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Saturday, January 28, 2017

गुड्डी गायब है उर्फ जनता ऊँचा सुनती है

बच्चों के साथ एक नाट्यानुभव 
शूज शफल” एक ड्रामा तकनीक  है, इसे जितनी बार बच्चों के साथ करो इसकी उतनी ही संभावनाएं खुल कर सामने आती हैं। करना कुछ नहीं, एक वस्तु लीजिए और बच्चों या अभिनेताओं के बीच रख दीजिए। अब उस वस्तु का प्रयोग करते हुए अभिनय करना है। शर्त यह है कि वास्तव में जो वस्तु है उसे वह वस्तु न मान कर कोई और वस्तु मानना है। केजीबीवी में 91 लड़कियां थीं। सभी को इस गतिविधि में शामिल करना ही था। निकटतम उपलब्ध वस्तु, एक थाली जो हॉस्टल में सहज ही उपलब्ध थी वह लड़कियों के घेरे के बीच में रखी गई। अब लड़कियों को बुलाया गया। यह क्या! कोई भी लड़की उठ कर नहीं आई। क्या बात है... गतिविधि प्रासंगिक नहीं है ... या ... मैं बता ही नहीं पाया ... एक बार फिर बताया गया ... बात जस की तस... अब खोट सामने वाले में देखने की बारी थी। शायद लड़कियों में झिझक बहुत है। क्यों न एक बार फिर अपने सम्प्रेषण को परखा और सीमाओं को देखा जाए, कई बार शाब्दिक सम्प्रेषण काफी नहीं होते। मैंने सभी लड़कियों को कहा कि इस गतिविधि को करने में पहला नंबर मेरा है। मैंने सामने पड़ी थाली को उठाया और उसे आईने की तरह सामने रख कर अपने बाल सँवारने का कार्य किया। मेरे बैठने से पूर्व एक लड़की खड़ी हो चुकी थी। उसने आरती की थाली बना दी। दूसरी लड़की ने भी पूजा जैसी कोई थाली बनाई। उससे कहा गया कि आप एक ही कार्य को दोहरा नहीं सकते। लड़की ने कहा कि यह अलग है, मैं यह थाली लेकर राखी बांध रही हूँ। एक लड़की आयी उसने थाली को थालीपने से सम्पूर्ण मुक्ति देते हुए बारिश में छाते की तरह औढ लिया। एक और लड़की ने उसे रोटी बेलने का चकला बना दिया। एक ने बैठने कि चौकी बना दी। एक ने कचरादान बनाया, एक ने फावड़ा, एक ने सुदर्शन चक्र... लैपटाप ... ढपली.... स्कूल की घंटी... कंघा... पंखा... कॉपी ... किताब... पर्स... बैग ... गिनती 91 तक जाती है... इस बीच नैनी, जो अभी पढ़ना लिखना सीख रही है, जिसके बारे में कहा जाता है कि शिक्षण प्रक्रियाओं में नहीं जुड़ पाती, वह अब तक तीन बार आ चुकी है और हर बार उसके उत्साह में गुणोत्तर वृद्धि हो रही है। कल्पना व सृजनशीलता की ऊष्मा से पिघल कर थाली तरलता में रूपांतरित हो चुकी थी और मन चाहे नाना आकारों में ढलने लगी थी।  अब लड़कियों को बुलाना नहीं पड़ रहा वे आ रही हैं... इससे पहले कि यह आइडिया तरलता से गैस में तब्दील होकर हवा हो जाए इसमें वैरिएशन (बदलाव) जरूरी है।
विचारों के मशरूम
मैंने बदलाव के आशय से लड़कियों से कहा कि यह गतिविधि तो बहुत सरल हो गई है। अब मैं इसे थोड़ा कठिन कर देता हूँ। चार-पाँच लड़कियों ने कहा जरूर कर दीजिए लेकिन एक–एक बार पहले इसे हमे पूरा करने दो। थोड़ी देर बाद मैंने थाली के पास ही एक छोटा बक्सा रख दिया, जो वहीं क्लासरूम में रखा हुआ था। थोड़ा सा विराम आया। कल्पना का विमान अब वैचारिक धरातल पर उतर चुका था। अब तक लड़कियां वस्तु को उसके आकार के अनुसार कल्पना के रंग दे रहीं थीं। अब वे दोनों वस्तुओं के अंतर्संबंध को देख रहीं थीं। उस वस्तु के आकार उपयोगिता व गुणधर्म आधार पर... फिर उसके साथ अपने शरीर को भी ढाल रही थीं। एक लड़की ने बक्से को लैपटाप बनाया तथा पास में रखी थाली से कुछ ले कर खाती भी जा रही है। एक लड़की ने बक्से को पूजा की वेदी बनाया तथा सामने पूजा की थाली रखी। अब थाली अपने मूल रूप की और लौट रही थी और बक्सा कल्पना के रंगों से रंगा जा रहा था। अब लड़कियों ने कहा कि आपने गतिविधि को कठिन करने की बजाए और सरल कर दिया। अब मैंने एक वस्तु कपड़ा भी रख दिया। मैंने कहा अब चाहें तो दो लड़कियां साथ मिल कर भी आ सकती हैं। चंद क्षण में ही लड़कियों के हाथ जुड़ कर जोड़ियाँ बनने लगीं। एक लड़की ने बक्से पर कपड़ा बिछाया, उस पर दूसरी को बैठा दिया तथा थाली में उसके पैर रख कर, पैरों को धोने का उपक्रम करने लगी। एक जोड़ी आई उसने बक्से व कपड़े की स्थिति में बदलाव किए बिना अपने साथी को उस पर बैठाया तथा थाली में से कुछ उठा कर बालों में मेहँदी लगाने का अभिनय किया... एक जोड़ी, भी वैसे ही लड़की को बक्से पर बैठाया, बैठी हुई लड़की के हाथ में थाली को आईने की तरह थमाया और उसकी चोटी बनाने का अभिनय करने लगी। ऐसा प्रतीत हो रहा था कि लड़कियां Photomontage तकनीक की विशेषज्ञ हों और मूल बैकग्राउंड  या झांकी के आगे कुछ इन्स्टाल या रद्दोबदल करके दृश्य को परिवर्तित कर रही हों। लड़कियों की जोड़ियाँ बदस्तूर आ जा रही थीं मंच पर से। उनके अभ्यासों में कथा तो अभी नहीं आई थी लेकिन एक सूत्र जरूर आ गया था जो उन्हे व मंच की वस्तुओं को न केवल बांधता था बल्कि पूर्व में लड़कियों द्वारा बनाए को, विध्वंस न करने की बजाए उसमे कुछ जोड़ता था। यहाँ नाटक की प्रवृत्ति साफ उभर कर सामने आ रही थी जो सहज ही व्यक्तियों को एक टीम बनने की और ले जाती है। मेरे पास बदलाव का और कोई विकल्प नहीं था सिवा इसके कि एक दो वस्तु और व्यक्तियों को जोड़ने की छूट दे दूँ। मैंने कहा कि इसे और कठिन (आसान ) करने जा रहा हूँ। मैंने अब कोने में रखी एक झाड़ू उठा कर मंच के बीच रख दी और लड़कियों से कहा कि अब कितनी भी लड़कियां आ सकती हैं। अब तक यह गतिविधि मूक रखी गई थी अब बोलने की बंदिश भी हटा दी गई।
दो-दो की टोलियाँ चार-पाँच के दल में संघनित होने लगे। चीज़ें बढ़ी व्यक्ति भी बढ़े। चीजों व व्यक्तियों की बढ़ोतरी की गर्मी व नमी पाकर विचारों के मशरूम ज़मीन तोड़ कर बाहर आने लगे। विचारों से कथाओं की कोंपले फूटती दिखाई देने लगीं। एक लड़की थाली को तकिया बना लेती हुई है। दूसरी ने उसको चादर औढ़ा दी है। एक उसे औझा को दिखाने ले जाती है। औझा झाड़ू से झाड़ फूँक करता है। एक और लड़की आकर उन्हे समझाती है और डॉक्टर के पास लेकर जाती है। इसी प्रकार और भी टोलियाँ आने लगीं। डॉक्टर उस सन्दूकची में दवाइयों को लेकर मरीज की जांच करता है। चीजों से विचार तथा विचारों से कथाओं की कोंपले फूटती दिखाई देने लगीं। शुज शफल की की गतिविधि जहां हमारा प्रस्थान बिन्दु था वहीं हमें लग रहा था कि बिना कोई बाह्य विचार लड़कियों पर थोपे महज़ चीजों के सहारे हम उसी मंज़िल तक सहज ही आ गए जहां पहुँचने के लिए लंबा सफर तय करना पड़ता है। यह अहसास होता है कि आमतौर पर हम जिन्हें जड़ वस्तुएँ मानते हैं, दरअसल वे ज़िंदगी की बुनावट साथ लिए रहती हैं। नाटक में अभिनेता का स्पर्श पाकर ये वस्तुएँ पुनर्नवा की तरह जीवंत हो उठती हैं। जितनी वस्तुएँ और व्यक्ति बढ़ेंगे वैचारिक सूत्र मूर्त से अमूर्त की बढ़ने  लगते हैं। जिंदगी उतने ही संस्लिष्ट रूप में नाटक की कथा के रूप में चल निकलती है अपने विराट रूप मे।
थोड़ी ही देर में पूरा समूह छोटी-छोटी टोलियों में ढलता दिखाई दिया। चूंकि चीजों का सेट एक था तो, पहले मैं, पहले मैं की अराजकता भी आई। एक बदलाव के तौर पर फिर एक मोड गतिविधि को दिया गया। सभी लड़कियों से कहा गया कि बाहर आँगन में जाएँ और जो चीज आपको दिखाई दे उसे लेकर आ जाएँ। चीजें इकट्ठी होने पर लड़कियों के  समूह बना दिये। सभी समूहों को अपनी लाई चीजों में से पाँच चीज़ें लेनी है व उनके साथ एक नाटक बना कर लाना है। 
समूह
वस्तुएँ
विचार
कथा का परिवेश
समूह 1.
कंघा, तेल, बाल्टी, मग, डंडा
पढ़ाई व दंड
हॉस्टल व स्कूल जीवन
समूह 2.
कॉलगेट, ब्रुश, फोन, किताब, नेल कटर
पढ़ाई  व दंड
स्कूल मे अफसर का दौरा
समूह 3
डंडा, बैग, गिलास, स्टूल, कॉपी
पढ़ाई, दंड, बाल विवाह 
स्कूल
समूह 4
घड़ी, किताब, रंग, दर्पण व पेंसिल बॉक्स
पढ़ाई
स्कूल
समूह 5
पत्ता, बोतल, झाड़ू, लकड़ी, सोना
जेंडर भेद, अंधविश्वास  
घर समाज
समूह 6
बैग, प्लेट, चाकू, कपड़े, साबुन
मोलभाव
सब्जी का ठेला




समूह 7
पत्ते, गिलास, फूल, दुपट्टा व झाड़ू
अंधविश्वास
अस्पताल व भोंपा
लगभग आधा घंटा काम करने के बाद बच्चे बड़े समूह मे लौट आए। सबने तैयारी के साथ अपनी प्रस्तुतियाँ दीं। यहाँ भी चीजें दोनों रूपों में इस्तेमाल  हुईं अपने वास्तविक रूढ रूप में तथा प्रतीकात्मक व काल्पनिक रूप में। परंतु बच्चों के चीजों के साथ काम करने का एक पैटर्न समझ मे आया कि भले ही चीजों के मामले में हर समूह के पास अलग-अलग चीजें थीं, कथानक व घटनाओं का वैविध्य भी स्वाभाविक रूप से अपेक्षित था लेकिन उनमें गूँथे हुए विचार लगभग समान ही थे। शायद बचपन में चीजों से पेश आने में बच्चों में ज्यादा महारत होती है। किसी भी वस्तु से वे मनचाहा करवा सकते हैं। शायद इसी लिए उन्होने विविधता पूर्ण चीजों के बावजूद अपनी ज़िंदगी के सबसे निकट के व तल्ख अनुभवों व विचारों को अभिवक्ती दी, जो उनके कॉमन से हैं।
इस गतिविधि में चीजों की मार्फत एक सौद्देश्य शैक्षणिक प्रक्रिया की और हम बढ़ चुके थे। छोटी नाट्य प्रक्रियाओं से घटनाओं, कहानियों से होते हुए बच्चों के मुद्दों तक पहुँच चुके थे जो उनके सबसे निकट के है। इन्हीं में से किसी एक पर आगे के दिनों और फोकस्ड होकर काम किया जाना है।
मिला कुंजी वाक्य उर्फ गुड्डी गायब है।  
 एक समूह की प्रस्तुति का दृश्य था कि कक्षा कक्ष में अध्यापिका बच्चों की हाजरी करती है। बच्चे “यस मैडम” बोलते हैं। अब टीचर गुड्डी का नाम पुकारती है। कोई आवाज नहीं आती। टीचर दुबारा नाम लेती है तो एक बच्ची बोलती है, “गुड्डी नहीं है।” टीचर पूछती है, “कहाँ है?” बच्चे कहते हैं – “गुड्डी गायब है!”  
रोलप्ले खत्म होने के बाद हमने “गुड्डी गायब है...” वाक्य को खोलना शुरू किया। हमने लड़कियों से कहा कि अभिनय में और ज्यादा सच्चाई लाने के लिए विवरणों में और गहराई लाना जरूरी हो जाता है। फर्ज़ करो कि गुड्डी स्कूल में नहीं है तो वह कहाँ हो सकती है। इसकी चर्चा में उन सभी ठिकानो को टटोला गया जहां एक स्कूल से ड्रॉप आउट के बाद लड़की के होने की संभावनाएं हो सकती हैं। चर्चा में यह पता ही नहीं चला कि कब यह वाक्य “गुड्डी गायब है” रोल प्ले के संदर्भ विशेष की गुड्डी से निकल, सामान्यीकृत होकर एक आम लड़की या महिला की स्थिति का रूपक बन कर सामने आ गया। चलो, जहां तक चले इस रूपक से ही आगे बढ़ा जाए...
एक सवाल किया गया, “और कहाँ कहाँ से गुड्डी गायब है ?
“अस्पताल से... बस से ... बस स्टैंड से .... शहर से .... गाँव से... गली ... से .... घर से .... ”
“बस, गयाग करने के तरीके अलग-अलग हैं।”
इन्हीं तरीकों में से एक-एक तरीके पर चर्चा करने व उस पर एक कहानी लिख लाने का होमवर्क तीनों कक्षाओं के मिश्रित समूह बनाकर दिया गया। आशय यह भी था कि एक तो होमवर्क के बहाने लड़कियां उन प्रक्रियाओं के बारे में मिल कर सोचेंगी जो लड़कियों को वंचित बनती हैं, दूसरे मौखिक अभिव्यक्ति पर आज काफी काम हो चुका था इसलिए थोड़ा ठहरकर लिखित अभिव्यक्ति भी उभर कर आ सकें।  
अगले दिन सुबह केजीबीवी में पहुँचते ही लड़कियों ने एक्टिविटी हाल में इकट्ठे होकर कहानियाँ सुनाईं।
एक कहानी में संयुक्त परिवार है जहां महिला को अब और लड़कियां न जनने की हिदायत मिल रही है।
एक कहानी, ऐसा लगता है इसी कहानी को आगे बढ़ाती है, जिसमे एक दंपत्ति डॉक्टर से गुजारिश करता है कि वह अल्ट्रासाउंड के नतीजों को जेंडर में अभिव्यक्त कर दे।
तीसरी कहानी भी पहली वाली का तीसरा एपिसोड लगती है, जिसमें कन्या भ्रूण समाप्ति की ओर है।
चौथी कहानी में खाने की थाली में संतुलन का गड़बड़झाला दिखता है। लड़के की थाली बनाम लड़की की थाली।
पाँचवी कहानी में लड़की की पढ़ाई छुड़ाई जा रही है।
छठी कहानी में एक छोटी लड़की का विवाह किया जा रहा है।  
सभी कहानियाँ पढ़कर समझ में आया कि इन सभी कहानियों में कहानियों का प्लाट तो है लेकिन अभी इनकी और फिलिंग होनी बाकी है।
मैंने कहा, “ये कहानियाँ अभी कुछ विवरणों को चाह रही हैं।” उदाहरण के लिए लड़कियों को निम्न वाक्यों पर ध्यान देने के लिए कहा –
महिला पर ससुराल वालों ने भ्रूण जांच करने का दबाव बनाया।”
घरवालों ने लड़की की पढ़ाई छुड़ा दी।”
उपरोक्त वाक्यों पर गौर करें तो यहाँ शब्दों के तीन युग्म हैं।  जैसे – (एक) महिला व लड़की (दो) ससुरालवालों, घरवालों और (तीन) दबाव बनाया तथा छुड़ा दी। लड़कियों से कहा कि पहले युग्म में कहानी के केंद्रीय पात्र हैं इनमे जान तो डालनी ही पड़ेगी। इसके लिए पहले इनका नामकरण करना होगा तभी पात्र का आगे के चरित्र उभरेगा। दूसरे युग्म की संज्ञा भी जातिवाचक है इन्हे व्यक्तिवाचक करने पर कहानी के निर्दोष पात्र बच सकते हैं। कहानियाँ तो आखिर इंसाफ करती हैं न। मुख़तसर में लड़कियों से कहा गया कि जो पात्र ओप्रेसर हैं उन नामों व रिश्तों कों भी संज्ञा दीजिए। तीसरे युग्म के बारे में तफसील इसलिए दी कि इसी से ही कहानियों में संवाद आ पाएंगे। लड़कियों से कहा गया कि आपने लिखा कि पढ़ाई छुड़ा दी। लेकिन यहा यह नहीं पता चल रहा कि किसने क्या कह कर या कर के पढ़ाई छुड़ा दी, या क्या कह कर दबाव बनाया ? यहाँ कुछ बातचीत की गुंजाइश है जिसे दिये बिना कहानी में सच्चाई नहीं आ पाएगी।   अब कुछ क्रिएटिव लड़कियों के ग्रुप ने एक घंटे का समय लिया और कहानियों को मरम्मत करके सोंप दिया।
सभी कहानियों में एक क्रम नज़र आता है। अगर गुड्डी भारतीय महिला का रूपक है तथा गुड्डी को सभी कहानियों का केंद्रीय पात्र मानें तो दरअसल ये सभी कहानियाँ एक ही कथा के विभिन्न सोपान है।
तटस्थता मतलब आइडिया ग्रुप
अब लड़कियों के समूह उनकी रुचि और सामर्थ्य के हिसाब से बनाने का समय था।
एक समूह अभिनेताओं का
दूसरा समूह संगीत का
तीसरा समूह मंच सज्जा के लिए डिज़ाइनर्स का
लड़कियों का एक ऐसा तटस्थ समूह था जिसने किसी भी समूह में जाने की रुचि नहीं दिखाई। एक बार तो मन में आया कि सबको बराबर संख्या में प्रत्येक समूह में धकेल दिया जाए। यह बहुत आसान है। कई बार इसे संभावित एक मात्र विकल्प के रूप में किया भी है। हमेशा शिक्षक का आसान विकल्प की और जाना नवाचार की सम्भावना को कुचलना भी होता है। अचानक मुझे ख्याल आया... मैंने कहा कि यह आइडिया समूह है। यह समूह हमारे साथ रहेगा... विशेष तौर पर अभिनेताओं के समूह के साथ। यह विचार रंग भी लाया। जब हम अभिनेताओं के साथ स्क्रिप्ट पे काम कर रहे थे तब इस तथाकथित तटस्थ समूह से आइडिया तो आए बल्कि अधिकतर ने अपनी तटस्थता को भंग करते हुए समय-समय पर आकार कहा कि क्या यह मैं ट्राई कर सकती हूँ? इस प्रकार आइडिया  समूह का आइडिया काम कर गया।
गहरे पानी पैठ
अभनेताओं वाले समूह के साथ स्क्रिप्ट पर काम आगे का कहानी पर काम करने के दौरान स्क्रिप्ट के संवाद लगभग लिखे जा चुके थे। उनके सम्पादन व संयोजन के साथ अभिनय पर काम समांतर रूप से चल रहा था। गुड्डी गायब है यह तथ्य हर लड़की के लिए कोई पहेली जैसा नहीं था। इस अभिधा को वे व्यंजना के रूप में प्रयोग करना सीख चुकी थीं। जब ऐसा था तो उन्हे पता था कि पूरे भारत मे 1000 पुरुषों की तुलना में कितनी गुड्डियाँ गायब हैं। मालूम करना था तो राजस्थान का लिंगानुपात। गूगल पर लिख कर एक बार एंटर मारने पर आ गया।
लेकिन लड़कियों के सवाल इससे आगे जाते हैं-
जोधपुरा का ?
लूनी का?
गाँव नंदवान का?
इसकी पड़ताल में जनगणना 2011 के दस्तावेज़ खंगाले गए। वहाँ जनसंख्या के आंकड़े तो हैं लेकिन लिंगानुपात तो निकालना सीखना होगा... टीचर्स और टीम के लिए चुनौती ... मदद लेना जारी... यहा फोन लगाओ... वहाँ फोन लगाओ ... भंवर जी से पूछो ... खुद भी हिसाब लगाओ ... गणित के नतीजे पर पहुँचना बहूत उत्साह वर्द्धक होता है। जनसंख्या के इन आंकड़ों ने नाटक के आखिरी दृश्य को एक अद्भुत गणितीय अभिव्यक्ति बना दिया।
नाटक के आखिरी दृश्य मे बाल विवाह के आखिरी संवाद "स्वाहा..." के पश्चात जब एक लड़की आकार बोलती है, "इस तरह एक और गुड्डी गायब हो गई..." तो यह सिलसिला चल पड़ता है।
"इसी तरह रोज हजारों लाखों गायब होती हैं..."
"अलग-अलग तरीकों से... "
“पूरे देश में...”
"आपके राज्य मे... "
"आपके शहर में ... "
"आपके गाँव में ... जी हाँ नंदवान में ... "
नंदवान की कुल जनसंख्या है .........5648  
"नंदवान में पुरुषों की संख्या है ........2893 "
"नंदवान में महिलाओं कि संख्या है ........2755  "
"सीधा सा गणित है कि आपके गाँव नंदवान में 138 गुड्डियाँ गायब है।"
"जी हाँ, 138 गुड्डियाँ गायब हैं आपके नंदवान में ..."
"कुछ सुना आपने?"
केजीबीवी के आँगन के बीच में खड़ी लड़कियां अपना सवाल चारों और से दर्शकों भरे बरामदों तथा छज्जों की और उछालती हैं। सबसे पहले वे सामने की खास चार कुर्सियों से मुखातिब हैं। इन चारों कुर्सियों पर चार खास महिलाएं बैठी हैं। दो पंचायतों की दो सरपंच, एक उप सरपंच,  एक पंचायत समिति सदस्य। तीन घूघट में हैं। जवाब शायद यहाँ है लेकिन पुरानी जमी हुई खामोशी दिखाई दे रही है। अब लड़कियां दायीं और की दर्शक दीर्घा से भी पूछती हैं, “कुछ सुना आपने?
यहाँ गाँव के प्रोढ़ पुरुष बैठे हैं। ये सामने की कुर्सियों की खामोशी की एक वजह भी हो सकते हैं। सवाल इधर की दीवार से भी टकराकर लौट आया। लड़कियों ने अब सवाल सामने के छज्जों पर बैठे नवयुवक व नवयुवतियों के समक्ष शटलकोक सरीखा उछाल दिया। यहाँ शायद प्रश्न के उत्तर हैं और प्रश्न के प्रतिप्रश्न भी। लेकिन सवालों से पेश आने का होंसला व अभ्यास नहीं। अब एक खुसर-पुसर शुरू हो गई। लड़कियों ने फिर पूछा, “कुछ सुना आपने.... कुछ कहना है आपको...?
कोरस – “नहीं कुछ नहीं सुना... ”
कोरस – “क्यो...?
कोरस – “क्योंकि जनता ऊंचा सुनती है।”  

(कृपया अपनी टिप्पणी अवश्य दें। यदि यह लेख आपको पसंद आया हो तो शेयर ज़रूर करें।  इससे इन्टरनेट पर हिन्दी को बढ़ावा मिलेगा तथा  मेरी नाट्यकला व  लेखन को प्रोत्साहन मिलेगा। ) 


दलीप वैरागी 
09928986983 

Monday, July 4, 2016

“ भूलेंगे तो तब न, जब हम उसे रटेंगे!”

पिछली 29 - 30 जून 2016 को अजमेर के कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालयों की कुछ लड़कियां उनके विद्यालयों में होने वाली प्रमुख गतिविधियों की शेयरिंग व डेमोंस्ट्रेशन के लिए जयपुर आयीं थीं। इन केजीबीवी में समाज के सबसे वंचित तबके की लड़कियां पढ़ती हैं। ये लड़कियां उन दूर दराज क्षेत्रों से आती हैं जहां विद्यालय पहुँच में न होने के कारण शिक्षा से वंचित हो जाती हैं। केजीबीवी तसवारिया की लड़कियों ने  इंद्रलोक ऑडिटोरियम पर एक नाटक भी प्रस्तुत किया जिसने खूब सराहना बटोरी। एक पत्रकार वार्ता में जब इन लड़कियों से नाटक के बारे मे सवाल पूछे गए तो उनमे एक सावल था, “आप इतने लंबे संवाद कैसे याद रख पाती हैं, आप भूल नहीं जाती?” हमें एक बारगी लगा कि शायद इस सवाल का जवाब किसी तथाकथित बड़े को उठकर देना होगा। लेकिन इस आशंका को निर्मूल करते हुए कक्षा 8 की लक्ष्मी ने फटाक  से आत्मविश्वास के साथ जवाब दिया, “ भूलेंगे तो तब न, जब हम उसे रटेंगे!”
लक्ष्मी के इस जवाब के आखिरी शब्द की प्रतिध्वनि सुनाई दे उससे पहले पूरा हाल आधा मिनट के लिए तालियों की गड़गड़ाहट में डूब गया।  तालियों की डोर को अपने हाथ में थाम लक्ष्मी ने अपनी बात जो अभी तक हवा में तैर रही थी उसे तर्क के पैरों पर टिकाते हुए और स्पष्ट किया, “हम संवादों को रटते नहीं... ये हमारे आस-पास से अपने आप आते हैं।” उसने खुद ही उदाहरण भी रखा, बिलकुल शुक्ल जी की सूत्र व्याख्यान शैली में। लक्ष्मी किसी आचार्य सरीखी अब दृष्टांत रखती है, “अब देखो जैसे मैं बहू का रोल करती हूँ तो मुझे उसके लिए कोई संवाद रटने नहीं पड़ते। इसके लिए मैं अपने गाँव की किसी बहू को देखती हूँ और उसके जैसा करने की सोचती हूँ...” यहाँ लक्ष्मी नाट्यशास्त्र के किसी बड़े सिद्धान्त का प्रतिपादन तो नहीं कर रही लेकिन लक्ष्मी के चेहरे पर  वे संभावनाएं व उम्मीद साफ नज़र आती हैं, जो नाटक से की जाती है। लक्ष्मी की अभिव्यक्ति का आत्मविश्वास इस मान्यता को बल देता है कि नाटक अपनी मूल परिकल्पना में ही सीखने का यंत्र है। लक्ष्मी यह साबित करती है कि नाट्य निर्माण की प्रक्रिया से गुजरा हुआ कोई भी व्यक्ति सोचे समझे हुए जवाब आत्मविश्वास के साथ दे सकता है।
लक्ष्मी के इस अनुभव के बहाने से मुझे भी अपने ऐसे ही मुद्दे पर लिखे पुराने ब्लॉग याद आ गए उनके लिंक नीचे दे रहा हूँ।



(कृपया अपनी टिप्पणी अवश्य दें। यदि यह लेख आपको पसंद आया हो तो शेयर ज़रूर करें।  इससे इन्टरनेट पर हिन्दी को बढ़ावा मिलेगा तथा  मेरी नाट्यकला व  लेखन को प्रोत्साहन मिलेगा। ) 


दलीप वैरागी 
09928986983 

Friday, September 18, 2015

कहानी कोई भी मोड़ ले सकती है

यह नाटक कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय तबीजी, अजमेर की लड़कियों के साथ नाट्य कार्यशाला के दौरान तैयार किया गया।
-      (मंच पर टोली आकार गाना शुरू करती है। दो गायक पहले गाते हैं बाकी समूह उन पंक्तियों को दोहराता है।)
गायक     : आइए करें तमाशा जी,
आइए करें तमाशा जी।
सुनिए अपनी भाषा जी,
सुनिए अपनी भाषा जी।
ओ रे ओ मेरे देश के वासी
ओ रे ओ मेरे गाँव के वासी
गाँव के वासी, शहर के वासी
घर के वासी गली वासी
कोरस     : आइए करें तमाशा जी ....
गायक    : चाचा आओ, चाची आओ,
काका – काकी आप भी आओ
चिंटू मोनू का साथ में लाओ,
गोलु को तुम गोद खिलाओ
खाते आओ, गाते आओ  
आइए मम्मी पापा जी .....
एक          : लो भाई आगे, अब बोलो
गायक 1,2  : ( उसे आदर से दर्शकों में बैठते है। )
आओ बैठो नाटक देखो
नाक के खोल के फाटक देखो
कोरस           : नहीं
गायक           : दांत के खोल के फाटक देखो
कोरस           : नहीं जी 
गायक           : आँख के खोल के फाटक देखो
कोरस           : अरे नहीं भाई
सब             : कान के खोल के फाटक देखो
                 आइए करें तमाशा जी ....
दो               : अरे भाई क्या है आपके नाटक में?
गायक          : इस नाटक में बड़े-बड़े हैं
पेड़ों जैसे अड़े खड़े हैं
रीत रिवाज गले सड़े है 
माल दबाए चोर खड़े हैं
तीर तमंचा तान खड़े है
तीन व चार    : ( दोनों गायकों के कनपटी पर पिस्टल तानने का अभिनय)
                 ठाँय – ठाँय
गायक           : कहीं नहीं होती सुनवाई
                 कितना ही चिल्ला लो भाई
                 ऐसा क्यों होता है भाई...
(कलाकारों की मंडली भाग कर मंच पर आती है।)
गायक           : अरे भाई कौन हो? क्यों घुसे चले आ रहे हो?
अभिनेता       : हो गया आपका तमाशा... अब अपना पेटी-बाजा उठाये और प्रस्थान कीजिए
गायक           : क्यों ?
अभिनेता       : अब हमारा रोल है।
(गाते हुए निकाल जाते हैं। )
                 आइए करें तमाशा जी ...
सूत्रधार         : नमस्कार ... हमारे नाटक में एक कहानी है...
पाँच            : डायरेक्टर साब आप भूल रहे हैं
सूत्रधार         : क्या ?
पाँच            : इस नाटक में एक नहीं दो कहानियाँ हैं।
सूत्रधार         : हाँ तो भाई ... मैं कह रहा था कि ... इस नाटक में एक नहीं दो कहानियाँ है...
कोरस           : बहुत खूब ... एक टिकट में दो फिल्में
छ:              : डायरेक्टर साब आप फिर भूल रहे हैं
सात            : अब क्या है भाई ...
सात            : इस नाटक में दो नहीं तीन कहानियाँ है।
कोरस           : क्या बात है...
सूत्रधार         : बिलकुल इस नाटक में दो नहीं तीन-तीन कहानियाँ हैं। 
आठ             : आप बिलकुल भुलक्कड़ हैं डायरेक्टर साब... इस नाटक में चार – चार कहानियाँ                  है।
एक             : ये नाटक तो कहानियों की किताब है...
कोरस           : जिसमें कहिनियाँ बेहिसाब हैं...
                 आइए करें तमाशा जी... (गाते हुए मंच का चक्कर लगते हैं)
एक             : यह कहानी सीता की है... 
दो               : जिसके कुछ सपने हैं ।
तीन             : यह कहानी गीता की है...
चार             : जिसके सपनों पर समाज का पहरा है।
पाँच            : यह कहानी अंजली की है...
छ:              :  जिसका दुख और भी गहरा है।
सात            :  यह कहानी रीना की है...
आठ             : जो सपनों को सच करना चाहती है।
कोरस           : ये कहानी हम सब की है....
                 आइए करें तमाशा जी ...
( अस्पताल का दृश्य सीता के पिता बेड पर लेटे हैं। दृश्य में सीता के चाचा, चाची व सीता हैं। )
चाची           : (सीता को दुलारते हुए) हाय मेरी प्यारी भतीजी... माँ तो पहले ही मर गई...                  अब पिता भी बहुत बीमार हैं। तुम चिंता मत करो... तुम मेरे पास रहना ... मैं                  तुझे अपनी बेटी की तरह रखूंगी।
(चाचा बाहर आता है। )
चाचा           : बेटी तू अपने पिता के पास बैठ जरा...
चाची           : अजी क्या हुआ ?
चाचा           : ज्यादा देर नहीं अब
चाची           : इतनी देर मत करो जमीन के कागज़ का काम पहले...
चाचा           : हो गया...
(अंदर से सीता के रोने की आवाज़ आती है। सब रोते हुए सीता के पापा के चारों और घेरा बनाते है। दृश्य बदलता है। )
गायक           : सीता की अब ये कहानी हुई
                 चाचा-चाची के मन में बेईमानी हुई...
                 फंस गई देखो उनके जाल में
                 सीता कि अब ये कहानी हुई ...
सूत्रधार         : लाइट... साउंड... कैमरा... सीन वन... टेक वन ... एक्शन
चाचा           : सीता मेरे कपड़े प्रेस हो गए?
सीता            : हाँ, ये रहे
चाचा           : ये क्या ! शर्ट जला दी...
चाची           : सीता बर्तन माँज दिए ...
सीता            : जी चाची ... ये रहे 
चाची           : ये बर्तन माँजे है? कितने गंदे हैं... (बर्तन फेंकती है। )
चाचा           : मेरे जूते पोलिश हो गए क्या
सीता            : जी, ये लो ॥
चाचा           : देखो कितने गंदे हैं ... ये पोलिश की है?
(थप्पड़ मार कर गिरा देता है।)
चाची           : इससे कुछ नहीं होता ... मैं कहती हूँ इसे घर से निकाल बाहर करो ...
(दोनों उसे खींच कर घर से बाहर निकाल देते हैं।)
सूत्रधार         : कट ... कट ...कट ... माफ कीजिएगा, हम इस कहानी को यहीं रोक रहे हैं।
कोरस           : क्यों ? क्यों भाई क्यों ??
सूत्रधार         : क्यों कि इससे आगे कहानी कोई भी मोड़ ले सकती है...
कोरस           : जैसे ?
सूत्रधार         : सीता के साथ अब कुछ भी हो सकता है।
एक             : सीता का अपहरण हो सकता है।
दो               : सीता किसी गिरोह के चंगुल में फंस सकती है।
तीन             : उससे भीख मँगवाई जा सकती है।
चार             : इसके लिए उसे अपाहिज बनाया जा सकता है।
पाँच            : उससे बाल मजदूरी कारवाई जा सकती है
छ:              : उसका बलात्कार किया जा सकता है।
सात            : उसे मारा जा सकता है।
कोरस           : उसके साथ कुछ भी हो सकता है...
सूत्रधार         : ऐसी सीता एक नहीं सैकड़ों हैं...
कोरस           : लाखों हैं...
सूत्रधार         : करोड़ों हैं...
कोरस           : हम सब के आस-पास हैं।
(कोरस धीरे- धीरे गाता है। )
कोरस           : सुनिए अपनी भाषा जी...
                 आइए करें तमाशा जी...
सूत्रधार         : लाइट... साउंड... कैमरा ... सीन टू , टेक वन ... एक्शन
(मंच के दोनों कोनों पर सामांतर दो दृश्य बनते हैं। एक में बच्चे खेल रहे हैं दूसरे में बड़े बात कर रहे हैं। )
बच्चे             : कोड़ा ए जमालशाही ... पीछे देखे मार खाई ...
बच्चा एक       : चलो गुड्डा-गुड्डी का खेल खेलते हैं।
बच्चा दो         : हाँ... हाँ... खेलते हैं ...
व्यक्ति एक      : और रामलाल जी क्या हाल है
व्यक्ति दो       : बहुत अच्छा... आप... आप कैसे हैं?
बच्चा तीन       : अरे तेरी गुड़िया तो बहुत सुंदर है...
बच्चा चार       : तेरा गुड्डा भी बहुत खूबसूरत है...
व्यक्ति एक      : तुम्हारी लड़की बहुत सुंदर है...
व्यक्ति दो       : आपका लड़का भी बहुत खूबसूरत है...
बच्चा तीन       : तुम्हारी गुड़िया क्या करती है?
बच्चा चार       : मेरी गुड़िया तो स्कूल जाती है। तुम्हारा गुड्डा क्या करता है?
बच्चा तीन       : मेरा गुड्डा भी स्कूल जाता है।
व्यक्ति एक      : आपकी लड़की क्या करती है?
व्यक्ति दो       : मेरी लड़की तो स्कूल जाती है... और आपका लड़का क्या करता है?
व्यक्ति एक      : मेरा गुड्डा भी स्कूल जाता है।
बच्चा तीन       : मुझे तुम्हारी गुड़िया पसंद आई
बच्चा चार       : मुझे भी आपका गुड्डा पसंद है।
व्यक्ति एक      : भाई मुझे आपकी लड़की पसंद है
व्यक्ति दो       : मुझे भी आपका लड़का पसंद है।
बच्चा तीन       : चलो गुड्डे – गुड्डी की शादी कर देते हैं
व्यक्ति एक      : भाई रिश्ता पक्का !
व्यक्ति दो       : समझो पक्का बिलकुल पक्का।
व्यक्ति तीन     : चलो मुँह मीठा करो।
(शहनाई व बाजे की आवाज के साथ कलाकार बच्चों के चारों और घूमते हैं। संगीत अब मंत्रोचार में बदल जाता है। कोरस बच्चों के चारों और घेरे में आ जाता है। )
सूत्रधार         : कट... कट... कट...  माफ कीजिएगा इस कहानी को हम यही रोक रहे हैं।
कोरस           : क्यों (कोरस का प्रत्येक व्यक्ति बारी-बारी से “क्यों” बोलते हुए पीछे अर्धवृत्त मे            खड़े हो जाते हैं। )
चार             :  सर, हमने मेहनत की है...
पाँच            : जम कर रिहर्सल की है...
कोरस           : आखिर क्यों रोक रहे हैं ?
सूत्रधार         : क्योंकि इससे आगे यह कहानी कोई भी मोड़ ले सकती है।
कोरस           : जैसे ?
सूत्रधार         : गीता के साथ अब कुछ भी हो सकता है...
एक             : उससे दहेज मांगा जा सकता है...  
दो               : दहेज के लिए पीटा जा सकता है...  
तीन             : घर से निकाला जा सकता है...
चार             : जलाया जा सकता है...
पाँच            : उसकी पढ़ाई छुड़वाई जा सकती है...
छ:              : वह कम उम्र में माँ बन सकती है...
सात            : इस वजह से उसकी मौत भी हो सकती है...
आठ             : वह बल विधवा बन सकती है...
नौ              : उसकी सारी जिंदगी तबाह हो सकती है...
कोरस           : उसके साथ कुछ भी हो सकता है...
सूत्रधार         : ऐसी गीता एक नहीं सैकड़ों हैं...
कोरस           : लाखों हैं...
सूत्रधार         : करोड़ों हैं...
कोरस           : हम सब के आस-पास हैं।
(कोरस धीरे- धीरे गाता है। )
कोरस           : सुनिए अपनी भाषा जी...
                 आइए करें तमाशा जी...
(मंच के दोनों छोर पर बारी बारी से सीन बनेंगे पहला सीन पूरा हो जाने पर फ्रीज़ हो जाएगा, दूसरी साइड में दूसरा बनेगा। )
सूत्रधार         :  लाइट... साउंड... कैमरा ... सीन थ्री, टेक वन ... एक्शन
(एक लड़की रास्ते से जा रही है। दो लड़के अपनी बाइक पर आते हैं और चारों ओर बाइक से चक्कर लगाकर उसे छेड़ते हैं। )
लड़का 1        : अरे यार क्या लड़की है।
लड़का 2        : आजा, चलती है क्या ...
लड़की          : बत्तमीज...
सूत्रधार         : कट... कट... कट... लाइट... साउंड... कैमरा... सीन थ्री... टेक टू... एक्शन...
(बस आती है। कंडक्टर आवाज़ लगा रहा है। बस पर लोग चढ़ते हैं। दो लड़कियां चढ़ती है। उनके पीछे दो लड़के भी चढ़ जाते है। )
लड़का 3        : अरे देख तेरे आगे वाली को
लड़का 4        : क्या बाल हैं इसके (हाथ पकड़ता है। लड़की वहाँ से हट जाती है। )
लड़का 3        : आगे वाली को भी देख ( लड़का 4 झटके से उसके ऊपर झुकता है।)
लड़की 2        : डोंट टच मी...
लड़का 4        : कसम से पूरी अंग्रेज़ है...
सूत्रधार         : कट... कट... कट... माफ करना, हम इस नाटक को...
कोरस           : हम यहीं समाप्त कर रहे हैं ...
सूत्रधार         : नहीं, हम इस नाटक को समाप्त नहीं करेंगे...
कोरस           : तो फिर कौन करेगा?
सूत्रधार         : (सामने दर्शकों से ) आप करेंगे...
सूत्रधार         : (किसी दर्शक विशेष को टार्गेट करते हुए) जी हाँ, आप करेंगे... क्यों करेंगे न...            आइए जी ... अब मंच आपके हवाले है। इस दृश्य को यही खत्म करना चाहें तो                  यहीं खत्म करें। आगे बढ़ाना चाहें तो आगे बढ़ाएँ। सुखांत बनाना चाहें सुखांत                    बनाएँ... दुखांत बनाना चाहें तो दुखांत बनाएँ... आइए .... ( इसी प्रकार दो तीन           दर्शकों को मंच पर फ्रीज़ हुए सीन को परिवर्तित करने को कहें। कोशिश यह हो कि         मुद्दे पर जम कर चर्चा भी हो सके। )


(कृपया अपनी टिप्पणी अवश्य दें। यदि यह लेख आपको पसंद आया हो तो शेयर ज़रूर करें।  इससे इन्टरनेट पर हिन्दी को बढ़ावा मिलेगा तथा  मेरी नाट्यकला व  लेखन को प्रोत्साहन मिलेगा। ) 

दलीप वैरागी 
09928986983 




 
  


अलवर में 'पार्क' का मंचन : समानुभूति के स्तर पर दर्शकों को छूता एक नाट्यनुभाव

  रविवार, 13 अगस्त 2023 को हरुमल तोलानी ऑडीटोरियम, अलवर में मानव कौल लिखित तथा युवा रंगकर्मी हितेश जैमन द्वारा निर्देशित नाटक ‘पार्क’ का मंच...