Saturday, January 28, 2017

गुड्डी गायब है उर्फ जनता ऊँचा सुनती है

बच्चों के साथ एक नाट्यानुभव 
शूज शफल” एक ड्रामा तकनीक  है, इसे जितनी बार बच्चों के साथ करो इसकी उतनी ही संभावनाएं खुल कर सामने आती हैं। करना कुछ नहीं, एक वस्तु लीजिए और बच्चों या अभिनेताओं के बीच रख दीजिए। अब उस वस्तु का प्रयोग करते हुए अभिनय करना है। शर्त यह है कि वास्तव में जो वस्तु है उसे वह वस्तु न मान कर कोई और वस्तु मानना है। केजीबीवी में 91 लड़कियां थीं। सभी को इस गतिविधि में शामिल करना ही था। निकटतम उपलब्ध वस्तु, एक थाली जो हॉस्टल में सहज ही उपलब्ध थी वह लड़कियों के घेरे के बीच में रखी गई। अब लड़कियों को बुलाया गया। यह क्या! कोई भी लड़की उठ कर नहीं आई। क्या बात है... गतिविधि प्रासंगिक नहीं है ... या ... मैं बता ही नहीं पाया ... एक बार फिर बताया गया ... बात जस की तस... अब खोट सामने वाले में देखने की बारी थी। शायद लड़कियों में झिझक बहुत है। क्यों न एक बार फिर अपने सम्प्रेषण को परखा और सीमाओं को देखा जाए, कई बार शाब्दिक सम्प्रेषण काफी नहीं होते। मैंने सभी लड़कियों को कहा कि इस गतिविधि को करने में पहला नंबर मेरा है। मैंने सामने पड़ी थाली को उठाया और उसे आईने की तरह सामने रख कर अपने बाल सँवारने का कार्य किया। मेरे बैठने से पूर्व एक लड़की खड़ी हो चुकी थी। उसने आरती की थाली बना दी। दूसरी लड़की ने भी पूजा जैसी कोई थाली बनाई। उससे कहा गया कि आप एक ही कार्य को दोहरा नहीं सकते। लड़की ने कहा कि यह अलग है, मैं यह थाली लेकर राखी बांध रही हूँ। एक लड़की आयी उसने थाली को थालीपने से सम्पूर्ण मुक्ति देते हुए बारिश में छाते की तरह औढ लिया। एक और लड़की ने उसे रोटी बेलने का चकला बना दिया। एक ने बैठने कि चौकी बना दी। एक ने कचरादान बनाया, एक ने फावड़ा, एक ने सुदर्शन चक्र... लैपटाप ... ढपली.... स्कूल की घंटी... कंघा... पंखा... कॉपी ... किताब... पर्स... बैग ... गिनती 91 तक जाती है... इस बीच नैनी, जो अभी पढ़ना लिखना सीख रही है, जिसके बारे में कहा जाता है कि शिक्षण प्रक्रियाओं में नहीं जुड़ पाती, वह अब तक तीन बार आ चुकी है और हर बार उसके उत्साह में गुणोत्तर वृद्धि हो रही है। कल्पना व सृजनशीलता की ऊष्मा से पिघल कर थाली तरलता में रूपांतरित हो चुकी थी और मन चाहे नाना आकारों में ढलने लगी थी।  अब लड़कियों को बुलाना नहीं पड़ रहा वे आ रही हैं... इससे पहले कि यह आइडिया तरलता से गैस में तब्दील होकर हवा हो जाए इसमें वैरिएशन (बदलाव) जरूरी है।
विचारों के मशरूम
मैंने बदलाव के आशय से लड़कियों से कहा कि यह गतिविधि तो बहुत सरल हो गई है। अब मैं इसे थोड़ा कठिन कर देता हूँ। चार-पाँच लड़कियों ने कहा जरूर कर दीजिए लेकिन एक–एक बार पहले इसे हमे पूरा करने दो। थोड़ी देर बाद मैंने थाली के पास ही एक छोटा बक्सा रख दिया, जो वहीं क्लासरूम में रखा हुआ था। थोड़ा सा विराम आया। कल्पना का विमान अब वैचारिक धरातल पर उतर चुका था। अब तक लड़कियां वस्तु को उसके आकार के अनुसार कल्पना के रंग दे रहीं थीं। अब वे दोनों वस्तुओं के अंतर्संबंध को देख रहीं थीं। उस वस्तु के आकार उपयोगिता व गुणधर्म आधार पर... फिर उसके साथ अपने शरीर को भी ढाल रही थीं। एक लड़की ने बक्से को लैपटाप बनाया तथा पास में रखी थाली से कुछ ले कर खाती भी जा रही है। एक लड़की ने बक्से को पूजा की वेदी बनाया तथा सामने पूजा की थाली रखी। अब थाली अपने मूल रूप की और लौट रही थी और बक्सा कल्पना के रंगों से रंगा जा रहा था। अब लड़कियों ने कहा कि आपने गतिविधि को कठिन करने की बजाए और सरल कर दिया। अब मैंने एक वस्तु कपड़ा भी रख दिया। मैंने कहा अब चाहें तो दो लड़कियां साथ मिल कर भी आ सकती हैं। चंद क्षण में ही लड़कियों के हाथ जुड़ कर जोड़ियाँ बनने लगीं। एक लड़की ने बक्से पर कपड़ा बिछाया, उस पर दूसरी को बैठा दिया तथा थाली में उसके पैर रख कर, पैरों को धोने का उपक्रम करने लगी। एक जोड़ी आई उसने बक्से व कपड़े की स्थिति में बदलाव किए बिना अपने साथी को उस पर बैठाया तथा थाली में से कुछ उठा कर बालों में मेहँदी लगाने का अभिनय किया... एक जोड़ी, भी वैसे ही लड़की को बक्से पर बैठाया, बैठी हुई लड़की के हाथ में थाली को आईने की तरह थमाया और उसकी चोटी बनाने का अभिनय करने लगी। ऐसा प्रतीत हो रहा था कि लड़कियां Photomontage तकनीक की विशेषज्ञ हों और मूल बैकग्राउंड  या झांकी के आगे कुछ इन्स्टाल या रद्दोबदल करके दृश्य को परिवर्तित कर रही हों। लड़कियों की जोड़ियाँ बदस्तूर आ जा रही थीं मंच पर से। उनके अभ्यासों में कथा तो अभी नहीं आई थी लेकिन एक सूत्र जरूर आ गया था जो उन्हे व मंच की वस्तुओं को न केवल बांधता था बल्कि पूर्व में लड़कियों द्वारा बनाए को, विध्वंस न करने की बजाए उसमे कुछ जोड़ता था। यहाँ नाटक की प्रवृत्ति साफ उभर कर सामने आ रही थी जो सहज ही व्यक्तियों को एक टीम बनने की और ले जाती है। मेरे पास बदलाव का और कोई विकल्प नहीं था सिवा इसके कि एक दो वस्तु और व्यक्तियों को जोड़ने की छूट दे दूँ। मैंने कहा कि इसे और कठिन (आसान ) करने जा रहा हूँ। मैंने अब कोने में रखी एक झाड़ू उठा कर मंच के बीच रख दी और लड़कियों से कहा कि अब कितनी भी लड़कियां आ सकती हैं। अब तक यह गतिविधि मूक रखी गई थी अब बोलने की बंदिश भी हटा दी गई।
दो-दो की टोलियाँ चार-पाँच के दल में संघनित होने लगे। चीज़ें बढ़ी व्यक्ति भी बढ़े। चीजों व व्यक्तियों की बढ़ोतरी की गर्मी व नमी पाकर विचारों के मशरूम ज़मीन तोड़ कर बाहर आने लगे। विचारों से कथाओं की कोंपले फूटती दिखाई देने लगीं। एक लड़की थाली को तकिया बना लेती हुई है। दूसरी ने उसको चादर औढ़ा दी है। एक उसे औझा को दिखाने ले जाती है। औझा झाड़ू से झाड़ फूँक करता है। एक और लड़की आकर उन्हे समझाती है और डॉक्टर के पास लेकर जाती है। इसी प्रकार और भी टोलियाँ आने लगीं। डॉक्टर उस सन्दूकची में दवाइयों को लेकर मरीज की जांच करता है। चीजों से विचार तथा विचारों से कथाओं की कोंपले फूटती दिखाई देने लगीं। शुज शफल की की गतिविधि जहां हमारा प्रस्थान बिन्दु था वहीं हमें लग रहा था कि बिना कोई बाह्य विचार लड़कियों पर थोपे महज़ चीजों के सहारे हम उसी मंज़िल तक सहज ही आ गए जहां पहुँचने के लिए लंबा सफर तय करना पड़ता है। यह अहसास होता है कि आमतौर पर हम जिन्हें जड़ वस्तुएँ मानते हैं, दरअसल वे ज़िंदगी की बुनावट साथ लिए रहती हैं। नाटक में अभिनेता का स्पर्श पाकर ये वस्तुएँ पुनर्नवा की तरह जीवंत हो उठती हैं। जितनी वस्तुएँ और व्यक्ति बढ़ेंगे वैचारिक सूत्र मूर्त से अमूर्त की बढ़ने  लगते हैं। जिंदगी उतने ही संस्लिष्ट रूप में नाटक की कथा के रूप में चल निकलती है अपने विराट रूप मे।
थोड़ी ही देर में पूरा समूह छोटी-छोटी टोलियों में ढलता दिखाई दिया। चूंकि चीजों का सेट एक था तो, पहले मैं, पहले मैं की अराजकता भी आई। एक बदलाव के तौर पर फिर एक मोड गतिविधि को दिया गया। सभी लड़कियों से कहा गया कि बाहर आँगन में जाएँ और जो चीज आपको दिखाई दे उसे लेकर आ जाएँ। चीजें इकट्ठी होने पर लड़कियों के  समूह बना दिये। सभी समूहों को अपनी लाई चीजों में से पाँच चीज़ें लेनी है व उनके साथ एक नाटक बना कर लाना है। 
समूह
वस्तुएँ
विचार
कथा का परिवेश
समूह 1.
कंघा, तेल, बाल्टी, मग, डंडा
पढ़ाई व दंड
हॉस्टल व स्कूल जीवन
समूह 2.
कॉलगेट, ब्रुश, फोन, किताब, नेल कटर
पढ़ाई  व दंड
स्कूल मे अफसर का दौरा
समूह 3
डंडा, बैग, गिलास, स्टूल, कॉपी
पढ़ाई, दंड, बाल विवाह 
स्कूल
समूह 4
घड़ी, किताब, रंग, दर्पण व पेंसिल बॉक्स
पढ़ाई
स्कूल
समूह 5
पत्ता, बोतल, झाड़ू, लकड़ी, सोना
जेंडर भेद, अंधविश्वास  
घर समाज
समूह 6
बैग, प्लेट, चाकू, कपड़े, साबुन
मोलभाव
सब्जी का ठेला




समूह 7
पत्ते, गिलास, फूल, दुपट्टा व झाड़ू
अंधविश्वास
अस्पताल व भोंपा
लगभग आधा घंटा काम करने के बाद बच्चे बड़े समूह मे लौट आए। सबने तैयारी के साथ अपनी प्रस्तुतियाँ दीं। यहाँ भी चीजें दोनों रूपों में इस्तेमाल  हुईं अपने वास्तविक रूढ रूप में तथा प्रतीकात्मक व काल्पनिक रूप में। परंतु बच्चों के चीजों के साथ काम करने का एक पैटर्न समझ मे आया कि भले ही चीजों के मामले में हर समूह के पास अलग-अलग चीजें थीं, कथानक व घटनाओं का वैविध्य भी स्वाभाविक रूप से अपेक्षित था लेकिन उनमें गूँथे हुए विचार लगभग समान ही थे। शायद बचपन में चीजों से पेश आने में बच्चों में ज्यादा महारत होती है। किसी भी वस्तु से वे मनचाहा करवा सकते हैं। शायद इसी लिए उन्होने विविधता पूर्ण चीजों के बावजूद अपनी ज़िंदगी के सबसे निकट के व तल्ख अनुभवों व विचारों को अभिवक्ती दी, जो उनके कॉमन से हैं।
इस गतिविधि में चीजों की मार्फत एक सौद्देश्य शैक्षणिक प्रक्रिया की और हम बढ़ चुके थे। छोटी नाट्य प्रक्रियाओं से घटनाओं, कहानियों से होते हुए बच्चों के मुद्दों तक पहुँच चुके थे जो उनके सबसे निकट के है। इन्हीं में से किसी एक पर आगे के दिनों और फोकस्ड होकर काम किया जाना है।
मिला कुंजी वाक्य उर्फ गुड्डी गायब है।  
 एक समूह की प्रस्तुति का दृश्य था कि कक्षा कक्ष में अध्यापिका बच्चों की हाजरी करती है। बच्चे “यस मैडम” बोलते हैं। अब टीचर गुड्डी का नाम पुकारती है। कोई आवाज नहीं आती। टीचर दुबारा नाम लेती है तो एक बच्ची बोलती है, “गुड्डी नहीं है।” टीचर पूछती है, “कहाँ है?” बच्चे कहते हैं – “गुड्डी गायब है!”  
रोलप्ले खत्म होने के बाद हमने “गुड्डी गायब है...” वाक्य को खोलना शुरू किया। हमने लड़कियों से कहा कि अभिनय में और ज्यादा सच्चाई लाने के लिए विवरणों में और गहराई लाना जरूरी हो जाता है। फर्ज़ करो कि गुड्डी स्कूल में नहीं है तो वह कहाँ हो सकती है। इसकी चर्चा में उन सभी ठिकानो को टटोला गया जहां एक स्कूल से ड्रॉप आउट के बाद लड़की के होने की संभावनाएं हो सकती हैं। चर्चा में यह पता ही नहीं चला कि कब यह वाक्य “गुड्डी गायब है” रोल प्ले के संदर्भ विशेष की गुड्डी से निकल, सामान्यीकृत होकर एक आम लड़की या महिला की स्थिति का रूपक बन कर सामने आ गया। चलो, जहां तक चले इस रूपक से ही आगे बढ़ा जाए...
एक सवाल किया गया, “और कहाँ कहाँ से गुड्डी गायब है ?”
“अस्पताल से... बस से ... बस स्टैंड से .... शहर से .... गाँव से... गली ... से .... घर से .... ”
“बस, गयाग करने के तरीके अलग-अलग हैं।”
इन्हीं तरीकों में से एक-एक तरीके पर चर्चा करने व उस पर एक कहानी लिख लाने का होमवर्क तीनों कक्षाओं के मिश्रित समूह बनाकर दिया गया। आशय यह भी था कि एक तो होमवर्क के बहाने लड़कियां उन प्रक्रियाओं के बारे में मिल कर सोचेंगी जो लड़कियों को वंचित बनती हैं, दूसरे मौखिक अभिव्यक्ति पर आज काफी काम हो चुका था इसलिए थोड़ा ठहरकर लिखित अभिव्यक्ति भी उभर कर आ सकें।  
अगले दिन सुबह केजीबीवी में पहुँचते ही लड़कियों ने एक्टिविटी हाल में इकट्ठे होकर कहानियाँ सुनाईं।
एक कहानी में संयुक्त परिवार है जहां महिला को अब और लड़कियां न जनने की हिदायत मिल रही है।
एक कहानी, ऐसा लगता है इसी कहानी को आगे बढ़ाती है, जिसमे एक दंपत्ति डॉक्टर से गुजारिश करता है कि वह अल्ट्रासाउंड के नतीजों को जेंडर में अभिव्यक्त कर दे।
तीसरी कहानी भी पहली वाली का तीसरा एपिसोड लगती है, जिसमें कन्या भ्रूण समाप्ति की ओर है।
चौथी कहानी में खाने की थाली में संतुलन का गड़बड़झाला दिखता है। लड़के की थाली बनाम लड़की की थाली।
पाँचवी कहानी में लड़की की पढ़ाई छुड़ाई जा रही है।
छठी कहानी में एक छोटी लड़की का विवाह किया जा रहा है।  
सभी कहानियाँ पढ़कर समझ में आया कि इन सभी कहानियों में कहानियों का प्लाट तो है लेकिन अभी इनकी और फिलिंग होनी बाकी है।
मैंने कहा, “ये कहानियाँ अभी कुछ विवरणों को चाह रही हैं।” उदाहरण के लिए लड़कियों को निम्न वाक्यों पर ध्यान देने के लिए कहा –
“महिला पर ससुराल वालों ने भ्रूण जांच करने का दबाव बनाया।”
“घरवालों ने लड़की की पढ़ाई छुड़ा दी।”
उपरोक्त वाक्यों पर गौर करें तो यहाँ शब्दों के तीन युग्म हैं।  जैसे – (एक) महिला व लड़की (दो) ससुरालवालों, घरवालों और (तीन) दबाव बनाया तथा छुड़ा दी। लड़कियों से कहा कि पहले युग्म में कहानी के केंद्रीय पात्र हैं इनमे जान तो डालनी ही पड़ेगी। इसके लिए पहले इनका नामकरण करना होगा तभी पात्र का आगे के चरित्र उभरेगा। दूसरे युग्म की संज्ञा भी जातिवाचक है इन्हे व्यक्तिवाचक करने पर कहानी के निर्दोष पात्र बच सकते हैं। कहानियाँ तो आखिर इंसाफ करती हैं न। मुख़तसर में लड़कियों से कहा गया कि जो पात्र ओप्रेसर हैं उन नामों व रिश्तों कों भी संज्ञा दीजिए। तीसरे युग्म के बारे में तफसील इसलिए दी कि इसी से ही कहानियों में संवाद आ पाएंगे। लड़कियों से कहा गया कि आपने लिखा कि पढ़ाई छुड़ा दी। लेकिन यहा यह नहीं पता चल रहा कि किसने क्या कह कर या कर के पढ़ाई छुड़ा दी, या क्या कह कर दबाव बनाया ? यहाँ कुछ बातचीत की गुंजाइश है जिसे दिये बिना कहानी में सच्चाई नहीं आ पाएगी।   अब कुछ क्रिएटिव लड़कियों के ग्रुप ने एक घंटे का समय लिया और कहानियों को मरम्मत करके सोंप दिया।
सभी कहानियों में एक क्रम नज़र आता है। अगर गुड्डी भारतीय महिला का रूपक है तथा गुड्डी को सभी कहानियों का केंद्रीय पात्र मानें तो दरअसल ये सभी कहानियाँ एक ही कथा के विभिन्न सोपान है।
तटस्थता मतलब आइडिया ग्रुप
अब लड़कियों के समूह उनकी रुचि और सामर्थ्य के हिसाब से बनाने का समय था।
एक समूह अभिनेताओं का
दूसरा समूह संगीत का
तीसरा समूह मंच सज्जा के लिए डिज़ाइनर्स का
लड़कियों का एक ऐसा तटस्थ समूह था जिसने किसी भी समूह में जाने की रुचि नहीं दिखाई। एक बार तो मन में आया कि सबको बराबर संख्या में प्रत्येक समूह में धकेल दिया जाए। यह बहुत आसान है। कई बार इसे संभावित एक मात्र विकल्प के रूप में किया भी है। हमेशा शिक्षक का आसान विकल्प की और जाना नवाचार की सम्भावना को कुचलना भी होता है। अचानक मुझे ख्याल आया... मैंने कहा कि यह आइडिया समूह है। यह समूह हमारे साथ रहेगा... विशेष तौर पर अभिनेताओं के समूह के साथ। यह विचार रंग भी लाया। जब हम अभिनेताओं के साथ स्क्रिप्ट पे काम कर रहे थे तब इस तथाकथित तटस्थ समूह से आइडिया तो आए बल्कि अधिकतर ने अपनी तटस्थता को भंग करते हुए समय-समय पर आकार कहा कि क्या यह मैं ट्राई कर सकती हूँ? इस प्रकार आइडिया  समूह का आइडिया काम कर गया।
गहरे पानी पैठ
अभनेताओं वाले समूह के साथ स्क्रिप्ट पर काम आगे का कहानी पर काम करने के दौरान स्क्रिप्ट के संवाद लगभग लिखे जा चुके थे। उनके सम्पादन व संयोजन के साथ अभिनय पर काम समांतर रूप से चल रहा था। गुड्डी गायब है यह तथ्य हर लड़की के लिए कोई पहेली जैसा नहीं था। इस अभिधा को वे व्यंजना के रूप में प्रयोग करना सीख चुकी थीं। जब ऐसा था तो उन्हे पता था कि पूरे भारत मे 1000 पुरुषों की तुलना में कितनी गुड्डियाँ गायब हैं। मालूम करना था तो राजस्थान का लिंगानुपात। गूगल पर लिख कर एक बार एंटर मारने पर आ गया।
लेकिन लड़कियों के सवाल इससे आगे जाते हैं-
जोधपुरा का ?
लूनी का?
गाँव नंदवान का?
इसकी पड़ताल में जनगणना 2011 के दस्तावेज़ खंगाले गए। वहाँ जनसंख्या के आंकड़े तो हैं लेकिन लिंगानुपात तो निकालना सीखना होगा... टीचर्स और टीम के लिए चुनौती ... मदद लेना जारी... यहा फोन लगाओ... वहाँ फोन लगाओ ... भंवर जी से पूछो ... खुद भी हिसाब लगाओ ... गणित के नतीजे पर पहुँचना बहूत उत्साह वर्द्धक होता है। जनसंख्या के इन आंकड़ों ने नाटक के आखिरी दृश्य को एक अद्भुत गणितीय अभिव्यक्ति बना दिया।
नाटक के आखिरी दृश्य मे बाल विवाह के आखिरी संवाद "स्वाहा..." के पश्चात जब एक लड़की आकार बोलती है, "इस तरह एक और गुड्डी गायब हो गई..." तो यह सिलसिला चल पड़ता है।
"इसी तरह रोज हजारों लाखों गायब होती हैं..."
"अलग-अलग तरीकों से... "
“पूरे देश में...”
"आपके राज्य मे... "
"आपके शहर में ... "
"आपके गाँव में ... जी हाँ नंदवान में ... "
नंदवान की कुल जनसंख्या है .........5648  
"नंदवान में पुरुषों की संख्या है ........2893 "
"नंदवान में महिलाओं कि संख्या है ........2755  "
"सीधा सा गणित है कि आपके गाँव नंदवान में 138 गुड्डियाँ गायब है।"
"जी हाँ, 138 गुड्डियाँ गायब हैं आपके नंदवान में ..."
"कुछ सुना आपने?"
केजीबीवी के आँगन के बीच में खड़ी लड़कियां अपना सवाल चारों और से दर्शकों भरे बरामदों तथा छज्जों की और उछालती हैं। सबसे पहले वे सामने की खास चार कुर्सियों से मुखातिब हैं। इन चारों कुर्सियों पर चार खास महिलाएं बैठी हैं। दो पंचायतों की दो सरपंच, एक उप सरपंच,  एक पंचायत समिति सदस्य। तीन घूघट में हैं। जवाब शायद यहाँ है लेकिन पुरानी जमी हुई खामोशी दिखाई दे रही है। अब लड़कियां दायीं और की दर्शक दीर्घा से भी पूछती हैं, “कुछ सुना आपने?”
यहाँ गाँव के प्रोढ़ पुरुष बैठे हैं। ये सामने की कुर्सियों की खामोशी की एक वजह भी हो सकते हैं। सवाल इधर की दीवार से भी टकराकर लौट आया। लड़कियों ने अब सवाल सामने के छज्जों पर बैठे नवयुवक व नवयुवतियों के समक्ष शटलकोक सरीखा उछाल दिया। यहाँ शायद प्रश्न के उत्तर हैं और प्रश्न के प्रतिप्रश्न भी। लेकिन सवालों से पेश आने का होंसला व अभ्यास नहीं। अब एक खुसर-पुसर शुरू हो गई। लड़कियों ने फिर पूछा, “कुछ सुना आपने.... कुछ कहना है आपको...?”
कोरस – “नहीं कुछ नहीं सुना... ”
कोरस – “क्यो...?”
कोरस – “क्योंकि जनता ऊंचा सुनती है।”  

(कृपया अपनी टिप्पणी अवश्य दें। यदि यह लेख आपको पसंद आया हो तो शेयर ज़रूर करें।  इससे इन्टरनेट पर हिन्दी को बढ़ावा मिलेगा तथा  मेरी नाट्यकला व  लेखन को प्रोत्साहन मिलेगा। ) 


दलीप वैरागी 
09928986983 

Friday, December 16, 2016

भाषा शिक्षण का एक अनुभव: कहानी तो किसी पे भी बन सकती है

दिनांक : 8/ 12/ 2016
मैंने कक्षा में जाते ही कुछ वाहियात किस्म के सवाल पूछे, जैसे  - “आप क्या पढ़ रहे हैं?” लड़कियों का स्वाभाविक सा जवाब था, “सामाजिक ज्ञान।” मेरे हाथ क्या लगा? सवाल इसलिए व्यर्थ था चूंकि इसके पीछे कुछ जाने की इच्छा थी ही नहीं। लड़कियां अर्द्धवार्षिक परीक्षा की तैयारी कर रही थीं। यह मुझे पता था। मैं कुर्सी में धंसकर  आगे की तरतीब सोचने लगा। जवाब का सिरा थाम के वार्तालाप का सेतु बांधने की कोशिश की, “आपको सामाजिक ज्ञान पढ़ने में यानि समझने में कोई दिक्कत हो तो बताएँ।” मुझे लगता है सवाल से ज्यादा अहम संप्रेषित हुआ। लिहाजा लड़कियों ने या तो सवाल सुना ही नहीं या जवाब देना उचित नहीं समझा। बातचीत के लिए जमीन अभी समतल नहीं हुई थी। मेरे सामने शेरगढ़ कस्तूरबा विद्यालय की कक्षा 6 की लड़कियां बैठी हैं। कक्षा का विभाजन व बैठक व्यवस्था दो समूहों में है – एक समूह जो शिक्षिकाओं के मापदण्डों के आधार पर कक्षा 6 की दक्षताओं के अनुरूप हैं। दूसरा समूह उन लड़कियों का है जो पढ़ने – लिखने के बुनियादी कौशलों को हासिल करने में अभी संघर्षरत हैं। इन्हे कक्षा दो के स्तर की पुस्तकें दी हुई हैं। अभी पिछले माह की गई बेसलाइन मूल्यांकन की रिपोर्ट के अनुसार ज़्यादातर लड़कियां अभी पढ़ना नहीं जानती हैं।
मैं कमरे को निहार रहा था और बातचीत के सूत्र तलाश रहा था। मुझे लगता है कि किसी भी कक्षा में शुरू के पाँच मिनट शिक्षक के लिए बहुत आसान नहीं होते हैं। मेरे मामले में तो हमेशा ही ऐसा होता है चाहे बच्चे परिचित हों या अपरिचित। इन लड़कियों से मैं पहली बार मिल रहा था। मैंने नाम बताया और अपने बारे में संक्षिप्त परिचय दिया। इस बार फिर मैंने एक और ऐसा सवाल किया जिसका जवाब मुझे पहले ही पता था, “कहानी किस-किसको पसंद हैं।” जवाब में आवाज़ नहीं हाथों हा हवा में लहराना हुआ। इस सवाल के जवाब में मुझे एक और सवाल  एक अंकुर फूटता दिखा... मैंने कहा, “ये कहानियाँ आती कहाँ से हैं?”
“किताब से... ”
“लाइब्रेरी से... ”
“नानी से... ”
दादी से... मम्मी से ... टीवी से .... रेडियो से ... अखबार से .... दोस्त से... सहेली से... पड़ौसी से......
निरर्थक से सवालों के बीज इतनी जल्दी बातचीत की फसल के रूप में लहलहा उठेंगे यकीन न था। लड़कियां उमंग के साथ बातचीत में जुट गईं।  अब मेरे पैर भी सख्त मिट्टी पे खड़े थे मैंने पूर्व प्रश्न की बुनियाद पर ही दूसरी ईंट रखी, “अच्छा ये बताओ कि कहानी किस – किस पर बन सकती है?”
एक झटके में हाथों की फसल फिर कमरे में लहलहा उठी। हाथों की गिनती से मुझे समझ आ गया कि अब हम किधर की दिशा ग्रहण करने वाले हैं। लड़कियों की शब्दावली का जायजा लेने के लिए मैंने उन्हें कहा कि आप बारी-बारी से बोलते जाएँ और मैं ब्लैक बोर्ड पर उन्हें लिखता जाऊंगा। निम्नलिखित शब्द बोर्ड  आकार लेने लगे। जो याद रह गए वे हैं -
बकरी
नाना
नानी
हाथी
मक्की
किसान
शेर
कुत्ता
दादा
रानी
कौआ
मक्खी
चिड़िया
मोर
पत्ता
दादी
पानी
औरत
हिरण
कबूतर
चोर

राजा





मैं शब्दों को बोर्ड पर जहां-तहां छितरा कर लिख रहा था। इसके पीछे था आज का उद्देश्य – शब्द पठन। जब बोर्ड पर चार-पाँच शब्द आते हैं तो शिक्षक के मन में उनको लेकर कई वर्गीकरण के विचार उभरने लगते हैं। जैसे सजीव – निर्जीव, जानवर-पक्षी या मनुष्य इत्यादि। मैंने इन वर्गीकरन के आधार पर इन शब्दों को बोर्ड पर न लेकर आगे की गतिविधियों के लिए स्थगित कर दिया। चूंकि इन लड़कियों के साथ पढ़ना सीखने के साथ काम किया जाना है इसलिए मैं एक जैसी ध्वनि वाले, शब्द मैत्री वाले या फिर जिनमें मात्राओं का कोई पैटर्न दिखाई दे, उन्हें एक जगह, पास-पास लिखना शुरू कर दिया। ताकि लड़कियों को पढ़ने में, अंदाजा लगाकर शब्द को पहचानने में मदद मिल सके।    
बोर्ड के शब्दों से भर जाने के बाद यह  बात भी स्पष्ट को गई कि कहानी में दुनिया की कोई बी शै आ सकती है। थोड़ी सी चर्चा के बाद ग्रुप इस निष्कर्ष पर भी पहुँच गया कि कहानी कोई भी बना सकता है चाहे वह पढ़ा-लिखा या या न हो। यह भी तय किया कि आज हम मिलकर एक कहानी भी लिखेंगे।
अभी तय यह हुआ कि पहले कोई लड़की बोर्ड के पास आकार इन सभी शब्दों को पढ़ के बताए। एक साथ चार हाथ हवा में लहराए। एक को बुलाया गया जिसे अच्छे से पढ़ना आता है। लड़की ने एक-एक करके सारे शब्दों को पढ़ दिया। फिर मैंने कहा कि कोई लड़की शब्दों पर उंगली रख कर एक बार पढ़ो। एक और लड़की ने आकर शब्दों पर उंगली रख कर वाचन किया।   इसमें कोशिश यह थी कि जिन लड़कियों के लिए यह उक्ति प्रचलित है कि “वे नहीं पढ़ सकती .... या इन्हें तो कुछ नहीं आता” वे इस सहभागी वचन प्रक्रिया में बोर्ड के शब्द जाल में से ध्वनियों व आकारों का तारतम्य व पैटर्न पकड़ पाएँ और उनके दरम्यान कोई संबंध समझकर अपने मन की छवियों को इन इबरतों के साथ रख कर देख लें। ये वो लड़कियां नहीं हैं जिन्हें  बिलकुल भी अक्षरों का एक्सपोजर न हो। बल्कि इनमे से अधिकतर तो 5- 6 सालों से अक्षरों के महासागर के भंवर में डोल रही हैं। बस इनके हाथ नहीं लगता है तो अर्थ रूपी किनारा।
तीन-चार बार लड़कियों (जो पहले से पढ़ सकती हैं) पढ़वाने के बाद  मेरा लक्ष्य अब वे  लड़कियां थीं जिनके बारे में यह प्रचलित था कि वे “पढ़ नहीं सकती”। अब मैंने इसे हल्का सा खेल का रूप दे दिया- दोना समूह से बारी बारी से एक लड़की आएगी और पढ़ेगी। इस बार बारी थी दूसरे वाले ग्रुप की। थोड़े संकोच के साथ आकर बोर्ड पर खड़ी हुई, मैंने कहा, “आपके लिए छूट है कि आप कहीं से भी पढ़ सकती हैं।” लड़की ने शुरू से शुरू किया जैसे ही उसने दो शब्दों को पढ़ा पीछे से दो लड़कियों के ताली बजने की आवाज़ आई। इन तालियों का समर्थन बाकी लड़कियो की नजरों में दृश्यमान था। यह वह  लड़की थी जिसके बारे में प्रचलित है, “वह नहीं पढ़ सकती।” अब वह उंगली बोर्ड कि और इंगित किए धीमें- धीमे पढ़ रही है अगले शब्द पर जाने से पहले पिछले को देखती है, मन मे बुदबुदाती है फिर मुखर होती है। आवाज़ बहुत धीमी है। उसकी आवाज को सुनने के लिए कमरे के शोर ने भी अपने आप को उसी कि फ्रिक्वेंसी पर ट्यून कर लिया है। वह पढ़ रही है। शब्द दर शब्द। आखिर जैसे ही बोर्ड पर का आखिरी शब्द उच्चरित किया तो उसकी ध्वनि से करतल ध्वनि शुरू हुई और पूरा हाल गुंजाएमान हो गया। लड़की के लिए इल्म का एक तिलिस्म खुलने के लिए बाकी आलिम लड़कियों का अहतराम था।
इस तरह दोनों समूहों से अनवरत क्रम चलता रहा। सबने पढ़ा। मज़े से पढ़ा। उत्साह से पढ़ा। इस गतिविधि में कोई नहीं थी जो निरक्षर थी।  उनकी टीचर कि नज़रें भी आश्चर्यचकित थीं।
किसी ने कहा, “सर कहानी तो अभी बाकी है।”
मैंने कहा, “कहानी किस पर बनाएँ ?”
लड़कियाँ बोलीं, “कहानी तो किसी पर भी बन सकती है।”
मैंने कहा, “इतने सारे नाम लिखे हैं, तय करके बताओ इनमें से किस पर लिखें?”
“मोर”
 “बिल्ली”
“शेर.... चूहा .... खरगोश....... ” खूब सारी आवाज़ें आने लगीं।
एक लड़की बोली, “सर, जानवरों की नहीं हम इंसान की कहानी बनाएँ।”
दूसरी लड़की – “किसान की कहानी बनाते हैं।”
किसान पर सबकी सहमति बन गई। 
कमरे की पिछली दीवार पर एक और ब्लैक बोर्ड बना हुआ था। चूंकि सामने वाले बोर्ड पर शब्द लिखे हुए थे उसे हमने मिटाना उचित नहीं समझा। हमने तय किया पीछे वाले बोर्ड का प्रयोग करते हैं। सब लड़कियाँ उस और घूम गईं।
मैंने लड़कियों से कहा कि कहानी का शुरू का वाक्य मैं लिख देता हूँ, बाकी की कहानी आपको वाक्य दर वाक्य पूरी करनी है। मैंने वाक्य लिखा –
एक किसान था।
मेरे लिए पहला वाक्य लिखना आसान था। लिकिन कहानी में पहला वाक्य जितना आसान होता है दूसरा वाक्य उतना ही मुश्किल होता है। क्योंकि वह किसी अज्ञात घटना में धंसा हुआ होता है जिसे अभी कल्पित कियाया जाना बाकी है। दूसरे वाक्य के अवतरित होने से पहले सोचने वाले के मस्तिष्क में कहानी की एक रूपरेखा होना लाज़मी होती है। भाषण में शायद इसके उलट होता है वहाँ पहला वाक्य एक बड़ी चट्टान होती है। मैंने लड़कियों से कहा इसका दूसरा वाक्य सोचिए। लड़कियां एक दूसरे की तरफ ताकने लगीं। कुछ लड़कियों के सिर्फ बुदबुदाने का स्वर है लेकिन कोई मुखर नहीं हुई। फिर मैंने कहा कि आपका कोई भी बोला वाक्य इस कहानी का दूसरा वाक्य हो सकता है। देखें कौन लड़की अपना पहला वाक्य कहानी में जोड़ती है, मेरे ऐसा कहने पर उषा खड़ी हुई और बोली-
“वह इधर – उधर घूम रहा था। ”
उषा वही लड़की है जिसके बारे में पूर्व धारणा है कि वह पढ़ नहीं सकती। लेकिन उसके पास भाषा है, एक जिंदा भाषा। जिसके साथ वह सोचने का काम करती है। जिसके माध्यम से वह दुनिया से जुड़ती है। वह कल्पनाएँ करती है , सपने देखती है और उन्हें सहेजकर स्मृति में रखती है। उसी कोश में से एक वाक्य इठला कर अब श्यामपट्ट पर जा चिपका है। बोर्ड का पाठ अब उसी रंग और शक्ल का है जो उसकी स्मृतियों मे बंदनवार सा आच्छादित है। अब उसके लिए पाठ और उसके शब्द सहोदर से हैं। शायद इसे ही तो  पढ़ना कहते  है।
उषा के लिए एक बार कमरा फिर तालियों से गुंजाएमन हुआ।
अब तीसरे वाक्य के लिए जद्दोजहद शुरू हो गई। मैंने कहा, “उषा का किसान कुछ आवारा किस्म का व्यक्ति लग रहा है। क्या आप उसके घूमने को कोई उद्देश्य देना चाहते हो? उषा की ही तरह संतोष, दरियाव पूजा जैसी लड़कियां हैं जिन्हें पढ़ने में दिक्कत है। इस बार दरियाव खड़ी हुई और बोली –
“वह खाने के लिए चीजें तलाश रहा था।”
दरियाव ने किसान की आवारगी को एक मक़सद देकर उसे अपने गाँव के ही किसी दुनियादार व्यक्ति की शक्ल दे डाली जो सुबह से शाम तक खाने के जुगाड़ में लगा रहता है। ज़िंदगी भर प्रेमचंद के होरी  की  तरह रोटी की  मरीचिका के पीछे भटकता रहता है।
एक और लड़की ने जैसे होरी की विडम्बना को भाँप लिया और चौथे वाक्य के रूप में उसकी नियति को तय कर दिया और बोली –
“उसके पास खाने की चीज़ें खरीदने के लिए पैसे नहीं थे।”
अब तक कहानी घुटनों के बल चल रही थी लेकिन इस वाक्य के बाद उसमें पहिये लग गए। एक साथ कई लड़कियों के हाथ खड़े हुए वाक्य जोड़ने के लिए। एक हाथ बाकायदा उषा का भी है। इस बार मौका मिला कक्षा 6 के स्तर की लड़की को। उसने वाक्य दर्ज़ करवाया – “वह अपने भाई के पास गया और बोला कि मुझे कुछ पैसे उधार चाहिए।” मैंने और तफसील के लिए लड़की से सवाल किया कि वह कौनसे भाई के पास गया, छोटे या बड़े? शायद वह अपने अनुभव में गई या यूं ही तुक्का लगाया और वाक्य को यूं फिर से लिखवाया-
“वह अपने बड़े भाई के पास गया और बोला कि मुझे कुछ पैसे उधार चाहिए।”
झट से एक लड़की खड़ी हुई और बोली, सर लिखो –
“उसके भाई ने कहा कि मेरे पास पैसे नहीं हैं।”
ईश्वर जाने यह वाक्य अनुभव की तल्खी से जन्मा या फिर उसने बड़ी चतुराई से घटना में नया मोड दे दिया। लेकिन वाक्य बोर्ड की इबारत में दर्ज़ हो चुका था। अब कुछ लड़कियों की शून्य में सोचते हुए थीं और कुछ  लड़कियों के सिर हल्की गुफ्तगू के किए जुड़े और एक अंतराल बाद एक वाक्य किसान के लिए उम्मीद सरीखा कमरे की चुप्पी में उग आया –
“वह अपने दोस्त के पास गया और बोला कि मुझे कुछ पैसों की जरूरत है।”
इस वाक्य ने जहां कहानी में एक उम्मीद जगाई वहीं एक पूर्वाभास ने मुझे चिंतित भी कर दिया कि अब कहीं कोई लड़की उठ कर किसान की इस उम्मीद को भी समाप्त न कर दे। और कह दे कि भाई ने भी मना कर दिया। मैंने भी सोच लिया था कि यदि ऐसा हुआ तो मैं लड़कियों से सवाल जवाब करूंगा कि ऐसा क्यों किया आपने। लेकिन लड़कियां प्रेमचंद की तरह निर्दयी नहीं निकलीं उन्होने प्रेमचंद की तरह होरी को तिल-तिल नहीं रुलाया। उसके लिए यह विकल्प खुला रखा लेकिन सस्पेंस बनाए रखा। अब नया वाक्य था-
“दोस्त ने पूछा कि आपको कितने पैसों की जरूरत है?”
इस वाक्य का अगला वाक्य भी लगभग तय सा है। जो एक गणितीय संख्या होगा।  बस लड़कियों को किसान के अर्थशास्त्र का थोड़ा जायजा लेना है और हल्का सा मानसिक गणितीय आकलन करना है। जो भी, अब किसान ने कहा –
“मुझे पाँच सौ रुपयों की जरूरत है।”
वाह री लड़कियों, गज़ब आपकी बराबरी व न्याय की अवधारणा है आपकी ! आपने दोस्त की जेब भी किसान के ही नाप की सिल डाली। आखिर दोस्त से कहलवा ही दिया –
“इतने रुपये तो मेरे पास नहीं हैं।”
समझती क्या हैं ये लड़कियाँ ! पाँच सौ कोई बड़ी रकम तो नहीं थी, दिलवा देतीं तो क्या बिगड़ जाता दोस्त का? दोस्ती की सच्चाई पर संदेह अब लाज़मी हो गया है। आखिर लड़कियों के मन में क्या है? क्या कोई संभावना बची है? एक लड़की ने उठ कर संभावना को दोस्त में से ही निकाला। अब दोस्त आगे बढ़ कर पूछता है-
“आप इन पैसों का क्या करेंगे?”
लड़कियां भलीभाँति जानती हैं कि किसान की सबसी बड़ी जरूरत वही चीज़ होती है जिसे वह सबसे ज्यादा उपजाता है और खेत – खलिहान से घर तक का सफर तय करने तक वह चीज़ सबसे कम बचती है। एक लड़की अब किसान की बात को अगले वाक्य में रखती है-
“इन पैसों से मैं बाजरा ख़रीदूँगा।”
ब्लैक बोर्ड की सीमाएं निर्धारित हैं लेकिन सृजनशीलता की नहीं, यदि दो वाक्यों में बात खत्म न हुई तो दूसरे बोर्ड की इबारत को मिटाना होगा। लड़कियों ने इसे भी भाँप लिया और और दोस्त के एक वाक्य में कहानी को सुखांत बनवा दिया –
“आप अपनी जरूरत के जितना बाजरा मेरे घर से ले जाओ।”
इस एक वाक्य में लड़कियों ने न केवल कहानी को खत्म किया बल्कि समाज में लगभग खत्म होती इस तरह की विनिमय की परंपरा का मुजाहिरा भी करा दिया। अब किसान से औपचारिकता का वाक्य कहलवा कर घर भेज दिया।
कहानी बोर्ड पर आ चुकी थी। अब मेरा शिक्षक फिर जाग गया। मैंने लड़कियों से कहा कि जरा पढ़कर तो देखो कि अपनी कहानी कैसी बनी नहीं। अपनी कहानी  पद लड़कियों को जहां बोर्ड पर लिखी इबारत से तदात्मय स्थापित करने में मदद करता है वहीं कहानी बनी  पद उन्हे सफलता का अहसास कराता है। जो कि हमारी परंपरागत शिक्षण प्रक्रियाओं में दुर्लभ सा है। सभी लड़कियाँ अपनी कहानी  पढ़ने को आतुर थीं। इसमें भी पूर्व की शब्द पठन की प्रक्रिया की तरह ही कहानी को पढ़ा गया। सभी लड़कियों ने कहानी को पढ़ा। हाँ, उषा ने भी पढ़ा। सफलता व अपनापे के अहसास के साथ।
दूसरी कहानियों पर सवाल जवाब हो सकते हैं तो क्या इस पर भी लड़कियां बातचीत कर सकती हैं? मैंने कुछ सवाल किए भी जैसे -
“भाई ने किसान को पैसों के लिए क्यों मना किया होगा?”
लड़कियों ने चर्चा में बताया कि “ऐसा नहीं कि भाई के पास पैसे नहीं थे, वह पैसे देना ही नहीं चाहता था।”
मैंने पूछा, “इसका क्या सबूत है कहानी में?”
लड़कियां – “इसका सबूत यह है कि जब किसान पैसे मांगने गया तो भाई ने शुरू में ही मना कर दिया यह जाने बिना कि उसे कितने पैसे चाहिए। इससे साबित होता है कि वह पैसे देना ही नहीं चाहता था। जैसे दोस्त ने पैसों के लिए तब मना किया जब उसने जान लिया कि किसान को कितने पैसों की जरूरत है। इससे पता चलता है कि सच में ही दोस्त के पास पैसे नहीं थे।”
बोर्ड और कालांश की सीमाओं में जकड़ी इस इबारत को हो सकता है आप कहानी न माने। लेकिन एक कहानी आज शुरू हो चुकी है जो इस बोर्ड से भविष्य के क्षितिज तक जाएगी। लड़कियां की इस इबारत में हो सकता है कहानी न हो लेकिन लड़कियों के लिए अनंत संभावना है सृजनशीलता के मुस्तकबिल तथा एक शिक्षक के लिए शिक्षण की।  तत्काल मुझे एक संभावना  नजर आई । मैंने लड़कियों से कहा कि पहले वाले बोर्ड पर जो शब्द लिखे हुए हैं उन्हे अपनी नोटबुक में लिख लो लेकिन उन्हे जैसे के तैसा नहीं लिखना है। इस शब्दों में कई तरह के समूहों मे रख कर देख सकते हैं। मैंने लड़कियों से इस शब्दों को वर्गिकरण करके तालिकाबद्ध करने के लिए कहा।

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दलीप वैरागी 
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