इलैक्ट्रोनिक मीडिया के चेहरे के बारे में मुख्तसर सी जानकारी मैंने पिछले पोस्ट में दी थी. आज प्रिंट मीडिया के बारे में लिखने के लिए मुझे आज के अखबार ने मजबूर कर दिया . दरअसल आज सुबह जब मैंने अखबार उठाया तो उसके मुख पृष्ठ एक भी ख़बर नहीं थी. पहले पन्ने पर पूरे पेज का इश्तिहार था. पिछले साल भर से अखबारों का चेहरा इतनी जल्दी से बदला है कि अब कोई चेहरा रहा ही नहीं महज इश्तिहार हों गया है. यह किसी एक अखबार की बात नहीं है बल्कि यह हर नेशनल मीडिया कहलाने वाले अखबार की कहानी है चाहे वह हिंदी का हों या अंग्रेजी वाला. अखबार का मुख पृष्ठ उसका मैनिफेस्टो होता है. हर सुबह पाठक जब सारे दिन की भागदौड़ में शमिल होने जाने से पहले नजर भर अखबार को देखना चाहता है कि उसके अखबार ने किस घटना को प्रमुखता देते हुए सुर्खियों में रखा है; चाय की गुमटी और बस की सीट पर बैठा कोई व्यक्ति जब अपना सिर जब अखबार में दे पढ़ रहा होता है तो बगल में बैठा भी कोई तिरछी नजर से अखबार की सुर्खियाँ देख लेता है. लेकिन आज पाठक को हर तरफ इश्तिहार ही दिखाई देते है चाहे अखबार का पहला पन्ना हों या सडक का किनारा . अखबार और होर्डिंग में कोई फर्क नहीं रह गया है . जब मुख पृष्ठ के पूरे पन्ने पर किसी बिल्डर, सीमेंट, गाइड बुक और कोचिंग संस्थान के इश्तिहार से पूछता हूँ की खबरें कहाँ हैं तो ऐसा लगता है कि मानो वह इश्तिहार कह रहा हों , ‘कंगाल तेरे खर्चे हुए तीन रुपयों से यह अखबार नहीं चलता है; यह चलता है इस विज्ञापन से.’ सही बात है कि जिनके पैसे से अखबार चलता है पहला पन्ना भी उसका ही होगा . यह सही है कि आज मीडिया में विज्ञापनों से इनकार नहीं किया जा सकता लेकिन एक बुनियादी तमीज़ तो रहनी चाहिए कि क्या कहाँ छपना चाहिए. ऐसी स्थिति में कैसे कहा जा सकता है कि अखबार जनता आवाज है? अखबार लोकतंत्र की आवाज़ है ? कहने को कह सकते हैं लेकिन कहने से आवाज़ में असर नहीं आएगा. आवाज़ में असर के लिए तो मुख पृष्ठ पर अखबार के असली चेहरे को ही आना होगा . उस चेहरे को जो होना चाहिए. अखबार जनता के सरोकारों से तभी जुड़ेगा जब उसका काम पाठक की जेब से निकले पैसे चलेगा.
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