Tuesday, March 24, 2015

नाटक संभावनाओं का मंच ( भाग 4 )

शुरूआतः एक खुशनुमा इत्तेफ़ाक

कस्तूरबा गाँधी बालिका विद्यालय,
किराप, अजमेर नाट्य कार्यशाला27 से 29 मार्च 2014
 

जब किराप में इस नाट्य कार्यशाला की तारीख निर्धारित की तब यह सोचा नहीं था कि इसकी शुरूआत विश्व रंगमंच दिवससे होगी। बहरहाल, 27 मार्च को केजीबीवी में जाकर हमने लड़कियों से इस दिन के ऐतिहासिक महत्त्व पर मुख्तसर बात की कि इन तीन दिनों में हम लोग मिलकर जो काम करने जा रहे हैं, उसका कितना महत्त्व है। यह उस काम से किसी भी मायने में कम नहीं है, जिसे आज के दिन संसार के रंगकर्मी अपने-अपने तरीके से करेंगे।
अब तक की कार्यशालाओं में हम सभी लड़कियों को शामिल नहीं कर पाए थे। लगभग, तीस-पंैतीस लड़कियों के साथ ही काम हो पाता था, जिसकी वजह से मंचन के वक्त उन लड़कियों की नाराज़गी सामने आती थी, जो नाटक में भाग नहीं ले पाती थीं। ‘‘हमें नाटक क्यों नहीं सिखाया गया, सिर्फ़ इन्हीं लड़कियों के साथ क्यों काम किया गया ?‘‘ जवाब में हमारे पास कोई दलील नहीं होती, जो लड़कियों को संतुष्ट कर सके। सही भी है, अगर हम यह मानते हैं कि नाटक व्यक्ति में छिपी हुई प्रतिभा व संभावनाओं को उजागर करता है तो यह भी सर्वमान्य है कि ये संभावनाएँ सब में हैं। इसका मौका सभी को मिलना ही चाहिए। अतः, सभी सौ लड़कियों के साथ काम करने की योजना बनाई गई। तय यह हुआ कि तीन बड़े समूह बनेंगे व प्रत्येक समूह में एक नाटक तैयार किया जाएगा। तीनों समूहों को अपने नाटक की थीम तय करने के लिए कहा गया। समूह एक ने पानी विषय चुना, समूह दो ने दंगा तथा समूह तीन ने चुनाव। उस के बाद उनसे कहा गया कि आप अपने-अपने विषय पर जम कर चर्चा करें। उससे जो भी समझ बने उसी के आधार पर अपने समूह में कहानी, गीत, नारे, चार्ट व पोस्टर जो भी चाहें, बनाकर लाएँ। समूह अलग-अलग कमरों में चले गए। थोड़ी देर तक तो समूह बना रहा, बाद में वह पाँच-छः की छोटी-छोटी टोलियों में बँटने लगा, स्वतः ही। किसी के पास किताब-कॉपी, किसी के पास स्केच-कलर, किसी के पास पेंट-ब्रश, किसी के हाथ में पुस्तकालय की किताबें थीं। सरपट दौड़ शुरू हो गई, कमरे दर कमरे, समूह दर समूह। हमारी किसी को कोई परवाह नहीं। थोड़ी देर के लिए हम व शिक्षिकाएँ मुक्त थे, आगे की व्यूह रचना के लिए या फिर इस सक्रियता के दृश्य को आँखों में कैद करने के लिए- काम होता दिखाई दे रहा है, सर्वत्र-चर्चाएँ हो रही हैं। बातें हो रही हैं। बातों से बातें निकल रही हैं जिनसे ख्याल बुने जा रहे हैं, इन्हीं ख्यालों पर कथा का ताना तना जा रहा है। कल्पना के रंग चढ़ाए जा रहे हैं। नारे गढे़ जा रहे हैं, तुकबंदियाँ की जा रहीं हैं, काफि़ये मिलाए जा रहे हैं, गीत रचे जा रहे हैं। कलम चल रही है, कूची चल रही है, कागज़, कॉपी व चार्टों पर इबारतें नुमाया हो रही हैं। ऐसा लग रहा है जैसे हर चीज़ में पंख लगे हैं। चंद घंटों में ही नाटकों के मजमून तैयार होकर सामने आ गए हैं और इन सब से लैस, सारा समूह एक बार बड़े हाॅल में उपस्थित है और साथ में है बहुत सारी सहायता सामग्री। इन कहानियों के साथ आगे बढ़ा जाना है।
तय यह हुआ कि दंगा चुनाव दोनों विषयों पर दो नाटक किए जाएँगे। जब दो नाटक किए जाने हैं तो मौजूदा तीन समूहों के साथ कैसे काम हो पाएगा? शायद, मुख्तलिफ़ तरीके से समूह बनाने होंगे। समूह कुछ इस तरह से बने-लड़कियों से कहा गया कि जो लड़कियाँ नाटक में अभिनय की इच्छुक हैं, वे एक तरफ़ आ जाएँ। लगभग आधी लड़कियाँ आ र्गइं। चयन की छूट दी गई कि आप खुद तय करें कि किस नाटक में रहना है। अब हमारे सामने तीन समूह थे। शेष तीसरे समूह को बहुत महत्त्वपूर्ण जि़म्मेदारी मिली कि आप लोग तय करें कि इन दोनों नाटकों में नेपथ्य से किस प्रकार सहयोग कर इन्हें प्रभावी बनाया जा सकता है। इसमें काम काफ़ी विविधता भरा था। सेट डिज़ाइन, मंचसज्जा, रूपसज्जा, वेशभूषा, संगीत, मंच-प्रबंध इत्यादि। लेकिन, हमें इस बड़े समूह में लड़कियों को क्या-क्या स्पेसिफि़क यानी खास जि़म्मेदारियाँ देनी हैं, इसको ज़्यादा स्ट्रक्चर्ड यानी ढाँचागत रूप से तैयार नहीं किया। वे अपनी समझ, सामथ्र्य व रुचि के हिसाब से अपनी भूमिकाएँ खुद तय करें। इस समूह से यह विशेष रूप से कहा गया कि वे अभिनय वाले समूह से लगातार संवाद कायम रखेंगे। तीनों समूह अपने-अपने काम में फिर जुट गए। अथक । वे मंचन तक रुकने वाले नहीं थे।

भाषा की पाठशाला

साजिद अली -‘‘भाइयो और बहनो, मैं घर-घर में फरी (फ्री) बीजली (बिजली) पहुँचाऊँगा।” साजिद अली की भूमिका में गायत्री हिन्दी में लिखे संवाद को ठेठ मारवाड़ी लहज़े में बोल रही थी। गायत्री को दुबारा इसी संवाद को बोलने के लिए कहा गया। फिर पूछा ‘‘आपको लगता है संवाद में कुछ गड़बड़ है?‘‘ लड़की ने संवाद फिर बोला -
 “भाइयो और बहनो, मैं घर-घर में फरी बीजली पहुँचाऊँगा।
हमारे नाटक में तो हमें लगता है कि साजिद अली को
हिन्दी बोलनी चाहिए।
थोड़ा सोचने के बाद लड़की ने फिर अपना संवाद बोला-
“भाइयो और बहनो, मैं घर-घर में फरी बीजली पहुँचाऊँगा।
इस बार बदलाव महज़ इतना था कि मारवाड़ी लहज़े को थोड़ा अपदस्थ करने की कोशिश की गई। इसी कोशिश पर ही हमें भाषा सीखने की बुनियाद रखनी थी। हमें पता चल गया था, धूल कहाँ से हटानी है। हिन्दी भाषा की कक्षा का साजो-सामान जुटना शुरू हो गया। अब गायत्री के लिए मारवाड़ी और हिन्दी में उच्चारण भेद को सचेत रूप से देखने की ज़रूरत है। उसकी संवाद अदायगी में फरी और बीजली शब्दों में कील गड़े हुए हैं, इन्हें एक-एक करके खींच कर देखने की ज़रूरत है। यह एक शुरूआत होगी, सचेत रूप से अपनी भाषा को देखने की। अभिनेता के लिए तो यह निहायत ज़रूरी है। अब फिर गायत्री से कहा गया कि अब जब आप अपना संवाद बोलें तो खुद की आवाज़ को गौर से सुनें, और जहाँ उचित लगे बदलाव करने की कोशिश करें। गायत्री ने फिर तीन-चार बार संवाद दोहराया। पता नहीं, उसने खुद को सुना या नहीं। हमने उसके काम को थोड़ा आसान करने की कोशिश की। हमने कहा, ‘’अब ऐसा करते हैं, एक बार आप संवाद बोलेंगी, उसके पश्चात हम बोलेंगे। आपको दोनों को ध्यान से सुनना है, फिर फ़र्क महसूस करिये।
साजिद अली- ‘‘भाइयो और बहनो, मैं घर-घर में फरी
बीजली पहुँचाऊँगा।”
हमने संवाद को सही करके बोला-‘‘भाइयो और बहनो, मैं
घर-घर में फ्ऱी बिजली पहुँचाऊँगा।
इस बार गायत्री ने सुना और थोड़ा समय लेने के बाद अपना
संवाद आंशिक बदलाव के साथ बोला-
...मैं घर-घर में मुफ़्त बीजली पहुँचाऊँगा।
संवाद में परिवर्तन कर बोलना इस बात का सूचक था कि उसने पहली बार हमारी व खुद की आवाज़ को सुनना शुरू किया था। जैसे ही सुनना शुरू हुआ, वैसे ही उसने सचेत प्रयास किया कि जिस शब्द में समस्या थी उसके स्थान पर समानार्थक विकल्प तलाश कर रख दिया। निस्संदेह, यहाँ गायत्री के लिए भाषाई कौशल का एक आयाम खुला था, किन्तु अभीष्ट यह नहीं था। यह समस्या से नज़रंदाज़ी होगी। गायत्री से कहा गया कि आप संवाद के शब्दों में किंचित भी हेर-फेर किए बिना संवाद अदायगी का बार-बार अभ्यास करें। शुरू में थोड़ा ज़बान लड़खड़ाई, लेकिन अंततः उसने सही संवाद बोला। अभी से गायत्री सही संवाद बोलेगी। वह सही संवाद बोलेगी नाटक के मंचनपर्यंत या शायद जीवनपर्यंत...। कुछ इसी तरह की समस्या नाटक में एक नेता मांगीलाल का किरदार निभा रही संजु जाट के साथ आ रही थी। स्थिति थी- नेता एक सभा को संबोधित कर रहे हैं और जनता से बड़े बडे़ वायदे कर रहे हंै। जनता उनकी पोल भी खोल रही है। नेता संजु कहती है-
भाइयो और बहनो, मैं आपके गाँव में घर-घर में पानी पहुँचाऊँगा।
जब दूसरी बार संवाद बोला तो कुछ इस तरह-
भाइयो और बहनो मेरी सरकार में आपके यहाँ घर-घर में पानी पहुँचाऊँगा।
तीसरी बार- भाइयो-बहनो, आपके गाँव में सबको घर-घर पानी
पहुँचाऊँगा।”
संजु के साथ समस्या यह थी कि संवाद छोटा होने के बावजूद भी वह अंततः तय नहीं कर पा रही थी कि उसे क्या लाइन बोलनी है। हर बार वाक्य विन्यास व शब्दावली बदल जाने से संवाद में आत्मविश्वास नहीं आ रहा था और आत्मविश्वास न होने से भाव-सृष्टि भी नहीं हो पा रही थी। वाक्य के उलटफेर में वह खुद ही फँसे जा रही थी, मानो वह अपने संवाद को ज़बर्दस्त बनाने के लिए अपनी शब्दावली को खंगाल देना चाहती थी। लेकिन, वे शब्द बेतरतीबी से आकर अर्थ पर कुहासा डाल देते थे। ऐसा लगता था, वह अपनी जेब से संवाद की शब्दावली निकालना चाहती है, लेकिन, जैसे ही हाथ बाहर निकालती है वैसे ही साथ में अनावश्यक शब्दों की रेज़गारी भी नीचे गिर जाती है।
नाटक के कथोपकथन विधान में यह ज़रूरी नहीं कि प्रत्येक वाक्य को बहुत सारे विशेषणों, सर्वनामों इत्यादि पर हर बार खड़ा किया जाए। नाटक के किसी भी संवाद के दोनों सिरों के हुक पूर्व और बाद के कथनों में लगे हुए होते हैं और उन्हीं की उंगली पकड़ कर नाटक में चलते हैं। नाटक में कई बार चंद शब्द या फिर एक अकेला शब्द भी पूरी बात कह जाता है। यहाँ तक कि सन्नाटों में भी अर्थ और भाव के वातायन खुलते हैं। ज़ाहिर है, लड़की को इस सत्य तक पहुँचने में वक्त लग सकता था, लेकिन यह नामुमकिन नहीं था। हमने कहा, आप नाटक के पहले व बाद के संवादों के साथ अपने संवाद को जोड़कर देखें, फिर आपको जो भी अनावश्यक शब्द लगें, उनकी छंगाई करते जाएँ। आखिर, लड़की ने अपनी जेब से करारे नोट सरीखा संवाद निकाल कर सबके सामने रख दिया- मैं घर-घर में पानी पहुँचाऊँगा।

कागज़ में शायद शब्दों के अतिरिक्त बोझ को उठाने की सामथ्र्य होती हो, लेकिन, ज़बान और कान तो मुख-सुख को ही समझते हैं। जो शब्द मुख-सुख नहीं देते वह फि़ज़ा में कहीं छितरा कर रह जाते हैं। सम्प्रेषण के ध्येय तक नहीं पहुँचते। कलम और ज़बान फितरतन जुदा-जुदा हैं। कलम तो कागज़ पर शब्दों को तहा-तहा कर छोड़ती जाती है और पुस्तक उन्हें इस्तरी करके रख देती है। किन्तु, ज़बान शब्दों को गढ़ती है और उनमें प्राण भी फूँकती है तथा सामने वाले को किसी शिशु की तरह पकड़ाती है। बच्चे को गोद में लेते वक्त हम वज़न को महसूस नहीं करते। इस तरह से हुआ सम्प्रेषण दुनिया के किसी भी कोने में बेहतरीन सम्प्रेषण ही कहा जाएगा। इसके छोटे-छोटे व अनुशासित अभ्यास सिर्फ़ नाटक की रिहर्सलों में ही मिल सकते हैं।
एक पाठ नागरिक शास्त्र का भी

कार्यशाला के अंतिम दिन ड्रेस रिहर्सल के वक़्त जब हम लड़कियों से मिले, सब के बीच तीन-चार लड़कियाँ टोपियाँ (स्कल कैप) पहन कर बैठी हुई थीं। ये मौलवी की भूमिकाएँ निभा रहीं थीं। हमारा स्वाभाविक सा सवाल था, ‘‘अरे वाह! ये कहाँ से लीं?‘‘ ‘‘हमने खुद सिली हैं। ‘‘किसने सिली हैं?” इसके जवाब में मुझे उम्मीद थी कि मेहरून, हसीना, हिना या शहनाज़ का नाम आएगा, लेकिन, लड़कियों ने समवेत स्वर में कहा, ‘‘सर, सुनीता ने सिली हैं, ये सारी टोपियाँ। अब हमारे लिए अटकलें लगाने के लिए बहुत कुछ था। क्या सुनीता टोपियाँ सिल सकती है, क्या सुनीता पहले से टोपियाँ सिलती रही है? या फिर नाटक बनाने की प्रक्रिया ने सुनीता को मजबूर कर दिया और उसने अपने आप उन्हें सिल दिया। दरअसल, इस दृश्य को इस तरह से भी होता हुआ देखा जा सकता है-सुनीता केजीबीवी में सीखे अपने सिलाई कौशल से उत्साहित होकर मेहरून, हसीना, शहनाज़ व हिना से मिली होगी। जिस चरित्र के लिए टोपी सिली गई, उस पर बात हुई होगी, उससे परे मज़हबों पर भी बात हुई होगी। और, टोपी सिलते-सिलते कितने मज़हबी फ़ासलों की इन लड़कियों ने तुरपाई की होगी। कितने ही रिश्तों को रफ़ू किया होगा ? कौन कह सकता है, हमेशा साक्ष्यों की तलाश बेजा बात है। कुछ मामलों में हमें संभावनाओं को ध्यान में रख कर प्रक्रियाओं को छेड़ना भर है। साक्ष्य हमेशा हों, यह ज़रूरी तो नहीं।
एक दृश्य में जब हसीना काठात अज़ान लगाती है तो उसकी सहपाठी दुर्गा मुसल्ला बिछा कर किसी मौलवी की तरह नमाज़ अदा करने लगती है। वही दुर्गा, जो एक दिन पहले नमाज़ के दृश्य में खुद को बहुत असहज महसूस कर रही थी ! आज के दृश्य और कल की स्थिति के दरम्यान ज़रूर एक पूर्वरंग विद्यालय के आवासीय समय में रचा गया होगा।
यही स्थिति गणेश की आरती वाले दृश्य में थी। एक लड़की कोरस से निकल कर आगे आकर गणेश बनती है। बाकी लड़कियों का समवेत स्वर में आरती-गायन। नाटक का उद्देश्य हिन्दू या मुस्लिम धर्मों की उपासना पद्धतियों को देखना-सीखना नहीं हो सकता। बल्कि, नाटक दूसरे की जगह खुद को रख कर दूसरे के नज़रिए को समझना शुरु करता है, ताकि अपने धर्म के साथ-साथ दूसरे के धर्म का अहतराम कर सकें। दरअसल, इन नाटक खेलती लड़कियों की शक्ल में हिंदुस्तान के सेक्यूलर यानी धर्मनिरपेक्ष मुस्तकबिल का ब्लू प्रिंट दिखाई दे रहा है।

मिलजुल कर रचा विराट् सौन्दर्य

यह हमारा विशेष आग्रह था कि स्कूल की प्रत्येक लड़की नाट्य कार्यशाला की पूरी प्रक्रिया में हिस्सा ले। सिद्धान्त में यह विचार जितना खूबसूरत है, उसे अमली जामा पहनाना कम चुनौतीपूर्ण न था। केजीबीवी में एक सौ पाँच लड़कियाँ नामांकित हैं, और एक सौ दो आज उपस्थित। किसी भी गतिविधि में सौ लड़कियों का शामिल होना एक बडी़ ताकत हो सकता है, पर हमेशा ऐसा होता नहीं। इसे ताकत में तब्दील किया जा सकता है। यह सामूहिक ताकत कोरी निरंकुश कदमताल न बन जाए, इसलिए, इसे सौंदर्यबोधीय  संस्कार देना ज़रुरी होता है। यह संस्कार नाटक के द्वारा सहजता से दिये जा सकते हैं। एक दूसरा पहलू है, सक्रियता का। कई बार सक्रियता के नाम पर समूह में बस काम दे देना धोखा भी साबित हो सकता है। व्यक्तिगत रुप से सीखने में सक्रियता निर्विवाद है। लेकिन, एक बडे़ उद्देश्य के लिए जब समूहों में काम करते हैं, तो उसके लिए उस विराट् उद्देश्य का विजन यानी दृष्टि, प्रत्येक के चित्त-मानस में स्पष्ट होना लाज़मी है। इस तरह से सक्रियता का एक सीधा-सा सिद्धान्त यहाँ नज़र आता है कि प्रक्रिया की प्रत्येक कडी़ से जुड़ा व्यक्ति विराट् को अपने तसव्वुर में रखे, उसी के आधार से कल्पना की उडा़नें भी भरे और फिर अपने छोटे समूह के कार्य में लग जाए, समूह में अपनी छोटी – बडी़ भूमिका या जि़म्मेदारी की छोटी से छोटी अनंत बारीकियों तक जाने में लग जाए। इस तरह वह विराट् आकार कैनवास पर उभरने लगता है। उल्लेखनीय है कि कार्यशाला में लड़कियों की सक्रियता कुछ इस तरह दिखाई दे रही थी कि उनका काम आखिरकार समग्रता में उभर कर आता दिखाई दिया। काम करती हर लड़की की कोशिश में यह स्पष्ट पता चल रहा था कि तस्वीर सबकी निगाह में है और सबकी साझा की हुई है। अभिनय वाले समूह अपने अभिनय में निखार लाने के लिए भरसक कोशिश कर रहे हैं। बैकस्टेज वाले समूह की अपनी पैनी नज़र रहती है कि कैसे अपने कार्य से उनके अभिनय में और प्रभावोत्पादकता ला सकें। एक दृश्य में मंच से नेता अपनी-अपनी रैलियों को संबोधित कर रहे हैं। सीन ठीक ही चल रहा था अचानक दो लड़कियाँ ऊँची कूद के खेल में काम आने वाले दो स्टैंड र्ले आइं और नेताओं के सामने उन्हें माइक के रुप में खड़ा कर दिया गया। ये उन दो लड़कियों की परिकल्पना थी। इस परिकल्पना को अब दो-चार और लड़कियों ने लपक लिया। माइक को हॉल के साइड में ले जाकर उस पर रंगीन कागज़ लपेटना शुरु कर दिया। दो लड़कियों ने हार्ड-शीट को काट कर उस पर पेपर चिपका, एक फ़ुट लंबाई की दो पट्टियाँ काट लीं और उन पर बडे़ कलात्मक तरीके से लिख दिया, ‘सोनू साउण्ड सर्विस-मसूदा। अब तैयार हो गया नेता जी का मंच और मंच पर रखा माइक। नेता का साजो-सामान जुट गया, तो फिर, कुछ जनता के लिए भी होना चाहिए। चुनावी साल है, रैली सभाओं का दौर चल रहा है। लड़कियाँ सब देख रही हैं। दो-तीन लड़कियों ने फिर स्टोर रूम की तरफ रुख किया। स्टोर रूम के रूप में अब एक और महत्त्वपूर्ण किरदार जुड़ने वाला है। थोड़ी देर में वे दस-बारह तख्तियाँ लेकर आयीं जिनमें पकड़ने के लिए डंडियाँ लगी हुई थीं। उन पर पल्स पोलियो अभियान, ‘बाल विवाह अभिशाप है, ‘भ्रूण हत्या बंद करो, ‘एक बेटी पढे़गी सात पीढी़...इत्यादि इबारतें लिखी हुई थीं। हमने पूछा, ‘‘आप इन तख्तियों का क्या करेंगी? ये तो विषय से जुड़ी हुई नहीं है।’‘ लड़कियों ने कहा कि इन तख्तियों पर वे नारे लिख कर चिपका देंगी। कूचियाँ, कलम व रंग फिर सक्रिय हो गए और वहीं पास में ही एक टोली बैठ गई इन इबारतों को रचने। पास में ही नाटक के रिहर्सल में संवाद चल रहे हैं, लेकिन, उन आवाज़ों पर अब रंग छाने लगे हैं और संवादों की ध्वनियाँ नेपथ्य में चली जाती हैं। अब उन तख्तियों पर नारे उभरते हैं, ‘वोट फॉर मांगीलाल, ‘हमारा नेता कैसा हो, मांगीलाल जैसा हो,
वोट फ़ोर साजिद अली, ‘एक, दो, तीन, चार, साजिद अली अबकी बार।
अलग-अलग जगह पर अलग-अलग टोलियाँ बैठी हैं, अपना-अपना काम कर रही हैं। कोई किसी को सुपरवाइज़ नहीं कर रहा। एक टोली मुखौटे तैयार कर रही है। एक टोली उनमें अपनी कल्पना के रंग भर रही है। एक टोली इस मुद्दे पर बहस कर रही है कि हिंसा क्या होती है? किस-किस तरह की होती है? हिंसा के क्या-क्या साधन हैं, क्या-क्या प्रतीक हैं? इस टोली ने उन सब के चार्टों पर चित्र बनाए हैं। इस सारी भागदौड़ से परे तीन-चार लड़कियाँ बिल्कुल अनौपचारिक ढंग से घंटों से बैठी हैं व बातों में मशगूल हैं। इनके चेहरों के भाव से बिल्कुल नहीं लगता कि वे किसी अकादमिक डिस्कोर्स मे लगी हैं। बातचीत में एक ज़बर्दस्त ठहराव नज़र आ रहा है। देखने से लगता है कि इन्होंने सारे क्रिया-कलाप में अपनी निजी बातचीत के लिए खूब फुर्सत निकाल ली है। लेकिन, काफ़ी समय बाद जब यह समूह हमारे सामने आया और जब हमने इनके चार्ट देखे तो हमारी धारणा बदल गई। हाल में हुए चुनावों का सारा का सारा इतिवृत्त व विश्लेषण इनके पास था। किस-किसने चुनाव लड़ा, कौन जीता, कौन हारा। जातीय व धार्मिक समीकरण क्या थे, चुनाव के वक्त अंदर कौन था, बाहर कौन, चुनावों को लेकर क्या लड़ाइयाँ हुईं, क्या हथकंडे रहे-सब बातें इन लड़कियों ने लिखी थीं। आखिर मंचन का दिन आया। तय हुआ केजीबीवी के मध्य खुले प्रांगण में नाटक होगा। अब मंच-प्रबंधन व सज्जा के लिए लड़कियाँ एकजुट होने लगीं। स्टोर रुम आज फिर खुल कर सक्रिय भूमिका में आ गया। लड़कियाँ आज फिर वहाँ जातीं व वहाँ से कुछ न कुछ लेकर आती दिखाई दीं। जाने किस कोने से पुराना दस गुणा दस फ़ीट का बड़ा पर्दा निकाल र्लाइं। उसे बरामदे के दो बडे़ खंभों के मध्य कस कर बाँध दिया गया, जिस पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था - कस्तूरबा गाँधी बालिका विद्यालय, किराप। यह साइक्लोरामा यानी मंच के पीछे का परदा हो गया। एक समूह का काम है अब तक कार्यशाला के दौरान बनी सामग्री की प्रदर्शनी लगाने का। लड़कियों ने आँगन में सभी चार्ट्स को फैला दिया है, चयन हो रहा है, विषयवार वर्गीकरण हो रहा है। मैंने उनकी मदद हेतु सुझाव दिया कि इन चार्ट्स को रस्सी बाँध कर हम मंच के बाजू में लटका सकते हैं। मेरे सुझाव को हवा में उड़ा दिया गया, ‘‘सर, कितनी हवा चल रही है, सब हवा से हिलेंगे।
क्या किया जाए?’’
इन्हें साॅफ़्ट बोर्ड्स पे लगा देते हैं।
‘‘लेकिन, सॉफ्ट बोर्ड्स तो कमरों में लगे हैं। वहाँ?’’,
प्रदर्शनी तो मंच पे ही होनी चाहिए।”,
एक लड़की ने तुरंत कहा, ‘‘साॅफ़्ट बोर्ड्स दीवारों पर से हटा लेते हैं।
किसी लड़की का यह कहना भी साहसिक कदम ही माना जाएगा। आमतौर पर, साॅफ़्ट बोर्ड्स को लगाना ही मुश्किल होता है, उतारना तो बहुत बड़ी बात। लड़की की बात को वाॅर्डन सोमती सोनी ने मजबूती दी-
“सर, हम इन साॅफ़्ट बोर्ड्स को बड़ी आसानी से उतार व
लगा सकते हैं।

एक-एक कर आठ-दस साॅफ़्ट बोर्ड्स अगले ही पल ज़मीन पर थे। लड़कियाँ उन पर चार्ट्स पिनअप कर रहीं थीं। अब एक-एक कर ये बोर्ड्स मंच के पीछे व बगल में खड़े कर दिए गए। इनको खड़ा करने के लिए पीछे पलंग लाकर खड़े किए गए। मंच पर धूप होगी, इसलिए स्टोर से पुराना शामियाना लाकर टाँग दिया गया। स्टोर से ही पुरानी फ़र्रियाँ (बंदनवार) लाकर पूरे प्रेक्षागृह में सजा दी गईं। पृष्ठभूमि में लगे साॅफ़्ट बोर्ड्स को और उभारने के लिए बिल्कुल नई चादरें स्टाॅक में से लाकर टाँगी गईं। अभिनय स्थल और दर्शकों के बीच चूने से एक रेखा खींच दी गई। इस रेखा के किनारे-किनारे बाहर बरामदे से गमले लाकर कतार में रख दिए गए। कुछ और गमले भी मंच पर, जहाँ उन्हें मुनासिब लगा, सजा दिए। मंच पर जहाँ पर्दा बाँधा जाता है, वहाँ कसकर आर-पार एक रस्सी बाँधी गई और उस पर चार खूबसूरत मुखौटे लटका दिए गए। कोई भी लड़की अपनी कोशिश में कमी नहीं रखना चाहती थी। चारों तरफ़ ऊर्जा ही ऊर्जा, खूबसूरती ही खूबसूरती। जिस नाटक का पूर्वरंग इस कदर रचा गया हो, वह उत्कृष्ट कैसे नहीं होगा! मंचन देखने के लिए पास के माध्यमिक विद्यालय (रमसा) की लड़कियों व शिक्षिकाओं को आमंत्रित किया गया। उन्होंने नाटक देखे भी... सराहे भी... मौखिक तौर पर भी और लिखित में भी!
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दलीप वैरागी 
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Sunday, March 22, 2015

कथोपकथन: विषय सूची

कथोपकथन: विषय सूची:   नाटक और रटना नाटक : संभावनाओं का मंच (भाग 1) नाटक : संभावनाओं का मंच (भाग 2 ) नाटक: संभावनाओं का मंच (भाग 3) थियेटर ( Theatre) : फ़...

Sunday, March 15, 2015

नाटक और रटना

शिक्षा में अवधारणाओं को रट लेना एक अच्छी शैक्षिक प्रक्रिया नहीं मानी जाती है, लेकिन फिर भी यह प्रायः कहीं न कहीं  प्रतिष्ठित हो जाती है। यह शिक्षा में कितना जरुरी है या मज़बूरी है, इस मुद्दे पर बहस भी वर्तमान है। कमोबेश ऐसी ही स्थिति रंगमंच पर भी है। नाट्य मंडलियों में प्रायः दो-चार ऐसे अभिनेता होते हैं जो दूसरी या तीसरी रिहर्सल तक लाइनों को रट लेते हैं। यहाँ मैं इसके लिए संवाद शब्द जानबूझकर नहीं बोल रहा हूँ। शायद ही वे संवाद के वास्तविक अर्थ तक भूमिका को ले जा पाते हों। मैं हमेशा ही यह महसूस करता रहा हूँ कि आखिरी रिहर्सल तक मुकम्मल तरीके से याद नहीं कर पाया हूँ। लेकिन कभी असहायता की स्थिति में भी खुद को नहीं पाया है। चूँकि नाट्यकर्म की बुनावट में ही सहयोग व संभावनाओं का ऐसा अद्भुत ताना-बाना है, जो  आपको विश्वास के साथ पार ले जाता है।
अभी एक नाटक की रिहर्सल पर मेरे एक साथी अभिनेता एक अज़ीब मुश्किल से गुज़र रहा है। उसे पूरी तौर पर अपना रोल याद है। रिहर्सल के दौरान अक्सर वह कहता है, "क्या करूँ, मेरे संवादों में 'अंदर' के भाव बिलकुल निकल कर नहीं आ रहे है।" वह बिलकुल सच बोल रहा है। पूरी ईमानदारी के साथ वह इस सत्य को स्वीकार कर रहा है, जो एक अभिनेता का आवश्यक गुण है। लेकिन मेरे लिए चुनौती थी, यह पहचान करना कि उसकी मुश्किल की जड़ क्या है? यह बात गौर करने लायक थी कि रिहर्सल के शुरूआती दिनों में ही इस अभिनेता ने अपनी लाइनों को कंठस्थ कर लिया था।
शौकिया मंडलियों में इस तरह के अभिनेता अपनी तत्परता के कारण पसंद भी किये जाते हैं। किन्तु, यही तत्परता उनके सात्विक अभिनय में रूकावट बन जाती है।
प्रायः आलेख की पहली रीडिंग में ही अभिनय की यात्रा शुरू हो जाती है। यात्रा ही नहीं अच्छा खासा जीवंत नाटक हो जाता है। इस नाटक की रंगभूमि अभिनयशाला या रिहर्सल रूम नहीं होती, बल्कि वह अभिनेता के मानसपटल होती है। यह अभिनय लेखक के द्वारा खड़े किये गए चरित्रों व स्थितियों के रेखाचित्रों का होता है जिसमें अभिनेता की कल्पना के रंग उन्हें आकर देने लगते हैं। ये चरित्र अभिनेता के अवचेतन के तहखाने में जाते है, वहां अभिनेता के पूर्व अनुभव उनका मेकअप करके उन्हें शक्लें प्रदान करते हैं। वहीं स्टोर में रखी भावनाओं का एक झोंका इन चरित्रों में शक्ति फूंक कर जीवंत रूप में खेलने के लिए आँखों में तैरा देता है।
यह अभिनय पढ़ने के साथ-साथ मन में चल रहा होता है। इसमें विशेष बात यह है कि ये आकार जितनी स्पष्टता के साथ उभरते हैं, उतनी ही तेजी से मिट भी जाते हैं। किसी सपने सरीखे होते हैं ये आकार, सोते हुए एकदम रंगीन और आँख खुलते ही धूमिल! कुशल अभिनेता बस इतना करता है कि इन बुलबुलों के फूटने से पहले उन्हें सहेजना शुरू कर देता है। आगे का सारा काम इन्हीं आकारों के अनुसार अपने शरीर व सामग्रियों को ढालने का होता है।
जो अभिनेता प्रथम वाचन से आकारों पर गौर करने लगता है, उसके लिए आगे के वाचनों में आकार और साफ व स्पष्ट होने लगते हैं। और जिनका आग्रह शुरू से ही लाइनें याद करने पर रहता है उसके हाथ से वे जीवंत चित्र छूट जाते है। अगले ही वाचन में उसकी आँखों के सामने आते हैं  वर्ण, ध्वनियाँ, शब्द वाक्य...वाक्य...और वाक्य विन्यास तथा उनके साथ फंसी कुछ अस्पष्ट, धुली-पुंछी छवियाँ।
अभिनय में याद करना अपरिहार्य है लेकिन यह अगर उस मन के अभिनय को निरंतर शारीर में रूपांतरित करने के अभ्यासों के तहत हो तो बेहतर है। यदि यह याद करना सायास आग्रह के साथ होता है तो मंच पर आने के वक्त मन के आकारों की जगह सिर्फ टेक्स्ट ही आएगा। टेक्स्ट से काम चल सकता है लेकिन यह कसक बनी रहेगी, "क्या करूँ, मेरे अंदर के भाव नहीं नहीं निकल रहे?"
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दलीप वैरागी 
09928986983 

Tuesday, March 10, 2015

नाटक संभावनाओं का मंच (भाग-3) : धीरे-धीरे आइसबर्ग का बाहर आना

 पूर्व रंग
इस शृंखला में कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालयों में नाट्य कार्यशालाओं के अनुभवों व उनसे बनी समझ को सँजोने की कोशिश की गई है। कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय (केजीबीवी) सरकार द्वारा संचालित आवासीय विद्यालय हैं। केजीबीवी में समाज के गरीब व वंचित तबके की लड़कियाँ वहीं रह कर कक्षा छ: से आठ तक शिक्षा हासिल करती हैं। यहाँ उन्हें सभी आवासीय सुविधाएं व शिक्षा नि:शुल्क उपलब्ध हैं। यहाँ उन लड़कियों को प्रवेश प्राथमिकता से दिया जाता है, जिन्हें कभी स्कूल जाने का अवसर नहीं मिला है। इसके अलावा वे लड़कियाँ भी आती हैं, जो कभी स्कूल गई थीं, पर कुछ दर्ज़े पार करने के बाद ही उनकी पढ़ाई बीच में छूट गई। संधान पिछले पाँच वर्षों से राजस्थान के केजीबीवी के साथ गुणवत्ता युक्त शिक्षा के लिए कार्य कर रहा है। केजीबीवी में जिस तरह की लड़कियाँ नामांकित होती हैं, उनके साथ ऐसी प्रक्रियाएँ अपनाने की ज़रूरत होती है जिससे वे तेज़ गति से सीख सकें, शीघ्रता से पढ़ने-लिखने के बुनियादी तरीके हासिल करें जो उन्हें अपनी कक्षा की अपेक्षित दक्षताओं तक पहुँचने में मदद करें। इसके साथ उनमे न्होंसला कायम हो कि वे सीख सकती हैं। इसी सोश के तहत अजमेर व बीकानेर के केजीबीवी में थियेटर कार्यशालाएँ आयोजित की गईं। यहा उनके अनुभवों का विवरण है। इसका उद्देश्य यही है, कि इन अनुभवों से जो सीख उभर कर आती है, उसके आधार पर शिक्षिकाएँ अपने प्रयोग कर सकें। 
 धीरे-धीरे आइसबर्ग का बाहर आना
नाट्य कार्यशालाओं की शुरुआत हमने बीकानेर के  केजीबीवी (जैतासर ) से की थी। पहले ही प्रयास में हमें उत्साहित करने वाले नतीजे मिलने लगे, जिन्होंने हमें आगे इस प्रक्रिया को अन्य केजीबीवी में बेहतर ढंग से योजना बना कर ले जाने में मदद की। यों तो, हम यहाँ लगभग तीस-पैंतीस लड़कियों के  साथ काम कर रहे थे, लेकिन इस प्रक्रिया में कुछ लड़कियों की प्रतिभा अप्रत्याशित रुप से निखर कर सामने आई, जिसे पिछले दो-तीन सालों से किसी ने दर्ज नहीं किया था। कार्यशाला शुरु करने के पहले ही दिन से एक नाम हम सबके सामने था- परमेश्वरी जाट। पढ़ने में होशियार, चेहरे पर चमक, एकदम चुस्ती-फुर्ती वाली, किसी न किसी से कोई न कोई बात करते रहने वाली, अभिव्यक्ति में एकदम बेबाक है परमेश्वरी जाट। इसलिए वह शिक्षिकाओं की भी चहेती है। यह हो नहीं सकता कि आप केजीबीवी में चंद घंटांे के लिए जाएँ और परमेश्वरी के नाम से नावाकिफ़ रहें। थोड़ी ही देर में आप परमेश्वरी से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकते। यह लड़की आत्मविश्वास से कितनी लबरेज़ थी, उसका उदाहरण देखें। मेरे साथी संजय नाटक के लिए पात्रों को चुन रहे थे। लगभग सभी लड़कियाँ संजय को घेरे हुए थीं। सब अपना नाम अभिनय के लिए लिखवाना चाहती थीं। इन सबसे दूर परमेश्वरी एक तरफ़ खड़ी हुई थी। मैंने उससे पूछा ‘‘परमेश्वरी, आप नाटक में एक्टिंग नहीं करेंगी क्या?’’ उसने कहा, ‘‘करुँंगी, सर!’’ मैंने कहा, ‘‘आपने नाम क्यों नहीं लिखवाया?’’ परमेश्वरी बड़ी मजबूती से बोली, ’’मुझे लिखवाने की ज़रुरत नहीं, मेरा नाम तो आ ही जाएगा।’’ मुझे परमेश्वरी का जवाब अचंभित कर गया। मुझे पहली बार उसे लेकर हल्की सी चिंता हुई। क्या परमेश्वरी इस आत्मविश्वास को जीवन में आगे सँभाल पाएगी? क्या यह आगे चल कर दंभ या निरंकुश आत्मप्रवंचना में तो रूपांतरित नहीं हो जाएगा, जो उसे अलग-थलग खड़ा कर देगा ? फिर मुझे राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा में दिया गया वह वायदा भी याद आया कि बच्चों को ऐसी शिक्षा दी जाए जिससे वे अपने को किसी मुगालते में न रखें। लेकिन, इसका एक दूसरा सच यह भी था कि परमेश्वरी के आलोक वृत्त की परिधि ऐसी थी कि और भी लड़कियों के नाम थे जो रोशनी में नहीं आ पाते थे। उन अंधेरे पक्षों पर रोशनी डालने का काम नाट्य कार्यशाला ने किया।
इसकी शुरुआत हुई पूजा सुथार से। पूजा एकदम चुप रहने वाली लड़की है। मैं अपने काम के साथ-साथ कैमरे से तस्वीरें लेने का काम भी कर रहा था। तभी पूजा ने आकर धीरे से कहा ‘‘सर, दूसरे समूहों में जो काम चल रहा है, क्या वहाँ की कुछ तस्वीरें मैं ले कर आऊँ?‘‘ मैंने उसे कैमरा दिया, उसे मोटे-मोटे फं़क्शन समझाए। जब उसके द्वारा ली गई तस्वीरों को देखा तो हम दंग रह गए। एकदम किसी प्रोफ़ेशनल की तरह उसने तस्वीरों को क्लिक किया था। इसके बाद हमने व शिक्षिकाओं ने निर्णय लिया कि अब शेष कार्यशाला की तस्वीरें पूजा ही लेगी। उसमें ज़बर्दस्त आत्मविश्वास जागा। तीन दिन में ही। पूरे केजीबीवी में वह अब पूजा फ़ोटोग्राफ़र के नाम से जानी जाती है। इस तरह से केजीबीवी के आकाश पर एक और जुगनू रोशन हुआ।
दूसरी लड़की है कुसुम, जिसने इस अश्वमेध यज्ञ के घोडे़ की लगाम थामी। कुसुम भी अभी तक उन लड़कियों में शामिल थी, जिसके लिए हम तय नहीं कर पा रहे थे कि उसे क्या जि़म्मेदारी दी जाए। इस वक़्त हम उन लड़कियों की तलाश कर रहे थे जो कोरस के लिए सुर में गा सकें। एक-एक कर सभी लड़कियों से गाना गाकर देखने के लिए कहा जा रहा था। किसी का भी जम नहीं रहा था। परमेश्वरी बार-बार गाकर कोशिश करने की बात कह रही थी। और भी लड़कियाँ एक मौका और देने को कह रही थीं। इस बार सब लड़कियों को एक साथ गाने के लिए कहा गया। पूरा समूह जब गा रहा था, तभी एक सुर कहीं से ऐसा आता सुनाई दिया, मानो गहन अंधेरे वन में कहीं से सूरज की एक अकेली किरण अंधेरे को चीरती हुई धरती तक पहुँची हो और हमें राह दिखा गई हो। यह आवाज़ थी कुसुम की। इस बार कुसुम को अकेले गाने दिया तो वह छा गई- एकदम सुरीली व लयबद्ध कुसुम। अब वह पूरे कोरस का नेतृत्व करेगी। भूमिका में एक बदलाव और आया। अब वह सूत्रधार की भूमिका में भी होगी। अब कुसुम की पहचान गायिका कुसुम के रुप में बनने लगी है। इस सब के दरम्यान परमेश्वरी में एक बदलाव आने लगा। वह टीम का हिस्सा बन कर नज़र आने लगी। गाने के वक़्त वह कोरस का हिस्सा थी और अभिनय के वक़्त वह मंच के बीच थी। ये महज़ इक्के-दुक्के नाम नहीं हैं, जिनका यहाँ उल्लेख किया गया है। प्रत्येक कार्यशाला में ऐसी बहुत सी लड़कियाँ थीं, जिनकी संभावनाएँ आइसबर्ग यानी समुद्री हिमशैल के रूप में निकल कर आयीं।
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दलीप वैरागी 
09928986983 

Sunday, March 8, 2015

नाटक संभावनाओं का मंच (भाग 2) : नाटक क्या करता है


 पूर्व रंग
इस शृंखला में कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालयों में नाट्य कार्यशालाओं के अनुभवों व उनसे बनी समझ को सँजोने की कोशिश की गई है। कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय (केजीबीवी) सरकार द्वारा संचालित आवासीय विद्यालय हैं। केजीबीवी में समाज के गरीब व वंचित तबके की लड़कियाँ वहीं रह कर कक्षा छ: से आठ तक शिक्षा हासिल करती हैं। यहाँ उन्हें सभी आवासीय सुविधाएं व शिक्षा नि:शुल्क उपलब्ध हैं। यहाँ उन लड़कियों को प्रवेश प्राथमिकता से दिया जाता है, जिन्हें कभी स्कूल जाने का अवसर नहीं मिला है। इसके अलावा वे लड़कियाँ भी आती हैं, जो कभी स्कूल गई थीं, पर कुछ दर्ज़े पार करने के बाद ही उनकी पढ़ाई बीच में छूट गई। संधान पिछले पाँच वर्षों से राजस्थान के केजीबीवी के साथ गुणवत्ता युक्त शिक्षा के लिए कार्य कर रहा है। केजीबीवी में जिस तरह की लड़कियाँ नामांकित होती हैं, उनके साथ ऐसी प्रक्रियाएँ अपनाने की ज़रूरत होती है जिससे वे तेज़ गति से सीख सकें, शीघ्रता से पढ़ने-लिखने के बुनियादी तरीके हासिल करें जो उन्हें अपनी कक्षा की अपेक्षित दक्षताओं तक पहुँचने में मदद करें। इसके साथ उनमे न्होंसला कायम हो कि वे सीख सकती हैं। इसी सोश के तहत अजमेर व बीकानेर के केजीबीवी में थियेटर कार्यशालाएँ आयोजित की गईं। यहा उनके अनुभवों का विवरण है। इसका उद्देश्य यही है, कि इन अनुभवों से जो सीख उभर कर आती है, उसके आधार पर शिक्षिकाएँ अपने प्रयोग कर सकें। 

नाटक क्या करता है

आज हम जिस दौर से गुजर रहे हैं, उसमें शिक्षा से बहुत अपेक्षाएँ हैं। लेकिन, वस्तुस्थिति यह है कि शिक्षा से जितनी अपेक्षाएँ की जा रही हैं, नाउम्मीदी उससे कहीं ज्यादा मिल रही है। इस नाउम्मीदी के चलते निरंतर शिक्षा व्यवस्था से असंतोष बढ़ता ही जा रहा है। सब चाहते हैं कि हमारे बच्चे को गुणवत्ता युक्त शिक्षा मिले। ऐसी शिक्षा जिससे गुज़रकर बच्चा एक बेहतर नागरिक बने। अच्छे नागरिक से बराबरी, न्याय, संवेदनशीलता, मिलकर रहना, मिलकर काम करना व सहयोग जैसे सामाजिक व संवैधानिक मूल्यों की अपेक्षा की जाती है। साथ ही उससे यह भी अपेक्षा की जाती है कि उसमे व्यक्तित्व के कुछ महत्वपूर्ण पहलू कल्पनाशीलता, सृजनशीलता, प्रभावी सम्प्रेषण व समस्या समाधान के कौशलों का भी विकास हो।
वर्तमान शिक्षा-व्यवस्था को देखने पर उपरोक्त गुणों के संदर्भ में निराशा ही हाथ लगती है। स्कूली अंत:क्रिया इतनी पाठ्यपुस्तक आश्रित है कि सारी शैक्षणिक प्रक्रियाएँ पाठ्यपुस्तक में दे गई सूचनाओं व संकल्पनाओं को रटने के इर्द-गिर्द बुनी जाती हैं। इस सारी कवायद में बच्चे का ज्ञानात्मक पक्ष भले बढ़ता हो और शायद इस दिशा में वह कुछ विशेषज्ञता व कौशल भी प्रपट कर लेता हो, लेकिन क्या इस प्रक्रिया से समाज व देश आगे बढ़ा? क्या दरअसल खुद व्यक्ति भी? एक वक़्त था, जब देश की तमाम समस्याओं को हम गरीबी व अशिक्षा से जोड़ कर देखते थे। आजा स्थिति यह है कि प्रत्येक बच्चे को हम स्कूल में दाखिल करवा चुके हैं, लेकिन, संविधान के लक्ष्य – न्याय, बराबरी व स्वतन्त्रता फिर भी एक ख्वाब ही बने हुए हैं। आज जातिवाद व सांप्रदायिकता पहले से भी घिनौने रूप में हमारे सामने है। मीडिया के लिए “बिकाऊ मीडिया” विश्लेषण चलन में है। जजों की निष्पक्षता व नैतिकता संदेह के घेरे में है। इंजीनियरिंग पढ़ने वाले विद्यार्थी अपराध का रास्ता चुन रहे हैं। डॉक्टर का इलाज़ एक नया मर्ज़ दे जाता है। पुलिस पर किसी को यकीन नहीं है। नेताओं से उम्मीद नहीं है। भ्रष्टाचार आज अपने चरम पर है।
लब्बोलुआब यह है कि शिक्षा के नाम पर भले ही हम सभी बच्चों को स्कूल तक ले आए हों, लेकिन आज भी शिक्षा में उन संवैधानिक मूल्यों को स्थापित नहीं कर पाए हैं जो किसी इंसान को एक बेहतर नागरिक बनाते हैं। इन जीवन-मूल्यों का शिक्षा में न आने का सबसे बड़ा कारण है, शिक्षा में ज़िंदगी व जीवंत अनुभवों का न आ पाना। सच्चाई, ईमानदारी, बराबरी, संवेदनशीलता व सहभागिता, ये ज़िंदगी के जीवंत मसले हैं। ये अभ्यास से ही ज़िंदगी में साधे जा सकते हैं। लेकिन, इन्हें साधने का अभ्यास हमारी कक्षा में दिखाई नहीं देता है, वहाँ सिर्फ़ है – इन्हें ग्रहण करने की अनंत उपदेश शृंखला या फिर दीवारों पर लिखे सुभाषित वाक्य, जो दीवार का चूना छूटने के साथ ज़िंदगी में भी पपड़ाए से लाग्ने लगे हैं।  जीवन-मूल्यों का अभ्यास जिंदगी में ही हो सकता है। ऐसा हमारे पास क्या है जो जिंदगी को कक्षा में अभ्यास के लिए हाज़िर कर सके या फिर उसका वहाँ सृजन कर सके। जब भी किसी ऐसे माध्यम को तलाशते हैं जो जीवन को कक्षा में उतार सके, तो एक ही माध्यम नज़र आता है – नाटक। नाटक ही वह ज़रिया जो ज़िंदगी को हूबहू कक्षा में थोड़ी देर के लिए सर्जित करता है। यहाँ नाटक के उन मजबूत पहलुओं पर बात करते हैं जो हमारी शिक्षण प्रक्रियाओं को जीवंत बनाते है।
संवेदनशीलता
जब किसी नाटक में हम कोई भूमिका कर रहे होते हैं तो थोड़े वक़्त के लिए ही सही, हम खुद से हट कर किसी और ज़िंदगी को जी रहे होते हैं। इसके दो पहलू है। एक तो इस प्रक्रिया में खुद से बाहर होकर स्वयं को तटस्थ भाव से देखते हैं। जब खुद को बाहर से देखते है तो फिर मैं कहाँ रह जाता है? मैं की गैरहाज़री अहम को अपदस्त करती है। दूसरे हम जब खुद को दूसरे की जगह रख कर देख रहे होते हैं, तो हमें अपनी स्थिति पता चलती है। मसलन, हम किसी नाटक में हिटलर की भूमिका कर रहे होते हैं तो यह ज़रूरी नहीं कि हम हिटलर के विचारों से सहमत हों, लेकिन हम भूमिका निभाते हुए समस्या को हिटलर के नज़रिये से देखते ज़रूर है। समस्या समाधान के लिए नेगोसिएशन यानी बातचीत तभी संभव है जब हम समस्या को दूसरे के नज़रिये से देखना शुरू करते हैं। किशोरावस्था में रिश्तों के दरम्यान जो टकराहट सामने आती है, उसका प्रमुख कारण ही एक दूसरे के नज़रिये को नहीं समझ पाना ही है। एक लड़की घर से बाहर सहेली के साथ बाज़ार जाना चाहती है और उसके पिता, माँ या कोई बड़ा, सख्ती से माना कर देते हैं। अब, समाधान कि ओर तभी बढ़ा जा सकता है जब समस्या को उसके परिवारजनों के नज़रिये से भी देखा जाए।
सहभागिता
नाटक की प्रक्रिया में टीम वर्क बहुत ज़रूरी है। किसी भी नाटक के बनने की शुरुआत ही समूह-कार्य से होती है। बच्चों से नाटक करने को कहते ही वे एक से दो व दो से तीन होने शुरू हो जाते हैं। नाटक के साथ-साथ ही समूह बनना शुरू हो जाता है। नाटक में यह ज़बरदस्त ताकत कि यह एक छाते की तरह काम करता है, जिसके नीचे नृत्य, गीत-संगीत, चित्रकला, मूर्तिकला इत्यादि कलाएं आ जाती हैं। फलत:, नाटक इस वजह से अपने में विभिन्न रुचियों व आयामों वाले लोगों को जोड़ लेता है।
अभिव्यक्ति
नाटक बच्चों को मंच प्रदान करता है ताकि वे खुद को अभिव्यक्त कर सकें। नाटक के माध्यम से वे अपनी भावनाएँ, विचार व अपने सपने लोगों के सामने रख सकते हैं, जो वे सामन्यात: नहीं कर पाते। इसी श्रंखला में आगे लिखा है कि कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय, तबीजी में लड़कियों ने अपना नाटक इसी विषय पर तैयार किया कि वे क्या चाहती हैं? उन्हें क्या अच्छा लगता है? वे क्या बनना चाहती हैं या इसके अलावा उनके माँ में किस प्रकार के भय हैं। इन बातों को कहने का मौका हमारे घर व समाज में कहाँ मिलता है! अपने सपनों को दूसरों के सामने रखना, अपने दिलों की गाँठ खोलना व अपने ज़ख़्मों को हवा दिखने का काम नाटक बखूबी करता है। जब हम इसके अभ्यास नाटक में करते हैं तभी असल ज़िंदगी में कहने का हौसला बन पाता है।
सम्प्रेषण
 नाटक क्या-क्या कर सकता है, इसकी असीम संभावनाएं है। लेकिन नाटक का एक प्रमुख पहलू है कि यह विद्यार्थियों सम्प्रेषण कौशल को माँजता है। नाटक की हर कड़ी में सम्प्रेषण के अनगिनत अभ्यास है। अपनी बात को कहने के अलग-अलग आयाम, आवाज़ को ठीक करने के लिए वाक् – यंत्र को साधना, दूसरे के नज़रिए   से सामने वाले को सुनना – इन सभी के नाटक में बहुत से अभ्यास मिलते है। सम्प्रेषण में दूसरे को सुनने का बड़ा महत्त्व है। आज के दौर में जिस तरह अपनी ही बात को कहने और विरोधी विचार को बर्दाश्त न करने की प्रवृत्ति बढ़ रही है, उसे नाटक व्यवस्थित रूप से तोड़ता है। नाटक में कथोपकथन का अनुशासित तानाबाना होता है। उसमे दूसरे की पंक्तियों को सुने बगैर हम अपना संवाद नहीं बोल सकते हैं। संवादों के इसी अनुशासित विधान में दूसरे को व विरोधी विचार को सुनने के इतने व्यवस्थित अभ्यास मिलते हैं कि यह एक मूल्य के रूप में अवचेतन पर अंकित होता है। वहीं यह एक कौशल के रूप में भी सामने आता है।
समस्या- समाधान

नाटक तैयार करने की प्रक्रिया विद्यार्थियों को अपने जीवन की वास्तविक समस्याओं के समाधान का अभ्यास एक सुरक्षित वातावरण में प्रदान करती है। यहाँ वे उस समस्या के परिणामों को भोगने के भय से मुक्त होते हैं। नाटक में जब हम दूसरे की भूमिका कर रहे होते हैं, तब उस चरित्र के सामने आने वाली दुविधाएँ व द्वंद्व अपने जीवन की समस्याओं का विश्लेषण करने के अभ्यास देते है। मुझे याद है, बचपन में जब घर के बड़े लोग खेत में काम करते थे तो हम भी पास में ही अपनी छोटी सीए क्यारी बना लेते थे और फिर उसमें हल चलना, बीज बोना, सिंचाई करना, फसल काटना इत्यादि, अभिनय खूब करते थे। दूसरे के खेत में पशु चराना, खेत की मेड़ तोड़ना, बंटवारा, पानी की बारी को लेकर झगड़ा – इन सभी का अभिनय हम किया करते थे। मुख्य बात यह थी कि इस अभिनय में भविष्य में आने वाली समस्याओं को सुलझाने की हम तैयारी कर रहे थे, वहीं पर अभी उनके जोखिमों से हम मुक्त थे। 
इन अनुभवों का प्रकाशन संधान द्वारा प्रकाशित किया जा चुका हैजिसे पीडीएफ़ में पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक कर सकते हैं - नाटक : संभावनाओं का मंच   
(कृपया अपनी टिप्पणी अवश्य दें। यदि यह लेख आपको पसंद आया हो तो शेयर ज़रूर करें।  इससे इन्टरनेट पर हिन्दी को बढ़ावा मिलेगा तथा  मेरी नाट्यकला व  लेखन को प्रोत्साहन मिलेगा। ) 

दलीप वैरागी 
09928986983 

Saturday, March 7, 2015

नाटक, संभावनाओं का मंच (भाग - 1) : खामोश नाटक जारी है

पूर्व रंग
इस शृंखला में कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालयों में नाट्य कार्यशालाओं के अनुभवों व उनसे बनी समझ को सँजोने की कोशिश की गई है। कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय (केजीबीवी) सरकार द्वारा संचालित आवासीय विद्यालय हैं। केजीबीवी में समाज के गरीब व वंचित तबके की लड़कियाँ वहीं रह कर कक्षा छ: से आठ तक शिक्षा हासिल करती हैं। यहाँ उन्हें सभी आवासीय सुविधाएं व शिक्षा नि:शुल्क उपलब्ध हैं। यहाँ उन लड़कियों को प्रवेश प्राथमिकता से दिया जाता है, जिन्हें कभी स्कूल जाने का अवसर नहीं मिला है। इसके अलावा वे लड़कियाँ भी आती हैं, जो कभी स्कूल गई थीं, पर कुछ दर्ज़े पार करने के बाद ही उनकी पढ़ाई बीच में छूट गई। संधान पिछले पाँच वर्षों से राजस्थान के केजीबीवी के साथ गुणवत्ता युक्त शिक्षा के लिए कार्य कर रहा है। केजीबीवी में जिस तरह की लड़कियाँ नामांकित होती हैं, उनके साथ ऐसी प्रक्रियाएँ अपनाने की ज़रूरत होती है जिससे वे तेज़ गति से सीख सकें, शीघ्रता से पढ़ने-लिखने के बुनियादी तरीके हासिल करें जो उन्हें अपनी कक्षा की अपेक्षित दक्षताओं तक पहुँचने में मदद करें। इसके साथ उनमे न्होंसला कायम हो कि वे सीख सकती हैं। इसी सोश के तहत अजमेर व बीकानेर के केजीबीवी में थियेटर कार्यशालाएँ आयोजित की गईं। यहा उनके अनुभवों का विवरण है। इसका उद्देश्य यही है, कि इन अनुभवों से जो सीख उभर कर आती है, उसके आधार पर शिक्षिकाएँ अपने प्रयोग कर सकें। 

 खामोश, नाटक जारी है।

“अभी आपने हमारा नाटक कहानी किससे काही जाए देखा।” केजीबीवी तबीजी में नाट्य कार्यश्याला के अंतिम दिन का यह दृश्य है। ये शब्द नाटक खत्म होने के बाद नाट्य दल की बालिका अर्चना खरोल के थे। अर्चना यहाँ नाटक खत्म होने  का संदेश देने के लिए मंच पर उपस्थित हुई थी। उसके मजबूती से खड़े होने के अंदाज़, आत्मविश्वास व आँखों की चमक से ऐसा लग नहीं रहा था कि अभी यहाँ कुछ खत्म करने का इरादा है, बल्कि यह कि कोई सिलसिला शुरू होने जा रहा है। अर्चना ने इसी बात को साबित करते हुए दर्शकों, जिनमें बाकी लड़कियाँ, शिक्षिकाएँ व इस प्रदर्शन के लिए विशेष रूप से आमंत्रित बीईओ साहब थे, से कहा –
“इन तीन दिनों में हमारे केजीबीवी में जो नाटक सिखाया गया, वह हमने आपके सामने प्रस्तुत किया। आपको हमारा नाटक कैसा लगा? आप कोई सवाल पूछना चाहते हैं या कोई सुझाव देना चाहते हैं?
सवाल के जवाब में थोड़ी देर सन्नता पसरा रहा। शायद नाटक के बाद इस तरह का सवाल अनपेक्षित था। अचानक एक हाथ हवा में उभरा, जुगनू की तरह, फिर एक और... एक और... एक-एक करके कई हाथ खड़े हो गए। इन जुगनुओं से कोई एक कौना रौशन नहीं था, बल्कि पूरा मंच जगमगा उठा। इन जुगनुओं से हाथ मिला एक चिराग भी प्रज्ज्वलित हुआ। बीईओ साहब कि भी सवाल-जवाब में दिलचस्पी जागी। लड़कियों के सवाल जहां एक ओर नाटक के द्वारा पैदा की गई सहज जिज्ञासा के प्रतिफल थे, वहीं वे उस कौतूहल का नतीजा भी थे कि  पता तो करें कि तीन दिन से क्या हो रहा है ?’ हालांकि उन्हें बताया तो गया था कि नाट्य कार्यशाला चल रही है, लेकिन दरअसल क्या-क्या सिखाया गया, उन्हें नहीं पता था।
लड़कियों ने सवाल पूछने शुरू किए –
“मुखौटे क्यों लगाए जाते हैं?
“नाटक में आधी लड़कियों ने ही मुखौटे क्यों लगा रखे थे?
“पर्दा क्यों लगाया गया था?
“नाटक के अंदर गाना क्यों जोड़ा गया?
“कोरस क्यों बनाया गया ?
“चार लड़कियों ने चार अलग-अलग बातें क्यों कहीं?
“नाटक सभी लड़कियों को क्यों नहीं सिखाया गया? आधे समूह को ही क्यों सिखाया गया?
सवालों को सुन कर थोड़ी देर के लिए हमारे भी होश फ़ाख्ता हुए। फिर हमारे अंदर एक नाट्य-निर्देशक जागा। सवालों का जूआ अपने कंधों पर लादने का मन बना लिया, यह सोच कर कि ये नाट्यशास्त्रीय अवधारणाओं के बुनियादी सवाल हैं, शायद लड़कियाँ जवाब न दे पाएँ। लेकिन, हमने अपने को रोका और फ़ैसला किया कि सवालों के जवाब जिनसे पूछे गए हैं, उन्हें ही देने चाहिए। जिस प्रकार नाटक में हम अभिनेता पर भरोसा करते हैं कि वह अभीष्ट विचार को दर्शकों तक पहुंचाएगा, इस नाटक में भी लड़कियों पर ज्वलंत सामाजिक प्रश्न खड़ा करने का भरोसा किया है। जब उस भरोसे को परखने का वक्त आया है कि क्या लड़कियाँ इन सामाजिक सवालों को खड़ा करने की प्रक्रिया में खुद खड़ी हो पाई हैं या नहीं, तो फिर उस मौके को हाथ से क्यों जानें दें! दूसरी बात श्रेय लेने की भी है। सारा श्रेय उन लड़कियों को ही लेना चाहिए, अच्छा या बुरा। यहाँ मुद्दा हमारी प्रक्रिया के मूल्यांकन का भी है कि नाटक बनाने की प्रक्रिया में क्या लड़कियाँ लाइनें ही रट रही थीं या फिर उन्होने प्रक्रिया का विश्लेषण कर उसे समझा है। बहरहाल, हमें बीच में से हट जाना चाहिए। ऐसा हुआ भी... और बाद में हमें खड़े होने की ज़रूरत पड़ी भी नहीं, सिवाय इसके कि जब उत्साह कुछ ज्यादा ही बढ़ जाता तो ज़रा सा हस्तक्षेप लोकसभा स्पीकर सरीखा... लड़कियों ने बहुत ही व्यवस्थित तरीके से मंच को संभाला। सवाल दर जवाब और जवाब दर सवाल लड़कियाँ आगे बढ़ती रहीं और बहस को चलती रहीं। जैसे उनका सवाल पूछने का तरीका लोकतान्त्रिक था वैसे ही जवाब भी लोकतान्त्रिक तरीके से आ रहे थे। जैसे ही सवाल पूछा जाता तो मंच पर बैठी कोई भी लड़की कहती, “मैं इस सवाल का जवाब देना चाहती हूँ।” वह हाथ खड़ा करती और सवाल का जवाब देती। लड़कियों के वही चंद सवाल यहाँ दिए गए हैं जिन्हें दस्तावेज़ तैयार कर रही लड़की नूरी खातून ने लिख लिया था। आप पूछेंगे सवालों के जवाब कहाँ हैं? जवाब लड़कियों को मिल चुके हैं, लड़कियों ई मार्फ़त। हमारे लिए सवाल महत्वपूर्ण हैं। सवाल शाश्वत होटेन हैं। उनके जवाब सार्वभौमिक नहीं होते। उन्हें अपने संदर्भों से ही समझना पड़ता है। लड़कियों ने उन्हें अपने संदर्भ में देखा। आप भी सवाल से सवाल की तरह ही पेश आएँ।
जब सवाल-जवाब का सिलसिला थमा तो नाटक करने वाली लड़कियाँ हमारी खामोशी बर्दाश्त नहीं कर पाईं। उन्होने पूछ ही लिया –
“आपको हमारा नाटक कैसा लगा?
“आपको नाटक कराते समय कोई कठिनाई तो नहीं आई?
“आप दोबारा कब आएंगे?
जवाब की शक्ल में कुछ भावुकता भरे शब्द ही व्यक्त होने वाले थे, जो अक्सर सार्वभौमिक से होते हैं। आखिरकार मंचन इस सूचना के साथ खत्म हुआ कि शाम को दौसा ज़िले की एक केजीबीवी की लड़कियाँ एक्सपोजर विजिट के लिए अजमेर आई हुई है, जो शाम को यहीं रुकेंगी। फिर क्या था, लड़कियों ने तुरंत निर्णय किया कि क्यों न यह नाटक उन लड़कियों को भी दिखाया जाए। आनन-फ़ानन में वे लड़कियाँ तैयारियों में जुट गईं। इस बार यह जानने के लिए कि लड़कियों का क्या रिफ्लैक्शन है यानि वे उसके बारे में क्या सोचती हैं, शिक्षिकाओं ने उस प्रक्रिया को थोड़ा और व्यवस्थित किया, ताकि आने वाली प्रत्येक लड़की अपनी प्रतिकृया जाहीर कर सके।
इसके लिए चौथाई कागज़ की लगभग सौ पर्चियाँ काटी गईं, जो मंचन के पश्चात लड़कियों को अपनी राय ज़ाहिर करने के लिए दी गईं। तैयारियां पूरी करके लड़कियाँ इंतज़ार करने में लगी। हमें लगा कि नाटक खत्म नहीं हुआ है। वह अभी भी चल रहा है, खामोशी के साथ लड़कियों व शिक्षिकाओं के ज़हन में। हमें लगा हमारा काम पूरा हो गया, थैला उठाया, इजाज़त ली और निकल गए।

बातों से बात निकलती गई

 प्रशिक्षण का दूसरा दिन हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण था। पहले दिन के अप्रत्याशित नतीज़े सामने आने लगे। लड़कियों को मिलकर एक कहानी रचने का काम दिया था, जिसे उन्होंने बखूबी किया। दूसरा, लड़कियों ने पहले दिन का दस्तावेजीकरण भी स्वप्रेरणा से किया था, जिसके वचन से उन्होंने दूसरे दिन की शुरुआत कि। अब उनके प्रतिवेदन के अनुसार ही हम पहले दिन को समझने की कोशिश करते हैं-
“हमारे यहाँ पर संधान से दलीप सर व संजय विद्रोही सर आए। हम सभी लड़कियों को बहुत खुशी हुई। फिर हम सभी लड़कियों में से छत्तीस लड़कियों का चयन किया और हॉल में लेकर गए। हम सभी ने भी परिचय दिया। फिर उन्होंने बताया कि हम तुम्हें नाटक सिखाएँगे, मुकुट (मुखौटे) बनाना सिखाएँगे। हमें बहुत खुशी हुई। फिर उन्होंने पूछा कि हम किस टॉपिक पर नाटक बनाएँगे?
यहाँ उद्देश्य था कि किसी पहले से लिखी गई स्क्रिप्ट पर काम न कर, लड़कियों के खुद के अनुभवों पर आधारित कोई विषय तय किया जाए। ताकि, उन्हें पता चले कि किस प्रकार एक विचार के इर्द-गिर्द कहानी बनाई जाती है, फिर संवाद लिखे जाते हैं तथा उन संवादों के आधार पर पूरे नाटक का ताना-बना कैसे बुना जाता है।
“उन्होंने पहले हमारे सपनों के बारे में पूछा। किसी ने कहा, मैं टीचर बनना चाहती हूँ। किसी ने कहा मेरे पास बड़ा सा मकान हो।एक लड़की ने कहा, पापा मुझे आगे नहीं पदाएंगे, मुझे इस बात का डर है। इस प्रकार हमने डर टॉपिक चुना। खाना खाकर दो बजे हॉल में बैठ गए और गाना गया। सर ने हमें डर टॉपिक पर कहानी बनाने को कहा। हमसे पूछा कि हमे किस-किस से डर लगता है? हमने लड़कियों की सहायता से उसे नोट किया और अब इसी की सहायत से हमें कहानी बनानी है। कहानी किस प्रकार बनाते हैं, छोटा सा गेम खिलाया गया ताकि पता चले लड़कियों की कल्पना शक्ति कितनी तेज़ है। इस प्रकार डर पर ही गाना बनाने के लिए कहा गया।”
यहा विशेष रूप से उल्लेखनीय बात यह है कि लड़कियाँ पूरी प्रक्रिया में सक्रिय रूप से जुड़ रही थीं, शुरू से आखिर तक जिस भी रूप में काम आगे बढ़ रहा था उसे अपनी कॉपी में लिखती जा रही थीं ताकि कोई चरण  छूट न जाए। कौन क्या बनाना चाहती है, किसके क्या सपने हैं, किस-किससे डर लगता है। कहानी-निर्माण की प्रक्रिया में जब कोई लड़की वाक्य जोड़ कर आगे बढ़ती तो दूसरी लड़की झट से उसे लिख लेती। धीरे-धीरे टीम में सहयोग का ताना-बाना अपने आप खिंचने लग गया। इस प्रकार कहानी के संवाद व गीत पंक्ति दर पंक्ति बनते गए। अर्चना खारोल व नूरी खातून कहानी के पूरा होने पर आखिरी तय स्वरूप अपनी कॉपी में दर्ज़ कर लेतीं।
“बाद में हमने मुखौटे बनाने शुरू किए। सर ने बताया कि मुखौटे किस प्रकार बनाए जाते हैं। उखौटे जिस चीज़ से बनाए जाते हैं, उसे जिप्सोमा कहते हैं। सर ने एक लड़की के चेहरे पर मुखौटा बनाकर दिखाया। सबसे पहले जिप्सोमा की पट्टी को थोड़ा-थोड़ा व छोटा काट दिया। फिर एक कटोरी में पानी भर लिया। पहले लड़की के चेहरे पर आँवले का तेल लगाया ताकि मुखौटा चिपके नहीं। फिर जिप्सोमा को जल्दी से भिगोकर चेहरे पर लगा दिया। इस प्रकार आँख, होंठ आदि को ध्यान में रखते हुए मुखौटे बनाए। फिर ये लड़कियों ने एक दूसरे पर बना कर देखे।इस प्रकार सात मुखौटे बना लिए।”
मुखौटे बनाने की शुरुआत में मैं जिप्सोमा की पट्टियाँ काट रहा था और संजय उसे एक लड़की के चेहरे पर लगा कर लड़कियों को दिखा रहे थे। इस दौरान समझ में आ रहा था कि लड़कियाँ किस कदर यह काम अपने हात में लेने को आतुर हैं। अभी मैंने कोई दस पट्टियाँ ही काटी होंगी कि एक लड़की ने कैंची मुझसे ले ली, “लाओ, यह तो मैं कर लूँगी।” संजय ने एक मुखौटा अभी पूरा ही किया था। उससे पहले ही छ:-सात लड़कियाँ अपने चेहरे पर तेल मल कर तैयार थीं और इतनी ही लड़कियाँ उनके चेहरे पर मुखौटे बनाने के लिए तैनात हो गईं। सब अपनी-अपनी कल्पना के हिसाब से मुखौटों को उभारने में जुट गईं। एक लड़की ने कहा, सर, मैं भौंहे बना दूँ। एक लड़की ने माथे पर तिलक भी उकेर दिया। उतार कर मुखौटे सूखने के लिए रख दिए। सूखने के बाद रंग करने की बारी थी। सब अपनी-अपनी कल्पना के रंग भर रही थीं। अचानक एक लड़की ने कहा, “अरे, यह कैसे पता चलेगा कि कौनसा मुखौटा आदमी का है और कौनसा औरत का?” तभी, एक लड़की ने मुखौटे पर काली स्याही से घुमावदार मूंछें लगा दीं और मुखौटे को हवा में लहराते हुए कहा, “अब बन गया आदमी!”
लड़कियों के प्रतिवेदन से यह बात साफ़ है कि वे जहां एक ओर गतिविधियों में सक्रिय रूप से शामिल थीं, वहीं दूसरी तरफ तटस्थ रूप से प्रक्रिया को देख कर विश्लेषण कर रही थीं। साथ में, वे यह कयास भी लगा रही थीं कि कौनसी गतिविधि किस उद्देश्य के लिए कारवाई गई थी। 
इन अनुभवों का प्रकाशन संधान द्वारा प्रकाशित किया जा चुका हैजिसे पीडीएफ़ में पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक कर सकते हैं - नाटक : संभावनाओं का मंच   
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दलीप वैरागी 
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