Wednesday, April 25, 2018

नुक्कड़ नाटक : होश में कब तक आएंगे ?



(मंच पर चार अभिनेता अलग-अलग मुद्राओं में मूर्तिवत खड़े हैं । एक अजनबी सा उनको बड़ी गौर से देखता है।
 “अरे भाई, आप कौन हैं .....? दो तीन बार बोलता है।”
“ कौन हम ?”
“हाँ तुम”  
“मैं एक लैब टैकनीशियन हूँ। सुबह 9 बजे से  शाम 5 बजे तक लैब में सेंपल चेक करता हूँ। देर शाम 7 तक बजे तक मरीजों को रिपोर्ट सोंपकर जल्दी से निकलता हूँ...”
“मैं एक शिक्षक हूँ। सारा दिन बच्चों को पढ़ाता हूँ । छुट्टी के बाद बच्चों ग्रहकार्य की कॉपियाँ संभालते कर रेक में रखते हुए मोटरसाइकिल के जल्दी से किक मारता और वहाँ से निकल पड़ता हूँ ...”
“मैं एक कंपनी का एम्पलॉय हूँ कई बार टार्गेट पूरा करते – करते छूटने में बहुत देर हो जारी है।”
“मैं खाद्य विभाग में बाबू हूँ। किसानों द्वारा लाई गई अनाज की बोरियाँ गिनने में कब शाम हो जाती है, पता ही नहीं चलता...”
 “मैं शहर का एक मध्यम दर्जे का व्यवसायी हूँ, जीएसटी के वाउचरों का जोड़ मिलाते कब दिन छिप जाता है पता ही नहीं चलता ...”  
कोरस : “नई बात क्या है, इसमें?”
“बात तो है”
“है ...... है........ जी ...... बात तो है...”
“बड़ी लंबी कहानी है ....”
कोरस : एक बात है  जो बहुत पुरानी है
इसमें राजा है न रानी है ,
चीनी  ना जापानी है
हिंदुस्तानी बात है ये,
पर शर्म से पानी पानी है।    
एक बात है जो बहुत पुरानी है
“अरे चुप भी करो बेशर्मों। ये बताओ कि असली बात क्या है ?”
“बात ये है कि.......”
“बोल भी यार .....”
“हट शर्म आती है”
“अरे भाई ऐसा काम ही क्यों करते हो जिसमें शर्म आए।”
“मुझे नहीं तुझे आएगी।”
“जब हमसे कोई पूछता है कि आप क्या करते हैं तो पता है कि हम क्या कहते हैं?”
“यही कि ....
कोरस : कैसे कहूँ दूँ जान, मैं ऐसा क्यूँ करता हूँ।
करता नाटक हूँ मैं ऐसा क्यूँ कहता हूँ ।
ओ तेरी ... ओ तेरी ... ओ तेरी  ......
धत्त तेरी... धत्त तेरी ... धत्त  तेरी... 
“अरे भाई! सारी दुनिया ही नाटक करती है।”
“काश ऐसा होता !”
“अरे भाई, वो वाला नाटक नहीं...”
“तो कौनसा नाटक ?”
“नाटक मल्लब अंधा युग, आधे अधूरे, घासीराम कोतवाल .... मल्लब डिरामा।”  
“ये तो वही बात हुई न । पर्यायवाची...”
“अरे भाई हम थियेटर करते हैं – थियेटर।”
“तो सीधा कहो न भाई हिन्दी में कि थियेटर करते हो।”
“अरे भाई टाइम खराब कर दिया। वही तो देखने जाए रहे थे। एक ठो  टिकटवा भी खरीदे हैं। अब लगता है कि सब बर्बाद हो गया। सत्यानाश हो गया। आप ही लोग करेंगे क्या वहाँ अंदर नाटक?”
“अंदर नाटक करने की हमारी औकात नहीं।”
थोड़ी देर यहाँ यहाँ भी रुकिए।
थोड़ा नुक्कड़ की तरफ भी झुकिए” 
“हटो जी, अंदर जाने दो।”
कोरस : अरे भाई रुकिए वहाँ अभी अभिनेता तैयार हो रहे हैं।”
“अभी चेहरे पर फाउंडेशन मल रहे हैं।”
“ढीली कुर्ती को सील रहे हैं।”
“संवाद याद करते –करते हिल रहे हैं।”
“डिरेक्टर ऑडीटोरियम के मालिक को पंखा झल रहे हैं।”
“वैसे अंदर चलता एसी है, पर उसकी भी  ‘ऐसी की तैसी है’
“साउंड सिस्टम भी वैसी है। ”
“लाइट सन सत्तर के जैसी हैं। ”
“पर नाटक एक दम टन्न है।”
“कहानी भी गुरु ए-वन है।”
 “हीरोइन सना सन्न है....”
“डाइलोग दना दन्न हैं।”  
“यार तुम लोग
मुद्दे से भटकाते हो खूब
बातें यूं बनाते हो खूब
सीधी साफ बात कहो
कि नाटक-वाटक  क्यूँ करते हो?”
कोरस : क्यूँ करते हो, क्यूँ करते हो ?
नाटक –वाटक क्यूँ करते हो
सरकारी नौकरी भाई नहीं क्या
ऊपरी  इन्कम आई नहीं क्या
होती तेरी सगाई नहीं क्या
नुक्कड़ गली में फिरते हो
यूं ज़िल्लत में क्यूँ मरते हो
भाई, नाटक-वाटक क्यूँ करते हो
क्यूँ करते हो, क्यूँ करते हो
नाटक वाटक क्यूँ करते हो?
काम से अपना काम रखो तुम
शाम को चाहे जाम रखो तुम
चाहे तो आठों याम रखो तुम  
जेब में  झंडू बाम रखो तुम
सुबह रखो तुम शाम रखो तुम
हाँ- हाँ – हो – हो – हो हो....... हांफने लगते हैं ।
यूं मारे – मारे क्यूँ फिरते हो
दर्द में अपने क्यों घिरते हो  
क्यूँ करते हो, क्यूँ करते हो
नाटक वाटक क्यूं करते हो।
“लो भाई अब दो जवाब!”
“तो सुन”
 “सुना”
कोरस : सुनो सुनो अरे मेरे यार सुनो
मेरी रख के कान पुकार सुनो
जब नाटक कोई भी होता
उसमें एक हँसता है इक रोता है।
चाहे कहानी कोई भी हो
जागी हो या सोई भी हो  
झगड़े की हो, टंटे की हो
चाहे संते की हो, बंते की हो
हम बात पते की करते हैं ... क्यूँ करते हैं क्यूँ करते है ...  
इसमें लाख टके की बात है
नाटक ज़िंदगी के साथ है
इसकी निराली  रीत है
प्यार है इसमें प्रीत है
यहाँ धड़कनों के गीत हैं
रंग जज़्बातों में भरते है ... क्यूँ करते है क्यूँ करते हैं...
छोटा कब हो जाए बड़ा
पड़ा सड़ा भी हो जाए खड़ा
लड़ा  हुआ न लगे लड़ा
कौन बड़ा जी कौन बड़ा
छोटा है और  कौन पड़ा
बड़ा यहाँ न बहुत बड़ा
पड़ा यहाँ न बहुत पड़ा
आदमियत पर रहा अड़ा 
इंसानियत पर सदा खड़ा
वही बड़ा है वही बड़ा
हर नाटक में वही जड़ा
इस धुन में हम रहते हैं ..... क्यूँ करते हैं.....
“अरे अब तो समझ में आया बुद्धू?”
“क्या भाई”
कौरस : यही कि हम ...
क्यूँ करते है, क्यूँ करते हैं
नाटक वाटक क्यूँ करते हैं .....
“चुप... चुप ... बहुत हो गई नौटंकी ..... ये माना कि जो भी करते हो सही करते हो। तुम नाटक करते हो। भले ही मारा -मारा फिरते हो। ... परंतु नाटक करते कहाँ हो ?”
“वाह प्यारे मिल गया... कुंजी वाक्य मिल गया ... देर से आया लेकिन असली सवाल पे तो आया - “कहाँ करते हो नाटक?”
“यह सबसे बड़ा सवाल है।”
“यक्ष प्रश्न है।“
“मन करता है तुझे झप्पी दूँ
एक प्यार से पप्पी दूँ”  
“ये सवाल नहीं सवाल का भी बाप है
 जिसकी कीमत सवा लाख है”
“मतलब ?”
“सीधा बताऊँ या घूमा के ?”
रो के बताऊँ या गा के
या फिर जीएसटी लगा के!”
“जो सस्ता हो वही बता ?”
“सीधा मतलब यह है कि वह जो बिल्डिंग दिखाई दे रही है न ...”
“मोती डूंगरी ?”
“उससे भी आगे ?”
“उससे आगे तो सूरज है !”
“ज्यादा ऊपर नहीं नीचे देख।”
“भवानी तोप !”
“उससे पहले”
 “इंद्रा गांधी स्टेडियम”
“अब रोड पार कर ले”
“अरे यार बड़ी अजीब सी बिल्डिंग है... बाहर चाय की थड़ी वाले कहते हैं कि सरकार ने जाने क्या सांची का स्तूप बना दिया? क्या नाम है उसका ..... प्रताप औडिटोरियम ?”
(फ्लैश बैक)
(अचानक समूह एक शोर में बदल जाता है....जुलूस की शक्ल में आ जाते हैं )
“ले के रहेंगे, लेके रहेंगे”
“औडिटोरियम लेके रहेंगे ..... रंगकर्म जिंदाबाद .... जिंदाबाद ... जिंदाबाद”  
(जुलूस आगे बढ़ता है जाता है ....)
रंगकर्मी : दोस्तो हम नाटक करने वाले हैं। हम जनता में जागरूकता लाने के लिए ... संस्कृति को बचाने के लिए .... मानवीय मूल्यों के लिए नाटक करते है... लेकिन नाटक कहाँ करें ? जय रंगकर्म।”
नेता : संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए हमने मास्टर प्लान बनाया है। तालियाँ
रंगकर्मी : नेता जी, हमें मास्टर प्लान की नहीं औडिटोरियम की जरूरत है। जय रंगकर्म!”
नेता : हम आपकी मांग को अगली, नहीं, अगली  से अगली पंचवर्षीय योजना में प्रमुखता देंगे । तालियाँ
रंगकर्मी : पिछले 10 साल से यह न्यूतेज टाकीज़ बंद पड़ा है यही दे दीजिए। हम इसमें ही नाटक कर लेंगे। इसमें चूहे पल रहे हैं।
नेता : स्वगत। करोड़ों की प्रोपर्टी पे निगाह है कमबख्तों की। जाहिर। हमने फैसला किया है कि आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित एक औडिटोरियम का निर्माण नाटक करने वालों के लिए किया जाए। ये रहा उसका ब्लू प्रिंट। तालियाँ बजाओ कमबख्तों...
(फ्लैश बैक समाप्त)  
“ओ तेरी कि .... तो ये छछूंदर के सर पे चमेली का तेल। ये तुम्हारे नाटक करने के लिए बनाया गया है !”
कोरस : चुप । मज़ाक मत बना। हाँ, यह नाटक करने के लिए बनवाया गया था।
“लेकिन इसमें नाटक करने के अलावा सारे नाटक हो सकते हैं।”
“छूछक, भात, लेडीज संगीत, एनवल फंक्शन, फैशन परेड ..... लेकिन नाटक नहीं।”
 “क्यों?”
“इसमें नाटक करने की फीस लगती है .... पता है कितनी लगती है ?”
“कितनी ?”
“एक ... लाख... रुपये ....”
“एक लाख रुपये ..... इतने में दो भैंस आ जाएँ .... छोरी की सगाई हो जाए..” (बेहोश होकर गिर जाता है।)
“इसे पानी पिलाओ”
“जूता सुंघाओ”
 “दोस्तो इसकी चिंता नहीं करें। इन्हें थोड़ी देर में होश आ जाएगा। यकीन मानिए । हमें भी पहली बार सुनके ऐसे ही गश आया था। लेकिन होश आ गया था।”
“लेकिन आपको होश कब आएगा ?”
 “ये जो बिल्डिंग खड़ी है इसकी नींव की एक –एक ईंट पर एक वादा लिखा है। वादा इस शहर के रंगकर्मियों के लिए, वादा इस शहर के वाशिंदों के लिए कि शहर के रंगकर्म को बढ़ावा देने के लिए उनको औडिटोरियम उपलब्ध करवाया जाएगा।”
“आज इस इमारत की दीवार पर हर सिम्त एक वादाखिलाफी पुती हुई दिखाई  देती है। वादाखिलाफी इस शहर के रंगकर्मियों के साथ। वादाखिलाफी इस शहर के कला प्रेमियों के साथ, वादाखिलाफी इस शहर के मतदाताओं के साथ। मैं इस वादाखिलाफी को लानता भेजता हूँ, मेरे शहर के मतदाताओं आप को होश कब आएगा?
( street play, Nukkad Natak)
लेखन -  दलीप वैरागी  

 9928986983 

 










Monday, April 2, 2018

दूसरे के जूते में पैर रख के देखो


मैंने यह व्याख्यान 27 मार्च 2018 को विश्व रंगमंच दिवस पर रंग संस्कार थियेटर ग्रुप द्वारा  आयोजित विचार गोष्ठी में दिया था । 

"क्षेत्रीय संस्कृतियों के योगदान में रंगमंच का योगदान" इस कथन के इम्प्लिकेशन क्या हैं? एक रंगकर्मी होने के नाते मेरा यह धर्म है कि उन्हें पहचान कर बात आगे बढ़ाई जाए। एक मान्यता तो यह है कि है हम सब क्षेत्रीय संस्कृतियों को वैल्यू करते हैं। यह बात बिल्कुल सही भी है। यदि यह सही है भी और होना भी चाहिए, परंतु सही होने के साथ-साथ इसका एक सियाह पक्ष भी है जो या तो हमें दिखाई नहीं देता या फिर हम उससे साक्षात्कार करने का साहस नहीं जुटा पाते हैं। जब क्षेत्रीयता के इस अधूरे पक्ष को लेकर हम आगे बढ़ते हैं तो फिर तो हमारे सामने ‘मराठा-मानुष’ सरीखी इसकी चरम अभिव्यक्ति का विस्फोट होता है। जब यह विस्फोट होता है तो राजस्थान में विभाजन के वक्त आए पुरुषार्थी सिंधी-पंजाबी अपने ही मुल्क में शरणार्थी कहलाते हैं और उनको खुद के पुरुषार्थ को उदाहरण बनाने में आधी से ज्यादा सदी लग जाती है। केवल अपने श्रम की सामर्थ्य साथ लिए आजीविका की तलाश में आया कोई भी पूर्वी भारतीय जब राजस्थान आता है और कैसे ‘बिहारी’ की जातिवाचक संज्ञा  को प्राप्त करता है। जब यह तथाकथित ‘बिहारी’ जब लुधियाणा या जालन्धर के किसी स्टेशन  पर उतरता है तो ‘भईया’ की संज्ञा पता है। जब उसे इस संज्ञा या विशेषण से संबोधित किया जाता है तो उसकी ध्वनि को नहीं बोलने वाले के चेहरे को पढ़ें तो जो चाक्षुष बिम्ब हमारे मानस पटल पर बनता है, वह हमारी तथाकथित क्षेत्रीय सांस्कृतिक विकास की अवधारणा की कलाई खोल देता है। हमने किस तरह की क्षेत्रीय संस्कृति की पहचान विकसित की है जो किसी अन्य सांस्कृतिक पहचान के साथ सहअस्तित्व को बर्दाश्त नहीं कर सकती?
इस तरह का क्षेत्रीय सांस्कृतिक विकास जल्दी ही राजनैतिक नारों से  खाद पानी प्राप्त कर लेता है और देश की अखंडता के समक्ष चुनौती बन कर खड़ा हो जाता है। फलतः बिहार से आया ऑटो चालक मुंबई में अपनी पूर्वी मिश्रित अनगढ़ मराठी बोलते हुए भी मुंबई से बाहर लतियाया जाता है। उत्तर पूर्व से आए हुए विद्यार्थियों पर राजधानी में ही हमले होते हैं। ये क्षेत्रीयता की कौनसी संस्कृति हमने विकसित कर ली है? क्या इस शब्दावली को और गहरे से समझे जाने की जरूरत हैं। क्या क्षेत्रीय सांस्कृतिक विकास की क्या कोई सार्वभौमिक अवधारणा है भी क्या? क्या इस तरह के सांस्कृतिक विकास का चरम बिन्दु सांस्कृतिक श्रेष्ठता की मनोग्रन्थि में परिणत तो नहीं हो जाता! यह सवाल बेचैनी पैदा करता है।
कहीं अब तक के विमर्श में आपने मुझे एक यूनिफ़ोर्मिक कल्चर का पक्षधर तो नहीं समझ लिया। जी नहीं मैं इन दोनों एक्सट्रीम छोरों पे तो नहीं हो सकता, यदि हो भी तो इन दोनों के कहीं दरम्यान। हम सब जानते हैं कि भारत की संस्कृति बहुलतावादी है। यहाँ कई स्तर की विविधता है। इस वैविध्य के पीछे निस्संदेह भारत का बहुलता  भरा प्राकृतिक भूगोल है। इस भूगोल ने छोटे-छोटे अंचलों में अपनी-अपनी जीवन शैलियों और जीवन दर्शनों को पनपने में मदद की। भूगोल की चुनौतियों के पार जाने की फितरत इंसान की हमेशा रही है। बह भूगोल की बाधाओं को पार करके दूसरे लोगों से इंटरेक्ट करता रहा है। इसके साथ ही अपनी स्थानीय पहचान को लेकर असुरक्षा बोध की बेचैनी भी पाले रहा है। वह अपने दायरे बनाता भी रहा है कई बार दायरों से बाहर झाँकता भी रहा है। अपने दायरों का अतिक्रमण, इंसान के स्वभाव का यही पहलू उसे वैश्विक मानव भी बनाता रहा है। भारतीय इंसान के चरित्र का यही बिन्दु जहां उसे स्थानीयता के प्रति अनुराग के साथ भारतीयता का भाव भी देता है जो कभी अपने पूर्ण उद्दात  रूप में “वसुधैव कुटुम्बकम्व”  की अभिव्यक्ति कर बैठता है।  आज मनुष्य ने विज्ञान व तकनीक में इतनी तरक्की कर ली है कि उसने मरुस्थल, पर्वत, जल और अब अन्तरिक्ष इत्यादि भौतिक भूगोल की बाधाओं पर जीत हासिल कर ली है। स्थूल चुनौती हट चुकी है। अब इंसान ने भौतिक भूगोल की बाधाओं के स्थान पर वैचारिक संकीर्णताओं के कृत्रिम भूगोल के पहाड़ खड़े कर लिए हैं जो संस्कृतियों में वैमनस्य के संकट पैदा कर रहे हैं। यह संकट कृत्रिम है। तो फिर रास्ता क्या है?
दूसरे के जूते में पैर रख कर देखो।
एक मात्र रास्ता है रंगमंच, जो सर्वसुलभ भी है। रंगमंच कभी किसी एक क्षेत्रीय संस्कृति को लेकर नहीं चल सकता। रंगकर्म की अपनी ही एक संस्कृति है। इस संस्कृति के मूल्यबोध वैश्विक हैं, सार्वभौमिक हैं। इस मूल्य का प्रस्थान बिन्दु है इंसानियत। जिसके केंद्र में इंसान है। वह इंसान जो एक ही समय में सबसे अलग अद्वितीय भी है और सबके जैसा भी। इंसानियत के ये मानी देशकाल की सीमाओं से बाधित नहीं होते।
दरअसल रंगमंच किसी एक क्षेत्रीय संस्कृति को लेकर आगे नहीं बढ़ता है। दरअसल वह अपनी संस्कृति के उन सार्वभौमिक मूल्यों की स्थापना करता चलता है। जिसका केंद्र बिन्दु इंसान है और उसकी इंसानियत। इंसानियत को समझने का एक ही नुक्ता है और वह रंगमंच के पास है - "दूसरे के जूते में पैर रख कर देखो।" जब तक आप किसी भी स्थिति को दूसरे अर्थात विरोधी के दृष्टिकोण से नहीं देखेंगे तब तक आप न दूसरे इंसान को समझ सकेगें और न इंसानियत को। नाटक तो दूसरे के दृष्टिकोण से देखने से भी दो कदम आगे जाकर दूसरे की जिंदगियाँ जीकर देखने के अवसर देता है। दूसरे के हर्ष-विषाद को स्वयं के स्तर पर भोगने के मौके देता है।
मुख़तसर में कहे तो नाटक किसी संस्कृति के उत्थान में योगदान देता है या नहीं पर इतना अवश्य करता है कि वह अपने से अलग दूसरे की संस्कृति को समझने के अवसर, दृष्टि देता है व अपने से भिन्न का अहतराम करने का जज्बा देता है। एक दूसरी बात यह कि नाटक देखने से संस्कृतियों की समझ तो आ सकती है लेकिन भिन्न को समझ कर उसका सम्मान करने या अंगीकार करने का सामाजिक स्वीकार तो नाटक में डूबने से आएगा। जब नाटक का प्रदर्शन होता है तब, दर्शकों पर इसकी फुहार मात्र ही पड़ती है। सागर में गौते तो रंगकर्मी ही लगाता है। वैसे रंगकर्मियों में भी ऐसे कई हैं जो बरसाती पहन कर पानी में उतरते हैं। हममें से भी अधिकतर अपनी पकी हुई उम्र में रंगकर्मी बने हैं। इसलिए अक्ल दाढ़ देर से उगी है या उग रही है।  हममें से कितने हैं जिन्हें बचपन से ही इसी प्रक्रिया में ढाला गया था? मेरा मानना है कि यदि अपने से भिन्न की समझ, सम्मान या स्वीकार का जो सर्वभौमिक सांस्कृतिक मूल्य है वह तभी स्थापित होगा जब नाटक को प्रारम्भिक शिक्षा से जोड़ा जाएगा। यही मूल्य क्षेत्रीय समुदायों की पहचानों को सम्मान व स्वीकार प्रदान करेगा। ये मूल्य किताबी पाठों के कोरे सुभाषितों "अनेकता में एकता भारत की विशेषता" की तोता रटंत प्रक्रियाओं से नहीं आएगा। बल्कि इसे खोलकर इसके निहितार्थ समझकर ज्ञान आधारित व्यवहार करने के जीवंत अभ्यास देने होंगे। जीवंत अभ्यास देने का माध्यम रंगमंच से बेहतर और कोई नहीं हो सकता है।
मुझे आश्चर्य होता है कि नाटक शिक्षा के लिए जितना जरूरी है वह उतना ही शिक्षा व्यवस्था से बहिष्कृत है। यह उस देश में हो रहा है जिस देश में नाट्यशास्त्र जैसा ग्रंथ लिखा गया हो। नाट्यशास्त्र के पहले ही अध्याय में इसके रचयिता ने इसके उद्देश्यों में स्पष्ट कर दिया है कि इसका प्रमुख हेतु शिक्षा है। उम्मीद है कि इस गोष्ठी में शिक्षक प्रशिक्षण से जुड़े लोग भी मौजूद हों। मैं पूछता हूँ कि आपमें से कितनों ने नाट्यशास्त्र को शिक्षाशास्त्र के रूप में पढ़ाया या देखा?  नाट्यशास्त्र शिक्षा शास्त्र के रूप में पढ़ाना तो दूर आज भी नाटक स्कूल में सह-शैक्षणिक गतिविधि के तौर पर ही सिमटा हुआ है। आज भी शिक्षा व्यवस्था में शिखर पर बैठे लोग नाटक को टूल ऑफ पेडागोजी मानने को ही तैयार नहीं। मैं बांसवाड़ा में आदिवासी लड़कियों के लिए संचालित एक सरकारी स्कूल में बच्चियों व शिक्षिकाओं के साथ नाटक की कार्यशाला कर रहा था। उस कार्यशाला में हम यह प्रयोग कर रहे थे कि कैसे नाटक को दैनिक शिक्षण का तरीका बनाया जाए। दुर्योग से शिक्षा विभाग के स्टेट ऑफिस से एक अफसर स्कूल का निरीक्षण करने पहुंचे। स्टाफ को एक घंटा बैठा के डांटते रहे कि आप तीन दिन से तथाकथित पढ़ाई लिखाई बंद करके केवल नाटक करवा रहे हैं। जब महानुभाव को यह बताया गया कि यह जो भी हो रहा है सरकार के साथ MOU के तहत हो रहा है और जो हो रहा है आपको उसकी मुख़तसर जानकारी व समझ भी होनी चाहिए।  

रंगकर्मी और शिक्षक अलग-अलग गृह के निवासी हैं
शिक्षा में नाटक के न होने की विडम्बना भी यही है। रंगकर्मी शिक्षक या शिक्षाविद नहीं और शिक्षक रंगकर्मी नहीं है। दोनों में आदान-प्रदान भी नहीं है। जब स्कूल में वार्षिक उत्सव होता है तब चार दिन के लिए रंगकर्मी को बुलाया जाता है। टीचर अपनी क्लास रंगकर्मी को सोंप कर दूसरे कामों में लग जाता है। जब कभी संयोग से कोई रंगकर्मी टीचर बन जाता है तो वह अपने “टीचर” व “रंगकर्मी” को प्रेक्टिस में तो रखता है लेकिन जुदा-जुदा। जब टीचिंग करता है तो अपने रंग कर्मी को बाहर जूते की तरह खोल आता है। जब बच्चों को नाटक करवाता है तब अपने शिक्षक को कोट की तरह कुर्सी पर टाँग आता है।
यह काम तभी हो सकता है जब रंगकर्मी व शिक्षक फुर्सत निकाल कर साथ बैठेंगे। साझा शैक्षिक नियोजन करेंगे। जब रंगकर्मी नाट्य प्रक्रिया शुरू करे तो शिक्षक प्रक्रिया का अवलोकन करे कि बच्चों में ऐसे कौनसे व्यवहारगत बदलाव अनपेक्षित रूप से हो रहे हैं, जिनको शिक्षक अपनी शैक्षणिक प्रक्रियाओं में देखना चाहता है। उसके उलट, जब शिक्षक अपना शिक्षण करे तो रंगकर्मी शैक्षिक प्रक्रिया को देखे कि उन अवधारणा को समझने में बच्चों को कहाँ मुश्किल आ रही है, इन्हें किन नाट्य प्रक्रियाओं से आसानी से बच्चे समझ सकेंगे।
ये प्रयोग किसी स्कूल में शुरुआती तौर पर कर पाना बहुत मुश्किल है। क्योंकि इस तरह के प्रयोग में गिजुभाई को भी कम मुश्किले नहीं आई थीं। वही मुश्किलें जिनका जिक्र मैं ऊपर कर चुका हूँ। यह काम करने का स्पेस, मौका और स्वतन्त्रता जितनी शिक्षक प्रशिक्षण विद्यालयों में हो सकती है उतनी कहीं नहीं। ये संस्थाएं प्री-सर्विस व पोस्ट सर्विस शिक्षक के काम को प्रभावित करती है।  इसलिए यह काम को शुरू करने का सबसे बढ़िया मंच ये संस्थाएं ही हो सकती हैं। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय ऐसा करेगा हमें यह उम्मीद जल्दी ही छोड़ देनी चाहिए। उसके तो राष्ट्रीय स्वरूप पर भी प्रश्न चिह्न लगते रहे हैं। उसने एक अलग ही तरह की संस्कृति विकसित की है। उसपर चर्चा विषयांतर हो जाएगा। नाटक शिक्षाशास्त्र हो सकता है शुरू में मुझे भी यह विचार किताबी लगता था लेकिन जब-बच्चों व शिक्षकों के साथ काम करते हुए इसमें डूबा तो वास्तविक अनुभव व आनंद महसूस किया।   

एक अनुभव दूसरे को समझना का
जिस कार्यशाला की बात मैं कर रहा था,  उसके अंतिम दिन ड्रेस रिहर्सल के वक़्त जब हम लड़कियों से मिले, सब के बीच तीन-चार लड़कियाँ टोपियाँ (स्कल कैप) पहन कर बैठी हुई थीं। ये मौलवी की भूमिकाएँ निभा रहीं थीं। हमारा स्वाभाविक सा सवाल था, ‘‘अरे वाह! ये कहाँ से लीं?‘‘ ‘‘हमने खुद सिली हैं।” ‘‘किसने सिली हैं?” इसके जवाब में मुझे उम्मीद थी कि मेहरून, हसीना, हिना या शहनाज़ का नाम आएगा, लेकिन, लड़कियों ने समवेत स्वर में कहा, ‘‘सर, सुनीता ने सिली हैं, ये सारी टोपियाँ।” अब हमारे लिए अटकलें लगाने के लिए बहुत कुछ था। क्या सुनीता टोपियाँ सिल सकती है, क्या सुनीता पहले से टोपियाँ सिलती रही है? या फिर नाटक बनाने की प्रक्रिया ने सुनीता को मजबूर कर दिया और उसने अपने आप उन्हें सिल दिया। दरअसल, इस दृश्य को इस तरह से भी होता हुआ देखा जा सकता है-सुनीता विद्यालय में सीखे अपने सिलाई कौशल से उत्साहित होकर मेहरून, हसीना, शहनाज़ व हिना से मिली होगी। जिस चरित्र के लिए टोपी सिली गई, उस पर बात हुई होगी, उससे परे मज़हबों पर भी बात हुई होगी। और, टोपी सिलते-सिलते कितने मज़हबी फ़ासलों की इन लड़कियों ने तुरपाई की होगी। कितने ही रिश्तों को रफ़ू किया होगा ? कौन कह सकता है, हमेशा साक्ष्यों की तलाश बेजा बात है। कुछ मामलों में हमें संभावनाओं को ध्यान में रख कर प्रक्रियाओं को छेड़ना भर है। कई बार परिणाम साक्षी होते हैं । साक्ष्य हमेशा हों, यह ज़रूरी तो नहीं।
नाटक के एक दृश्य में जब हसीना काठात अज़ान लगाती है तो उसकी सहपाठी दुर्गा मुसल्ला बिछा कर किसी मौलवी की तरह नमाज़ अदा करने लगती है। वही दुर्गा, जो एक दिन पहले नमाज़ के दृश्य में खुद को बहुत असहज महसूस कर रही थी ! लगभग इन्कार कर दिया था। फिर एक ही दिन में क्या हुआ? आज के दृश्य और कल की स्थिति के दरम्यान ज़रूर एक पूर्वरंग विद्यालय के आवासीय समय में रचा गया होगा। जो आपको दिखाई नहीं देखा आपके संतोष के लिए परिणाम है। यही स्थिति गणेश की आरती वाले दृश्य में थी। एक लड़की कोरस से निकल कर आगे आकर गणेश बनती है। बाकी लड़कियों का समवेत स्वर में आरती-गायन। नाटक का उद्देश्य हिन्दू या मुस्लिम धर्मों की उपासना पद्धतियों को देखना-सीखना नहीं हो सकता। बल्कि, नाटक दूसरे की जगह खुद को रख कर दूसरे के नज़रिए को समझना शुरु करता है, ताकि अपने धर्म के साथ-साथ दूसरे के धर्म का अहतराम कर सकें। दरअसल, इन नाटक खेलती लड़कियों की शक्ल में हिंदुस्तान के सेक्यूलर यानी धर्मनिरपेक्ष मुस्तकबिल का ब्लू प्रिंट दिखाई दे रहा है।

सारांश : सहज मार्ग नाटक 
निस्संदेह क्षेत्रिय संस्कृतियों के उत्थान के प्रयास होने चाहिए। और इसके लिए रंगमंच बेहतर माध्यम है। क्योंकि यह एक्शन थियरि – ज्ञान, भावना व कर्म तीनों को साथ लेकर चलता है। क्योंकि क्षेत्रीय संस्कृतियों का उन्नयन यदि मस्तिष्क की खिड़कियां खोलकर नहीं हुआ तो हम पूरी दुनिया में एक ऐसी जमात तैयार कर देंगे जो इतनी असहिष्णु हो जाएगी, परिणामस्वरूप कभी बामियान में बुद्ध की प्रतिमाएं गिराएगी, लेनिन या अंबेडकर की मूर्तियों  को उखाड़ेंगी, फिल्मों के पोस्टर फ़ाड़ेंगी, पेंटरों को और लेखकों को निर्वासित करवाएगी और अंततः गोली मारकर खामोश करने की कोशिश करेगी। इसकी सिर्फ और सिर्फ एक ही वजह है कि शिक्षा प्रक्रिया ज़िंदगी से आइसोलेशन में चल रही है। बच्चे विचारों को सूचनाओं की तरह ग्रहण कर रहे हैं। वैचारिक प्रक्रिया में ज्ञान का निर्माण नहीं कर रहे हैं। विरोधी विचार की कद्र करने के अभ्यास देने अब बंद कर दिए गए हैं। क्या यही थी इंडियन इंटेक्चुअल ट्रेडिशन? वैदिक शास्त्रार्थ को ही लें तो अपना विचार को प्रतिष्ठित करने से पहले विरोधी के विचार को वक्ता द्वारा पहले स्थापित करता था फिर उसकी सीमाओं पर बात होती थी तत्पश्चात अपने पक्ष की बात की जाती थी।
ये सभी ज़िंदगी की यथार्थ समस्याएँ हैं इनके हल ज़िंदगी के रास्ते पर चल कर ही निकाले जा सकते हैं। सिर्फ एक ही माध्यम है जो कक्षा में ज़िंदगी को संपूर्णता में उद्घाटित कर दे, वह नाटक है।  

दलीप वैरागी
मोबाइल:  9928986983
ई-मेल:  dalipvaragi@gmail.com



Wednesday, March 21, 2018

World Theatre Day : आओ, लोगों को नाटक का चस्का लगाएँ


International Theatre Day (अंतर्राष्ट्रीय रंगमंच दिवस) अगर जवाब है तो फिर सवाल क्या है? आज इस मौके पर रंगकर्मियों को उस सवाल को तलाश कर पकड़ना चाहिए। हाथ लगने पर सबसे पहले खुद पर  ही दागना चाहिए। तब कहीं जाकर यह दिन मनाने या न मनाने की सार्थकता समझ में आएगी। मेरा जब सवाल से सामना हुआ। उससे उपजी बेचैनी में कुछ जांच पड़ताल की तो पता चला कि कोई International Theatre Institute (ITI) नाम का एक गैर सरकारी संगठन है, जिसने यह दिन 27 मार्च को मनाने की शुरुआत की थी। सबसे पहला अंतर्राष्ट्रीय रंगमंच दिवस 1961 में मनाया गया था। तब से ITI इस दिन को मनाने की अगुवाई व अह्वान हर वर्ष करती है। विश्व भर में इसके लगभग 90 से ज्यादा क्षेत्रीय केन्द्रों व अनगिनत रंग मंडलियों द्वारा आयोजन किए जाते हैं। ITI हर वर्ष नाटक की किसी प्रसिद्ध हस्ती द्वारा लिखित संदेश जारी करती है। गौरव की बात यह है कि पिछले वर्ष 2018 यह रंग-संदेश भारत के  रंग निर्देशक राम गोपाल बजाज ने जारी किया था। इससे भी पहले 2002 में भी नाटककार गिरीश कारनाड ने भी यह संदेश जारी किया था।  इस वर्ष Theatre day message क्यूबा के रंग निर्देशक Carlos CELDRÁN ने जारी किया है।  
ये तो इतिहास की बात हो गई। लेकिन सवाल तो वहीं वर्तमान में है कि अंतर्राष्ट्रीय रंगमंच दिवस क्यों मनाया जाए ?
हम क्यों मनाएँ इस सवाल को चंद क्षणों के लिए होल्ड पे रखते हैं और पहले यह देखते हैं कि ITI क्या सोच कर इसे आधी से भी ज्यादा सदी से मानती चली आ रही है। ITI ने अपने उद्देश्य स्पष्ट कर रखे है -
  1.          दुनिया में जितने भी तरह का रंगकर्म हो रहा है उसे बढ़ावा देना।
  2.         रंगमंच की अहमियत लोगों को बताना।
  3.          सरकार व नीति निर्धारक रंगमंच की अहमियत को समझ कर इसकी मदद कर सकें, इसके मद्देनजर रंग मंडलियों को अपने काम बड़े स्तर पर प्रस्तुत करने में सक्षम बनाना।  
  4.          नाट्यकर्म करने में आनंद महसूस करना।  तथा
  5.          इस आनंद को दूसरों के साथ साझा करना

ऊपर बताए गए बिन्दुओं की रोशनी में हम अपने आयोजनों को भी देख सकते हैं। हो सकता इनमें से कोई एक बिन्दु आपको हो। दो-तीन या सब भी हो सकते हैं। ये भी हो सकता है कि आपके इससे दो अधिक भी हों। लेकिन किसी भी आलोक में आत्मवलोकन अवश्य करें कि क्यों मानना है। मनाने की वजह और तरीका भी अपना खुद तय करें।  
तरीके से याद आया कि एक तरीका चल निकला है ‘विचार-गोष्ठी’ वाला। इसके चल निकलने के पीछे ‘हींग और फिटकरी’ वाली कहावत यदि पूरी नहीं तो थोड़ी तो जरूर लागू होती है।  यह सच कि इस तरीके में ‘हींग और फिटकरी’ के इनपुट से तो बच जाते हैं लेकिन ‘चौखा’ ‘रंग’ भी तो नहीं चढ़ता। अब ‘रंग’ के अभिधा, लक्षणा और व्यंजना का कोई भी अर्थ लिया जा सकता है। सबको पता है कि गोष्ठी से रंग जमता नहीं, पर दिल है कि फिर भी मानता नहीं। गोष्ठी के लिए पचास जनों को बुलाओ, पंद्रह पहुंचेंगे, पाँच बोलेंगे बाकी चाहे तो सो लेंगे। इसके आउटकम के रूप में भी एक कहावत है जिसका सारांश आखिर ‘तीन पात’ ही होता है। अब आप कहेंगे कि कहावत की पूरी अभिव्यक्ति क्यों नहीं की जा रही है। वह इसलिए कि आपको तो पता है कि अभिव्यक्ति के खतरे बहुत हैं आजकल। आप पर तो भरोसा किया जा सकता है , लेकिन ‘ढाक’ तो बुरा मान सकता है कि भाई ‘तीन पात’ होने में उसका क्या कसूर!  
यह सवाल भी देखो कितना बहरूपिया है,  हमें यहाँ उलझा खुद कपड़े बदल कर आ गया। खड़ा है मेरे बर अक्स और पूछ रहा है कि किसको मानना चाहिए अंतरराष्ट्रीय रंगमंच दिवस? अरे भाई, जो मानना चाहे उसे मानना चाहिए। जिसका प्रदर्शन कला या नाट्यकला की ताकत में यकीन है, जिसका मनुष्यता में यकीन है। आप कहीं के भी हों कोई भी हों। यदि आप गाते हैं तो आज कोई नई तान छेड़िए। इंकलाबी हैं तो फेफड़ों में पूरी हवा भर कर जय रंगकर्म का नारा बुलंद कीजिए। स्कूल में कभी ड्रामा किया है तो अब शहर में भी कीजिए। किसी नाटक मंडली को जानते हैं तो उसे अपने शहर में भी नाटक करने को बुला लाइए। शहर में नाटक है तो देखने जाइए, साथ में किसी और को भी ले जाइए। चार पैसे हों और हाथ खुला हो तो रंगकर्म की तंगी दूर कर आइए। पढ़ते लिखते हैं तो आज कोई दास्ताँ मित्र मंडली में बैठ कर भावपूर्ण तरीके से सुनाइए। अभी तक देखने नहीं गए तो नाटक देख कर आइए। पसंद आए तो सराहिए नहीं तो नुक्ताचीनी ही कर आइए। यदि रंगकर्मी हो हजार तरीके से मनाइए।
यदि अकेले हो तो दो हो जाएँ। किसी तीसरे को भी ढूंढ लाएँ। हर नए को नाटक का चस्का लगाएँ। फिर भी कुछ समझ में न आए तो गोष्ठी करके ही सही लेकिन मनाएँ। आइये अंतरराष्ट्रीय रंगमंच दिवस मनाएँ। इसे सिर्फ रंगकर्मियों का दिवस न बनाएँ। अन्यथा रंगकर्मी इतिहास की विलुप्त प्रजातियों में शुमार होगी और प्रकारांतर से इंसानियत भी।
क्योंकि इंसानियत के साथ गलबहियाँ करते हुए अभिनय कला आई है, यह गई तो इंसानियत का क्या हो, कोई क्या जाने? यही मूल प्रश्न है ?

Tuesday, March 13, 2018

जीवन कौशल शिक्षा क्या है


शिक्षा आज इंसानी जरूरतों में सर्वोपरि है। इसी सोच के तहत इसे इंसान के बुनियादी अधिकारों में शुमार किया गया है। क्योंकि इंसान के रोज़मर्रा के सरोकार भोजन, सेहत, सौंदर्यबोध व व्यवहार  को शिक्षा गहरे से प्रभावित करती है या कर सकती है। इसलिए गुणवत्ता शिक्षा का एक पर्याय यह भी माना गया है कि इंसान ज्ञान आधारित व्यवहार करे। इस शब्दावली में दोनों ही शब्द काबिले गौर हैं। और सीधे ही पता चलता है कि कार्य दो स्तर पर अपेक्षित है।
इसी सन्दर्भ में जब हम मौजूदा शिक्षा प्रक्रिया को देखते हैं तो एक विडंबना साफ नज़र आती है कहीं ज्ञान का बोलबाला है तो कहीं केवल व्यवहार की उपदेशमाला है। ज्ञान को लेकर दृष्टिकोण भी सूचनाओं को किसी भांति रट लेने न कि उसके निर्माण अथवा उसकी निर्मिति के मनोवैज्ञानिक अप्रोच के तहत ग्रहण से है।
ज्ञान और व्यवहार के मध्य गहरी खाई  है। वहीं मनुष्य के समक्ष समस्याएं अपने वास्तविक रूप में वर्तमान हैं और ज्ञान का आभासी स्वरुप है, जो अजस्र (लगातार) भविष्योन्मुखी पर्वतारोहण सरीखा है। जब शिक्षा वर्तमान समस्याओं को अनदेखी करके आगे बढ़ती है, तो या तो उस प्रक्रिया से विश्वास और आनंद समाप्त होता है और टूटन आती है अथवा हम शिक्षा के संकीर्ण हेतु तलाश लेते हैं और उनके साथ आगे बढ़ जाते हैं। दोनों ही स्थितियों में जीवन के वास्तविक संघर्ष शिक्षा की जद से छूट जाते हैं।
हम पुनः शिक्षा के उसी सूत्र को पकड़ने की कोशिश करते हैं - शिक्षा दरअस्ल ज्ञान आधारित व्यवहार है। यह शब्दावली इंसानी फ़ितरत के दो अलग-अलग छोर पकड़ कर खड़ी है। इसके स्वरुप को समझना जितना आसान हो सकता है इनका परस्पर रूपांतरण एक बेहद जटिल मनोदैहिक (psychosomatic) प्रक्रिया है। इस मनोदैहिक सम्बन्ध को समझ कर उसे शिक्षाशास्त्र में ढालना ही जीवन कौशल शिक्षा का उपक्रम है।
कौशल और उसका निर्माण
औपचारिक शैक्षणिक प्रक्रियाओं में और कभी- कभी जीवन कौशल शिक्षा की प्रक्रियाओं में एक गफलत होने की सम्भावना रहती है कि वह कौशल में तबदीली तक न पहुँच कर मुद्दे की समझ तक ही न रह जाए। प्राय: मूल्यांकन प्रक्रिया में मुद्दे तक आसानी से पहुँच जाती है, व्यवहार तक पहुँचने के लिए फुर्सत वर्तमान मूल्यांकन प्रक्रियाओं में शायद नहीं है, फलस्वरूप प्रक्रिया को मुकम्मल समझ लिया जा सकता है।
कौशल एक मायने में इंसानी सक्रियता का बाईप्रोडक्ट होता है। यह इंसान की चेतन सक्रियता से प्रारम्भ होता है तथा उसकी गतियों-क्रियाओं के अभ्यास के नैरन्तर्य के पश्चात आदतों के रूप में अवचेतन में डुबकी लगा जाते हैं। आदतें मनुष्य के चेतन प्रयासों के पश्चात वे परिष्कृत क्रियाकलाप हैं जिन पर चेतना के नियंत्रण की जरुरत नहीं होती है। इसलिए वे अवचेतन को हस्तगत होते हैं। कौशल वह नियंत्रण है जो इंसान की आदतों या उनके अद्भुत समिश्रणों का प्रयोग किसी कार्य को साधने के लिए करता है। और यह नियंत्रण चेतना से ही किया जाता है। इस तरह कौशल इंसान के चेतन मन का फंक्शन है न कि अचेतन का। इंसान के व्यवहार में कौशल के स्तर पर पैठ के लिए जरूरी है कि उसकी सक्रियता के उत्स व प्रेरण को भी समझा जाए।
ये रूपांतरण जटिल है तो फैसियानेटिंग भी है। यह हर प्रकार के कौशल के लिए सामान है।
बुनियादी जीवन कौशल क्या हैं?
यह निर्धारित करने का विषय स्वयं व्यक्ति का जीवन ही है। इसके आगे यह भी तय करना होगा की जीवन की कौनसी समस्याएं हैं जो उसे गहरे प्रभावित करती हैं। शायद यह भी देखना होगा कि क्या इन समस्याओं में कोई पैटर्न है। ऐसी कौनसी समस्याएं हैं जो उम्र, देशकाल, वर्ग के हिसाब से कॉमन हैं। क्या इनको हल करने के लिए कॉमन संक्रियाएं निर्धारित हो सकती हैं। यदि हाँ, कहीं ये मूलभूत संक्रियाएँ बुनियादी जीवन कौशल तो नहीं। जब हम ऐसे कौशल को पाते और देखते हैं जो बहुत बुनियादी किस्म का हो तो वह निसंदेह बाह्य की बनिस्पत आभ्यंतरिक ही होते हैं।
इंसान अपने जीवन में ज्यादातर जिन समस्याओं से दो चार होता है वे उसके अन्तर्वैयक्तिक संबंधो से जुडी होती है। इन समस्याओं को बेहतर समझने के लिए सोचने समझने के आधारभूत कौशल आधारभूत है। यूँ तो इंसान की विचार प्रक्रिया उसकी सहजवृत्ति है। वह बाह्य जगत को देखकर उसे विचारों में निरंतर रूपांतरित करता रहता है। सोचने समझने को कौशल जिसे रिफ्लेक्टिव स्किल की संज्ञा दी जाती है, वह इंसान की इस विचार प्रक्रिया को सौद्देश्य नियंत्रित व नियोजित करती है। यह एक व्यवस्थित वैचारिक परिघटना है, जिसे इंसान प्रयास व अभ्यास से अर्जित करता है। यह कौशल किसी नए अनुभव को अपने पूर्व अनुभवों व ज्ञान से जोड़कर समझने की सामर्थ्य प्रदान करता है। चूँकि इन अन्तर्व्यक्तिक संबंधो से व्यक्ति स्वयं भी जुड़ा होता है। इसलिए यह अपेक्षा रहती है कि वह तटस्थ होकर भावनाओं से निरपेक्ष स्थिति पर विचार करे।
इंसानी रिश्तों की भी बड़ी द्वंद्वात्मक स्थिति है। इनमें समस्याओं का जाला भी है तो साथ में सहयोग का ताना बाना भी है। इन सहयोग के सूत्रों को पकड़कर रिश्तों में सद्भवनापूर्वक सामंजस्य बैठना वह सामर्थ्य है जिसे प्रभावी सम्प्रेषण कौशल से ही हासिल किया जा सकता है।
सोचना समझना
सहयोग लेना व करना तथा
सद्भावपूर्वक रिश्तों के दरम्यान सामंजस्य बनाना।
ये तीन बुनियादी कौशल हैं जो निःसंदेह इंसान को सामर्थ्यवान बनाते है जिंदगी की राहों पर चलने के लिए।





अलवर में 'पार्क' का मंचन : समानुभूति के स्तर पर दर्शकों को छूता एक नाट्यनुभाव

  रविवार, 13 अगस्त 2023 को हरुमल तोलानी ऑडीटोरियम, अलवर में मानव कौल लिखित तथा युवा रंगकर्मी हितेश जैमन द्वारा निर्देशित नाटक ‘पार्क’ का मंच...