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Friday, May 8, 2015

सूचना का अधिकार : क्या कोई और रास्ता भी है ?

यह अर्जी इग्नू में लगाने से पहले मैं इसे ब्लॉग पर इस लिए डाल रहा हूँ, ताकि जो लोग इस कानून के विरोध में है वे मुझे सुझाएँ कि क्या कोई और रास्ता भी है। जो लोग इस कानून में विश्वास रखते है में मार्गदर्शन करें कि इस अर्जी को और धारदार कैसे बनाया जा सकता है।


सेवा में,
पब्लिक इन्फोर्मेशन ऑफिसर,
स्कूल ऑफ परफोरमिंग आर्ट्स,
इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय (IGNOU)
नई दिल्ली।
विषय : सूचना का अधिकार अधिनियम – 2005 के तहत सूचनाएँ लेने हेतु।

महोदय,
विनम्र निवेदन है कि इग्नू से जो सूचनाएँ मुझे चाहिए उनका जिक्र करने से पहले मुझे उसकी भूमिका के रूप में कुछ कहना है।

आरटीआई की अर्जी की जरूरत क्यों पड़ी
महोदय, जो सूचना मुझे चाहिए वे किसी भी इंसान के लिए सहज सुलभ होनी चाहिए। लेकिन मैं पिछले दो महीने से  उन्हें प्रोपर  चैनल से प्राप्त करने की कोशिश कर रहा हूँ। बात दरअसल यह है कि मैंने विश्वविद्यालय की वेब साइट से पता किया कि यहाँ से  प्रदर्शनपरक कला में सर्टिफिकेट-नाट्य कला (सीपीएटीएचए) करवाया जाता है। जब मैंने इस कोर्स के लिए रीजनल केंद्र, जयपुर से संपर्क किया तो उन्होंने बताया कि इस कोर्स के अध्ययन की सुविधा यहाँ नहीं है, इसलिए आप विश्वविद्यालय के दिल्ली कार्यालय में संपर्क करें। तब, मैंने वेब साइट पर दिये नंबरों पर बारी-बारी से फोन मिलाया मुझे कोई मदद नहीं मिली। फोन लाइनों का रेस्पोंस निम्न प्रकार आया –
·     अधिकतर बार तो फोन कनेक्ट ही नहीं हुआ।  
·     कुछ नंबरों पर, “यह नंबर स्थायी रूप से सेवा में नहीं” की ध्वनि आई।
·     यदि दो चार बार कनेक्ट हुआ तो लंबी घंटी के बाद अपने आप कट गया यानि किसी ने उठाया नहीं।  
·     किस्मत से एक बार किसी ने फोन उठाया पर यहाँ भी बदकिस्मती देखो, उधर से आवाज़ आई, “आपका फोन पुस्तकालय में लग गया है, मैं आपको सही नंबर देता हूँ।” सही नंबर पर फोन लगाया तो किसी ने चोंगा ही नहीं उठाया।
हो सकता है यह यंत्रणा मेरे अकेले की ही न हो। अब आप ही बताइये आप एक दूरस्थ शिक्षा माध्यम वाले विश्वविद्यालय हैं। देश-दुनिया में हजारों मील दूर बैठा व्यक्ति कैसे आप से संवाद कायम कर पाएगा? वेब साइट पर सूचना पूरी नहीं है और फोन से डायलॉग हो नहीं पा रहा है। यह एक दूरस्थ शिक्षा वाले विश्वविद्यालय के लिए बहुत ही सोचनीय बात है।  यह तब और भी विचारणीय हो जाती है जब विश्वविद्यालय की आत्मछ्वि वैश्विक स्तर की हो।
महोदय, मेरी मजबूरी है कि फ़ोन पर बात हो नहीं रही है और दिल्ली आने की मेरे पास अभी फुर्सत व सामर्थ्य नहीं है। इसलिए आरटीआई के अलावा कोई विकल्प नहीं। अत:

सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 के तहत निम्नलिखित सूचनाएँ प्रदान करें

  •      प्रदर्शनपरक कला में सर्टिफिकेट-नाट्य कला (सीपीएटीएचए)  का कोर्स क्या आपके विश्वविद्यालय से करवाया जाता है? यदि कभी-कभी नहीं करवाया जाता है तो उसका तर्कसंगत आधार क्या है?

  •  क्या अलवर या जयपुर, राजस्थान का निवासी, जिसकी थियेटर में रूचि है व रंगमंच से जुड़ा हुआ है, तथा आपकी वेब साइट पर इस कोर्स के लिए अपेक्षित सभी योग्यताओं को पूरा करता है, क्या वह इस कोर्स में प्रवेश पा सकता है ? यदि हाँ तो क्यों, नहीं तो क्यों?
  •   कृपया इस कोर्स की प्रवेश प्रक्रिया बताएं तथा अध्ययन के क्या चरण होंगे? 
  •    रीज़नल सेंटर पर यह कोर्स अनुपलब्ध है और आपकी वेब साइट पर यह उपलब्ध है। इस अद्भुत विरोधाभास का दस्तावेजी प्रमाण दें। यदि यह कोर्स राजस्थान के लिए उपलब्ध नहीं तो देश के किस कोने के खुशकिस्मत लोगों के लिए आपने यह सुविधा उपलब्ध करवा रखी है। यदि इसका जवाब दिल्ली है तो फिर क्यों न इसकी दूरस्थ शिक्षा की अवधारणा पर शक किया जाए? कृपया तर्कसंगत जवाब दस्तावेजी प्रमाणों के आधार पर दें।
  •    कम से कम कितने विद्यार्थी  होने पर आप एक कोर्स उस सत्र में करवाते है। आपको कैसे पता चलता है कि अमुक संख्या में विद्यार्थी उपलब्ध है? कोई नियम हो तो उसका प्रमाण दें।  
  •   आपकी फ़ोन लाइनों पर लोगों के फ़ोन को सुनना सुनिश्चित करने के लिए क्या कोई पॉलिसी या नियम बना हुआ है।
  •   क्या इस तरह का निरीक्षण किया जाता है कि फोन सुनने वाले अपने  उत्तरदायित्व का निर्वाह कर रहे हैं? कृपया दस्तावेजी प्रमाण दें।
  •   क्या रेस्पोंडेड व अनरेस्पोंडेड कॉल का ब्योरा रखा जाता है?

महोदय, मैं ये सभी सूचनाएँ सद्भावना पूर्वक मांग रहा हूँ, इस उम्मीद के साथ कि उपरोक्त संदर्भित कोर्स के प्रति पात्रता के बारे में जान सकूँ तथा इग्नू के सूचना सिस्टम के प्रति मेरे मन में जो विभ्रम पैदा हुआ है उसकी सफाई कर सकूँ।
धन्यवाद सहित
दलीप वैरागी



Saturday, May 18, 2013

मेरी डायरी का एक पन्ना : योगी चौराहे

मैं कल अपने पाँच साल के बेटे काव्य को टीका लगवाने के लिए डॉक्टर के यहाँ जा रहा था। हम दोनों बाइक पे थे। आदतन वह पूरे रास्ते सवाल पूछता रहता है। आज वह सवाल नहीं पूछ रहा था। क्योंकि जाने कैसे उसे यह भान हो गया था कि जो रास्ता हमने चुना है वह डॉक्टर की तरफ जाता है। डॉक्टर के यहा जाने का मतलब उसके लिए टीका लगना ही होता है। इसलिए वह अपनी सहज जिज्ञासाओं को दबा या स्थगित कर के उन युक्तियों को सोच रहा था और एक-एक करके आजमा भी रहा था, जिससे डॉक्टर से छुटकारा मिल जाए। हम भी बाप ठहरे और लगातार आश्वासन दिए जा रहे थे कि आपको टीका तो बिलकुल नहीं लगेगा। हमने अपनी मुश्किल डॉक्टर पे डाल दी।
खैर, डॉक्टर के गए, टीका भी लगा, रोना – चिल्लाना, प्यारना – पुचकारना भी हुआ। बहरहाल हम वापस लौट रहे थे। चौराहे की बत्ती जो दूर से उल्टी गिनती गिनते हुए दिखाई दे रही थी, 3... 2... 1... तक पहुँचते - पहुँचते लाल हुई। हमने ब्रेक दबाए और रुक गए। बत्ती का दुबारा से हरे होने का इंतज़ार करने लगे, फिर से एक उल्टी गिनती के साथ। दूसरी तरफ के यतायात का हाल कुछ ऐसा था - मानो किसी ने सांस को प्राणायाम की तरह प्रयास से रोक रखा था और अगर अब न भी छोड़ते तो अपने आप छूट जाता। लगभग कपालभांति की तरह झटके से चौराहे ने ट्राफिक को फूँक दिया। कई बार ये चौराहे मुझे किसी योगी की तरह लगते हैं जो एक नाक से सांस को भर कर रोक रहे हैं और दूसरी तरफ से छोड़ रहे हैं। लेकिन लाख प्रयास से योग साधता नहीं।
टीके से उपजी नाराजगी की वजह से बाप बेटे में अभी तक अस्थाई रूप से बातचीत बंद थी। आखिर जिज्ञासा ने अबोले को तोड़ा और उसने सवाल किया, “पापा, हम यहाँ रुक क्यो गए हैं?”
इस सावल ने अब पिता के अंदर एक शिक्षक को जागा दिया। और शिक्षक ने मौका ताड़ लिया ट्राफिक रूल सिखाने का। मैंने कहा, “जब सिग्नल लाल होता है तो हम रुक जाते हैं”
“हम क्यों रुक जाते हैं?”
“ताकि दूसरी तरफ के लोग आसानी से निकाल सकें।”
“अब हम कब चलेंगे?”
“जब सिग्नल ग्रीन होगा तब...”
“ग्रीन कब होगा?”
“जब बैकवर्ड काउंटिंग खत्म होगी।”
मेरी ज्ञान - गीता चल रही थी। उल्टी घड़ी ने लगभग आधा ही फासला तय किया होगा। पीछे से एक फर्राटा बाइक आकर थोड़ी धीमी हुई। हॉर्न से पार निकल जाने के इरादे साफ जाहिर किए। हॉर्न की आवृति और उतार चढ़ाव की तत्परता में देश की तरक्की के ग्राफ के साथ आगे बढ़ जाने के इरादे साफ दिखाई दे रहे थे। आगे आकार बाइक पर आरूढ़ नौजवान ने दाएँ देखा यह इतमीनान करने के लिए कि कोई पुलिस वाला तो नहीं खड़ा है। दायीं ओर से तसल्ली हो गई कि इधर तरक्की में रुकावट नहीं खड़ी है। फिर बायीं ओर देखना जरूरी था, तरक्की में बाधाएँ दूसरी तरफ भी हो सकती हैं। बाईं और एक स्कूटी खड़ी थी और स्कूटी पर दो लड़कियां। बाइक सवार ने विकास के पहले मॉडल में तुरंत अपना अविश्वास सा प्रकट करते हुए अपनी बाइक को एक तरफ विराम दिया। देश की तरक्की की नई परिभाषा गढ़ी। इंजन को बंद करके नियम पालन में आस्था प्रकट की और अपनी बाइक के मिरर को स्कूटी पर फोकस करके संवैधानिक तौर तरीकों को अपनाना उचित समझा।
तरक्कीपसंदों की कमी कहीं भी नहीं होती है। पीछे से ‘धूम’ टाइप की दो – चार फटफटिया और आईं, आते ही सर्र से निकल गईं। निकलते ही लोगों को जागा गई कि कुछ भी हो तरक्की की असली पहचान जल्दी से आगे निकल जाना ही है। बाकी के वाहनों ने भी तरक्की के इसी मॉडल में ही अपनी बेहतरी समझी, उनमें जुंबिश हुई। काफिला आगे निकाल पड़ा। लाल बत्ती अभी भी सांस थामे हुए खड़ी थी। तभी बेटे सवाल किया –
“अभी तो ग्रीन लाइट भी नहीं हुई फिर सब क्यूँ जा रहे हैं।”
मेरे ज्ञान की गठरी में छेड़ हो चुका था। चौराहे पे जो मैंने पाठशाला खड़ी की थी वह ताश के पत्तों की मानिंद ढह गई थी। मेरे भीतर का अध्यापक छुट्टी ले चुका था। पिता का अक्स फिर उभर आया था। वाहनों के समुंदर का हिस्सा बनना ही बुद्धिमानी समझ पिता आगे बढ़ा। बेटा इस बार लगभग चिल्ला के बोला-
“हम आगे क्यूँ जा रहे है, सिग्नल अभी ग्रीन नहीं हुआ है?”
कुछ कहने सुनने को बाकी नहीं था। कहता भी क्या, कोई भी शब्द अब असरदार नहीं लग रहा था, वजनदार नहीं लग रहा था। जो मैंने सिखाना चाहा वह तो मालूम नहीं लेकिन इतना तो जरूर है कि कुछ न कुछ सीखना तो जरूर हुआ है। क्योंकि हर घटना से बच्चे कोई सीख तो गढ़ ही लेते हैं। वह क्या है – नियम पालन के लिए नागरिकता का कोरा किताबी पाठ, तेज़ रफ्तार का पागलपन, एक पिता की कथनी और करनी का दोहरापन? या कुछ और ?
इन ट्राफिक सिगनल्स पर यूं तो मिनट आधा-एक मिनट का विराम होता है लेकिन इन वकफ़ों में ही बहुत से मासूमों के मन में बहुत सारी अवधारणाएँ बनती मिटती हैं। और कुछ पत्थर पे स्थायी इबारत की तरह भी लिख जाती हैं।
(कृपया अपनी टिप्पणी अवश्य दें। यदि यह लेख आपको पसंद आया हो तो शेयर ज़रूर करें।  इससे इन्टरनेट पर हिन्दी को बढ़ावा मिलेगा तथा  मेरे लेखन  को प्रोत्साहन मिलेगा। ) 

दलीप वैरागी 
09928986983 

Saturday, November 19, 2011

सुचना का अधिकार अधिनियम (Right to information act) : कानून में दम है

यह घटना सूचना का अधिकार कानून कि ताकत की सक्सेस स्टोरी  है | इस ताकत को हमने आजमाया है |इसकी सिर्फ जानकारी होना ही काफी नहीं है बल्कि इसको आजमा कर देखना चाहिए | अगर देश का हर जागरूक इंसान ऐसे अपनी मुश्किलों में इस कानून का इस्तेमाल करेगा तो भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए किसी लोक पाल बिल  की जरूरत नहीं |
 
बात पिछले दो साल की है | दिन व तारीख तो याद नहीं, हाँ इतना पता है कि उस दिन सूर्य ग्रहण पड़ा था |  ग्रहण खग्रास नहीं खण्ड ग्रास था | ऐसा नहीं कि ग्रहण होने की वजह जयपुर थम गया हो लेकिन फिर भी ऐसे बहुत से लोग रहे होंगे जो उस वक्त घर से नहीं निकले होंगे | दो तीन तो हमारे ऑफिस में ही थे जिन्होंने खुले में जाने से परहेज किया | बावजूद इसके मैं और मेरा दोस्त जो कि मेरा सहकर्मी भी है ने इन दो घंटों का इस्तेमाल एक महत्वपूर्ण काम को करने में किया | काम दरअसल यह था कि मेरे दोस्त भँवर ने बताया कि उन्होंने LIC (जीवन बीमा) की एक पॉलिसी विड्रो करवाई थी, तीन - चार महीने पहले | लेकिन भुगतान का चैक जो कि एक सप्ताह में उनके पास पहुंचना चाहिए था वह अभी तक उनके पास नहीं पहुंचा था | इसके लिए भँवर जी उनके ऑफिस में कई चक्कर लगा चुके थे | कई बार फोन भी किया | कभी काम से सम्बन्धित जिम्मेदार व्यक्ति सीट पर नहीं होता तो कभी मिल जाता तो प्रकिया  में है कह कर टरका देता | ग्रहण वाले दिन हमने योजना बनाई कि क्यों न हम (RTI)   सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत अर्जी लगाकर पता तो करे कि मामला कहाँ अटका हुआ है ? भंवर  जी ने कहा कि यह ठीक बात है “हम दूसरों को तो सूचना का अधिकार के लिए जाग्रत करते हैं,  आज खुद के लिए भी कर के देखें | तुरंत हमने एक अर्जी सूचना अधिकारी , जीवन बीमा कार्यालय जयपुर के नाम लिखी | याद रखें सूचना अधिकारी नाम का प्राणी हर कार्यालय में होता है | और कार्यालय की किसी दीवार पर उसका नाम भी चस्पा होना चाहिए | तो हमने लिखा कि हमें सूचना का अधिकार अधिनियम  २००५ तहत निम्न लिखित  जानकारियां चाहिए -
  1. मेरे काम में हो रहे विलम्ब का यथोचित कारण बताएँ |
  2. मेरे काम की अब तक की प्रगति की स्थिति बताएँ | तथा
  3. मेरे काम के लिए कौन-कौन व्यक्ति जिम्मेदार  हैं | उनके नाम बताएँ ताकि प्रमाद पाए जाने पर जरूरी कानूनी कार्यवाही उनके खिलाफ की जा सके |
अर्जी लिखने तक सूर्य ग्रहण कि गिरफ्त में आ चूका था | और हम  तय  कर चुके थे कि आज हम और सूर्य एक साथ ग्रहण से निकलेंगे | सूर्य चन्द्रमा की छाया से और हम भ्रष्टाचार की गिरफ्त से | हम सीधे LIC ऑफिस पहुंचे | सेकंड फ्लोर पर बड़ा सा हॉल,  हॉल में कुर्सियां ही कुर्सियां … कुर्सियों के आगे मेजें ही मेजें …  मेजों पर फाइलों के ढेर … कुछ कुर्सियों पर बाबू लोग आसीन, कुछ पर टंगे कोट… इसके अलावा भी बहुत साजो सामान | 
जैसा हम सोच रहे थे वैसा यहाँ कुछ भी नहीं था | यहाँ किसी भी कोने पर सूचना अधिकारी का नाम नहीं लिखा था |  क्या करें, किससे पूछें ?  इसी उहापोह में एक टेबल पर फाइलों से झांकते हुए हमने एक बड़े ऑफिस कर्मी से पूछ लिया “ यहाँ का सूचना अधिकारी कौन है ?”  इस एक वाक्य ने जैसे वहाँ रुके हुए पानी में पत्थर मार दिया हो | अभी तक जो सभी जो एक दूसरे से असम्प्रक्त से  अपनी गतिविधियों में मस्त थे | कही बातचीत भी तो ‘वोटिंग फॉर गोडो’ के पात्रों की तरह उकताहट मिटाने  की विवशता युक्त प्रयास –सी | इस एक वाक्य ने सब को जोड़ कर रख दिया | सबकी नज़रें हम पर केंद्रित हो गईं | ऐसे सवाल से सामना करने की उम्मीद किसी को नहीं थी | हमने फिर अपना सवाल दोहराया | वह चुप , चुप्पी कुछ सघन हो गयी थी क्योंकि उसकी चुप्पी में अब सभी  चुप्पियाँ शामिल हो गयीं थीं और मानो उन सब चुप्पियों ने एक बड़े  सन्नाटे का निर्माण कर दिया हो | वह सन्नाटा जैसे हमसे ही सवाल कर रहा था -  वाह ! भला यह भी कोई बात है ? ऐसा  भी कहीं होता है  ? अरे भाई कानून है तो क्या लेकिन काम तो काम के तरीके से ही होता है ! सन्नाटे कागुब्बारा जल्दी ही फूट गया | उसे हमने ही फोड़ा यह कह कर “ हमें सूचना अधिकारी का नाम बताइए हमें अर्जी लगानी है और आपने यहाँ उसका नाम भी नहीं लिख रखा जो कि यहाँ होना चाहिए |” इतने में ही भंवर जी ने अर्जी टेबल पर दे मारी | मगर मजाल है किसी ने उसे छुआ, अर्जी नहीं जैसे वर्जित फल हो !  इतने में ही पीछे से आवाज़ आयी आपको मैनेजर साब ने बुलाया है | हम मैनेजर के केबिन में चले गए | हमारा प्रयोजन पहले ही प्रेषित था,  भूमिका पहले ही बन गई थी | इसलिए बिना भूमिका के हमने अर्जी सरकाई | साहब ने पढ़ी , साहब की घंटी घनघनाई , तुरंत एक महिला कर्मचरी आई … साहब बोले , “ इन सर का काम क्यों नहीं हुआ ?”
कर्मचारी बोलीं , “ सर …सर.. इनका…वो ….जो …जो छुट्टी पर …
मैनेजर बोला , “ वो छुट्टी पर है तो क्या काम नहीं होगा … जाओ फोरन इनका चेक बना कर लाओ|  "
अगले १० मिनट में चैक भँवर जी के हाथ में था |
मैनेजर बोले, “ कोई और काम हो तो जरूर बताएँ |”
हम बोले, “ अभी तो काम यही है कि आप इस अर्जी को विधवत लगाओ |”
मैनेजर - अब तो रहने दो आपका काम तो हो गया |
हम - पता तो चले कि चूक कहाँ है ?
सारांश यह है कि मैनेजर ने कहा कि आप जिसकी गलती है माफ़ कर दीजिए .. नौकरी … बाल बच्चों का सवाल …
हम  चलने  लगे तो मैनेजर ने कहा कि आप यह अर्जी मुझे देते जाओ ताकि मैं अपने स्टाफ को दिखा सकूँ कि अब पुराने वाला तरीका नहीं चलेगा |
जब हम वहाँ से निकले तो ग्रहण हट चूका था सूर्य का भी और भ्रष्टाचार का भी | लेकिन ग्रहण तो आते रहते हैं | लेकिन जज्बा सूरज वाला होना चाहिए जो हर बड़े ग्रहण के बाद निकल के आता है नयी रौशनी के साथ |
(मेरे दूसरे  ब्लॉग बतकही से)













Tuesday, June 14, 2011

कितना मुश्किल है रोजमर्रा की ज़िन्दगी में कानून का पालन कर पाना …


(1) Polythene पर रोक के संदर्भ में
अभी पाँच - छह महीने पहले राजस्थान सरकार ने एक बहुत ही महत्वपूर्ण निर्णय किया जिसके तहत पूरे प्रदेश में पोलीथिन के इस्तेमाल पर रोक लगा दी | आम आदमी ने इस निर्णय का स्वागत किया कि अब शायद पारिस्थितिकी संतुलन में कुछ मदद मिलेगी | पोलीथिन हर तरह से पर्यावरण को दूषित कर रहा था | कानून लागू होने के अगले दिन इसका असर भी दिखाई दिया | जो लोग बजाए जाते वक्त घर से थैला लेकर नहीं गए थे उनकी तस्वीरें अखबार में छपी थीं कोई झोली में सब्ज़ी ला रहा था तो कोई अपने हैलमेट में ही डाल कर ला रहा था | सरकारी अमले ने चार-छह व्यापारिक प्रतिष्ठानों पर छापे मार कर कार्यवाही की | लगने लगा कि अब धरती पर स्वर्ग आने ही वाला है | दूकानदारों ने पन्नियाँ काउंटरों से हटा कर छुपा दीं और पन्द्रह-बीस दर्जन कागज के लिफ़ाफे रख लिए शायद यह सोच कर कि देर सवेर कानून की हवा तो निकलनी ही है  |  बात सच भी निकली अगले ही दिन से इसकी नाफरमानी शुरू हो गई | 
इन दिनों जो विचित्र बात हुई वह यह कि मेरे अपने परम्परागत दूकानदार से रिश्ते बदलने लगे | वही दुकानदार जो मुझे सड़क पर देख कर ही आवाज लगा लेता था अब देख कर उपेक्षा से मुह फेर लेता है | बात दरअसल यूँ है कि  सरकारी आदेश के अगले दिन ही जब मैं घर से महीने भर के राशन की लिस्ट लेकर दूकान पर पहुंचा तो देखा कि दूकानदार धड़ल्ले से polythene की थैलियों में सामान बांध कर दे रहा था | मेरे दूकान पर पहुँचते ही ग्राहकों से कहने लगा “ आप लोग घर से थैला लेकर आया करो आगे से थैली बंद हो गयी हैं |” फिर मुझे देखकर बोला “भाई साहब क्या करें पुराना स्टॉक तो खत्म करना पड़ेगा |”  मेरी लिस्ट लेकर सामान लिकालने लगा | मैंने कहा कि मैं तो पॉली बैग में सामान नहीं लूँगा | मेरी बात सुन वह अजीब स्थिति में आ गया | महत्वपूर्ण ग्राहक छोड़ना भी नहीं है लेकिन सामान किसमें दे | मेहनत से खोज कर दर्जन भर लिफाए निकले | मुश्किल पहले तो पांच किलो चीनी एक थैली में ही डल जाती थी अब वही दस लिफाफों में आई | कुछ सामान लिफाफों में भरा तो अधिकतर अखबारी पुड़ियों में लपेटा और सारे सामान को एक बोरे के सपुर्द किया | बिल थमाते वक्त दूकानदार के चेहरे पर एक रहस्यमई मुस्कान थी जो शायद कह रही थी कि आप हमारे लिए सबसे मुश्किल ग्राहक हो | खैर, दुकानों पर पॉलीबैग कभी नहीं रुके | अगले महीने जब मैं सामान लेने गया तो मैं भी मैं ही था, बनिया भी वही था लेकिन हमारे रिश्ते बदल चुके थे | वही जो सड़क पर से आवाज लगा देता था अब उसने मुझे कोई तवज्जो नहीं दी | दुकान पर खड़ी ग्राहकों की भीड़ को निपटता रहा | मैं अपनी बारी आने का इंतजार करता रहा | उसकी उपेक्षा से मुझे लग रहा था जैसे वो कह रहा हो ‘  सामान लेना है तो ऐसे ही लो ज्यादा नखरे हैं तो बिग बाज़ार या सुपर मार्केट जाओ |’ आज मैं बनिये की दूकान पर खड़ा सबसे अयाचित और अवांछित ग्राहक होता हूँ |
जैसा लग रहा था कि स्वर्ग आ जायेगा ऐसा कुछ भी नहीं हुआ पूरे जयपुर शहरभर में पॉलीबैग धड़ल्ले  से चल रहे हैं सब्जी बाजार में , थानों के इर्द गिर्द , अस्पतालों, स्कूलों, बस स्टैंड सब जगह | दूकानदार भी दे रहे है और ग्राहक भी ले रहे हैं और सरकारी अमला भी देख रहा है | किसी पर भी कोई कार्यवाही नहीं है | अख़बारों में भी कोई खबर नहीं है | इसे लागू करवाने की सरकार की कोई इच्छा शक्ति दिखाई नहीं दे रही है | उत्साही लोगों को सूचना के अधिकार के तहत अर्जी लगा कर पता करना चाहिए कि अब तक कितने दुकानदारों व ग्राहकों पर कार्यवाही हुई है | प्रशासन की गंभीरता का पता उसी से चल सकता है
(2) चौराहे का सिग्नल और मैं
रोज़ ऑफिस आने के लिए रास्ते में मुझे दो ट्रैफिक सिग्नल पार करने होते हैं | दोनों ही सिग्नल ऐसे हैं जहाँ सुबह के वक्त कोई ट्रैफिक पुलिस का सिपाही खड़ा नहीं होता है | लेकिन सिग्नल अपना काम अच्छे से करता है | सुबह ९-१० बजे के लगभग ट्रैफिक खूब होता है |  मैं जिन सिग्नल की बात कर रहा हूँ उसके बारे में दरअसल मेरी मुश्किल यह है कि जब लाल बत्ती होती है तो मैं रुक जाता हूँ और  उसका हरा होने तक इन्तेजार करता हूँ | अधिकतर लोग फर्राटे से मेरी बगल से निकल जाते हैं | कभी-कभी इक्का-दुक्का और होते है जो लाल बत्ती देख कर रुक जाते हैं | सामान्यतः मैं अकेला ही होता हूँ | मैं जब आगे खड़ा होता हूँ तो पीछे वाले वाहनों के होर्न कान फोड़ देते है |  और बगल से निकलते वक़्त पलटकर मुझे देखते हैं उनके देखने से ऐसा ध्वनित होता है जैसे कह रहे हों ‘ अज़ीब प्राणी है ! भला खाली सिग्नल पर भी कोई खड़ा होता है ?”  मुझे ऐसा लगता है कि लोग समझ रहे हों कि मैं इस महानगर का वाशिंदा ना होकर किसी अर्धविकसित सभ्यता का व्यक्ति होऊं | चलो अपने लिए यह उपमान भी बर्दाश्त किया जा सकता है लेकिन मुझे सबसे बड़ा खतरा यह लगता है कि कहीं ऐसा ना हों कि मैं इस देश के कानून की पालनार्थ रेड सिग्नल पर रुका होऊं और कोई तेज रफ़्तार वाहन पीछे से ….. आप ही बताओ कि मेरे जैसा व्यक्ति जिसकी आस्था कानून में है ऐसी स्थिति में क्या करे ? इन छोटी - छोटी बातों से कई सवाल उठते है | क्या नियमों का पालन करने के लिए हमेशा डंडे की जरूरत है | क्या हर सिग्नल पर सिपाही खड़ा करना लाजमी है  तकनीक का इस्तेमाल तो इसलिए किया गया था कि कम मानव संसाधन लगाना पड़े | लेकिन इस तरह तो यह और खर्चीला हों जायेगा | क्या आज आम आदमी का राष्ट्रीय चरित्र ऐसा हों गया है कि उसे अब रोजमर्रा कि जिंदगी में कानून तोड़ने में कोई झिझक नहीं होती है |  जब आम इंसान कि स्थिति ऐसी है तो फिर भ्रष्ट नेता और अफ़सर की क्या कहें | प्रधानमंत्री तक पर अन्ना हजारे लोकपाल बैठना चाहते है | मैं पूछता हूँ ऐसे लोगों के लिए क्या तैयारी है जो सौ-पचास नहीं करोड़ों की संख्या में हैं ?
चलो एक काम करें और सुबह से शाम तक पता करें कि जाने अनजाने में हम कितने कानून तोड़ते हैं | निसंदेह लिस्ट लंबी बनेगी | फिर हम आत्मावलोकन करें कि हम कितने अच्छे नागरिक हैं ?

अलवर में 'पार्क' का मंचन : समानुभूति के स्तर पर दर्शकों को छूता एक नाट्यनुभाव

  रविवार, 13 अगस्त 2023 को हरुमल तोलानी ऑडीटोरियम, अलवर में मानव कौल लिखित तथा युवा रंगकर्मी हितेश जैमन द्वारा निर्देशित नाटक ‘पार्क’ का मंच...