की मानिंद परतें उघाड़ने का अभिनय दुर्गेश सोनी ने बखूबी किया। युवा निर्देशक प्रिया साहू  की टीम (रोहित सिंह, अंशुल ठाकुर, सुहाली वारिस, सरस, अक्षय ठाकुर व पारुल जैन) में कोई कड़ी ऐसी नहीं थी जो दर्शकों के मानसपटल पर छाप न छोड़ गई हो। बहुत ही सार्थक, संतुलित व सौद्देश्य मरोरञ्जन इस नाटक ने प्रदान किया।
अंकुश शर्मा के निर्देशन में नाटकटैक्स फ़्रीके सभी पात्र अंधे है और एक अंधों के क्लब में रहते हैं। ये सभी अपनी विकलांगता को अभिशाप या दिव्य वरदान (दिव्यांग) मानने से आगे जाकर इंसानी संवेदना के रेशों को स्पंदित करते हैं। वे जिंदगी को उसी प्रकार रसमय बनाते हैं जैसे कोई भी व्यक्ति कर सकता है। वे एक दूसरे की जिंदगी की परिस्थितियों को (जो विकलांगता जनित स्थितियां नहीं) इस प्रकार रखते हैं उसमे स्वयं जोड़कर खुद भी आह्लादित होते हैं और दर्शकों पर भी रस की फुहार  छोड़ते हैं। चार दृष्टिबाधित व्यक्ति अनायास ही दार्शनिक महत्व के प्रश्नों को छोटे-छोटे कहकहों में सुलझाते नज़र आते हैं। वे खूबसूरती की पहेली को सहसा ही सुलझा देते हैं कि सुंदरता अंततः देखने वाले के मन में ही स्थित होती है। वे सभी पड़ौस में नहाने वाली युवती को, पड़ौस से आने वाले नल की आवाज से सुनते हैं और कल्पनाएँ करते हैं। यहाँ सब कुछ कल्पनाओं में है। यहाँ तक कि युवती भी और नहाना भी...  बहुत बारीक़ भावों की अभिव्यक्ति को अपनी देह पर धारण करना  और फिर उसे फैलाकर प्रेक्षागृह के दर्शकों पर जाल की तरह डाल कर पकडे रखना बहुत कुशल अभिनेता की कसौटी है। इसे अंकुश शर्मा व उसकी टीम ने बखूबी निभाया।
अंकुश से अलवर के दर्शकों का परिचय अब नया नहीं पिछले साल नवम्बर में उनके दो हास्य व्यंग्य नाटक निठल्ला बिच्छु का मंचन हो चुका है। अंकुश के सामने चुनौती यह भी थी कि वह हास्य में क्या विविधता दे पाएंगे। इस कसौटी पर वे सफल रहे हैं। उनकी टीम में क्रिश सारेश्वर, मोहम्मद हसन, मदन मोहन व धीरेंद्रपाल सिंह ने अपनी भूमिकाओं को शानदार तरीके से निभाया।
16 जनवरी 2016 की दोपहर को अलवर के रंगकर्मी प्रदीप प्रसन्न लिखित व निर्देशित नाटकचार कंधेखेला गया। प्रदीप अलवर के निवासी हैं अभी गुजरात में रहकर शोध कर रहे हैं। वहां पर उन्होंने विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों से मिलकर टीम बनाई है। वे दो महीने पहले  भी स्वलिखित नाटक लेकर इसी टीम के साथ अलवर आए थे। इतनी कम अवधि में ही एक और स्वलिखित व निर्देशित नाटक से गुदगुदाने के लिए प्रदीप का साधुवाद। ज्ञातव्य है कि प्रदीप के दो नाटक जवाहर कला केंद्र की नाट्यलेखन प्रतियोगिता में पुरुस्कृत हो चुके हैं। शोध में व्यस्तता के बावजूद प्रदीप की मंच पर यह सक्रियता अचंभित व प्रेरित करती है।
हास्य का विधा से ध्येय में तब्दील हो जाना  
इसी दिन शाम का नाटक था तपन भट्ट लिखित व निर्देशित नाटकहरिलाल एन्ड संस । अंतिम दिन भी दो प्रस्तुतियाँ थीं - फ्लर्ट और रॉन्ग नंबररोंग नंबर भी तपन भट्ट द्वारा लिखित व निर्देशित नाटक है। फ्लर्ट नरेंद्र कोहली द्वारा लिखित व गगन मिश्रा द्वारा निर्देशित है। तीनों नाटकों में समानता यह है कि अभीनेता कमोबेश वही हैं, यथा- विशाल भट्ट, तपन भट्ट, अभिषेक झाँकल, हिमांशु झाँकल, कपिल शर्मा व सौरभ भट्ट इत्यादि। ये सभी जयपुर रंगमंच के जबरदस्त प्रशिक्षित अभिनेता हैं। तीनों नाटकों में इन अभिनेताओं ने अपने अभिनय, गति व तारतम्य से भरे ऑडिटोरियम को बांधे रखा। विशाल भट्ट व अभिषेक झाँकल बहुत प्रतिभाशाली अभिनेता हैं लेकिन तीनों नाटकों में उन्हें एक ही शेड के रोल देना अचंभित करता है। इन दोनों अभिनेताओं के अभिनय के वैविध्य से अलवर के दर्शकों को परिचित करवाया जा सकता था। फ्लर्ट नाटक में गगन मिश्रा शिल्प के स्तर  पर वैविध्यपूर्ण पर प्रयोग करके जो रंगभाषा रचते हैं तो उनके ये प्रयोग काव्यात्मक नजर आते हैं।
तपन भट्ट के नाटकों में अभिनय व निर्देशन का काम बेहद उम्दा है, किन्तु उनके नाटककार से कुछ मुद्दों पर सवाल किए जा सकतेहैं। तपन भट्ट के दोनों नाटकों के संवादों में ऐसे बहुत से संवाद थे जो जेंडर, जेनरेशन, एवं संस्कृतियों के पूर्वाग्रहों से भरे हुए थे। रंगमहोत्सव की शुरुआत सीमा बिस्वास के स्त्रीर पत्र नाटक से होती है जो स्त्री को उसकी परमपरगत भूमिका से निकाल एक व्यक्ति के रूप में प्रतिष्ठित करने का आह्वान करती हैं, और दर्शकों को एक विचार के बादलों पर सवार करती हैं, वहीं नाटक 'हरीलाल एंड संस ' में  नौकरानी के लिए एक पात्र का यह संवाद,"मालिक, यह प्लॉट मेरे नाम कर दो" सरीखे संवाद, उस विचार प्रक्रिया को महोत्सव के आखिर तक आते-आते तार-तार कर देते हैं। उनके नाटक में इस तरह के संवादों की भरमार थी जो पाश्चात्य संगीत, सभ्यता व नई पीढ़ी को लेकर एकांगी दृष्टिकोण प्रस्तुत करतेहैं। इस तरह का हास्य प्रेक्षागृह के दर्शकों को विभाजित कर जाता है -  एक दर्शक वह जो इनके मार्फत परंपरा से अपने दृष्टिकोण और पुष्ट होते हुए पाता है, वह कहकहे लगता है। दूसरा दर्शक वह, जो  इस विडम्बना पर नहीं हंस सकता। यह विद्रूपता तब जन्म लेती है जब हास्य एक विधा से ध्येय में तब्दील हो जाता है। फिर कहानी का मुख्य कथ्य पीछे छूट जाता है, और कुछ भी कह के हँसाने की विवशता को  कलाकार ढोता है। हास्य एक रस है।  रसानुभूति एक दशा है ध्येय नहीं, सम्प्रेषण तो उन मूल्यों का होता जो लेखक का अभिप्रेत है। रस उसके सम्प्रेषण की गारंटी प्रदान करता है। लेकिन जब हास्य ही ध्येय हो जाता है तो वह विद्रूपता को जन्म दे सकता है। यह एक बहुत ही महीन धागा है जिसे पकड़ने की जरूरत है। आजकल टीवी पर छाए इस तरह के हास्य से ऊबकर जो दर्शक नाट्यशाला में आया होगा जरूर उसे निराशा हाथ लगी होगी। इसमे कोई दो राय नहीं की भट्ट जी के दोनों नाटको में दर्शकों की व ठहाकों की संख्या अनगिनत थी। तपन भट्ट अनुभवी व बहुमुखी प्रतिभा के कलाकार हैं। उन्हे अपने कथ्य में इस दृष्टि से भी नवाचार करने चाहिए। वे कर सकते हैं।
आखिर में कुछ सीखें व बातें जिन्हें कहा जाना चाहिए इस प्रकार हैं
  • पिछले दो महीने पहले जब पहला नाटक प्रताप ऑडिटोरियम में हुआ था तो आस-पास के लोग इस कंगूरेनुमा बिल्डिंग को बहुत विस्मय से देखते थे कि यह सरकार ने क्या बना कर रख दिया। इस बार जब यह इमारत चार दिन तक रोशनी में नहाई तो एक माहौल बना है। आस-पास  दुकान वालों को भी उम्मीद बंधी है कि इस इमारत की गतिविधियों की सातत्य उनकी दिहाड़ी में भी इजाफा करेगी।
  • दिन में एक कार्यक्रम संगीत व नृत्य का रखने के प्रयोग ने आयोजन को अलग आयाम दिया। स्वरांजलि संगीत क्लब अलवर में परिचित नाम है। संगीत के बेहतरीन जानकार इस क्लब से जुड़े हुए हैं। स्वरांजलि के साथ बहुत बड़ा दर्शक वर्ग भी जुड़ा हुआ है, जो इस जुगालबंदी से नाटक की ओर डायवर्ट हुआ है।
  • पिछले कार्यक्रम में जो कमी थी कि मीडिया ने, या मीडिया से परहेज किया गया था। इस बार मीडिया कवरेज अच्छा होने से दर्शक जोड़ने से फायदा मिला। व्हाट्स एप्प व फेसबुक पर जम कर प्रचार किया गया। स्थानी टीवी चैनल की शिरकत से इसमें इजाफा हुआ। नि:संदेह कारवां ने इस प्रचार-प्रसार में खूब भूमिका निभाई।
  • रंग संस्कार थियेटरकारवां ने इस कार्यक्रम को जिस भव्यता से किया है, यह अब इसकी आवृत्तियों की अपेक्षा भी करता है। किसी भी समूह की सार्थकता सही मायने में उसकी अगली गतिविधि में ही होती है। कारवां ने खुद ही बेंचमार्क इतना ऊंचा स्थापित कर दिया है। अब उनकी खुद से ही स्पर्धा है।
  • इस आयोजन में देशराज का दो बिन्दुओं से विचलन अलवर के रंगकर्मियों को साफ नज़र आया। पहला - बिना टिकट से नाटक दिखाना। दूसरा - नाटकों का समय पर शुरू न कर पाना। हालांकि मुफ्त में देखने से नया दर्शक भरी मात्रा में जुड़ा है, लेकिन यहाँ ज़िक्र इसलिए है कि देशराज का इस मूल्य पर ज़बरदस्त आग्रह रहा है। वीआईपी मेहमानों को बुलाना नाटक में देरी की प्रसिद्ध वजह है, जिसे न चाहते हुए भी आवश्यक बुराई के तौर पर स्वीकार किया जाता है।
इस लेख का आकार जरूरत से ज्यादा लंबा हो गया है। अंत में रंग संस्कार थियेटर ग्रुप व कारवां फाउंडेशन व अलवर के नागरिकों को एक सफल आयोजन के लिए बधाई।

दलीप वैरागी  

(कृपया अपनी टिप्पणी अवश्य दें। यदि यह लेख आपको पसंद आया हो तो शेयर ज़रूर करें।  इससे इन्टरनेट पर हिन्दी को बढ़ावा मिलेगा तथा  मेरी नाट्यकला व  लेखन को प्रोत्साहन मिलेगा। ) 


दलीप वैरागी 
09928986983 









Monday, October 5, 2015

हास्य नाट्य समारोह के ठहाकों की गूंज अलवर की फिज़ाओं में कई दिन तक रहेगी

कल 4 अक्तूबर 2015 का दिन अलवर रंगकर्म में काफी महत्त्व का था। वह इस लिए कि अलवर में नवनिर्मित प्रताप ऑडिटोरियम में पहली बार कोई नाट्य गतिविधि संपन्न हुई। यूँ तो यह ऑडिटोरियम बने हुए लगभग दो साल का वक़्त हो गया है लेकिन रंगकर्मियों के लिए यह आज भी मरीचिका बना हुआ है। इसको बुक करने का शुल्क इतना अतार्किक है कि रंगकर्मी इसको बुक करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे थे। अंततः यह काम रंग संस्कार थियेटर ग्रुप के देशराज मीणा ने कर दिखाया। और उन्होंने "हास्य नाट्य महोत्सव" के रूप में एक खूबसूरत शाम का अनुभव अलवर के दर्शकों के लिए रच दिया।
कल शाम प्रताप ऑडिटोरियम पर तीन नाटकों का मंचन हुआ जिसका विवरण इस प्रकार है -
पहला नाटक – “निठल्ला”
हरिशंकर परसाई के व्यंग्य रचनाओं पर आधारित इस नाटक का निर्देशन देशराज मीणा ने किया। इस नाटक में दो अभिनेताओं दीपक पाल सिंह व अंकुश शर्मा ने अपने सधे हुए अभिनय से दर्शकों को आद्यंत जोड़े रखा। दोनों अभिनेताओं ने सादगी से मंच पर कथा का नैरेशन भी किया और विभिन्न चरित्रों को भी निभाकर दर्शकों को गुदगुदाया और  परसाई जी के व्यंग धार से कहीं दर्शकों के मानस पर नश्तर भी छोड़े। यह सधे हुए अभिनय की मिसाल ही है कि कोई अभिनेता बड़ी चतुराई से दर्शक दीर्घा में बेबाकी से फोन पर बात करते हुई दर्शक की भी खबर ले डाले, बिना अपनी भूमिका से विचलित हुए। इस व्यंग नाटक ने जहाँ इन अभिनेताओं ने नेता, नौकरशाह व संतों की पोल खोली वहीं आखिरी संवाद तक आकर दर्शक को भी नहीं छोड़ा और गिरेबां में झांकने के लिए मज़बूर कर दिया।
दूसरे नाटक " उसके इंतज़ार में" के लेखक निर्देशक प्रदीप प्रसन्न हैं । इन्होंने नाटक में अभिनय भी किया। प्रदीप इन दिनों अहमदाबाद में रहकर शोध कर रहे हैं तथा वहां रहते हुए उन्होंने वहां शौकिया रंगकर्मियों की एक अच्छी खासी टीम बना ली है, जो वास्तव में बहुत बड़ी बात हैं। अपनी टीम के साथ अलवर में मंचन के लिए आए थे। उसके इंतज़ार में एक पूर्णतया हास्य नाटक है।  इस नाटक में एक परिवार की कहानी है, जहाँ लड़की को देखने के लिए आए हैं। विभिन्न परिस्थितियों के माध्यम से प्रदीप हास्य रचते हैं। पारिवारिक नोकझोक है, नौकरानी से इश्क है, बेरोजगारी है व मनुष्य की सहज दुर्बलताएँ हैं । इन छोटी-छोटी स्थितियों के माध्यम से प्रदीप जहाँ गुदगुदाते हैं वहीं गंभीर चोट भी कर जाते हैं और अगले ही पल हास्य की मसाज भी कर देते हैं। एक नाटककार के रूप में प्रदीप प्रसन्न विधा की नब्ज़ पकड़ चुके हैं। उनसे इसी तरह और लेखन की आगे भी उम्मीद है।
तीसरे नाटक के रूप में मोलियार की रचना "बिच्छू " का मंचन किया गया। इस नाटक का निर्देशन अंकुश शर्मा ने किया। अंकुश इस नाटक में भी प्रमुख भूमिका में थे। मोलियार की इस क्लासिक कृति के हिंदुस्तानी अनुवाद में दो परिवारों की कहानी है। जहाँ रूढ़िवादी कंजूस पिता भी हैं तो उनकी तथाकथित तरक्कीपसंद इश्कमिज़ाज़ सन्तानें भी।  इस पीढ़ी अंतराल और इस खाई को अपने अजीबोगरीब कौशल से सामंजस्य बनाने और उनकी खबर लेते हुए रहमत के किरदार को पूरी ऊंचाई पर लेकर जाते हैं अंकुश शर्मा। रहमत का किरदार सबको अपने इर्द-गिर्द मौज़ूद तुर्प के इक्के की याद दिलाता है जो किसी भी गाँव मौहल्ले के लिए उतना ही अपरिहार्य है जितना कि वह तिरस्कृत भी है। ये सारी परिस्थितिया गजब का हास्य रचती हैं। उर्दू ज़बान के शब्दों के साथ सभी कलाकारों ने उच्चारण की शुद्धता का ख्याल रखते हुए यह साबित किया कि वे प्रशिक्षित व पेशेवर अभिनेता हैं।
यह आयोजन एक दिन में कई बाते अलवर रंगकर्म को कह गया -
  • ऑडिटोरियम की शुल्क कम करने के लिए प्रशासन से मांग करना जरुरी तो है लेकिन उसके कम होने के इंतज़ार में बैठे रहना भी ठीक नहीं। जब तक उस जगह पर कोई गतिविधि नहीं होगी तो प्रशासन को उसकी जरुरत भी समझ नहीं आएगी।
  • यहाँ आयोजन होने से ही इसकी अंदर की खामी पता चली कि उसकी बनावट में बुनियादी चूक भी हुई हैं। साईक मंच के इतने पीछे चिपका कर लगाई गई है कि अभिनेता के मूवमेंट के लिए भी पर्याप्त स्थान नहीं। पंखे हैं नहीं, एसी लगे नहीं। दो घंटे की अवधि दर्शको को गर्मी में तलने के लिए काफी हैं।
  • नाटक को समय पर शुरू करना बहुत जरुरी है। लेकिन यह उतना ही दुर्लभ भी है। लेकिन कल का शो समय पर शुरू होने के पीछे निसंदेह देशराज की जिद को ही माना जा सकता है। इसके लिए देशराज साधुवाद के पात्र हैं। उन्होंने विशिष्ठ अतिथियों को भी आमंत्रित किया लेकिन उनके आदर सत्कार को बरक़रार रखते हुए उन्होंने दर्शको के समय व रसास्वादन को बाधित नहीं होने दिया।
  • इतनी महत्वपूर्ण गतिविधि की अगले दिन किसी अख़बार में कोई खबर नहीं मिलने पर अच्छा नहीं लगा। प्रिंट मिडिया की यह  दूरी समझ में नहीं आई।
  • इस रंग अनुभव को रचने में हालाँकि देशराज व प्रदीप अलवर के रंगकर्मी हैं लेकिन इनके अतिरिक्त पूरे अभिनेता दिल्ली जयपुर व  अहमदाबाद से थे। निःसंदेह इन अभिनेताओं ने अलवर के रंगकर्म को एक्सीलेंस के मापदंडों से परचित अवश्य करवाया। उम्मीद है भविष्य में अलवर के रंगकर्मी भी इस ऑडिटोरियम पर शिरकत करते दिखाई देंगे।
सारांशत: यह कहा जा सकता है कि रंग संस्कार थियेटर ग्रुप द्वारा आयोजित "हास्य नाट्य समारोह" के ठहाके की गूंज काफी समय तक अलवर रंगमंच की फिजा में गूँजेगी। अपनी तमाम मज़बूतियों के बावज़ूद यह कहे बिना बात ख़त्म नहीं की जा सकती कि यह हास्य का ओवरडोज़ भी था। काश! ये तीनो नाटक, तीन दिन क्रमिकता से मंचित होते तो माहौल और सघन बन सकता था। कुछ अधिक दर्शक जुटाए जा सकते थे। फिर भी आयोजकों बधाई , दर्शकों को बधाई !
(कृपया अपनी टिप्पणी अवश्य दें। यदि यह लेख आपको पसंद आया हो तो शेयर ज़रूर करें।  इससे इन्टरनेट पर हिन्दी को बढ़ावा मिलेगा तथा  मेरी नाट्यकला व  लेखन को प्रोत्साहन मिलेगा। ) 

दलीप वैरागी 
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Saturday, September 26, 2015

एक अमेच्योर एक्टर की डायरी - 1 : रटें या रमें


नाटक पर काम करते हुए कई बार आप वो कर रहे होते हैं जो दरअसल नहीं करना चाहते। नवोन्मेष केवल चाहे हुए को करने से ही नहीं होता, कई बार अनचाहा भी रचनाशीलता के अवसर दे जाता है। अरे! माफ़ कीजियेगा, इस ज्ञान का साधारणीकरण करके मत देखिए। ऐसा केवल मेरे केस में होता है। इसका मतलब यह भी नहीं कि मुझे नाटक करना पसंद नहीं है। लिहाजा परंपरा निभाते हुए जो नहीं चाहता, वही कर रहा हूँ। ट्रेन में बैठकर नाटक के संवादों को रट रहा हूँ। कल रिहर्सल पर निर्देशक की सवालिया नज़रों का सामना करना होगा, " क्या बात है अभी तक ....?" साथी अभिनेता दनादन डायलॉग बोल रहे है। उनकी डायलॉग-दुनाली में और व्यवधान क्यों डालूं! इस लिए ट्रेन के डेली यात्रियों के साथ गप्पबाज़ी करने और यात्रियों के चेहरों को उजबकों की तरह पढ़ने के स्थान पर स्क्रिप्ट पढ़ रहा हूँ।

अब ट्रेन की ऊपर की बर्थ पर बैठ कर परांठे की मानिंद रोल करके रखे हुए रोल के पन्ने निकाल, सीधे करके पाठ को देख रहा हूँ। शुरू से आखिर तक । एक बार, दो बार .... बार-बार... क्रम व कवायद अनंत...। बात बनती हुई लग नहीं रही...  काश मस्तिष्क भी स्कैनर की तरह काम करता और एक दो बार आँखों से गुजारने के बाद एक जेरोक्स इमेज बन जाती पूरे ए-फॉर साइज... लेकिन ऐसा होता तो कब का हो हो जाता। स्केनिंग के लिए जरुरी है एक समतल शीट हो।  रोल की तहरीर समतल तो है लेकिन तक़रीर आड़ी-तिरछी है। भावनाओं के पिरामिड हैं विचारों के गर्त हैं और जिज्ञासाओं कंदराएँ हैं।बहुत उबड़ खाबड़ है। 3डी... नहीं,... 4डी... वह भी नहीं... अनंत डाइमेंशन हैं। इसका जहनी जेरोक्स संभव नहीं। पर... याद तो करना है। खुद पर खुद का दबाव बना रहा हूँ।
यह लो घोटा लगा के सब समतल किये दे रहा हूँ। अब सब
2डी में है ...सारा का सारा सपाट!... अब इस इसकी अनुप्रस्थ काट की सीधी-सीधी सतरें बना ली हैं। उन्हें तुरपाई करके एक चिक बना रहा हूँ ताकि मानस पटल पर आच्छादित किया जा सके। जितना चाहे खोलो, जितना चाहे लपटो, जितनी चाहिए रौशनी... क्या चिक के बाद रौशनी की चाहत या रह जाती है? याद तो करना ही है हर हाल में... रट के या रम के ! यह मेरा अब खुद पे खुद का दबाव है। मैंने अपना तरीका इज़ाद किया है... आप कैसे करते हैं?


- दलीप वैरागी 
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Friday, June 26, 2015

भारतीय रेल का जनरल डिब्बा

ऐसी कौनसी जगह है जहाँ से पूरा हिंदुस्तान दिखाई देता है? मैं इसके जवाब में कहूँगा भारतीय रेल में पूरा हिंदुस्तान नज़र आता है। बक़ौल गुलज़ार साहब के, "एक हिंदुस्तान में दो-दो हिंदुस्तान नज़र आते हैं।" ऐसी ही नज़र हमें भी एक दिन मिली जब रिजर्वेशन के डब्बे से टीटीई ने हमें अनारक्षित टिकट के साथ पाया। हमेशा की तरह हमने भी जुगाड़ लगाने की कोशिश की। पता नहीं टीटीई जुगाड़ी नहीं था या हम अभी तक अनाड़ी थे। हमें जनरल बोगी का  रास्ता दिखा दिया गया। कसम से ऐसा महसूस हुआ जैसे बहिश्त से हमारी बेदखली हुई हो।
हम जनरल बोगी के सामने खड़े थे। बाहर से ही अंदर का दृश्य देख कर हमने यात्रा रद्द करने या फिर जीप-जोंगा या बस का विकल्प देखने का मन बना लिया। फिर भी हम दरवाज़े के आगे देख रहे थे जनरल डिब्बा किसी अनाज की बोरी जैसा लग रहा था। अब यदि इसमें सेर भर और डाला तो बोरी छलकेगी या फट जाएगी। लेकिन हम इस बात को लेकर भी दंग रह गए कि प्लेटफॉर्म पर मौज़ूद आधी से ज्यादा आबादी इसी डिब्बे की और लपक रही थी। डिब्बा हमें किसी ब्लैक होल सा नज़र आया। भीड़ की तत्परता में यह पूरा यकीन झलक रहा था कि इस डब्बे में अनंत जगह है। या फिर यह फंतासी है कि अंदर कोई है जो बेतरतीब बैठे लोगों इस्तरी करके तह लगता जाएगा और सब के लिए जगह बन जाएगी।
यात्रा कैंसिल करने का मन बनाने बावजूद निर्णय हमारे हाथ से निकल चुका था। हम ऐसी जगह खड़े थे जहाँ से वापस लौटना संभव न था। मुख्य धारा का बहाव डिब्बे के द्वार की ओर था। मुख्य धारा के वेग ने एक ही झटके से हमें उठाकर अंदर धर दिया। इस अद्भुत लिफ्ट का लुत्फ़ हमने पहली बार उठाया। और हमें पहली बार अपनी वंचितता का अहसास हुआ। आरक्षित डिब्बों में इस तकनीक से सदा महरूम रहे। हमेशा यह सोचते रहे कि बीमार, विकलांग व वृद्ध लोगों के लिए रैम्प होने चाहिए या व्हील चेयर का इंतज़ाम होना चाहिए। आज यह ज्ञान हुआ कि सुविधाएं दिमाग को बंद करती हैं और आभाव अविष्कारों के जनक हैं। जनरल बोगी में लोगों के दाखिल होने के लिए यह कन्वेयर बैल्ट जैसी सुविधा प्रारम्भ से ही विद्यमान है। एक बार फिर भारत के प्राचीन ज्ञान पर गर्व हो आया। जय हो विश्व गुरु की!
लिहाज़ा अंदर आना हमारी इच्छा पर निर्भर नहीं था लेकिन अंदर पैर टिकाने का फैसला हमे खुद करना था। अंदर हमारा पहला कदम रखना बिलकुल वैसे ही अनिश्चित था जैसा किशोरावस्था की मुहोब्बत में रखा पहला कदम। जैसे ही हमने गैलरी में पहला कदम रखना चाहा तो लय के साथ चलते हुए खर्राटे अचानक रुक गए,उनका स्थान एक गुर्राहट ने ले लिया और हमने अपना बढ़ाया हुआ कदम वापस ले लिया। गुर्राहट अब फिर सुर बदल कर खर्राटों में तब्दील हो गई। गैलरी में सोये व्यक्ति ने पहले की बनिस्पत अपने आयतन-क्षेत्रफल को विस्तार देते हुए खुद को गैलरी में और फैला दिया। एक पांव पर खड़े होकर हठयोग ठानने का इरादा हमारा नहीं था। हालांकि अगले ही दिन विश्व योग दिवस था। और हमारे इनबॉक्स में सरकार की तरफ से भेजे संदेशों की पूरी शृंखला थी, जिसमे 21 जून को योग करने सन्देश थे। हमने सरकार के दोहरे रवैये के बारे में भी एक पल सोचा कि सरकार योग करने की परिस्थितियां तो आज और यहीं पैदा कर रही है और योग कल करने को कह रही है। हमने सरकार की बात को अक्षरशः माना। योग को कल के लिए मुल्तवी किया। इसलिए हमने अपने पैर को अलग दिशा में रखना चाहा। जैसे ही हमने पैर नीचे रखा तो किसी झोले में सामान के चरमराने की आवाज आई। इससे पहले कोई और आवाज इस आवाज को उठाए हमने फिर अपना कदम वापस उठा लिया। कर भी क्या सकते थे, बगुले की तरह एक टांग पर टंगे हुए थे। शायद खड़े शब्द का इस्तेमाल यहाँ प्रासंगिक न होगा।
हम जो कर सकते थे वही किया। लोगों को देख सकते थे सो देखने लगे। और देखने में हमने वो देख लिया जिसे धरती पर देखने के लिए नासा के वैज्ञानिक बरसों से दिन-रात एक किए हुए हैं। जी हाँ, ज़ीरो ग्रैविटी ! भार हीनता। मैंने देखा कि लोग ऊपर उठ रहे हैं। जैसे कोई अदृश्य चुम्बक उन्हें खींच रही है। नहीं तो बिना किसी सीढ़ी की मदद से इतनी ऊँची जगह  पर लगाई बर्थ पर चढ़ना कैसे मुमकिन हो सकता है। मैं कन्फ्यूज़ हूँ कि ये बर्थ हैं या सामान रखने की ताक। लेकिन लोग ऊपर की और खिंच रहे थे और उन ताकों पर लद रहे थे...नाटे, लंबे, मोटे, बूढ़े, बच्चे व अधेड़ सब के सब। सीटों के ऊपर की बर्थ,माफ़ करें ताक, लोगों से भर गईं। गैलरी के ऊपर सामान रखने की परछत्ती पर सामान रखा हुआ था। सामान व्यर्थ का जंजाल है। इंसान अपने स्वार्थ के लिए सामानों का संग्रह करता जाता है। बाद में वही सामान मानव सभ्यता के लिए मुसीबत बन जाता है। इसी दार्शनिक विचार प्रक्रिया से प्रेरित होकर ही शायद एक नौजवान ताक की और ऊपर खिंच गया, जीरो ग्रैविटी की वजह से। यह सोच कर कि इस कायनात में प्रकृति ने इंसान के लिए जगह बनाई है अगर वहां सामान रहें यह मानवता के विरुद्ध बात है। मानवता के विचार से प्रेरित होकर युवक ने सामान को सरकाना शुरू किया और अपने लेटने के लिए जगह बना ली। ताक युवक के आकार से सकड़ी थी युवक ने अपना आकार भी सिकोड़ लिया। थोड़ी देर में ही खर्राटों में एक स्वर उसका भी शामिल हो गया।
लोग लगातार अपनी-अपनी जगह तलाश रहे थे डिब्बे में उम्मीद के साथ, और उन्हें मिल भी रही थी। मैंने देखा डिब्बे में लोग आ जा रहे थे। कोई कोई बाथरूम जा रहा था, कोई बाथरूम से बीड़ी पीकर लौट रहा था, कोई मुंह में लगभग छलकने के स्तर पर पहुंची खैनी की पीक को थूकने को लपक रहा था। लेकिन लोग गैलरी में नहीं चल रहे थे। ऐसा लगा कि गैलरी में कोई रोप-वे लगा हुआ है लोग उसी का इस्तेमाल करते हैं। हमने भी एक पल को अपने अंदर भारहीनता को महसूस किया और खुद को डिब्बे के मध्य वाले कंपार्टमेंट में खड़े पाया। बाकायदा दोनों पावों की जगह को हमने अपने ऊपर ईश्वर की बड़ी कृपा माना। सीट मिलने की कल्पना ही हिमाकत थी। फिर भी हमने सीटों का मुआयना करना शुरू कर दिया। रिजर्वेशन के डब्बे में इतनी ही लंबी-चौड़ी सीट पर तीन तक की गिनती लिखी होती है। मतलब कि यहाँ तीन व्यक्ति बैठ सकते हैं। इस डिब्बे में में तो चार तक की संख्या लिखी है। लिखा चार है और पांच-पांच बैठे हुए हैं। इसके पीछे सरकार की क्या मान्यता है। शायद यही कि जनरल डिब्बे में सफ़र करने वालों का आयतन-क्षेत्रफल रिजर्वेशन वालों की तुलना में कम होता है। इस तथ्य की पड़ताल करने के लिए एक बार फिर हम लोगों की और देखने लगे।
ऊपर बैठे सफ़ेद दाढ़ी वाले चचा जान ने काफी देर से अपना भारी बैग लिए खड़ी युवती से कहा, लाओ बिटिया बैग मुझे दे दो, थक जाओगी।" चचा जी ने बैग लेकर अपनी गोदी में रख लिया और निचे बैठे लोगों को थोडा अधिकार पूर्वक बोला, " थोड़ा-थोडा सरक जाओ भाई। लड़की को बैठने दो।" चचा जी ने कहा और लोगों में जुम्बिश हुई लोगों ने लड़की के बैठने के लिए बाकायदा जगह पैदा कर दी। उसी सीट पर जिस पर चार की संख्या लिखी है। यह हमारे लिए कोई चमत्कार से कम न था। चचा जी हमें जादूगर जान पड़े। हमें यक़ीन हो चला कि अगर चचा जी चाहें तो तो इसी चार की संख्या वाली सीट पर सातवें को भी सवार कर सकते हैं। मैंने आशा भरी दृष्टि से चचा जी की तरफ देखा। चाचा ने इस बार सामने वाली सीट की तरफ इशारा किया और हमने बिना जगह के एक सिरे पर बैठने का उपक्रम किया और सचमुच ही बैठ गए! मुझे यक़ीन हो गया कि इंसान में एक अद्भुत कौशल है, आकार बदलने का। रंग बदलना तो इंसान गिरगिट से सीख चुका है। क्या आकार बदलना जोंक से सीखा होगा? एक बात तो पक्की है कि इंसान जनरल डिब्बे में आकर ही अपने इस अद्भुत कौशल को एक्सप्लोर कर सकता है। शायद यही सोचकर ही सरकार ने जनरल डिब्बे की बैठक व्यवस्था का नियोजन किया है।
इस तरह पूरे डिब्बे में  अपने आकार को संकुचित व पल्लवित करने के इंसानी कौशल की मिसालें नज़र आने लगीं। हर स्टेशन पर यही मुजाहिरा होता। चार - चार वाली सीट पर सात-आठ तक बैठ रहे थे। बैठना क्रिया इस स्थिति में न्याय संगत भाषाई प्रयोग नहीं होगा। ऐसा लग रहा था कि हम टंगे हुए हैं। डिब्बे में सीटें नहीं बल्कि खुंटिया लगी हुई हैं। हर खूंटी पर एक इंसान टंगा है। मैं तो सरकार से अनुरोध करूँगा कि वह हर ट्रेन में एक जनरल डिब्बे की व्यवस्था जरूर करे। चाहे शताब्दी हो, राजधानी हो या दुरंतो सभी में जनरल डब्बे की व्यवस्था होनी ही चाहिए। बुलेट ट्रेन में भी एक जनरल डिब्बे की मैं शिफारिश करूँगा। यदि सरकार चाहती है कि इंसान की कल्पनाशीलता, सृजनशीलता निखर कर आए। उसकी अंदर की संभावनाएं निकल कर आएं तो जनरल डिब्बे की व्यवस्था हर ट्रेन में होनी चाहिए। यह काम पूरी ट्रेन को जनरल करने से नहीं होगा। एक ही डिब्बा होना चाहिए। यदि किसी ट्रेन में दो डिब्बे हैं तो उन्हे तुरंत प्रभाव से एक कर देना चाहिए। बस एक डिब्बा हो। सुविधाओं की चिन्ता नहीं करनी चाहिए। वैसे भी इस डिब्बे के यात्री सुविधाओं का प्रोपर इस्तेमाल कहा करते हैं। वे इन सुविधाओं को अपनी कल्पनाशीलता को विकसित करने में करते है। टॉयलेट का इस्तेमाल  स्मोकिंग ज़ोन के रूप में करते है। गैलरी का सोने के लिए करते हैं। लगेज कैरियर का इस्तेमाल स्लीपर बर्थ के लिए करते हैं। रेलवे ने डस्टबिन नहीं लगाया तो क्या हुआ इस डिब्बे के यात्री किसी भी जगह डस्टबिन की कल्पना कर लेते हैं। इसलिए इस डिब्बे में जितनी सुविधाएं होंगी कल्पनाशीलता कम होगी। सरकार को डिब्बे में तमाम सुविधाओं को बढ़ाने की चिंता नहीं करनी चाहिए। लोग असुविधाओं में भी अपना सुख खोज लेते है। पूरा डिब्बा अपने हाल में अब मगन है। बर्थ पर बैठे व्यक्ति ने ताश निकाल ली है। उसने गैलरी में खड़े व्यक्ति को ताश की गड्डी पकड़ाई। उसने ताश को फेंटा औए खिड़की के पास बैठे व्यक्ति को ताश बाँटने लगा। सब अपनी गति से चलने लगा। चाचा दूसरे यात्री से कह रहे हैं कि बेटी को बी एड करवा दिया है अगले साल शादी कर दूंगा। एक बुजुर्ग दूसरे को कह रहे हैं कि भाई स्वर्ग - नर्क सब यहीं हैं। डिब्बे में जिंदगी ने भी रेल के साथ रफ़्तार पकड़ ली है।
मैं तो कहता हूँ कि बस हर ट्रेन में एक जनरल डिब्बा सृजित करना चाहिए। भले ही जनरल डिब्बे की जगह खाली स्थान ही छोड़ दे तो लोग अपनी अद्भुत कल्पनाशीलता व सृजनशीलता से उसके नायाब उपयोग रेलवे को सुझा सकते हैं। बस दरकार है एक जनरल डब्बे की।
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