Saturday, September 26, 2015

एक अमेच्योर एक्टर की डायरी - 1 : रटें या रमें


नाटक पर काम करते हुए कई बार आप वो कर रहे होते हैं जो दरअसल नहीं करना चाहते। नवोन्मेष केवल चाहे हुए को करने से ही नहीं होता, कई बार अनचाहा भी रचनाशीलता के अवसर दे जाता है। अरे! माफ़ कीजियेगा, इस ज्ञान का साधारणीकरण करके मत देखिए। ऐसा केवल मेरे केस में होता है। इसका मतलब यह भी नहीं कि मुझे नाटक करना पसंद नहीं है। लिहाजा परंपरा निभाते हुए जो नहीं चाहता, वही कर रहा हूँ। ट्रेन में बैठकर नाटक के संवादों को रट रहा हूँ। कल रिहर्सल पर निर्देशक की सवालिया नज़रों का सामना करना होगा, " क्या बात है अभी तक ....?" साथी अभिनेता दनादन डायलॉग बोल रहे है। उनकी डायलॉग-दुनाली में और व्यवधान क्यों डालूं! इस लिए ट्रेन के डेली यात्रियों के साथ गप्पबाज़ी करने और यात्रियों के चेहरों को उजबकों की तरह पढ़ने के स्थान पर स्क्रिप्ट पढ़ रहा हूँ।

अब ट्रेन की ऊपर की बर्थ पर बैठ कर परांठे की मानिंद रोल करके रखे हुए रोल के पन्ने निकाल, सीधे करके पाठ को देख रहा हूँ। शुरू से आखिर तक । एक बार, दो बार .... बार-बार... क्रम व कवायद अनंत...। बात बनती हुई लग नहीं रही...  काश मस्तिष्क भी स्कैनर की तरह काम करता और एक दो बार आँखों से गुजारने के बाद एक जेरोक्स इमेज बन जाती पूरे ए-फॉर साइज... लेकिन ऐसा होता तो कब का हो हो जाता। स्केनिंग के लिए जरुरी है एक समतल शीट हो।  रोल की तहरीर समतल तो है लेकिन तक़रीर आड़ी-तिरछी है। भावनाओं के पिरामिड हैं विचारों के गर्त हैं और जिज्ञासाओं कंदराएँ हैं।बहुत उबड़ खाबड़ है। 3डी... नहीं,... 4डी... वह भी नहीं... अनंत डाइमेंशन हैं। इसका जहनी जेरोक्स संभव नहीं। पर... याद तो करना है। खुद पर खुद का दबाव बना रहा हूँ।
यह लो घोटा लगा के सब समतल किये दे रहा हूँ। अब सब
2डी में है ...सारा का सारा सपाट!... अब इस इसकी अनुप्रस्थ काट की सीधी-सीधी सतरें बना ली हैं। उन्हें तुरपाई करके एक चिक बना रहा हूँ ताकि मानस पटल पर आच्छादित किया जा सके। जितना चाहे खोलो, जितना चाहे लपटो, जितनी चाहिए रौशनी... क्या चिक के बाद रौशनी की चाहत या रह जाती है? याद तो करना ही है हर हाल में... रट के या रम के ! यह मेरा अब खुद पे खुद का दबाव है। मैंने अपना तरीका इज़ाद किया है... आप कैसे करते हैं?


- दलीप वैरागी 
9928986983 
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