anna hazare भ्रष्टाचार के खिलाफ एक मजबूत lokpal bill के लिए आंदोलन कर रहे है। पूरा देश अन्ना का समर्थन कर रहा है। हमारा समर्थन भी उनके साथ है। लेकिन हम ज़िंदगी भर किसी अन्ना का इंतजार क्यो करते है। जबकि रोज़मर्रा की जिंदगी मे अन्ना बनने के मौके आते रहते हैं। वो सही समय होता है अन्नागिरी दिखाने का। जैसा उस रोडवेज के कंडक्टर ने दिखाई। यह लेख मैंने अप्रेल 11 को अपने दूसरे ब्लॉग बतकही पर लिखा था। 15 अगस्त स्वाधीनता दिवस के अवसर पर मैंने डैशबोर्ड के आर्काइव से निकाल कर फिर पोस्ट किया है। |
Monday, August 15, 2011
एक रोडवेज कंडेक्टर की अन्नागिरी
पड़ौसी की आग से बीड़ी और चूल्हा तो जल सकते हैं लेकिन लट्टू नहीं...
जो उलझ कर रह गई है फाइलों के जाल में,
रोशनी वो गाँव तक पहुंचेगी कितने साल में ?
Wednesday, August 10, 2011
एक बातचीत
आज अपने पुराने और सीनियर साथी ओमपाल डुमोलिया से facebook पर चैट की । दरअसल ओमपाल जी ने मेरे पिछले ब्लॉग पोस्ट भाषा शिक्षण और विज्ञान पर टिप्पणी करके अपनी राय दी थी। सारा वार्तालाप इसी के इर्द गिर्द है। मैं सारे वार्तालाप को यही कॉपी करके ज्यों का त्यों पेस्ट कर रहा हूँ। इस वार्तालाप से यह नया विमर्श खुल रहा है । दोस्त लोग अपनी बात से इसे आगे बढ़ा सकते हैं। ओमपाल जी की टिप्पणी इस प्रकार है -
Ompal Dumoliya lekhak shahb lekh bhut hi accha h is trah ke lekhon se pdhne walon ke chkshu kulenge.do baat khna chahta hoon - treeka koi bhi ho skta h yadi kaam kiya jaye, dusri baat bhasha to sandrbh me sekhne ki baat bhi krte h is pr bhi thoda vichar krke baat me kuch jodo bhai taaki hum jaise logon ko bhi nya anubhav mil skega
अभी तो मैं अजमेर हूँ।
सर मैं खाना खाने जा रहा हु । बाद मे बात करता हूँ।
Tuesday, August 9, 2011
भाषा शिक्षण और विज्ञान
जब बच्चे को पहली बार किताब पढ़ना सिखाने की बात होती है तो हमारे यहाँ शिक्षण-विमर्श में दो–तीन तरह की शिक्षण पद्धतियों का जिक्र होता है—वर्ण शिक्षण पद्धति, शब्द शिक्षण पद्धति और संदर्भ पद्धति। पहले वाली वर्ण शिक्षण पद्धति हमारे यहाँ पुराने समय से प्रचलन में है। इस पद्धति से पढ़ना सीखने में बच्चों की अपनी मुश्किलें हैं, अर्थात इस तरीके से बच्चे आसानी से सीख नहीं पाते। इसकी जगह पर अन्य शब्द या संदर्भ शिक्षण पद्धति को केंद्र में लाने के प्रयास पिछले दो दशक से हो रहे हैं।
शब्द पद्धति से आशय है कि बच्चों को अर्थपूर्ण शब्दों के माध्यम से ध्वनियों की पहचान करवाएँ। संदर्भ पद्धति मानती है कि भाषा का सही उपयोग तभी सीखा जाता है जब शिक्षण बच्चों के संदर्भ, अनुभव, परिवेश और जीवन से जुड़ा हो। इनकी भी अपनी मुश्किल है कि ये टीचर के समझ में नहीं आती हैं। आज स्कूल में पढ़ाने वाला हर टीचर इस पद्धति के लिए प्रशिक्षित हो चुका है। हर साल के शिक्षक प्रशिक्षण में इन नवीन पद्धतियों से पढ़ना सिखाने के तरीकों पर बात होती है। बावजूद इसके देखने में आता है कि सभी स्कूलों में नए–पुराने शिक्षक बोर्ड पर पहले वर्णमाला रटाना, फिर उनकी एक–एक की बारहखड़ी बनवाना और यदि इस सारी कवायद में बच्चा कुछ ध्वनियों को पहचान जाता है तो फिर उन ध्वनियों को मिलाकर शब्दों की घुट्टी बनाकर पहली बार पिलाई जाती है। यह कड़वी डोज़ जो बच्चा आसानी से गटक जाता है; वह पढ़ते वक़्त हिज्जे करते, उँगलियों पर बारहखड़ी का हिसाब लगाते थोड़ा आगे बढ़ जाता है और ताउम्र वर्तनी की गलती करता है। यह कभी नहीं समझ पाता कि यह ह्रस्व और दीर्घ मात्राओं का भाषा में हकीक़त से क्या लेना–देना है। बाकी बहुत से बच्चे इस प्रक्रिया में पीछे छूट जाते हैं और पाँचवीं जमात तक पढ़ना नहीं सीख पाते हैं।
कई बार यह सोचकर हैरानी होती है कि क्या कारण है कि इतनी कवायद के बाद टीचर पुरानी परिपाटी को बदलना नहीं चाहते? क्या इसके पीछे परंपरावादी सोच है? कुछ नया न कर पाने की प्रवृत्ति है? या अज्ञान? अज्ञान कहना तो हिमाकत ही होगी। अगर इसकी रूट में अज्ञान नहीं तो क्या विज्ञान? इंसान किसी काम को पूरी निष्ठा से तभी करता है जब वह धर्मसम्मत हो या विज्ञानसम्मत। धर्म अर्थात आस्था; विज्ञान मतलब बुद्धि, विवेक, तर्क। लब्बोलुबाब यह कि काम का प्रेरण भाव से होता है और भाव का उत्स आस्था, विश्वास या तर्क–बुद्धि में। तो क्या भाषा शिक्षण की इस पहेली में विज्ञान और भाषा का कोई उलटफेर तो नहीं! मुझे लगता है कि इस उलटफेर को पकड़ने के लिए भाषा का स्ट्रक्चर और विज्ञान का अप्रोच और दोनों के अंतर्संबंध के समीकरण को समझना होगा।
कोई चीज़ इस जगत में है तो उसकी उत्पत्ति को समझने के दो तरीके हैं—एक, उसके ऐतिहासिक क्रमिक विकास को समझना, जो एक क्षणिक घटना नहीं है; किसी चीज़ को धरती पर बनने में करोड़ों साल का वक्त लगा है। दूसरा तरीका है कि प्रयोगशाला में किसी द्रव्य का रसायनशास्त्रीय तात्त्विक विश्लेषण किया और निष्कर्ष निकाला कि यह चीज़ अमुक–अमुक तत्वों से मिलकर बनी है। जैसे रसायनशास्त्र पानी का तात्त्विक विश्लेषण करके यह बताता है कि हाइड्रोजन के दो परमाणु और ऑक्सीजन का एक परमाणु मिलकर पानी बनता है (जबकि स्थापना यह होनी चाहिए कि पानी में हाइड्रोजन के दो तथा ऑक्सीजन का एक परमाणु होते हैं)। मुश्किल तब होती है जब हम विज्ञान के इस निर्णय की स्थापना को लेकर बैठ जाते हैं। रासायनिक विश्लेषण के लिए तो इसमें कोई दिक्कत नहीं, मगर इस स्थापना को लेकर चलें तो कुछ ज़्यादा हाथ नहीं आएगा। यदि ऐसे पानी बनता तो क्या बात थी—धरती पर हाइड्रोजन और ऑक्सीजन तो बहुत हैं! लेकिन पानी के असली स्वाद के लिए तो उसी पानी की ओर ही देखना होगा जो कुदरत की करोड़ों वर्षों की मेहनत का प्रतिफल है।
ऐसा ही कुछ भाषा के साथ है। भाषा भी उतने ही समय से धरती पर है जितना कि इंसान। भाषा भी व्यक्त संकेतों, शब्द, वाक्यों, छंदों में ही रहती आयी है। लेकिन भाषा-विज्ञान जब किसी भाषा का विश्लेषण करता है तो उसे इस प्रकार तोड़कर समझता है—ध्वनि–संकेत मिलकर शब्द बनते हैं और शब्द–शब्द मिलकर वाक्य तथा वाक्य दर वाक्य बात। यह भाषा के तात्त्विक रूप को समझने का तरीका तो है, लेकिन वास्तविक सत्य नहीं। किसी भी ‘समग्र’ को समझने के लिए टुकड़ों में तोड़कर देखना विज्ञान हो सकता है, लेकिन यह समझ लेना कि ‘समग्र’ टुकड़ों से मिलकर बना है, निरा अज्ञान ही कहलाएगा। विज्ञान एक प्रक्रिया है, उसे परिणति समझ लेना गड़बड़झाला खड़ा करता है।
भाषा शिक्षण के संदर्भ में ऐसा ही कुछ गड़बड़झाला हमारे सामूहिक अवचेतन में चलता है और हम मान लेते हैं कि शब्द ध्वनियों से मिलकर बने हैं, इसलिए सबसे पहले ध्वनि सिखाना जरूरी है, ध्वनि सीखने के बाद शब्द। जबकि भाषा कुछ अलहदा व्यवहार करती है। हमारे यहाँ शब्द ब्रह्म है। उसे खोलकर देखा जा सकता है लेकिन तोड़ा नहीं जा सकता। वह तो अजर है, अक्षर है, अविनाशी है। सीखने के लिए उसे पूरा ही सीखना होगा, अधूरा नहीं। इसलिए वर्ण पद्धति से शिक्षण दुरूह हो जाता है—उस तरह से प्रवाहमय नहीं, जैसी कि भाषा की तबीयत होती है।
ऐसा दूसरी कलाओं के साथ भी होता है। शास्त्रीय संगीत और नृत्यों को ही लें—इनको सीखना कितना श्रम और समय–साध्य होता है। पहले बाहर से चेष्टाओं और मुद्राओं को, स्वर–लिपियों को रटना पड़ता है। शुरू में ये निष्प्रयोजन-जान पड़ती हैं और काफी अभ्यास के बाद विद्यार्थी स्वयं रस–दशा तक पहुँच पाता है। जबकि लोकगीत और लोकनृत्य में पहली बार में ही रसानुभूति खुद भी करता है और दूसरों को भी करवाता है, क्योंकि लोकसंगीत का संस्कार उसके अवचेतन में है। दोनों ही रास्ते एक ही जगह पर पहुँचते हैं, लेकिन फ़र्क मार्ग की कठिनाई और सरलता का है।
यहाँ आकर लगता है कि विज्ञानसम्मत व्यवहार करने की जो हमारी नैसर्गिक आदत होती है, उसी के फलस्वरूप शिक्षक वर्ण पद्धति को छोड़ नहीं पाता—क्योंकि ऊपर से उसे यह विज्ञानसम्मत जान पड़ता है। इसके रूट में कहीं हमारा विज्ञान को देखने का नज़रिया भी है। कुछ इसे भी ठीक करने की जरूरत है।
सारांशतः यह कहा जा सकता है कि शब्द शिक्षण पद्धति एक तरह की लोकगीत की तान-सी है और वर्ण पद्धति शास्त्रीयता की-सी अनवरत कवायद। मार्ग एक ही सत्य को पकड़ने के हैं। तय राहगीर को करना है।
Monday, August 8, 2011
सिर्फ़ सेकुलर होना ही काफी नहीं सेकुलर दिखना भी चाहिए।
Sunday, August 7, 2011
"इनबॉक्स" भी पाठ्य सामग्री हो तो...
खैर हमने सवालों का सिलसिला आगे बढ़ाया । एक सवाल था ' आपके पास जब फुर्सत होती है तब क्या करते हो?' उसने झट से कहा " अपने मोबाइल मे गाने सुनता हूँ" इस जवाब ने हमारे अंदर सवालों की झड़ी लगा दी।
क्या बीरम को पढ़ना नहीं आता ?
क्या बीरम पढ़ना भूल चुका है ?
या बीरम को पढ़ने मे मज़ा नहीं आता है?
जवाब इनमे से कोई भी हो सकता है।
लेकिन एक बात है जो बीरम के बारे मे सभी कहते है वह यह कि उसके पास एक मल्टिमीडिया मोबाइल है जिसमे जिसमे वह मज़े से गाने सुनता है। उसने अपने मोबाइल की भाषा बदल कर हिन्दी कर रखी है। वह अपने मोबाइल पर एसएमएस लिख कर दोस्तों को भी भेजता है। ... लेकिन बीरम तो कहता है कि उसे पढ़ना नहीं आता है ... दरअसल मसला क्या है ? मसला सीधा यह है कि बिरम को जो पढ़ने के लिए दिया जाता है उसमे बीरम की कोई रुचि नहीं है । वह उसको अपना सा नहीं लगता ... बीरम को किसमे रुचि है ? यह कोई नहीं जनता ... शायद बीरम ... पक्का पता नहीं ... क्या बीरम की मोबाइल मे रुचि है ... तो बीरम कहता क्यों नहीं? शायद रुचियाँ बताने की जो परंपरागत लिस्ट में है, उसमे उसकी रुचि का शुमार नहीं है .... यह बात पक्की है कि बीरम को मोबाइल से खेलने मे मज़ा आता है ...
क्या बीरम पढ़ सकता है । बीरम को और मौके मिल सकते हैं । मौके उसकी तलाश मे हैं । पहुँच मे भी हैं। लेकिन क्या मौके मिलने से ही बीरम सीख जाएगा ? जी हाँ ! बीरम जरूर सीखेगा अगर उसकी पढ़ाई का ककहरा मोबाइल से शुरू हो । उसकी पहली किताब पौथी न होकर मोबाइल का इनबॉक्स बने तो कुछ बात बन सकती है । बीरम के लिए अभी सभी मौके चुके नहीं है । भले ही बीरम कहता हो कि उसका पढ़ाई मे दिमाग नहीं है । लेकिन मैंने कल बातों ही बातों मे उसके अंदर दबा के रखी पढ़ने कि इच्छा को पंजों के बल खड़े देखा है । इसलिए दोस्तो आप जब अगली बार बीरम से मिलें और उसको पढ़ने की बात करें तो उसके मोबाइल के बारे मे जरूर पूछे। क्योंकि उसकी प्रेरणा का उत्स वहीं पर है।
अलवर में 'पार्क' का मंचन : समानुभूति के स्तर पर दर्शकों को छूता एक नाट्यनुभाव
रविवार, 13 अगस्त 2023 को हरुमल तोलानी ऑडीटोरियम, अलवर में मानव कौल लिखित तथा युवा रंगकर्मी हितेश जैमन द्वारा निर्देशित नाटक ‘पार्क’ का मंच...
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पूर्वरंग इस एकल नाटक की पृष्ठभूमि में एक दुस्वप्न है। वह बुरा सपना हमने अपने बचपन में देखा था। यह शीत-युद्ध के आखिर का दौर था। दु...
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(इस लघु नाटिका को जयपुर शहर के मोती कटला माध्यमिक विद्यालय की लड़कियों के साथ नाट्यकार्यशाला के लिए लिखा गया था। इसका मंचन 6 जून 2015 को ब...
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20 फरवरी 2020 को Anubhav Sinha द्वारा निर्देशित फिल्म की स्पेशन स्क्रीनिंग जयपुर INOX में देखने का अवसर मिला। फिल्म के प्रमोशन के लिए अनु...